Harsha Indtroduction and His Contemporaries

Harsha Introduction and His Contemporaries

ऐतिहासिक स्रोत

पुष्यभूति, उसके वंशजों तथा उस काल की ऐतिहासिक जानकारी हमें अनेक सोतों से मिलती है। उनके हर्ष के सभापण्डित बाणभट्ट की हर्षचरित नामक कृति सर्वप्रमुख है। चरित एक ‘आख्यायिका’ है। आख्यायिका एक प्रकार की विधा है जिसमें रचनाकार किसी पूर्वत को अपनी रचना का आधार न बनाकर अपने समकालिक शासक और उसके पूर्वजों के वृत्त को ही अपना वर्ण्यविषय बनाता है। बाणभट्ट को हर्षचरित में वर्णित घटनाओं की या तो जानकारी थी अथवा उनमें अनेक के सम्बन्ध में उसे निजी अनुभूति को सुविधा प्राप्त थी। उसके वर्णित इतिहास की जो पुष्टि हमें समसामयिक चीनी वृत्तों अथवा तत्कालीन अभिलेखों से होती है, उससे यह ज्ञात होता है कि बाण ने अपनी आलंकारिक भाषा में इतिहास के वास्तविक तथ्यों का ही निरूपण किया है और उनकी सत्यता पर प्राय: पूर्ण विश्वास किया जा सकता है। उसने अपनी यात्राओं में समाज और साहित्य का भरपूर अध्ययन किया था जिसका फलक अत्यन्त व्यापक था। उसकी पैनी परख ने जो ऐतिहासिक दृश्य उपस्थित किए हैं, वे उतने ही सजीव और चमत्कारपूर्ण है, जितने कि उसके प्राकृतिक दृश्यों का विवरण।

हर्षचरित

अपने भाइयों द्वारा हर्षवृत्त जानने की इच्छा व्यक्त करने पर बाण ने हर्षचरित की रचना की थी। उसमें वह हर्ष का जीवनचरित देने के साथ ही अपना परिचय भी देता है। हर्षचरित के प्रथम उच्छवास की कोई ऐतिहासिक उपयोगिता नहीं है। किन्तु द्वितीय उच्छ्वास में बाण अपने वात्स्यायनगोत्रीय प्रीतिकूट नामक गाँव में बसनेवाले भृगुवंश और अपने बाल्यजीवन का वर्णन करता है। उसी में उसके हर्ष के निकट पहुंचने और उसके सान्निध्य में आने का उल्लेख है। वह कहता है कि लड़कपन की अपनी उत्सुकतापूर्ण व्यापक, किन्तु शिक्षाप्रद यात्राओं के पश्चात् एक दिन उसे राजदरबार में उपस्थित होने को राजा हर्ष का आमन्त्रण मिला। सम्राट् हर्ष को पहले तो बाणभट्ट की विनम्रता और विद्वता का कोई भान न था, किन्तु धीरे-धीरे वह उसकी ओर आकृष्ट होता चला गया और दोनों में परस्पर सौहार्द और निकटता स्थापित हो गई। हर्षचरित के तृतीय उच्छवास में श्रीकण्ठ जनपद और स्थाणुवीश्वर (थानेश्वर) की चर्चा करते हुए बाणभट्ट पुष्यभूति और शैव संन्यासी भैरवाचार्य के पारस्परिक सम्बन्धों की चर्चा करता है। किन्तु उसके अलावा वह हर्ष के अन्य पूर्वजों का कोई विवरण नहीं देता। चतुर्थ उच्छवास में वह सीधे प्रभाकरवर्धन का विवरण प्रस्तुत करता है। उसी में राज्यवर्धन, हर्षवर्धन और राज्यश्री के जन्म, उनके बाल्यकाल तथा राज्यश्री के कन्नौज के राजा गृहवर्मा से विवाह की जानकारी है। पंचम उच्छवास में हूणों के उपद्रव की समस्या का विवरण है, जिन्हें दबाने के लिए, राज्यवर्धन को भेजे जाने का उल्लेख है। वहीं प्रभाकरवर्धन की बीमारी और उसकी मृत्यु का विवरण भी दिया गया है। छठे उच्छ्वास में शोकाकुल राज्यवर्धन द्वारा भिक्षु जीवन अपनाने की इच्छा, गृहवर्मा के मारे जाने का समाचार, उस परिस्थिति विशेष के कारण राज्यवर्धन द्वारा राज्यकार्य की स्वीकृति, कन्नौज की रक्षा के लिए मालवराज के विरुद्ध उसका सैन्य अभियान तथा उसके द्वारा मालवराज के युद्ध में पराजित होकर मारे जाने एवं शशांक द्वारा स्वयं उसकी (राज्यवर्धन की) छद्मपूर्ण हत्या का विवरण है। उसी में हर्ष को इन घटनाओं की सूचना और सभी शत्रुओं से बदला लेने की उसकी प्रतिज्ञा का वर्णन मिलता है। सातवें उच्छ्वास में हर्ष की दिग्विजय यात्रा के प्रारम्भ तथा प्राग्ज्योतिष के राजा भास्करवर्मा के दूत हंसवेग के उसके समक्ष मित्रता का प्रस्ताव लेकर उपस्थित होने की चर्चा है। आठवे उच्छ्वास में राज्यश्री की खोज के लिए विन्ध्य के जंगलों में हर्ष के घूमने बौद्ध भिक्षु दिवाकरमित्र से उसकी भेंट तथा उसकी सहायता से राज्यश्री की प्राप्ति का विवरण है। किन्तु यहीं हर्षचरित समाप्त हो जाता है। आगे न तो हर्ष की विजयों का वर्णन है और न अन्य राज्यों से उसके सम्बन्धों की चर्चाएँ हैं। हर्षचरित का एक अन्य दोष यह भी है कि घटनाओं के वर्णनों में तिथियों का कहीं भी उल्लेख नहीं किया गया है। साथ ही अधिकाधिक श्लेषों के उपयोग के कारण तथ्यों के वास्तविक स्वरूप विवरण में अस्पष्टता भी आ गई है।

अभिलेख

अब तक हर्षवर्धन के चार अभिलेख प्राप्त हुए हैं। उनमें दो तो दान दी जाने वाली भूमि को अंकित करने वाले ताम्र-पत्रों पर संस्कृत में खुदे है और दो मुहरों पर तिथि की दृष्टि से (हर्ष सं० 22 अर्थात् 628 ई०) इनमें बाँसखेड़ा का ताम्रफलकाभिलेख पहला है, जो 1814 ई० में वर्तमान उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले से मिला था। इससे ज्ञात होता है कि हर्ष ने अहिछत्रमुक्ति के अंगदीया विषय का मर्कटसागर नामक गाँव सब भारों से मुक्तकर भरद्वाजगोत्री ब्राह्मणों—बालचन्द्र और भट्टस्वामी को दान में दिया था। यद्यपि इसमें हर्षवर्धन के वंश के मूलपुरुष पुष्यभूति की चर्चा तो नहीं है, किन्तु नरवर्धन से प्रारम्भ कर द्वितीय राज्यवर्धन तक की सम्पूर्ण वंश परम्परा राजमाताओं के नामों के साथ मिलती है। इस लेख की विशेषता यह है कि इसमें प्रशासन की अनेक इकाइयों के नाम, अधिकारियों के पद और दानवाले गाँव पर लगने वाले अनेक राजकीय कर बताए गए हैं। बीच में राज्यवर्धन की • मालवराज देवगुप्त तथा अन्य राजाओं पर विजय तथा शत्रुगृह (शशांक के घर में उसके वध के विषय में लिखा है। साथ ही हर्ष के पूर्वज राजाओं के विभिन्न आराध्यदेवों और उसके व्यक्तिगत विश्वासों की ओर भी निर्देश है। हर्ष संवत् 25 अर्थात् 631 ई० वाला मधुवन ताम्रपत्राभिलेख भी दानपरक है। यह उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में स्थित मधुबन नामक स्थान से मिला था। इसकी प्राय: सम्पूर्ण शब्दावली बाँसखेड़ा के लेख भी आवृत्तिमात्र हैं तथा दोनों में वर्णित राज्याधिकारी और कर भी एक समान ही है। इस लेख में उल्लिखित दानवाला सोमकुंडा नामक गाँव श्रीवास्तीभुक्ति के कुण्डधानी में स्थित था। उसे हर्षवर्धन ने वामस्थ्य नामक ब्राह्मण के जाली अधिकारी से छीनकर सावर्णिगोत्री भट्टवातस्वामी और विष्णुवृद्धगोत्री भट्टशिवदेवस्वामी को अग्रहाररूप (दान में) दिया था। नालन्दा और सोनपत (दिल्ली के निकट सोनीपत) से प्राप्त मुहरों वाले अभिलेखों से कोई विशेष ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त नहीं होती। ये मुद्राएं गोलाकार की हैं और फ्लीट का अनुमान था कि वे किन्हीं ताम्रफलकों के साथ लगी थीं जो अब तक प्राप्त नहीं हो सके हैं। सोनपत मुहर के ऊपर महाराज श्रीराज्यवर्धन (प्रथम) से हर्षवर्धन तक की वंशावली मिलती है, जिसमें प्रत्येक राजा की रानी का नाम भी मिलता है।

समकालीन राजवंशों के कुछ अभिलेखों में भी हर्षवर्धन सम्बन्धी उल्लेख मिलते हैं। बादामी के चालुक्यराज द्वितीय पुलकेशी का रविकीर्ति विरचित 633-34 ई० (शक सं० 556) का अहिहोड़ लेख उनमें सर्वप्रथम है। उससे हर्ष-पुलकेशी युद्ध में हर्ष की पराजय का ज्ञान होता है।

चीनी यात्रियों के विवरण

भारत आनेवाले अनेक चीनी यात्रियों के विवरणों तथा उनके आधार पर लिखे चीनी वृत्तों से भी हर्ष के बारे में पर्याप्त सामग्री मिलती है। ह्वेनसांग का यात्रावृत्त उनमें सर्वप्रमुख है। वह 20 वर्ष की आयु में बौद्ध भिक्षु हो गया था तथा गुरुओं और ग्रन्थों की खोज में अपने जीवन के 26वें वर्ष (629 ई० में) पश्चिम के देशों की ओर चल पड़ा। अन्ततः वह भारत पहुँचा। वहाँ 16 वर्षों तक घूमने के बाद वह 645 ई० में चीन लौटा, जहाँ चीनी सम्राट् ताइशुंग ने झुककर उसका स्वागत किया। उसकी सबसे बड़ी यात्रा भारत की ही थी, जिसे वह ब्राह्मणों का देश कहता है। लौटकर 648 ई० में उसने चीनी भाषा में अपनी यात्राओं का विवरण प्रस्तुत किया, यह विवरण सी-यू- की के नाम से प्रसिद्ध है। भारत आने का उसका मुख्य उद्देश्य बौद्ध तीर्थों की यात्रा और बौद्ध ग्रन्थों का संग्रह करना था। किन्तु उन तीर्थों में जाने, धार्मिक विषयों पर भारतीय विद्वानों से तर्क करने तथा पुस्तकसंग्रहों के अतिरिक्त उसने यहाँ के लोगों के जीवन, रीति-रिवाज और भौगोलिक विवरण भी दिए हैं। साथ ही, वह अनेक भारतीय राजाओं और राजनीतिक घटनाओं का भी उल्लेख करता है। उदाहरण के लिए वह थानेश्वर के प्राचीन (पारम्परिक) इतिहास (कौरव-पाण्डव युद्ध) तथा उसका नाम धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र पड़ने के कारण बताता है। तत्कालीन कन्नौज के इतिहास के विषय में भी वह उल्लेख करता है। राज्यवर्धन का शशांक द्वारा वध, हर्षवर्धन द्वारा कन्नौज को राजगद्दी ग्रहण करने तथा उसकी विजयों और सैन्य शक्ति का भी वह उल्लेख करता है। उसके सबसे वृहद् और क्रमानुसार विवरण हर्ष द्वारा आयोजित कन्नौज की सभा और प्रयाग की महामोक्षपरिषद् के विवरण में हैं। नालन्दा के बौद्ध महाविहार (विश्वविद्यालय) में वह रहा, पढ़ा और पढ़ाया। स्वाभाविक रूप से उसने उसका भी पर्याप्त विवरण दिया है। स्पष्ट है कि ह्वेनसांग के विवरण का राजनीतिक महत्त्व की अपेक्षा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व अधिक है।

ह्वेनसांग के कागजपत्रों के आधार पर उसके शिष्य हुइ-ली ने उसकी ‘जीवनी’ लिखी। उस जीवनी में ह्वेनसांग के भारत आने के पूर्व तथा यहाँ से लौट जाने के पश्चात् के जीवन का वर्णन है। उससे अनेक ऐसी घटनाओं का पता चलता है जो ह्वेनसांग के यात्रा विवरण में नहीं मिलती हैं। सी-यू- की तथा ‘जीवनी’ एक-दूसरे की पूरक हैं बाद में लिखे गए चीनी राजवंशों के इतिहासों भी इन दोनों के आधार पर भारत सम्बन्धी अनेक उद्धरण प्राप्त होते हैं। सम्भवत् ह्वेनसांग की प्रेरणा से ही 643 ई० में प्याओ नामक एक राजदूत चीनी सम्राट् की ओर से हर्ष के दरबार में भेजा गया। उसके साथ हान्-शो नामक एक राज्याधिकारी भी था। हान्-शो बाद में तीन बार और इस देश में आया। दुर्भाग्य यह है कि भारत के बारे में उसने : जो कुछ लिखा, उसके कुछ गिने-चुने उद्धरण ही शेष बच रहे है। हर्ष (शिलादित्य) के बारे में • लिखने वाले प्रमुख चीनी यात्रियों में ई-चिंतग अन्तिम था। 671 ई० में चीन से चलकर समुद्री मार्ग से होता हुआ वह भारत आया तथा 705 ई० में चीन लौट गया। किन्तु ह्वेनसांग की तरह भारत आने का उसका मुख्य उद्देश्य बौद्ध तीर्थों की यात्रा करना तथा बौद्ध साहित्य का संग्रह था। राजनीतिक बातों के सम्बन्ध में ई-चिंतग से भी कोई प्रमुख जानकारी उपलब्ध नहीं होती। प्रश्न 2-ह्वेनसांग कौन था? उसके द्वारा दिए गए भारत के विवरण पर संक्षेप में