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Bcom 1st Year Marginal Cost Notes

Bcom 1st Year Marginal Cost

सीमान्त लागत 

सरल शब्दों में, किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के उत्पादन से कुल लागत में जो वृद्धि होती है उसे सीमान्त लागत कहते हैं। अन्य शब्दों में, सीमान्त इकाई की लागत को सीमान्त लागत (Marginal Cost) कहा जाता है। एक उदाहरण से इस बात को और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है-माना कि कोई उत्पादन इकाई किसी वस्तु की 20 इकाइयाँ ₹400 लागत पर उत्पन्न करती है। अब यदि वह उत्पादन इकाई 20 इकाइयों के स्थान पर 21 इकाइयों का उत्पादन करे और कुल उत्पादन व्यय ₹ 425 आए तो 21वीं इकाई को उत्पादन लागत ₹ 25 होगी। इस दशा में इक्कीसवीं इकाई सीमान्त इकाई तथा ₹ 25 सीमान्त लागत होगी। सीमान्त लागत को अल्पकाल में कुल परिवर्तनशील लागत (TVC) द्वारा भी ज्ञात किया जा सकता है। अल्पकाल में एक अतिरिक्त इकाई के उत्पादन से कुल परिवर्तन लागत में वृद्धि होती है, उसे सीमान्त लागत कहते हैं। यह प्रारम्भ में गिरती है फिर न्यूनतम बिन्दु पर पहुँचती है और अन्त में बढ़ती है। सीमान्त लागत (MC) के सम्बन्ध में निम्नलिखित दो बातें ध्यान में रखनी चाहिए 

(i) MC रेखा AVC तथा ATC की अपेक्षा उत्पादन की कम मात्रा पर ही अपने निम्नतम बिन्दु पर पहुँच जाती है। 

(ii) MC रेखा AVC तथा ATC रेखाओं को नीचे से उनके निम्नतम बिन्दुओं पर काटती हुई गुजरती है। 

औसत लागत (Average Cost) कुल लागत को कुल उत्पादन से भाग देने पर जो लागत प्राप्त होती है, वही औसत लागत कहलाती है। अन्य शब्दों में औसत लागत – १० लाना कुल उत्पादन (इकाइयाँ) यदि 10 इकाइयों की कुल लागत र 70 है तो एक वस्तु की औसत लागत 70/10 = ₹ 7 होगी। 

उत्पत्ति के नियमों का औसत लागत पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। जब उत्पत्ति वृद्धि नियम लागू होता है तो उत्पादन वृद्धि के साथ-साथ औसत लागत कम होती जाती है। जब उत्पत्ति समता नियम लागू होता है तो औसत उत्पादन लागत उत्पादन वृद्धि के साथ-साथ बढ़ती चली जाती है। 

कुल लागत (Total Cost) कुल उत्पादन पर जो कुछ धन व्यय होता है, उसे कुल लागत कहा जाता है। कुल लागत में उत्पादन पर हुए सभी प्रकार के मौद्रिक व्यय शामिल होते हैं। 

कुल लागत, कुल स्थिर लागत तथा कुल परिवर्तनशील लागत के योग के बराबर होती है, अत: कुल औसत लागत, औसत स्थिर लागत व औसत परिवर्तनशील लागत का योग होता है। 

कुल लागत की मात्रा उत्पादन वृद्धि के साथ सदैव ही घटती है चाहे उत्पत्ति का कोई भी नियम क्रियाशील क्यों न हो। आसत लागत तथा सीमान्त लागत की अवधारणाओं को विभिन्न उत्पत्ति के त एक सरल उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।

निम्नांकित तालिकाओं पर दृष्टि डालने से यह स्पष्ट होता है कि उत्पत्ति वृद्धि नियम अथवा लागत ह्रास नियम के लागू होने पर सीमान्त न निरन्तर गिरती (कम होती) चली जाती है, औसत लागत भी घटती है, परन्तु सीमान्त लागत तुलना में कम तीव्र गति से। लेकिन कुल लागत में निरन्तर वृद्धि होती चली जाती है। 

उत्पत्ति समता नियम के अन्तर्गत सीमान्त लागत तथा औसत लागत में किसी प्रकार कोई परिवर्तन नहीं आता। केवल कुल लागत में आनुपातिक वृद्धि होती है 

उत्पादन की इकाइयाँ कुल लागत औसत लागत सीमान्त लागत

(Units of Product) (Total Cost) (Average Cost) (Marginal Cost) 

उत्पत्ति ह्रास नियम लागत वृद्धि नियम के अन्तर्गत उत्पादन वृद्धि के साथ-साथ तीनों लागतों में वृद्धि होती है। सीमान्त व्यय तथा औसत व्यय में निरन्तर वृद्धि होती है। उल्लेखनीय बात यह है कि सीमान्त लागत में औसत लागत की अपेक्षा अधिक तीव्र गति से वृद्धि होती है।

सीमान्त लागत तथा औसत लागत में सम्बन्ध (Relation between Marginal Cost and Average Cost) उपर्युक्त विवेचन तथा तालिकाओं से स्पष्ट है कि सीमान्त लागत (Marginal Cost) और औसत लागत (Average Cost) में घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध को . रेखाचित्र-20 (A) द्वारा भी प्रदर्शित किया जा सकता है। 

रेखाचित्र-20(A) से स्पष्ट है कि जब औसत लागत (AC) कम होती है तो सीमान्त लागत और भी तेजी से कम होती है। रेखाचित्र में औसत लागत A बिन्दु से B बिन्दु तक । निरन्तर गिर रही है। जब औसत लागत में वृद्धि होती है तो सीमान्त लागत में भी वृद्धि होने लगती है, परिणामतः दोनों वक्र रेखाएँ U आकार की हो जाती हैं। इन वक्र रेखाओं का U आकार होने का मूल कारण यह है कि जब उत्पादन प्रारम्भ किया जाता है तो उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ उपादानों का अनुकूलतम संयोग निकट आने लगता है जिससे औसत तथा सीमान्त दोनों ही लागतें गिरने लगती हैं। कुछ समय उपरान्त यह अनुकूलतम संयोग भंग हो जाता है क्योंकि उत्पादन के स्थिर उपादानों में तो कोई परिवर्तन नहीं होता, परन्तु परिवर्तनशील उपादानों की मात्रा में वृद्धि हो जाती है, परिणामतः कुल उत्पादन तो बढ़ता है, परन्तु सीमान्त उत्पादन की मात्रा निरन्तर कम होती चली जाती है जिससे सीमान्त तथा औसत लागत में वृद्धि होती है। B से C तक औसत लागत में भी वृद्धि होती है। औसत उत्पादन लागत में वृद्धि के साथ-साथ सीमान्त लागत में भी वृद्धि होती है। यही कारण है कि सीमान्त लागत (MC) औसत लागत (AC) से ऊपर पहुँच जाती है। 

उत्पादन मात्रा रेखाचित्र-20 (B) वितरण के आधुनिक

आधुनिक अर्थशास्त्री वितरण के सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त कोस्वीकार करते वरन् उन्होंने इसके स्थान पर माँग व पूर्ति के आधार पर एक नए सिद्धान्त का प्रतिया किया है। माँग व पूर्ति का यह सिद्धान्त कीमत सिद्धान्त (Theory of Value) से बहुत कर मिलता-जुलता है। इस सिद्धान्त की आधारभूत मान्यता यह है कि जिस प्रकार वस्तु की कीमत का निर्धारण वस्तु की माँग व पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है, उत्पादन के उपादानों का प्रतिफल भी उनकी माँग व पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है।

सिद्धान्त की मान्यताएँ (Assumptions) 

वितरण का आधुनिक सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है-

(1) बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति विद्यमान है।

(2) उत्पत्ति ह्रास नियम अथवा परिवर्तनशील अनुपातों का नियम लागू होता है।

(3) साधन की सभी इकाइयाँ समरूप हैं। अतः वे एक-दूसरे की पूर्ण स्थानापन्न हैं।

(4) प्रत्येक साधन छोटी-छोटी इकाइयों में पूर्णतः विभाज्य है।

(5) उत्पत्ति के सभी साधन पूर्णतया गतिशील हैं। 

(6) साधन की सीमान्त उत्पादकता को मापा जा सकता है और उसकी अवसर लागत दी हुई है। 

उत्पत्ति के उपादान की माँग (Demand of Factors of Production)-

उत्पादन के विभिन्न उपादानों (साधनों) की मांग प्रत्यक्ष माग (Direct Demand) नहीं होती वरन व्युत्पन्न माँग (Derived Demand) होती है और साधन की माँग उसकी सीमान्त उत्पादकता (Productivity) पर निर्भर करती है। इसका अभिप्राय यह है कि यदि किसी वस्त की माँग में वृद्धि होती है, तो उस वस्तु के उत्पादन में प्रयुक्त होने वाले साधनों की मांग में भी दि हो जाती है। उत्पादकों के द्वारा किसी भी साधन की मागी जाने वाली मात्रा उस पानी आगम उत्पादकता (Marginal Revenue Productivity) पर निर्भर करती है। अतः उत्पादक किसी भी साधन का उसकी आय उत्पादकता से अधिक प्रतिफल नहीं कर अतिरिक्त, जैसे-जैसे किसी साधन की अतिरिक्त इकाइयों का प्रयोग किया जा उत्पत्ति हास नियम के क्रियाशील होने के कारण उत्पादकता कम होती चली जाएगी। यही कारण है कि साधन की माँग का वक्र बाएँ से दाएँ नीचे की ओर झुकता है। 

उत्पत्ति के उपादान की पूर्ति (Supply of Factors of Production)

-जिस प्रकार किसी वस्तु की पूर्ति वस्तु की लागत से प्रभावित होती है, ठीक उसी प्रकार उत्पत्ति के उपादान (साधन) की पूर्ति उसकी अवसर लागत (Opportunity Cost) से निर्धारित होता है। “अवसर लागत द्रव्य की वह मात्रा है जो किसी साधन को किसी अन्य सर्वश्रेष्ठ वैकल्पिक उपयोग में मिल सकती है। अतः साधन को वर्तमान उद्योग में इतना प्रतिफल अवश्य मिलना चाहिए जितना कि उसे किसी अन्य वैकल्पिक उद्योग में प्राप्त हो सकता है अन्यथा साधन अपने वर्तमान उद्योग को त्याग कर उस उद्योग-विशेष में चला जाएगा। इस प्रकार साधन का पति मुल्य उसकी अवसर लागत से निर्धारित होता है। का साधन की पर्ति कीमत जितनी अधिक होगी साधन की पर्ति भी उतनी ही अधिक होगा। अतः पूर्ति वक़ बाएँ से दाएँ की ओर ऊपर को उठेगा। इसके अतिरिक्त, साधन विशेष की पूर्ति कई कारकों से प्रभावित होती है। जैसे श्रम की पूर्ति शिक्षा तथा प्रशिक्षण की लागत’, कार्य करने की दशाओं आदि से प्रभावित होती है। इसके अलावा साधनों की पूर्ति पर आर्थिक घटकों के साथ अनार्थिक घटकों का भी व्यापक प्रभाव पड़ता है।

साधन के प्रतिफल का निर्धारण (Determination of Factor Pricing) 

साधन या उपादान का प्रतिफल उस बिन्दु के द्वारा निर्धारित होगा, जिस बिन्दु पर साधन की मांग उसकी पूर्ति के ठीक बराबर होगी। रेखाचित्र-21 में साधन की माँग रेखा DD तथा | पति रेखा SS है. जो एक-दूसरे को P बिन्दु पर काट रही हैं। इस प्रकार साधन की माँग व पूर्ति । OM मात्रा होगी और OS प्रतिफल निर्धारित होगा। यहाँ एक प्रश्न यह उठता है कि प्रतिफल P बिन्दु से OS ही क्यों निर्धारित हुआ OS, अथवा OS, प्रतिफल क्यों नहीं निर्धारित होता? इसका कारण यह है कि OS, बिन्दु पर माँग की मात्रा SA है जबकि पूर्ति की मात्रा S, B है। में हैं। 

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त वितरण का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मिल यह सिद्धान्त इस बात की सामान्य व्याख्या करता है कि उत्पत्ति के विभिन्न सा न्यायोचित पुरस्कार किस प्रकार निर्धारित हो। यह सिद्धान्त मूलतः प्रतिस्थापन सिद्धान्त of Substitution) पर आधारित है। यह सिद्धान्त यह बताता है कि उत्पादन के एक उपाय की कीमत उसकी सीमान्त उत्पादकता के आधार पर निर्धारित होती है। इस सिद्धान्त प्रारम्भिक व्याख्या 19वीं शताब्दी के अन्त में प्रो० जे०बी० क्लार्क (J.B. Clans विक्सटीड (Wickstead), वालरस (Walras) आदि अर्थशास्त्रियों ने की, तत्पश्चात दा विकास में श्रीमती जोन रोबिन्सन (Mrs. Joan Robbinson) तथा जे०आर० हिक्स जैसे अर्थशास्त्रियों ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। 

सरल शब्दों में, इस सिद्धान्त का सार यह है कि जिस प्रकार दीर्घकाल में वस्तओं तथा सेवाओं का मूल्य उनकी सीमान्त उपयोगिता द्वारा निर्धारित होता है ठीक उसी प्रकार उत्पत्ति के विभिन्न साधनों का प्रतिफल भी उनकी सीमान्त उत्पादकता के द्वारा निर्धारित होता है। इस प्रकार यह सिद्धान्त यह बताता है कि राष्ट्रीय आय में से उत्पादन के प्रत्येक साधन को (साहसी के अतिरिक्त) जो प्रतिफल मिलता है वह उस साधन विशेष की सीमान्त उत्पत्ति के बराबर होता है। हाँ, किसी अवधि में (अथवा अल्पकाल में) किसी साधन को मिलने वाला प्रतिफल उस सीमान्त उत्पादकता से कम या अधिक हो सकता है, परन्तु दीर्घकाल में अथवा साम्य की दशा में साधन को मिलने वाला प्रतिफल उसकी सीमान्त उत्पत्ति (उत्पादकता) के बराबर ही होगा। 

उपर्युक्त व्याख्या के अनुसार इस सिद्धान्त की दो प्रमुख बातें निम्नवत् हैं –

(1) साधन की कीमत उसकी उत्पादकता पर निर्भर करती है। 

(2) साधन की कीमत उसकी सीमान्त उत्पादकता (Marginal Productivity) द्वारा निर्धारित होती है। 

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की परिभाषाएँ 

(Definitions of Marginal Productivity Theory)

(1) प्रो० साइमन्स (Prof. Simons) के शब्दों में— “पूर्ण प्रतियोगिता और उत्पत्ति के साधनों की पूर्ण गतिशीलता की दशाओं में श्रमिक को सीमान्त उत्पादन में कार्य पर लगाने से हुई उत्पत्ति के बराबर ही मजदूरी मिलती है।”

2) प्रो० हिक्स (Prof. Hicks) के शब्दों में- “सीमान्त उत्पादकता उत्पत्ति के साधनों के पुरस्कार की माप है जो सन्तुलन की अवस्था में उसे प्राप्त होता है, अर्थात उद्योग के शेष संगठन को पूर्ववत् बनाए रखते हुए फर्म की उत्पत्ति में वह वृद्धि जो उस साधन की पूर्ति में एक छोटी इकाई जोड़कर फर्म को प्राप्त होती है।” 

सीमान्त उत्पादकता की धारणा को स्पष्ट करने के लिए हम एक उदाहरण भी ले सकते हैं मान लीजिए कि किसी कारखाने में उत्पादन के अन्य साधनों के साथ 24 श्रमिक कार्य करते हैं जिससे कारखाने की कुल आय ₹ 5000 प्राप्त होती है। अब यदि उत्पत्ति के अन्य साधनों को यथास्थिर रखकर केवल श्रमिकों की संख्या में एक की वृद्धि कर दें, अर्थात् श्रमिकों का सख्या 25 कर दें, तो कारखाने को ₹ 5100 की आय प्राप्त होती है। इस प्रकार एक श्रमिक को वृद्धि से ₹ 100 की आय बढ़ जाती है। यही ₹ 100 अन्तिम (सीमान्त) श्रमिक की सीमान्त उत्पत्ति कहलाएगी। 

अतः श्रमिक की मजदूरी किसी भी दशा में ₹ 100 से अधिक नहीं होगी और शेष श्रमिक भी इसी दर से मजदूरी (Wages) प्राप्त करेंगे। इस प्रकार साधन की सीमान्त उत्पादकता’ उसकी अन्तिम इकाई की उत्पादकता का ही दूसरा नाम है। . 

(3) श्रीमती जोन रोबिन्सन के शब्दों में—“सीमान्तोत्पादन से अभिप्राय अन्य साधनों की निश्चित मात्रा के साथ किसी एक अतिरिक्त व्यक्ति के प्रयोग से उत्पादन में होने वाली वृद्धि से है।” अन्य शब्दों में, यह श्रम की सीमान्त भौतिक उत्पादकता और उत्पादन इकाई की सीमान्त आय का गुणनफल है। 

(4) प्रो० सैमुअल्सन (Samuelson) के शब्दों में, “किसी उत्पादनशील साधन की सीमान्त उत्पत्ति उस साधन की एक अतिरिक्त इकाई द्वारा उत्पादित की गई अतिरिक्त मात्रा होती है, जबकि अन्य साधन समान रहते हों।” 

(5) प्रो० हैन्सन के शब्दों में, “किसी साधन की सीमान्त उत्पत्ति साहसी की कुल आय में वह वृद्धि है जो उस साधन की एक अतिरिक्त इकाई के कार्य में लगाने पर प्राप्त होती है।” 

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की मान्यताएँ

(Assumptions of the Marginal Productivity Theory)

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है –

(1) उत्पादन की समस्त इकाइयाँ परस्पर समान हैं और वे एक-दूसरे की पूर्ण स्थानापन्न हैं। 

 (2) एक साधन की विभिन्न इकाइयाँ ही नहीं अपितु विभिन्न साधनों की विभिन्न इकाइयाँ भी पूर्ण स्थानापन्न हैं। 

(3) साधन बाजार तथा साधनों द्वारा उत्पादित वस्तु के बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति पायी जाती है। 

(4) केवल एक साधन परिवर्तनशील है तथा शेष साधन स्थिर रहते हैं। अन्य शब्दों में, 

शाल साधन की सीमान्त उत्पादकता (Marginal Productivity) को ज्ञात किया जा सकता है। 

(5) प्रत्येक उत्पादक का लक्ष्य अधिकतम लाभ प्राप्त करना है। 

(6) अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की स्थिति विद्यमान है। 

(7) सिद्धान्त के अन्तर्गत परिवर्तनशील अनुपातों के नियम को क्रियाशील मान लि गया है। 

(8) सीमान्त उत्पादकता का यह सिद्धान्त केवल दीर्घकाल में लागू होता है, अशी अल्पकाल में साधन को मिलने वाला परस्कार उसकी सीमान्त उत्पादकता स कम या अधिक को सकता है। 

सीमान्त उत्पादकता के प्रकार या माप (Kinds or Measurements of Marginal Productivity) 

सीमान्त उत्पादकता को तीन प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है 

1. सीमान्त भौतिक उत्पाद (Marginal Physical Product)-

किसी साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से कुल भौतिक उत्पाद | (Total Physical Product) में जो वृद्धि । होती है, उसे सीमान्त भौतिक उत्पाद कहते हैं,जबकि अन्य साधन स्थिर रखे जाते हैं। सीमान्त भौतिक उत्पाद वक्र सदैव U के उल्टे आकार का होता है जैसा कि रेखाचित्र-22 में दिखाया गया है 

2. सीमान्त आगम उत्पाद (Marginal Revenue Product)-

जब सीमान्त भौतिक 0 उत्पाद की वृद्धि को द्रव्य के रूप में व्यक्त  करते हैं तो इसको सीमान्त आगम उत्पाद (Marginal Revenue Product) कहते हैं। 

3. सीमान्त उत्पाद मूल्य (Value of Marginal Product

यदि प्राप्त अतिरिक्त उत्पादन, अर्थात् भौतिक उत्पाद को वस्तु के मूल्य से गुणा कर दें तो सीमान्त उत्पाद का मूल्य प्राप्त हो जाता है, स्मरण रहे, पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में कीमतं (P) और सीमान्त आय (आगम) (MR) एक-दूसरे के बराबर होती हैं, किन्तु अपूर्ण प्रतियोगिता की दशा में वस्तु का एकसमान सीमान्त भौतिक उत्पाद का उपज का मूल्य mm सीमान्त आय (आगम) (MR) कीमत से कम बनी रहती है, फलस्वरूप का मल्य (MP) और सीमान्त आगम उत्पाद (MRP) एकसमान न होकर अलग होते हैं।

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की आलोचना 

(Criticism of the Marginal Productivity Theory)

इस सिद्धान्त की आलोचना निम्नवत् की गई है 

1.संयुक्त उत्पत्ति में से किसी विशेष साधन द्वारा होने वाली उत्पत्ति का पता लगाना अत्यन्त कठिन है (It is difficult to determine the contribution of any particular factor in joint production)-प्रो० टॉजिग (Taussig), डेवनपोर्ट (Devenport), कारवर (Carver) तथा एड्रोएन्स (Adroance) आदि अर्थशास्त्रियों का मत है कि किसी साधन-विशेष की सीमान्त उत्पादकता को ज्ञात करना अत्यन्त कठिन है क्योंकि 

(i) प्रत्येक वस्तु का उत्पादन विभिन्न उपादानों अर्थात् साधनों का संयुक्त परिणाम होता है, अत: किसी विशिष्ट साधन की उत्पादकता ज्ञात करना अत्यन्त कठिन है। 

(ii) प्रो० हॉब्सन का मत है कि उत्पादन के साधनों के मिलने का अनुपात कुछ तकनीकी कारणों से स्थिर होता है और उसे सरलता से परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। 

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