Bcom 1st Year Business regulatory Framework pdf notes

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CHAPTER WISE

CHAPTER 1Law of Contract (1872)
CHAPTER 2Special Contracts
CHAPTER 3Sale of Goods Act (1930)
CHAPTER 4Negotiable Instrument Act (1881)
CHAPTER 5the consumer Protection Act (1986)
CHAPTER 6Foreign Exchange Manegement Act (2000)
 

Bcom 1st Year Business regulatory Framework pdf notes

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सहमति

Define Consent

भारतीय संविदा अधिनियम के अनुसार वैध संविदा होने के लिए यह आवश्यक है कि पक्षों की स्वतन्त्र सहमति हो। धारा 10 के अनुसार, “वे सभी समझौते जो संविदा के योग्य पक्षकारों की स्वतन्त्र सहमति से किए गए हों”। अत: अधिनियम में ‘पक्षकारों की स्वतन्त्र सहमति’ होनी आवश्यक है। पक्षों की स्वतन्त्र सहमति तब कहलाती है जब दो व्यक्ति एक बात पर एक ही अर्थ में राजी हो जाते हैं। तब कहा जाता है कि उन्होंने सहमति दी है। सहमति तब स्वतन्त्र मानी जाती है तब वह उत्पीड़न, अनुचित प्रभाव (Undue Influence), कपट (Fraud), मिथ्यावर्णन (Misrepresentation) अथवा गलता (Mistake) के कारण न दी गई हो। उदाहरणार्थ-यदि ‘अ’, ‘ब’ के समक्ष 500 में अपनी गाय बेचने का प्रस्ताव रखे और ‘ब’ उस प्रस्ताव पर अपनी स्वीकृति दे दे तो यह समझाता। 

इसके विपरीत यदि ‘अ’ छुरा दिखाकर ‘ब’ से अपनी गाय ₹ 600 में लेने के मा सहमति ले ले तो इसे ‘ब’ की स्वतन्त्र सहमति नहीं कहेंगे। धारा 13 तथा 14 के अन्तर्गत सहमति का अर्थ दिया गया है। धारा 13 के अनुसार, “दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा दी हई सहमति तब मानी जाती है, जबकि वे एक ही बात पर एक अर्थ में समहमत हो गए हों।’ इंस सम्बन्ध में Raffles Vs. Wichellhaus (1864) का निर्णय महत्त्वपूर्ण है जिसके अन्तर्गत यह माना गया है कि दोनों व्यक्तियों की एक ही बात पर सहमति आवश्यक है। इस सम्बन्ध में Sarat Chandra Vs. Kanai Lal (1921) का निर्णय भी महत्त्वपूर्ण । जिसमें भिन्न-भिन्न भाव से व्यक्तियों की सहमति उचित नहीं मानी गई। उदाहरणार्थ- अ ‘ब’ से 100 गाँठे रुई, जो कि मुम्बई से “पीअरलैस’ नाम के जहाज द्वारा आने को थीं। खरीदने के लिए सहमत हो जाता है। “पीअरलैस’ नाम के दो जहाज मुम्बई से आने वाले थे। ‘अ’ क अभिप्राय उस जहाज से था जो अक्टूबर में आने वाला था, जबकि ‘ब’ का अभिप्राय दूस जहाज से था जोकि दिसम्बर में आने वाला था। ऐसी दशा में उन दोनों में कोई अनुबन्ध नहीं हुआ क्योंकि दोनों पक्षकार एक ही बात पर एक ही भाव से सहमत नहीं हुए। एक अन्य उदाहरण को लेते हुए ‘अ’ मिथ्यावर्णन करके ‘ब’ से एक प्रपत्र पर हस्ताक्षर करा लेता है। ‘ब का अभिप्राय केवल साक्षी के रूप में एक हस्ताक्षर करना था, जबकि ‘अ’ ने उससे एक पक्षकार के रूप में हस्ताक्षर कराए थे। ऐसी दशा में भी सहमति नहीं कह सकते, क्योंकि दोनों पक्षकार एक ही बात पर भिन्न-भिन्न भाव से सहमत होते हैं। 

धारा 14 के अनुसार स्वतन्त्र सहमति उस दशा में समझी जाएगी, जबकि वह (i) उत्पीड़न, (ii) अनुचित प्रभाव, (iii) कपट, मिथ्यावर्णन या गलती से प्रदान न की गई हो। यदि किसी पक्ष ने अपनी सहमति इन कारणों से प्रभावित होकर दी हो तो उसकी सहमति स्वतन्त्र नहीं मानी जाएगी। उदाहरणार्थ-यदि ‘अ’ छुरा दिखाकर ‘ब’ से एक चैक पर ₹ 10,000 के भुगतान के लिए हस्ताक्षर करा ले तो ऐसी स्थिति में ‘ब’ द्वारा चैक पर किए गए 

वैधानिक पर प्रभाव (Effect on validity)-

ठहराव में ‘सहमति’ न होने की दशः में वह अर्थ (void) होता है, परन्तु यदि सहमति तो हो, लेकिन स्वतन्त्र सहमति’ (Free consent) न हो तो जिस पक्ष की सहमति स्वतन्त्र नहीं है उसकी इच्छा पर ठहराव व्यर्थनीर (voidable) होता है। 

प्रस्ताव का अर्थ एवं परिभाषा 

(Meaning and Definition of Proposal)

किसी समझौते के लिए प्रस्ताव (Proposal) तथा उसकी स्वीकृति (झोनी आवश्यक है। धारा 2 (a) के अनुसार, जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति कार्य को करने अथवा न करने के विषय में अपनी इच्छा को इस आशय से प्रकट को व्यक्ति उसके कार्य को करने अथवा न करने के लिए अपनी सहमति प्रदान करे तो हम को प्रस्ताव कहते हैं। प्रस्ताव रखने वाले को वचनदाता या प्रस्तावक कहा जाता है । जिसके समक्ष प्रस्ताव रखा जाता है उसे वचनगृहीता कहते हैं। उदाहरणार्थ- ‘क’ र यह कहे कि वह 10 क्विटल गेहूँ ,175 प्रति क्विटल के हिसाब से बेचने के लिए तैयार कर कहेंगे कि ‘क’ ने ‘ख’ के समक्ष बेचने का प्रस्ताव रखा। इसी प्रकार ‘अ’, ‘ब’ से कहता के यदि ‘ब’ उसे ₹ 500 दे दे तो वह ₹ 700 का दावा न करे। यहाँ पर ‘अ’, ‘ब’ से दावा करने रुकने का प्रस्ताव रखता है। 

प्रस्ताव के मुख्य लक्षण

(Main Characteristics of a Proposal)-

प्रस्ताव में निम्नलिखित लक्षण होने चाहिए 

1. दोनों पक्षों का होना (Existing of two Parties)—प्रस्ताव के लिए दो पक्ष होने चाहिए एक वचनदाता और दूसरा वचनगृहीता, कोई भी व्यक्ति अपने आप प्रस्ताव नहीं कर सकता। 

2. प्रस्ताव का सकारात्मक अथवा नकारात्मक रूप (Positive or Negative  Proposal)-प्रस्तावक द्वारा किसी कार्य को करने या उससे विरत रहने की तत्परता अथवा इच्छा प्रकट की जाती है। इस प्रकार से प्रस्ताव किसी कार्य को करने (Positive) अथवा उसे न करने (Negative) से सम्बन्धित होता है। उदाहरणार्थ-यदि ‘हवाई प्रकाशन -40,00,000 में अपना कारोबार ‘चित्रा प्रकाशन’ को बेचने के लिए तैयार हो तो यह किसा कार्य को करने के सम्बन्ध में सकारात्मक प्रस्ताव कहलाएगा। इसके विपरीत, यदि हवाई प्रकाशन’  50,000 देकर ‘चित्रा प्रकाशन’ से कहे कि वह दो वर्ष तक उसके विरुद्ध प्रतियोग व्यापार न खोले तो इसे हम किसी कार्य को न करने के सम्बन्ध में नकारात्मक प्रस्ताव कहेंगे।। 

3. एक पक्ष द्वारा इच्छा प्रकट किया जाना (To make An Offer by one, Party)-एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष के समक्ष किसी कार्य को करने अथवा न करने के सम्बन्ना में इच्छा प्रकट की जाती है। 

4.सहमति प्राप्त करने का उद्देश्य (Aim to get Consent on the Proposal) एक पक्ष दूसरे पक्ष के समक्ष अपना प्रस्ताव इस दृष्टि से रखता है कि दूसरा पक्ष उस का करने अथवा न करने के सम्बन्ध में अपनी सहमति प्रदान कर सके। यदि कोई व्यक्ति दूसर, से सहमति लेने के लिए बात न कहे तो उसे न तो प्रस्ताव कहा जा सकता है और न पदाति ही दी जा सकती है। उदाहरणार्थ-‘अ’ अपनी मित्र-मण्डली में बैठकर यह र अपनी पत्री का विवाह किसी सुयोग्य वर से करना चाहता है. तब यह बात न ता । समक्ष प्रस्ताव है और न ही किसी व्यक्ति द्वारा इस पर सहमति ही दी जा सकती है। हैरिस बनाम निकरसन के मामले में प्रतिवादी ने यह विज्ञापन दिया कि वह अपना कुछ न लन्दन से दूर निश्चित स्थान पर नीलामी द्वारा बेचेगा। विज्ञापन के अनुसार वादी लन्दन से उस नियुक्त स्थान पर पहँचा, परन्तु उसने पाया कि वहाँ सामान नीलाम नहीं किया गया। इस पर वादी ने प्रतिवादी के विरुद्ध अनुबन्ध खण्डन के लिए वाद प्रस्तुत किया। यह निर्णय किया गया कि प्रतिवादी ने विज्ञापन द्वारा प्रस्ताव करने के लिए अपने केवल अभिप्राय की घोषणा की, वास्तव में कोई प्रस्ताव नहीं किया। 

इस प्रकार कोई अमुक कथन वास्तविक प्रस्ताव है या प्रस्ताव करने का केवल अभिप्राय, यह एक तथ्य सम्बन्धी प्रश्न है जिस पर न्यायालय मामले की सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर निर्णय कर सकता है। 

इस प्रकार बातचीत में किसी अभिप्राय के कथन मात्र से ही बाधित वचन नहीं हो जाता, यद्यपि दूसरे पक्षकार ने उस कथन मात्र के आधार पर ही कार्य किया हो। एक मामले में एक ससर ने अपने होने वाले दामाद को लिखा, “मेरी पुत्री.. का उस सम्पत्ति में एक भाग होगा, जो कि उसकी माँ की मृत्यु के पश्चात् मेरे पास होगी।” यह निर्णय किया गया कि यह ., केवल अभिप्राय का एक कथन मात्र था। 

प्रस्ताव सम्बन्धी वैधानिक नियम

(Legal Provisions in regard to Proposal)

माननीय न्यायाधीशों के निर्णय के आधार पर प्रस्ताव सम्बन्धी कुछ वैधानिक नियम बनाए गए हैं जिनमें से मुख्य इस प्रकार हैं –

1. प्रस्ताव विनय के रूप में हो (Proposal as a Request)-प्रस्ताव एक विनय के रूप में होना चाहिए, आज्ञा के रूप में नहीं। उदाहरणार्थ-यदि ‘कमल’, ‘दीपक’ से यह कहे कि वह दिल्ली जाकर उसके लिए स्कूटर ला दे जिसके लिए उसे पारिश्रमिक दिया जाएगा तो यह एक आज्ञा है, निवेदन नहीं, अत: प्रस्ताव नहीं कहलाएगा।

2. प्रस्ताव का विशेष अथवा सामान्य रूप (Proposal may be Specific or General)-किसी व्यक्ति-विशेष के सम्मुख प्रस्तुत किया हुआ प्रस्ताव ‘विशेष प्रस्ताव’ कहलाता है। इसके विपरीत, जनसाधारण के लिए सम्बोधित किया हुआ प्रस्ताव ‘सामान्य प्रस्ताव’ कहा जाता है। उदाहरणार्थ-यदि ‘कमल’, ‘कान्ति’ से अपनी घड़ी 200 में बेचने के लिए प्रस्ताव रखे तो यह स्पष्ट प्रस्ताव कहलाएगा और यदि वह विज्ञापन द्वारा समस्त जनसमुदाय को ₹ 200 में अपनी घड़ी बेचने के लिए प्रस्ताव रखे तो इसे हम सामान्य प्रस्ताव कहेंगे। इस सम्बन्ध में Carlill Vs. Carbolic Smoke Ball Company (1893) का निर्णय महत्त्वपूर्ण है जिसके अन्तर्गत कम्पनी की विज्ञप्ति के अनुसार, “जो कोई व्यक्ति कम्पनी की दवा प्रयोग करने के उपरान्त इन्फ्लुएन्जा का शिकार होगा उसे कम्पनी 1,000 पण्डि देगी।” श्रीमती कालिल ने दवा का प्रयोग किया। बाद में उन्हें इन्फ्लुएन्जा हो गया जिसके लिए उन्होंने वाद प्रस्तुत किया। कम्पनी ने अपनी दलील देते हुए इसे प्रस्ताव न कहकर प्रस्ताव के लिए निमन्त्रण कहा। बाद में यह दलील व्यर्थ मानी गई। 

न्यायालय के अनुसार विज्ञापन इनाम देने के अभिप्राय का एक कथन मात्र ही नहीं था; बाल्क एक निश्चय था, और यद्यपि प्रस्ताव किसी व्यक्ति विशेष के लिए न होकर सामान्य नता के लिए था, फिर भी वह ऐसे किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा स्वीकार किया जा ता था जिन्होंने अपने व्यवहार से अथवा शर्तों का निष्पादन करके उसे स्वीकार किया। 

3. प्रस्ताव की शर्ते निश्चित एवं स्पष्ट होना (Definite and Clear Conditi of Proposal)-अस्पष्ट (Vague) अथवा अनिश्चित (Uncertain) प्रस्ताव विधान प्रवर्तनीय नहीं होता है, अत: यह आवश्यक है कि प्रस्ताव की शर्ते निश्चित होनी चाहिए उसकी स्वीकृति नहीं की जा सकेगी। उदाहरणार्थ-एक भाग्यवादी दुकानदार एक ‘व्याण ” सन्नियम’ खरीदते समय यह कहे कि यदि यह भाग्यवान् हुई तो दूसरी वही पुस्तक खरी अस्पष्ट है और निश्चितता के अभाव में वह प्रस्ताव नहीं कहलाया जा सकता है।

4. प्रस्ताव द्वारा एक वैधानिक सम्बन्ध उत्पन्न होना (Creating Local Relations)-प्रस्ताव वैध सम्बन्ध स्थापित करने की दृष्टि से किया जाना चाहिए अन्यथा या संविदा नहीं हो पाएगा। इस प्रकार के प्रस्ताव जो सामाजिक रीतियों, परम्पराओं, प्रतिष्ठाओं अथवा मनोरंजन से सम्बन्धित हों, वैधानिक उत्तरदायित्व स्थापित करने के लिए प्रस्तुत किए हा नहीं कहे जा सकते; जैसे-नौका विहार, सम्मिलित अध्ययन, सम्मिलित घूमने जाना, पिक्चर जाना आदि।

उदाहरणार्थ-यदि ‘अ’, ‘ब’ को अपने यहाँ भोजन करने के लिए आमन्त्रित करे और उसकी आवभगत के लिए व्यंजनों पर अपार धनराशि व्यय करे परन्तु ‘ब’ कुछ कारणवश न आ सके तो ‘अ’ उस व्यय की गई धनराशि के लिए अभियोग नहीं चला सकता। इस सम्बन्ध में Balfour Vs. Balfour, (1919) का निर्णय महत्त्वपूर्ण है जिसमें श्री Balfour अपनी पत्नी के साथ इंग्लैण्ड छुट्टियाँ व्यतीत करने गया। वहाँ उसकी पत्नी अस्वस्थ हो गई और परिणामस्वरूप उसकी पत्नी को इंग्लैण्ड में ही रहकर इलाज कराना पड़ा। Balfour को अपनी नौकरी पर वापस लंका आना था। वापस आते समय उसने अपनी पत्नी को वचन दिया कि वह प्रत्येक माह 30 पौंड खर्च के लिए भेजता रहेगा। कुछ समय तक उसने उक्त रकम भेजी, परन्तु बाद में मतभेद के कारण उक्त रकम भेजना बन्द कर दिया। बाद में उसकी पत्नी ने उसके विरुद्ध वचन भंग का वाद प्रस्तुत किया।

5. केवल प्रस्ताव की इच्छा प्रकट करना प्रस्ताव नहीं (Mere Expressing Desire will not Constitute Proposal)- यदि कोई व्यक्ति प्रस्ताव करने की केवल इच्छा प्रकट करे तो उसकी इस इच्छा को प्रस्ताव नहीं कहा जा सकता। उदाहरणार्थ-‘अ’ द्वारा अपनी मित्र-मण्डली में अपनी पुत्री की शादी में  30,000 लगाने की बात केवल इच्छा है, प्रस्ताव नहीं। इस सम्बन्ध में Harris Vs. Nickerson (1973) का निर्णय महत्त्वपूर्ण है, जिसके अन्तर्गत प्रतिवादी ने यह विज्ञप्ति निकाली कि वह निश्चित तिथि को लन्दन से कुछ दूर अपने सामान का नीलाम करेगा, जिसके अनुसार वादी लन्दन से अमुक स्थान पर पहुँचा लेकिन नीलामी रद्द कर दी गई। इसके लिए वादी ने अपने हर्जाने का अभियोग चलाया। निर्णय में कहा कि यह केवल प्रस्ताव की इच्छा है, प्रस्ताव नहीं।

6. प्रस्ताव का संवहन आवश्यक (Communication of Proposal)-प्रस्ताव संविदा का रूप तभी ले सकता है जब उसकी स्वीकृति कर दी गई हो। स्वीकृति का प्रश्न उसा दशा में उठता है जबकि सूचना उस व्यक्ति तक पहुँच जाए जो उसकी स्वीकृति देना चाहता है। यह सामान्य नियम है कि कोई भी व्यक्ति प्रस्ताव की स्वीकृति उस समय तक नहीं दे सकता है ‘जब तक कि वास्तविक रूप में उस प्रस्ताव की जानकारी उस व्यक्ति को न हो प्रस्ताव दिया गया है। इस सम्बन्ध में Lalmon Shukla Vs. Gauri Dutt (1930) का निर्णय महत्त्वपूर्ण है। इसके अन्तर्गत वादी प्रतिवादी के यहाँ एक मनीम है जिसे वादी के खोए हए भतीजे की खोज के लिए भेजा गया। इसी बीच विज्ञप्ति में ₹ 501 का इनाम उस व्यक्ति को देने का वचन दिया गया जो खोए हुए बच्चे को ढंढ निकाले। निर्णय में यह कहा गया कि पस्ताव की अनभिज्ञता में उसकी स्वीकृति का प्रश्न ही नहीं उठता है। प्रस्ताव शब्दों अथवा आचरण द्वारा व्यक्त किया जा सकता है तथा लिखित, मौखिक अथवा गर्भित (व्यावहारिक अथवा परिस्थिति निर्मित) हो सकता है।

उदाहरणार्थ-रोडवेज अपनी बस देहरादून से गाजियाबाद तक एक निश्चित किराये पर चलाती है, यह रोडवेज का गर्भित प्रस्ताव है। जो भी यात्री यात्रा करेगा उसे निर्धारित किराया देना पड़ेगा।

7. प्रस्ताव तथा प्रस्ताव का निमन्त्रण पृथक् है (Offer and Invitation to make An Offer is not One Thing)-प्रस्ताव में दूसरे व्यक्ति की सहमति प्राप्त करने का उद्देश्य होता है जबकि प्रस्ताव के लिए निमन्त्रण में सहमति प्राप्त करने का उद्देश्य नहीं होता। इस प्रकार के समझौते में अन्तर करना कठिन होता है, जो मूलत: Prima Facie प्रस्ताव प्रतीत होते हैं लेकिन वास्तव में वे केवल प्रस्ताव के लिए निमन्त्रण मात्र (Invitation to make an offer) ही होते हैं। यह भिन्नता पक्षकारों के अभिप्राय पर निर्भर मामले की समस्त परिस्थितियों को ध्यान में रखकर निश्चित की जा सकती है। इस प्रकार स्वयं प्रस्ताव न करके दूसरों को प्रस्ताव करने के लिए निमन्त्रण देना दो पृथक्-पृथक् बातें हैं।

उदाहरणार्थ-

(i) रेलवे टाइम टेबिल,

(ii) नीलामी द्वारा विक्रय की सूचना,

(iii) टेण्डर के लिए आमन्त्रण,

(iv) कम्पनी का प्रविवरण पत्र,

(v) मूल्य सूची का निगमन तथा

(vi) मूल्य सम्बन्धी पूछताछ का उत्तर।

अनुबन्ध

Contract

संविदा दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच वैधानिक उत्तरदायित्व पैदा करने वाला समझोता है जिसकी परिभाषा भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 2 (h) के अनुसार इस प्रकार है-“कोई समझौता जो राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय हो, संविदा कहलाता है।” इसका परिभाषा विभिन्न विद्वानों ने इस प्रकार दी है- कोई भी समझौता जो दो पक्षों के बीच उत्तरदायित्व पैदा कर दे, संविदा कहलाता है।”

वैध अनुबन्ध के भावश्यक लक्षण अथवा तत्व 

यद्यपि सभी परिभाषाएँ एक हो दृष्टिकोण पर प्रकाश डालती है, फिर भी सर फैजारक पोलॉक द्वारा दी गई परिभाश अधिक वैज्ञानिक मानी जाती है और भारतीय अनुबस मानिक द्वारा दी गई परिभाषा इसी के समान है। इस प्रकार सब परिभाषाएँ सोडता के शामिक मस्तिान पर ही आधारित है, परन्तु वैज्ञानिक सविदा कया है, इसके बारे में सभी कानूननेता मौन है। इस दृष्टिकोण से धारा 10. संविदा को परिभाषा को स्पट करती है। इसके अनुसार, “के सभी समझौते संविदा है, जो न्यायोचित प्रतिफल और उद्देश्य के लिए, सविता करने की क्षमता बाले पक्षों की स्वतन्त्र सहमति से किए गए हो, जिन्हें स्पष्ट रूप से बबई भोषित कर दिया गया हो और जो किसी विशेष अधिनियम के आदेश पर लिखित या साक्षीद्वारा प्रमाणित एवं पंजोकर हो।” इसके आधार पर संविदा के मुख्य लक्षण निम्नलिखित है—

(1) दो पक्षों के बीच समझौता होना, प्रस्ताव तथा प्रस्ताव को स्वोजति (Other and Acceptance) 

(2) समझौता राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय (Enfonteable by law) होना, जिसके लिए निम्नलिखित बातें आवश्यक होगी 

(i) पक्षों में संविदा करने की क्षमता (Legal capacity of the parties), 

(ii) पक्षों की स्वतन्त्र सहमति (Free consent of the partics),

(iii) न्यायोचित प्रतिफल तथा उद्देश्य (Lawtul consideration and obist), 

(iv) समझौते का लिखित, साक्षी द्वारा प्रमाणित अथवा पेजोक्त होना

1. दो पक्षों के बीच समझौता होना (Agreement between two Partics)समझौतो के लिए दो या दो से अधिक पक्षो का होना आवश्यक है। एक पक्षकार के वैधानिक प्रस्ताव की स्वीकृति दूसरे पक्षकार द्वारा होनी चाहिए। समझौता व्यर्थ, अर्थनीय, अवैध तथा अप्रवर्तनीय नहीं होना चाहिए। इस प्रकार एक प्रस्ताव प्रस्तुत करने वाला होना चाहिए जिस प्रस्तावक (Proposer or Promisor) कहते हैं तथा दूसरा स्वीकार करने वाला होना चाहिए जिसे वचनदाता या वचनगृहीता (Promisee) कहते है। धारा (a) के अनुसार, जब कोई व्यर्थ तथा व्यर्थनीय संविदा (अनुबन्ध) में अन्तर (Differences between Void and Voidable Contract) धारा 10 की शर्तों को पूरा न करने पर संविदा को व्यर्थ अथवा व्यर्थनीय माना जाता है। वैधानिक दृष्टिकोण से व्यर्थ अथवा व्यर्थनीय दोनों प्रकार के संविदों को कोई मान्यता नहीं दी जाती है। इन दोनों में अन्तर के आधार निम्नलिखित हैं-

1. धारा का आधार (Basis of Section)-धारा 2(j) के अनुसार, जो समझोता राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय होने से वर्जित हो जाता है, व्यर्थ कहलाता है, अर्थात् जब वह किसी अवयस्क के साथ बिना प्रतिफल के, गलती पर आधारित, लोक नीति के विरुद्ध, अनैतिक अथवा असम्भव समझौता हो तो वह व्यर्थ कहलाता है। इसके विपरीत धारा 2(i) के अनुसार, जो समझौता केवल एक पक्षकार की इच्छा पर आधारित हो, व्यर्थनीय संविदा कहलाता है, . अर्थात् जब समझौता उत्पीड़न, अनुचित प्रभाव, कपट या मिथ्यावर्णन द्वारा प्रभावित हो तो वह व्यर्थनीय कहलाता है। 

2. मान्यता का आधार (Basis of Recognition)-व्यर्थ संविदा किसी भी पक्षकार . द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हो सकता है, किन्तु व्यर्थनीय संविदा किसी एक पक्षकार द्वारा प्रवर्तनीय हो सकता है, अर्थात् व्यर्थ संविदा किसी पक्षकार द्वारा राजनियम की सहायता से प्रवर्तनीय नहीं है। अत: राजनियम द्वारा व्यर्थ संविदा को कोई मान्यता नहीं दी गई है जबकि हानि उठाए हए पक्षकार की इच्छा पर राजनियम द्वारा व्यर्थनीय संविदा में इसे मान्यता प्रदान की जा सकती है। 

3. हस्तान्तरणशीलता का आधार (Basis of Transferability)-व्यर्थ संविदा के अन्तर्गत प्राप्त वस्तु का हस्तान्तरण किसी तीसरे पक्ष को नहीं किया जा सकता है, अर्थात् तीसरे पक्षकार को अच्छा अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता है, परन्तु व्यर्थनीय संविदा के अन्तर्गत तीसरे पक्षकार को अच्छा अधिकार मिल सकता है, यदि उसने सद्भावना (In good faith) से वस्त का उचित मूल्य चुकाकर वस्तु को प्राप्त किया है। 

4. वैधता की अवधि का आधार (Basis of Time or Period)-व्यर्थ संविदा आरम्भ से लेकर अन्त तक व्यर्थ ही रहता है। इसके विपरीत, व्यर्थनीय संविदा प्रारम्भ में वैधानिक होता है और उस समय तक वैधानिक रहता है, जब तक कि अधिकार प्राप्त पक्षकार उसे व्यर्थ घोषित न कर दे।

उत्पीड़न का अर्थ (Meaning of Coercion)

उत्पीड़न’ का अभिप्राय किसी ऐसे कार्य को करने या करने की धमकी देने से है जो कि पदण्ड विधान (Indian Penal Code) द्वारा वर्जित है. अथवा किसी व्यक्ति को हानि पहुंचाने के लिए किसी सम्पत्ति को अवैध रूप से रोकना या रोकने की धमकी देने से ताकि वह व्यक्ति समझौते में सम्मिलित हो जाए। यह आवश्यक नहीं है कि जहाँ ‘उत्पीड़न का प्रयोग किया गया है वहाँ पर भारतीय दण्ड विधान आवश्यक रूप से लागू होता ही हो। 

धारा 15 के अनुसार, “उत्पीड़न का अभिप्राय किसी ऐसे कार्य को करने अथवा करने की धमकी देने से है जो भारतीय दण्ड विधान द्वारा वर्जित है अथवा इस दृष्टिकोण से दसो व्यक्ति को संविदा में सम्मिलित कर लिया जाए अथवा संविदा के लिए उसकी सहमति प्राप्त कर ली जाए अथवा उस व्यक्ति की सम्पत्ति को अवैध रूप से रोकना या रोकने की धमकी देने से है।” इस प्रकार इस परिभाषा के विश्लेषण के अनुसार यदि कोई व्यक्ति (i) भारतीय दण्ड विधान के विरुद्ध कार्य करे अथवा

(ii) सम्पत्ति को अवैध रूप से रोके तो वह उत्पीडन कहलाएगा। जहाँ पर उत्पीड़न प्रयोग में लाया गया है, वहाँ पर भारतीय दण्ड विधान का प्रचलित होना या न होना महत्त्वहीन है।

भारतीय दण्ड विधान के विपरीत कार्य (Activities Forbidden by Indian Penal Code)-

भारतीय दण्ड विधान प्रत्येक कार्य को करने की सहमति नहीं देता है। ऐसे बहुत-से कार्य हैं जो दण्ड विधान द्वारा वर्जित हैं; जैसे-किसी की लाश को न उठाने देना या खुदकशी आदि की धमकी देना। 

2. सम्पत्ति को अवैध रूप से रोकना (Unlawful Detention of Property) एक मामले में एक एजेन्ट ने, एक निश्चित हिसाब-किताब की पुस्तकें तथा अन्य महत्त्वपूर्ण प्रपत्र उस समय तक वापस करने से इनकार कर दिया जब तक कि नियोक्ता एजेन्सी उसके समय में हुए उसके सभी दायित्वों से उसे मुक्त न कर दे। नियोक्ता द्वारा ऐसी मुक्ति देनी पड़ी और नए एजेन्ट ने सब पुस्तकें प्राप्त कर ली। यह निर्णय हुआ कि मुक्ति-पत्र वादी द्वारा प्रतिवादी के उत्पीड़न से दिया गया था और इसलिए वह वादी की इच्छा पर व्यर्थनीय था। परन्तु कोई वैधानिक धमकी अथवा रोक उत्पीड़न न होगी। किसी की सम्पत्ति को रोकना अथवा रोकने की धमकी देना भी ‘उत्पीड़न’ माना जाता है। 

अनुबन्ध की वैधता पर उत्पीड़न का प्रभाव

(Effect of Coercion on the Validity of Contract)-

धारा 19 के अनुसार, उत्पीड़न से प्रेरित संविदा पीड़ित पक्षकार की इच्छा पर व्यर्थनीय होता है। यह आवश्यक है कि उत्पीड़न के लिए प्रयुक्त रोक या धमकी अवैधानिक होनी चाहिए। वैधानिक धमकी या रोक उत्पीड़न नहीं मानी जाएगी। 

अनुचित प्रभाव का अर्थ 

(Meaning of Undue Influence)

कोई संविदा उस समय अनुचित प्रभाव द्वारा प्रेरित माना जाता है जब दो पक्षों के बीच विद्यमान सम्बन्ध ऐसे हों कि पक्षों में से प्रत्येक एक-दूसरे की इच्छा को प्रभावित करने की स्थिति में हो और दूसरे पर अनुचित लाभ पाने की इच्छा से उस स्थिति को प्रयोग में लाए। इस प्रकार केवल किसी पक्षकार का अनुचित प्रभाव डाल पाने की स्थिति में होना ही पर्याप्त नहीं है, वरन उस स्थिति का अनुचित लाभ पाने के दृष्टिकोण से प्रयोग किया जाना भी आवश्यक है। धारा 16 के अनुसार, “एक संविदा अनुचित प्रयोग द्वारा प्रेरित किया हुआ उस समय कहा जाएगा जबकि पक्षकारों के सम्बन्ध इस प्रकार के हों कि वे एक-दूसरे की इच्छा को प्रभावित कर सकते हो और एक-दूसरे पर अनुचित लाभ पाने के लिए अपनी इस स्थिति का प्रयोग करें।” इस प्रकार अनुचित प्रभाव सिद्ध करने के लिए दो तथ्यों का होना आवश्यक है-

(i) पक्षकारों के बीच ऐसा सम्बन्ध होना आवश्यक है, जिसमें एक पक्षकार दूसरे पक्षकार के इच्छा को प्रभावित कर सके तथा

(ii) उस स्थिति का प्रयोग पक्षकार अनुचित लाभ उठाने के दृष्टिकोण से करे। 

इच्छा को प्रभावित करने की स्थिति (State of Influencing the Will)-

इच्छा को प्रभावित करने की स्थिति प्राय: निम्नलिखित दशाओं में कही जाती है- 

1. अधिक सत्ता (More Power)-जहाँ पक्षकारों के बीच सम्बन्ध ऐसे हैं कि उनमे से एक दूसरे पर अधिक सत्ता रखता है, जिससे कि वह दूसरे पर अपना प्रभुत्व जमा सके, जैसे—पिता और पुत्र, ऋणदाता तथा परेशान ऋणी, गुरु तथा शिष्य, जमींदार तथा किसान अथवा संरक्षक तथा रक्षित। 

2. विश्वासाश्रित सम्बन्ध (Reliable Relations)-जहाँ पक्षकारों के बीच : विश्वासाश्रित सम्बन्ध हैं; जैसे—वकील तथा मरीज। 

3. मानसिक दशा (Mental Condition)-जहाँ एक व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति से अनुबन्ध करता है जिसकी मानसिक दशा अधिक आयु, बीमारी अथवा मानसिक अथव शारीरिक कष्ट के कारण ठीक नहीं है; जैसे-डॉक्टर तथा मरीज। 

4. अनुचित लाभ (Undue Advantages)-अनुचित प्रभाव सिद्ध करने के लिए यह भी सिद्ध करना होगा कि अनुचित लाभ प्राप्त किया गया। प्रतिफल के अपर्याप्त होने पर ही व्यवहार अनुचित कहा जा सकता है और यह समझा जा सकता है कि अनुचित लाभ प्राप्त किया गया।

5. सिद्ध करने का दायित्व (Liability to Prove)-जब यह सिद्ध कर दिया जाता है कि एक पक्षकार दूसरे पक्षकार की इच्छा को प्रभावित करने की स्थिति में है और व्यवहार स्वयं अथवा प्रस्तुत प्रमाणों के आधार पर अनुचित मालूम होता है तो यह माना जाता है कि अनुबन्ध अनुचित प्रभाव द्वारा प्रेरित किया गया। अब यह सिद्ध करने का भार कि अनुबन्ध अनुचित प्रभाव द्वारा प्रेरित नहीं किया गया, उस व्यक्ति पर होगा जो दूसरे पक्षकार की इच्छा को प्रभावित करने की स्थिति में है। – धारा 16 (3) के अनुसार, यह सिद्ध करने का उत्तरदायित्व कि संविदा को अनुचित प्रभाव द्वारा प्रेरित नहीं किया गया, उस व्यक्ति पर ही होगा जो दूसरे की इच्छा को प्रभावित करने की स्थिति में है। 

अनुचित प्रभाव का संविदा पर प्रभाव

(Effect of Undue Influence on Validity of Contract)-

धारा 19 (अ) के अनुसार, जब किसी समझौते की सहमति अनुचित प्रभाव द्वारा प्राप्त की गई हो तब ऐसा संविदा उस पक्ष के द्वारा व्यर्थनीय है जिसकी स्वीकृति अनुचित प्रभाव द्वारा ली गई है। 

उत्पीड़न तथा अनुचित प्रभाव में अन्तर

(Differences between Coercion and Undue Influence)

1. प्रयोग के ढंग का आधार (Basis of Method)-उत्पीड़न में एक पक्षकार की ओर से दूसरे पक्षकार के विरुद्ध शारीरिक बल अथवा बल की धमकी का प्रयोग होता है जब अनुचित प्रभाव के अन्तर्गत नैतिक प्रभाव द्वारा सहमति प्राप्त की जाती है। 

2. वैधानिकता का आधार (Basis of Validity)-उत्पीड़न की दशा में संविदा चनदाता की इच्छा पर व्यर्थनीय है। अनुचित प्रभाव की दशा में संविदा पूर्ण रूप से समाप्त ‘कया जा सकता है अथवा ऐसी शर्तों पर समाप्त किया जा सकता है जो न्यायालय को उचित प्रतीत हों। 

3. सम्बन्धों का आधार (Basis of Relationship)-उत्पीड़न में पक्षकारों में निश्चित सम्बन्ध होना आवश्यक नहीं है जबकि अनुचित प्रभाव में दोनों पक्षकारों के बीच सम्बन्ध होना आवश्यक है। 

4. पक्षकारों का आधार (Basis of Parties)-उत्पीड़न वचनगृहीता द्वारा वचनदाता के विरुद्ध होना आवश्यक नहीं है, अनुचित प्रभाव में समझौता पक्षकारों के बीच ही होता है। 

प्रतिफल का अर्थ एवं परिभाषा – 

(Meaning and Definition of Consideration)

एक वैध अनुबन्ध होने के लिए आवश्यक लक्षण यह है कि अनुबन्ध के लिए न्यायोचित प्रतिफल तथा उद्देश्य होना चाहिए। किसी अनुबन्ध में (कुछ अपवादों को छोड़कर) यदि इसका अभाव होगा तो वह एक ‘बाजी’ या ‘जुआ’ का ठहराव कहलाएगा और इसलिए व्यर्थ होगा। इंगलिश राजनियम के अनुसार प्रत्येक ‘साधारण’ अनुबन्ध प्रतिफल के आधार पर ही होना चाहिए, किन्तु एक ‘सीलयुक्त अनुबन्ध’ बिना प्रतिफल के भी वैध है। भारतीय संविदा अधिनियम के अनुसार, “वे सभी समझौते संविदा हैं जो न्यायोचित प्रतिफल तथा उद्देश्य के लिए संविदा करने की योग्यता वाले पक्षों की स्वतन्त्र सहमति’ अर्थात् किसी संविदा में न्यायोचित प्रतिफल तथा उद्देश्य का होना आवश्यक है। अंग्रेजी राजनियम के अनुसार प्रत्येक साधारण संविदा प्रतिफल (Consideration) के आधार पर ही होना चाहिए, परन्तु सीलबन्द संविदा (Contract Under Seal) बिना प्रतिफल के भी वैध है। प्रतिफल तथा उद्देश्य दो पक्षकारों की दृष्टि से दो भिन्न नाम हैं। उदाहरणार्थ-‘अ’ ₹ 10,000 में अपना ‘चेतक स्कूटर ‘ब’ को बेचने के लिए समझौता करता है। ऐसी स्थिति में ‘अ’ के लिए 10,000 प्रतिफल है। तथा ‘ब’ के लिए ‘चेतक स्कूटर’ उद्देश्य है। धारा 2 (d) के अनुसार, “जब वचनदाता की इच्छा। पर वचनगृहीता अथवा किसी व्यक्ति ने कोई कार्य किया हो या करने से विरक्त रहा हो अथवा करता हो । कर विरक्त रहता हो अथवा करने या विरक्त रहने का वचन देता हो तो ऐर, का विरावत जाथवा वचन उस वचन के लिए प्रतिफल कहलाता है।” अन्य शब्दों में ननादाता की इच्छा पर वचनगृहीता अथवा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला का. अपना विक्ति प्रतिफल कहलाता है जो भूत (Past), भविष्य (Future) अथवा वर्तमान (Prot) का रूप ले सकता है, अत: जब वचनदाता की इच्छा पर वचनगृहीता अथवा किसी सामन्यक्ति ने (i) कुछ कार्य किया हो या उसके करने से विरक्त रहा हो (भूतकाल) अथवा (1) काल कार्य करता हो अथवा करने से विरक्त रहता हो (वर्तमान) अथवा (iii) कुछ कार्य करने अथवा करने से विरक्त रहने का वचन देता हो (भविष्य) तो हम इसे प्रतिफल कहते हैं। 

प्रतिफल के लक्षण

(Characteristics of Consideration)

1. प्रतिफल ( कार्य या विरक्ति) वचनदाता की इच्छा पर दिया जाना चाहिए (Consideration must move at the desire of the promiser)

चनादाता की इच्छा के अभाव में किया गया कार्य प्रतिफल नहीं माना जा सकता है। इन्। साबध में (1880) का निर्णय महत्त्वपूर्ण है जिसमें ‘अ’. जिलाधीश की प्रार्थना पर एक बाजार बनवाया, तत्पश्चात् ‘ब’ ने ‘अ’ को यह वचन दिया कि उस बाजार में अपनी एजेन्सी के द्वारा बिक्री पर ‘अ’ को कमीशन देगा। यह निर्णय किया गय’ कि ‘ब’ का कमीशन देने का वचन वैध नहीं है। 

2. प्रतिफल वचनगृहीता अथवा अन्य व्यक्ति की ओर से हो सकता है (The consideration may proceed from the promisee or any other person) “यह आवश्यक नहीं कि वचन वचनगृहीता द्वारा ही दिया जाए, वह अन्य किसी व्यक्ति द्वारा भी दिया जा सकता है।

इस सम्बन्ध में रचनात्मक प्रतिफल के सिद्धान्त (Doctrine of Constructive Consideration) को मान्यता दी जाती है जिसके अनुसार यद्यपि वचनगृहीता द्वारा स्वयं प्रतिफल देना आवश्यक नहीं है, फिर भी उसे स्वयं प्रतिफल का एक पक्ष होना आवश्यक है।” इस सम्बन्ध में Chinayya Vs. Ramayya (1891) का निर्णय महत्त्वपूर्ण है जिसमें पिता ने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति अपनी पुत्री के नाम इस शर्त पर कर दी कि वह अपने चाचा (पिता के भाई) को कुछ वार्षिक राशि आवश्यक रूप से देगी। उसी दिन पुत्री ने वार्षिक राशि देने के लिए वचन दिया, परन्तु कुछ समय उपरान्त पुत्री ने वार्षिक राशि देना बन्द कर दिया, यह कहा कि चाचा की ओर से कोई प्रतिफल नहीं है, परन्तु उसकी यह दलील न्यायालय द्वारा न सुनी गई। 

3. कुछ प्रतिफल का होना आवश्यक (There must be some consideration) संविदा का कुछ प्रतिफल होना आवश्यक अंग है। धारा 25 के अनुसार, प्रतिफल का पर्याप्त हाना आवश्यक नहीं है। यद्यपि प्रतिफल की प्राप्ति आवश्यक नहीं है, तथापि राजनियम की दृष्टि म उसका कुछ मूल्य होना आवश्यक है। इस सम्बन्ध में Jagindra Vs. Chandra Nath (1903) का निर्णय महत्त्वपूर्ण है जिसमें यह कहा गया था कि प्रतिफल को वास्तविक होना चाहिए काल्पनिक नहीं। इंगलिश राजनियम के अनुसार भी प्रतिफल की पर्याप्तता आवश्यक नहीं। 

संविदा करने की योग्यता का अभिप्राय

(Meaning of Competency of Contract)

संविदा को वैधानिक रूप देने के लिए यह आवश्यक है कि पक्षों में संविदा करने की योग्यता होनी चाहिए, अन्यथा कोई भी समझौता संविदा का रूप नहीं ले सकता। पक्षकारों में ‘ संविदा करने की योग्यता का होना संविदा के आवश्यक लक्षणों में है। धारा 11 के अनुसार, “प्रत्येक व्यक्ति संविदा करने के योग्य है, जो राजनियम के अनुसार जिसके अन्तर्गत वह आता है, वयस्क है, स्वस्थ मस्तिष्क का है और सम्बन्धित राजनियम के द्वारा अयोग्य घोषित नहीं किया गया है।” इस धारा का विश्लेषण करने से ज्ञात हो जाता है कि जिन व्यक्तियों को संविदा करने की क्षमता नहीं होती, वे हैं-

(i) अवयस्क (minor),

(ii) अस्वस्थ मस्तिष्क वाला व्यक्ति (A man of unsound mind),

(iii) राजनियम द्वारा अयोग्य घोषित व्यक्ति (disqualified from contracting by the law to which he is a subject) 

सामान्यतया राजनियम द्वारा यह माना जाता है कि प्रत्येक अनुबन्ध करने के योग्य है और यदि कोई व्यक्ति अनुबन्ध करने के अयोग्य होने के आधार पर दायित्व से मुक्ति का दावा करता है तो उसी को ही ऐसी अयोग्यता प्रमाणित करनी होगी। 

1. अवयस्क (Minor)-एक व्यक्ति, जो वयस्क न हो पाया हो उसे अवयस्क कहा जाता है। भारतीय वयस्कता अधिनियम के अन्तर्गत जो व्यक्ति 18 वर्ष की आयु पूरी कर ले वह वयस्क कहलाता है तथा यदि उसकी सम्पत्ति का किसी व्यक्ति को संरक्षक नियुक्त किया गया है तो वह 21 वर्ष की आयु पूरी करने पर वयस्क होगा। 

2. अस्वस्थ मस्तिष्क (Unsound Mind)-एक पागल, पैदायशी बेवकूफ, नशे के प्रभाव वाले व्यक्ति के साथ किया गया संविदा व्यर्थ माना जाता है। धारा 12 के अनुसार, स्वस्थ मस्तिष्क का व्यक्ति वह व्यक्ति है जो संविदा करते समय यह समझ सके कि वह क्या संविदा कर रहा है और उसका उसके हित पर क्या प्रभाव पड़ेगा। एक पागल (Insane), मुर्ख (Idiot) अथवा नशे में चूर बेसुध व्यक्ति स्वस्थ मस्तिष्क का नहीं कहलाया जा सकता है। स्वस्थ व्यक्ति के साथ संविदा करने के दृष्टिकोण से इस प्रकार निर्णय किया गया-(i) एक भारत जो अधिकांशत: स्वस्थ रहता हो, परन्तु संविदा करने के समय यदि अस्वस्थ मस्तिष्क हा गया हो तो उसके साथ किया गया संविदा व्यर्थ होगा, (ii) एक व्यक्ति जो अधिकांशतः त्य मस्तिष्क का रहता हो. परन्त संविदा करते समय स्वस्थ मस्तिष्क का हो गया हो तो के साथ किया गया संविदा वैध होगा, परन्तु दूसरे पक्षकार को यह सिद्ध करना होगा कि संविदा करते समय नावित स्वरा गरिताक का था। किसी पागल के साथ गाती संविदा भी मान्य नहीं है। 

अन्य अयोग्य व्यक्ति

(Other Disqualified Persons)

व्यक्ति राजनीतिक स्थिति के कारण अयोग्य माने गए हों जैसे विदेशी शत्र, विदेशी समाज, पल अथवा प्रतिनिधि, कैदी या अपराधी हो, ऊँचे पेशे के कारण अयोग्य माने गए हा जग बरिण डॉक्टर, कुछ संस्थाएँ तथा व्यक्ति जो वैधानिक स्थिति के कारण संविदा करने के अयो हो. कॉरपोरेशन, विवाहित स्त्रिया आदि-सभी संविदा के अयोग्य पक्षकार है। 

अवयस्क के हितों की राजनियम द्वारा रक्षा

(Protection afforded to Minors by the Indian Contract Act) 

अवयस्कता एक अयोग्यता कही जाती है, वास्तव में यह न्यायालयों के द्वारा अवया को प्रदान की गई रक्षा है। यह कथन ठीक ही प्रतीत होता है…”राजनियम अपने अवयस्कों के रक्षा करता है, उनकी सम्पत्तियों तथा अधिकारों का बचाव करता है, उनके अभावों की क्षम करता है, उनकी ओर से वैधानिक कार्यवाहियों में उनकी रक्षा करता है, न्यायाधीश टॉक सलाहकार, जूरी उनके सेवक तथा राजनियम उनका संरक्षक होता है।” अवयस्क द्वारा संविट करने की क्षमता के सम्बन्ध में वर्तमान स्थिति इस प्रकार है-

1.अवयस्क द्वारा किया गया संविदा व्यर्थ होता है (Contract with a Minorit Void)-अवयस्क द्वारा किया गया संविदा प्रारम्भ से व्यर्थ माना जाता है। धारा 112 अनुसार अवयस्क के साथ किए गए सम्पूर्ण संविदे व्यर्थ माने जाते हैं। यदि दूसरे पक्ष के अवयस्क की अल्पवयस्कता (minority) का आभास न हो तो भी उसके साथ किया हुन समझौता व्यर्थ माना जाता है। इस सम्बन्ध में Mohiri Bibi Vs. Dharmdas Ghosh (1903) का निर्णय महत्त्वपूर्ण है जिसमें अवयस्क द्वारा 20,000 की सम्पत्तियों को बन्धन रखकर 8,000 महाजन से लिए गए। 

मोहरी बीबी बनाम धर्मदास घोष 

(Mohiri Bibi Vs. Dharamdas Ghosh)

इस मामले में अवयस्क ने अपनी सम्पत्ति का  20,000 के लिए एक बन्धक लिए दिया था, जिसमें से ऋणदाता ने अवयस्क के लिए 8,000 भुगतान कर दिया था। अवयस्क बन्धक को निरस्त करने के लिए वाद प्रस्तुत किया। दूसरे पक्षकार की ओर से यह कहा गया अनुबन्ध व्यर्थनीय था और अवयस्क उसका परित्याग कर रहा था, इसलिए भारतीय अनु अधिनियम की धारा 64 एवं 65 के अधीन अवयस्क को दिया गया 8,000 वापस, चाहिए। प्रिवी काउन्सिल द्वारा यह निर्णय किया गया कि अनुबन्ध पूर्ण रूप में (व्यर्थनीय नहीं), इसलिए ऐसी परिस्थितियों में रुपया वापस करने का कोई प्रश्न उत्पन्न सकता था। धारा 64 एवं 65 ऐसे मामलों में लागू नहीं हो सकती जहाँ पर कोई अनुबन्ध नहीं सकता। अवयस्क वैधानिक समझौते नहीं कर सकता, पान्त अपनी आवश्य यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी सम्पत्तियों की जमानत पर ऋण ले सकता है, अवयस्क किसी भी वैधानिक समझौते को करने में असमर्थ है। वह लेने अथवा लाभ के लिए कोई वस्तु या सम्पत्ति खरीदने का वैधानिक समझौता नहीं कर ना है। परन्तु वह अपनी आवश्यक (जीवन सम्बन्धी) आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए . मानी सम्पत्ति पर ऋण ले सकता है और ऋण देने वाला धारा 68 के अनसार अवयस्क की पति से भुगतान पाने का अधिकारी है। जीवन की आवश्यकताएं अवयस्क के जीवन की आर्थिक स्थिति तथा रहन-सहन के स्तर पर निर्भर करेंगी। कोक के अनुसार, जीवन की अपशकताओं में सम्मिलित हैं—

(i) मकान का किराया,

(ii) भोजन व कपड़ा,

(iii) अवयस्क तथा उसकी पत्नी की आवश्यकताएं, दवा आदि पर खर्च,

(iv) सफर खर्च, +

(v) मृत संस्कार का गाय

(vi) प्रतिष्ठाजन्य वस्तुएं लेने के लिए ऋण,

(vii) सम्पत्ति की रक्षा के लिए आवश्यक खर्च तथा

(viii) अवयस्क के विवाह का खर्च। इस सम्बन्ध का निर्णय महत्त्वपूर्ण है जिसमें शृंगार एवं सजावट की वस्तुओं को जीवन की आवश्यकताएँ नहीं माना गया था, अत: अवयस्क को इन वस्तुओं के मूल्यों का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। 

3. एजेन्ट के रूप में अवयस्क (Minor as an Agent)-

यद्यपि किसी अवयस्क की नियक्ति एजेन्ट के रूप में की जा सकती है तथापि धारा 184 के अनुसार, उसके प्रत्येक कार्य के लिए स्वामी उत्तरदायी होता है तथा इसे कर्त्तव्यपालन न करने, जानबूझ कर गलती करने के लिए मालिक उससे क्षतिपूर्ति नहीं करा सकता। एक अवयस्क एजेन्ट नियुक्त किया जा सकता है और ऐसे अवयस्क द्वारा, एजेन्सी की प्रगति में किए गए सब अनुबन्ध उसके नियोक्ता पर बाध्य होंगे, परन्तु नियोक्ता अवयस्क एजेन्ट की लापरवाही अथवा कर्त्तव्य उल्लंघन के कारण हुई किसी हानि के लिए उससे क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकारी न होगा। 

4. साझेदार के रूप में अवयस्क (Minor as a Partner)-

भारतीय साझेदारी अधिनियम की धारा 30 के अनुसार, अवयस्क साझेदार नहीं हो सकता है, परन्तु सभी साझेदारों की सहमति से उसे साझेदारी के लाभ में सम्मिलित किया जा सकता है। अवयस्क स्वयं हानि के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं होता है। वयस्कता के छह माह के अन्तर्गत उसे अपनी फर्म में रहने अथवा न रहने की सूचना देनी होगी। 

5. अवयस्क दिवालिया घोषित नहीं किया जा सकता (Minor cannot be Adjudicated Insolvent)-

जो व्यक्ति संविदा करने के योग्य ही नहीं है उसे न तो देनदार (Debtor) ही माना जा सकता है और न ही उसे दिवालिया घोषित किया जा सकता है। 

6. अवयस्क की कम्पनी की स्थिति (Minor’s Position in a Joint Stock ompany)

क अवयस्क कम्पनी का अंशधारी बन सकता है जब तक कि कम्पनी के (Articles of Association) ठसे अंशधारी बनने के लिए रोक न लगाएँ। परन्तु ‘ लिए वह व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं होगा। इस सम्बन्ध में Jaffer Vs. a Bank Ltd. का निर्णय महत्त्वपूर्ण है।

धारक का अर्थ एवं परिभाषा 

(Meaning and Definition of Holder)

विनिमय साध्य विलेख की धारा 8 के अनुसार, “किसी प्रतिज्ञा-पत्र, विनिमय-विपत्र अथवा चैक के ‘धारक’ से अभिप्राय ऐसे किसी व्यक्ति से है जो उसे अपने नाम में रखने तथा . सम्बन्धित पक्षकारों से देय धन प्राप्त करने का अधिकारी है। जब कोई प्रतिज्ञा-पत्र, विनिमय-विपत्र अथवा चैक खो जाता है अथवा नष्ट हो जाता है तो उसका धारी वह व्यक्ति होता है, जो ऐसी हानि अथवा विनाश के समय उसका अधिकारी था।” 

उपर्युक्त परिभाषा के विश्लेषण के अनुसार धारक में निम्नलिखित बातों का होना आवश्यक है- 

1. अपने नाम में रखने का अधिकार (Right to keep in Own Name)-

धारक वही व्यक्ति हो सकता है जिसे लेख-पत्र अपने नाम से अपने पास रखने का अधिकार हो, उसे प्राप्तकर्ता (Payee), पृष्ठांकिकी (Endorsee) अथवा वाहक की हैसियत से प्राप्त हो सकता है। चोरी से लेख-पत्र प्राप्त करने वाला उसका धारक नहीं माना जा सकता है। 

2. धनराशि प्राप्त करने का अधिकार (Right to get the Money)-

धारक के लिए दूसरी आवश्यकता यह है कि उसे अपने नाम में ही रुपया प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए। ऐसा व्यक्ति, जो लेख-पत्र को अपने अधिकार में रखने पर भी रुपया पाने का अधिकारी नहीं होता है, विधि की दृष्टि में धारक नहीं बन सकता। 

यथाविधिधारी का अर्थ एवं परिभाषा

(Meaning and Definition of Holder-in-due-course)

धारा 9 के अनुसार, “यथाविधिधारी से आशय ऐसे व्यक्ति से है, जो प्रतिफल के बदले लखम लिखित धन के देय होने से पूर्व तथा इस विश्वास के लिए पर्याप्त कारण न रखते हुए सि व्यक्ति से उसने अधिकार प्राप्त किया था उसके अधिकार में कोई दोष विद्यमान था, प्रतिज्ञा-पत्र, विनिमय-विपत्र अथवा चैक को प्राप्त करता है, यदि वह वाहक को देय है, उसका आदाता-पृष्ठांकिकी हो जाता है यदि वह आज्ञा पर देय है।” हो. उपयुक्त परिभाषा के विश्लेषण के अनुसार यथाविधिधारी के लिए अग्रलिखित बातो का किसी प्रतिज्ञा-पत्र, होना आवश्यक है

विक्रय अनुबन्ध

Contract of Sale

वस्तु-विक्रय अनुबन्ध भी एक विशेष प्रकार का व्यापारिक अनुबन्ध है। इस.. अनुबन्ध से सम्बन्धित व्यवस्थाएँ वस्तु-विक्रय अधिनियम में सम्मिलित हैं। इस अधिनियम की धारा 2 के अनुसार, यह अधिनियम ‘वस्तु-विक्रय अधिनियम, 1930’ कहलाता है। यह अधिनियम जम्मू तथा कश्मीर राज्यों को छोड़कर सम्पूर्ण भारत के लिए होता है और यह 1 जुलाई, 1930 से कार्यान्वित हुआ। सन 1980 से पहले वस्तु-विक्रय से सम्बन्धित व्यवस्थाएँ भारतीय अनुबन्ध अधिनियम, 1872 की धाराओं 76-123 में सन्निहित थीं, परन्तु ये व्यवस्थाएँ वस्तु-विक्रय अनुबन्ध के सम्बन्ध में उत्पन्न हुए बहुत से प्रश्नों पर प्रकाश नहीं डालती थीं। इस कारण भारतीय संसद ने सन् 198 में इन व्यवस्थाओं को मल अनुबन्ध में निरस्त कर दिया और उनके स्थान पर एक नवीन अधिनियम ‘वस्तु-विक्रय अधिनियम, 1930’ व्यवस्थापित किया, जिसके द्वारा वस्तु-विक्रय से सम्बन्धित राजनियम को पूर्ण एवं वैज्ञानिक कर दिया गया। 

वस्तु-विक्रय संविदा का अर्थ एवं परिभाषा 

(Meaning and Definition of Contract of Sale)

वस्तु-विक्रय अधिनियम की धारा 4 (1) के अनुसार, “वस्तु-विक्रय की संविदा वह संविदा है, जिसके द्वारा विक्रेता एक निश्चित मूल्य के बदले वस्तु का स्वामित्व हस्तान्तरित करता है अथवा हस्तान्तरित करने का समझौता करता है।” उदाहरणार्थ-‘अ’, ‘ब’ को अपनी घड़ी ₹ 500 में बेचता है। यहाँ ‘अ’ और ‘ब’ के बीच घड़ी के लिए वस्तु-विक्रय संविदा कहलाएगा। इसी प्रकार यदि ‘अ’, ‘ब’ को अपनी पुरानी साइकिल  200 में देने के लिए: संविदा करता है तो यह वस्तु-विक्रय का संविदा कहलाएगा। 

विक्रय संविदा की मुख्य विशेषताएँ (Main Characteristics of a contract of sale)

उपर्युक्त विश्लेषण तथा अन्य प्रावधानों के आधार पर विक्रय संविदा के मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं –

1. वैध संविदा के तत्त्व (Main Elements of a valid Contract) वस्तु-विक्रय, संविदा अधिनियम का ही एक भाग है, लेकिन 1960 में इसको पृथक से पारित करने का मूल उद्देश्य इसे अधिक विस्तृत बनाना था। अत: वस्तु-विक्रय संविदों में वे सभी आवश्यक लक्षण होने चाहिए, जो एक वैध संविदा में होते हैं; जैसे—योग्य पक्षकारों का होना, उनकी स्वतन्त्र सहमति का पाया जाना, उचित प्रतिफल होना आदि।

2. क्रेता तथा विक्रेता का होना (Existance of both Purchaser and Seller)-अन्य संविदा की भाँति इसमें भी पक्षकार होते हैं। ये पक्षकार वस्तु-विक्रय संविदा में क्रमशः क्रेता तथा विक्रेता कहलाते हैं। क्रेता वह व्यक्ति है, जो कि वस्तु को निर्धारित मूल्य पर खरीदने के लिए सहमत होता है तथा विक्रेता वह है, जो वस्तु का निर्धारित मूल्य लेने के लिए सहमत होता है।

3. माल का होना (Existance of Goods)-विक्रेता संविदों में विषय-सामग्री माल ही होती है। माल का अभिप्राय (मुद्रा तथा अभियोग के योग्य किन्तु दोनों के अतिरिक्त) प्रत्येक प्रकार की चल सम्पत्ति से है। माल निश्चित अथवा अनिश्चित प्रकृति का हो सकता है, अचल सम्पत्तियों (भूमि, भवन, तालाब आदि) का विक्रय इस श्रेणी में नहीं आता। 

4. मूल्य को होना (Determined Price)-माल की बिक्री का प्रतिफल उसका ल्य होता है। वस्तु के प्रतिफल के रूप में विक्रेता को उसका मूल्य दिया जाता है। इस दृष्टिकोण १९.दान या उपहार (Gift) तथा वस्तु विनिमय की अदल-बदल (Barter) प्रणाली से भिन्न है। 

5. स्वामित्व का हस्तान्तरण (Transfer of Ownership)-धारा 4 (3) के वस्तु के स्वामित्व का हस्तान्तरण तत्काल अथवा समय के उपरान्त हो सकता हैविक्रेता सेक्रेता को वस्तु का हस्तान्तरण तत्काल हो जाता है तो यह ‘विक्रय’, यदि पति होने का वचन हो तो ‘विक्रय का समझौता’ कहलाता है। धारा 4 (4) के अनुसार पर समझौता’ उस समय विक्रय कहलाएगा, जब वह समय बीत गया हो अथवा उन शनों हो गई हो, जिनके अधीन वस्तु का हस्तान्तरण होना था। 

6. एक अंश स्वामी तथा दूसरे अंश स्वामी के बीच विक्रय का संविदा होम (Contract of Sale may be between One Part of Owner and the other)विक्रय का संविदा एक अंश स्वामी तथा दूसरे अंश स्वामी के बीच हो सकता है। 

7. विक्रय संविदापूर्ण अथवा शर्त के साथ होना (Contract of Sale baie Absolute or Conditional)-धारा 4 (2) के अनुसार, विक्रय संविदा पूर्ण (Absolutan ,अथवा शर्त के साथ (Conditional) हो सकता है। 

“विक्रय’ तथा ‘विक्रय के समझौते’ में अन्तर

(Difference between Sale and Agreement to Sale) 

1. स्वामित्व के हस्तान्तरण का आधार (Basis of Right of Transferability)-विक्रय संविदा में माल का हस्तान्तरण तत्काल ही विक्रेता से क्रेता को हो जाता है। इसके विपरीत, विक्रय के समझौतों में वस्तुओं का हस्तान्तरण उसी समय न होकर कुछ अवधि बाद होता है, अर्थात् विक्रय -एक निष्पादन संविदा है। इसके विपरीत, विक्रय समझौते का निष्पादन भविष्य में होता है, अर्थात् यह एक निष्पादनीय संविदा है। 

2. अधिकारों का आधार (Basis of Rights)-विक्रय के संविदों में वस्तु का सर्वव्यापी अधिकार मिल जाता है और वह वस्तु का प्रयोग समस्त विश्व के समक्ष मनमाने ढंग से कर सकता है। इसके विपरीत, विक्रय के समझौते में दोनों पक्षों के पारस्परिक अधिकार उत्पन्न होते हैं, जिसमें क्रेता तथा विक्रेता एक दूसरे पर वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। 

3. निष्पादन का आधार (Basis of Execution)-विक्रय संविदों में निष्पादन पूरा हो जाता है। 

4.जोखिम का आधार (Basis of Risk)-विक्रय संविदे में माल की जोखिम क्रेता पर होती है। इसके विपरीत, विक्रय के समझौते में जोखिम विक्रेता पर ही रहती है। 

5. माल न दिया जाने का आधार (Basis of Non-delivery of Goods) – विक्रय संविदा में यदि विक्रेता माल देने में त्रुटि करता है तो क्रेता का यह अधिकार है कि वह उस व्यक्ति से जिसके पास सामान हो, उसके मूल स्वामी के रूप में माल प्राप्त कर सके। इसक विपरीत, विक्रय के समझौते में वह केवल क्षति के लिए वाद प्रस्तुत कर सकता है। 

6. भुगतान न करने का आधार (Basis of Non-payment)-विक्रय में यदि क्रेता माल के मल्य को चुकाने में त्रुटि करता है तो विक्रेता मूल्य प्राप्ति के लिए वाद प्रस्तुत कर सकता है। इसके विपरीत, यदि क्रेता वस्तु प्राप्त करने अथवा मल्य चकाने में असमर्थ रहता है तो विक्रेता अपने हर्जाने के लिए वाद प्रस्तुत कर सकता है। 

अदत्त विक्रेता का अर्थ 

(Meaning of Unpaid Seller)

धारा 45 के अनुसार, अदत्त विक्रेता से अभिप्राय एक ऐसे व्यक्ति से है जिसको वस्तु के पूरे मूल्य का भुगतान न किया गया हो अथवा प्राप्त बिल को बिल की तिथि पर प्रस्तुत करते समय अनादृत कर दिया गया हो। इस परिभाषा के अनुसार विक्रेता ऐसा व्यक्ति माना जाएगा जो या तो स्वयं वस्तु का स्वामी हो अथवा विक्रय करने योग्य व्यक्ति हो। उदाहरणार्थ-‘अ’ ने ब’ को ₹ 5,000 में एक रेडियो बेचा, जिसमें से ‘अ’ को ‘ब’ से ₹ 2,000 मिले। ऐसी स्थिति में ‘अ’ अदत्त विक्रेता कहलाएगा। इसी प्रकार ‘ब’ को एक रेडियो बेचा जिसके लिए एक Bill bf Exchange भी लिख दिया। ‘ब’ ने उस बिल को स्वीकार कर लिया। ‘अ’ द्वारा बिल प्रस्तत किए जाने पर वह अनादृत हो गया, ऐसी स्थिति में ‘अ’ अदत्त विक्रेता कहलाएगा। ऐसे सभी ‘व्यक्ति जो विक्रय करने की स्थिति में हों उन सबको विक्रेता की श्रेणी में रखा जाता है। 

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