Organization and Management of the IMF

Organization and Management of the IMF मुद्रा कोष का संगठन तथा प्रबन्ध अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का प्रबन्ध एवं संगठन निम्न प्रकार है- 1.प्रशासक मण्डल  2.कार्यकारी संचालक  3.प्रबन्ध संचालक 1. प्रशासक मण्डल – कोष के सभी सदस्य देश अपना-अपना एक प्रतिनिधि मुद्रा कोश के प्रशासक मण्डल में नियुक्त करते हैं। प्रशासक मण्डल में एक गवर्नर तथा एक स्थानापन्न गवर्नर होता है। प्रत्येक प्रशासक का कार्यकाल 5 वर्ष होता है, इसकी पुनर्नियुक्ति भी की जा सकती है। प्रशासक मण्डल की एक वार्षिक सभा सितम्बर या अक्टूबर में होती है जिसमें कोष का 30 अप्रैल तक स्थिति विवरण और ब्योरा प्रस्तुत किया जाता है। वार्षिक सभा के अतिरिक्त मुद्रा कोष के कोई 5 सदस्य अथवा जिन सदस्यों को कुल मताधिकार का 25% प्राप्त है, प्रशासक मण्डल की सभा बुला सकते हैं। प्रशासक मण्डल मुद्रा कोष की सर्वोच्च संस्था है और कोष की सम्पूर्ण शक्तियाँ इसी मण्डल के अधीन हैं। 2. कार्यकारी संचालक मण्डल—इस मण्डल का प्रमुख कार्य सामान्य प्रशासन तथा दिन-प्रतिदिन का कार्य करना है । मुद्रा कोष के प्रबन्धक मण्डल में इस समय 22 सदस्य हैं। इनमें से 6 स्थायी सदस्य सबसे अधिक कोटा वाले देशों द्वारा, 5 सदस्य सुदूरपूर्व और प्रशान्त महासागर के देशों द्वारा, 5 सदस्य मध्यपूर्व के देशों द्वारा एवं शेष सदस्य क्रमशः अफ्रीका, लैटिन अमेरिकी और यूरोपीय देशों द्वारा मनोनीत किए जाते हैं। प्रबन्धक मण्डल का प्रत्येक मनोनीत या चुना हुआ सदस्य एक स्थानापन्न सदस्य की नियुक्ति कर सकता है। ये सदस्य कोष के नियमित कार्य संचालन के लिए उत्तरदायी होते हैं। प्रबन्धक मण्डल के सदस्यों को मुद्रा कोष से वेतन मिलता है। ★ 3. प्रबन्ध संचालक – मुद्रा कोष के दैनिक कार्य संचालन के लिए एक प्रबन्ध संचालक की नियुक्ति कार्यकारी संचालक मण्डल द्वारा की जाती है। प्रबन्ध संचालक प्रबन्ध मण्डल की सभाओं की अध्यक्षता करता है, किन्तु वह अपना मत केवल निर्णायक मत के रूप में ही दे सकता है। मताधिकार – मुद्रा कोष के सामान्य निर्णय बहुमत के आधार पर होते हैं। बहुमत सदस्य संख्या द्वारा न होकर कुल मताधिकार द्वारा निर्धारित होता है | मताधिकार के अन्तर्गत प्रत्येक सदस्य को 250 + 1 मत प्रति लाख SDRs ( Read More …

Meaning of Privatization

निजीकरण से आशय (Meaning of Privatization) निजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत सार्वजनिक उपक्रमों के स्वामित्व तथा प्रबन्ध में निजी क्षेत्र को सहभागिता प्रदान की जाती है अथवा स्वामित्व एवं प्रबन्ध का निजी क्षेत्र को हस्तान्तरण किया जाता है तथा आर्थिक क्रियाकलापों पर सरकारी नियन्त्रण को घटाकर देश में आर्थिक प्रजातन्त्र स्थापित किया जाता है । संकुचित अर्थ में निजीकरण का आशय उस नीति से है जिसके अन्तर्गत सार्वजनिक उपक्रम का निजी क्षेत्र को हस्तान्तरण कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया को ‘विराष्ट्रीयकरण’ (Denationalization) भी कहा जाता है। निजीकरण की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं- जिबान के० मुखोपाध्याय के अनुसार, “निजीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें किसी राष्ट्र। के आर्थिक कार्यकलापों में सरकारी प्रभुत्व को कम किया जाता है । “ वीरेन जे० शाह के अनुसार, “निजीकरण का अर्थ प्रजातन्त्र है। “ अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के अर्थशास्त्री सुसान के० जोन्स (Susan K. Jones) के शब्दों में, “निजीकरण शब्द से तात्पर्य किसी भी कार्यकलाप को सार्वजनिक क्षेत्र से निजी क्षेत्र को हस्तान्तरित करना है। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के कार्यकलापों में केवल पूँजी अथवा प्रबन्ध विशेषज्ञों का प्रवेश ही हो सकता है, किन्तु अधिकांश मामलों में, इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजी क्षेत्र में हस्तान्तरण होता है।” उक्त परिभाषाओं के आधार पर निजीकरण की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं— (1) यह विचारधारा विश्व स्तर पर लागू की जा रही है। (2) यह, एक नई विचारधारा तथा नई व्यूह रचना (Strategy) है।  (3) यह व्यापक विचारधारा है। इसका उद्देश्य सरकारी प्रभुत्व को कम करके निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना है। (4) यह विचारधारा आर्थिक प्रजातन्त्र (Economic Democracy) की स्थापना करती है। (5) यह सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन (Socio-Economic Changes) का उपकरण अथवा यन्त्र (Tool) है। (6)इसका विस्तृत क्षेत्र (Wide Scope) है। इसमें विराष्ट्रीयकरण (Denationalization), Read More …

Causes of the Origin of Black Money

Causes of the Origin of Black Money काले धन की उत्पत्ति के कारण काले धन की उत्पत्ति के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं- 1. कर-चोरी रोकने के शिथिल प्रयास – भारत में सर्वाधिक ऊँची दरों पर करों का आरोपण किया जाता है, लेकिन कर की अदायगी करने वाले लोगों का प्रतिशत अत्यन्त न्यून है। कर की इस चोरी को सरकार रोक पाने में अभी तक सफल नहीं हो सकी है। करों की चोरी के द्वारा काले धन की वृद्धि होती जाती है। 2. वस्तुओं की तस्करी – तस्करी भी काले धन को बढ़ाने में मदद करती है। कुछ देशद्रोही लोग देश से चोरी-छिपे माल बाहर विदेशों को भेजते हैं और विदेशों से यहाँ लाते हैं। इस क्रिया से कीमतों पर प्रभाव पड़ने के साथ-साथ काले धन की मात्रा भी बढ़ती है। सोना, मादक पदार्थों व जानवरों आदि की तस्करी, सीमा पार के और दूर-दराज के देशों में होती रहती है। 3. कराधान की ऊँची दरें – भारत में करों की दरें विश्व के किसी भी राष्ट्र के सापेक्ष सर्वाधिक हैं। भारत में कराधान की दरें इतनी अधिक होने के कारण धनी व्यक्ति भी अपनी वास्तविक आय बताने में हिचकिचाता है। इस प्रकार से लोगों के पास काफी धनराशि जिसका कोई हिसाब-किताब नहीं होता, एकत्र होती जाती है, जो धीरे-धीरे बेहिसाबी मुद्रा या काले धन में बदल जाती है। देश में प्रत्यक्ष करों की आय परोक्ष करों की आय के अनुपात लगातार घटती गई है, जो प्रत्यक्ष करों की लगातार चोरी को प्रकट करती है। 4.कठोर नियन्त्रण नीति- समानान्तर अर्थव्यवस्था अथवा काले धन के सृजन में अनेक प्रकार की कठोर नियन्त्रण वाली नीतियों का भी प्रमुख हाथ है। ये नीतियाँ है- कीमत व वितरण सम्बन्धी नियन्त्रण, प्रशासनिक नियन्त्रण, लाइसेन्सिंग पद्धति आदि। देश में सम्पूर्ण सरकारी मशीनरी का संचालन इस प्रकार से होता है कि मामूली सा काम कराने के लिए भी रिश्वत का सहारा लेना पड़ता है। भारत में आर्थिक क्रिया पर नियन्त्रण के विस्तार व जटिलता के कारण कर की चोरी वाली आमदनी का सृजन हुआ है। 

Causes and Effects of Regional Imbalance

Causes and Effects of Regional Imbalance क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण तथा प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था में क्षेत्रीय असन्तुलन के प्रमुख कारण एवं प्रभाव निम्नलिखित हैं— 1. भौगोलिक परिस्थितियाँ- भारत के कई क्षेत्रों के पिछड़े होने का कारण वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ भी हैं; जैसे-जम्मू व कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश तथा उत्तराखण्ड प्रदेश पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण पिछड़े रहे हैं। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहाँ यातायात की परेशानी रहती है, जिससे इन प्रदेशों में आवागमन काफी कठिन होता है । जलवायु भी क्षेत्रीय असन्तुलन को जन्म देती है। गंगा-यमुना का मैदानी भाग जितना उपजाऊ है, उतना उपजाऊ अन्य कोई क्षेत्र नहीं है। इसी वजह से ये क्षेत्र पानी की कमी न होने के कारण विकसित हो गए किन्तु शेष क्षेत्र, जहाँ पानी की कमी थी, पिछड़ गए। 2. ब्रिटिश शासन — आजादी के पूर्व का इतिहास यदि उठाकर देखें तो यह विदित होता है कि क्षेत्रीय असन्तुलन के लिए ब्रिटिश शासन काफी हद तक जिम्मेदार रहा। उन्होंने भारत को एक व्यापारिक केन्द्र के रूप में ही प्रयोग किया। अंग्रेजों ने यहाँ का कच्चा माल विदेशों में भेजा तथा वहाँ से आया हुआ पक्का माल यहाँ बेचा। परिणाम यह हुआ कि यहाँ व्यापार तथा उद्योग पिछड़ गए। उन्होंने केवल उन्हीं क्षेत्रों का विकास किया जिनसे उन्हें लाभ प्राप्त होता था। उन्होंने पश्चिम बंगाल तथा महाराष्ट्र का ही विकास किया। इसी तरह जमींदारी प्रथा ने कृषि को विकसित नहीं होने दिया। आय के बड़े हिस्से पर साहूकारों तथा जमींदारों का कब्जा होता था। इस शासन के दौरान जिन स्थानों से नहरें निकाली गईं वे ही क्षेत्र विकसित हो पाए। 3. नए विनियोग – नए विनियोगों का जहाँ तक प्रश्न है; विशेषकर निजी क्षेत्र में; पहले से विकसित क्षेत्रों में ज्यादा नया विनियोग किया गया है, जिसका उद्देश्य ज्यादा लाभ कमाना भी होता है। दूसरे विकसित क्षेत्रों में पानी, बिजली, सड़क, बैंक, बीमा कम्पनियाँ, श्रमिकों का आसानी से मिलना, बाजार का नजदीक होना इत्यादि का लाभ भी प्राप्त हो जाता है। इस वजह से भी क्षेत्रीय असन्तुलन हो जाता है।

Factors Fostering Globalization in India

Factors Fostering Globalization in India भारत में विश्वव्यापीकरण को प्रभावित करने वाले घटक  भारत में विश्वव्यापीकरण को निम्नलिखित तत्त्व प्रभावित करते हैं- 1. प्रतिस्पर्द्धा – पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण अंग प्रतिस्पर्द्धा के कारण ही कम्पनियों को विदेशों में नए बाजार ढूँढ़ने की आवश्यकता हुई इसी के परिणामस्वरूप उत्पादन तथा विक्रय की नई विधियों का विकास हुआ है। विदेशी कम्पनी की प्रतिस्पर्द्धा के डर से ही घरेलू कम्पनियाँ भी विश्व परिप्रेक्ष्य में अपने को स्थापित करने लगी हैं। 2. उदारवादी नीतियाँ – विश्वव्यापीकरण के विकास का मुख्य कारण ही पुनर्रचना की प्रक्रिया लागू होना है। 3. विभिन्न देशों में उपलब्ध उपरि ढाँचा, वितरण प्रणाली एवं विपणन दृष्टिकोण एक समान रूप वाले होते जाते हैं। 4. पूँजी बाजारों का सार्वभौमीकरण होता जा रहा है। प्रवाह करने वाली पूँजी की राशि में तेज गति से वृद्धि होती जा रही है जिसके कारण राष्ट्रीय स्तर के पूँजी बाजार विश्व स्तर के स्वरूप धारण करते जा रहे हैं। भारत में भी विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया धीरे-धीरे गति पकड़ रही है। भारत में विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया 1991 में प्रारम्भ हुई । प्रश्न 18 – भूमण्डलीकरण से आप क्या समझते हैं? What do you mean by Globalization ? उत्तर – भूमण्डलीकरण या वैश्वीकरण का अर्थ है विश्व में चारों ओर अर्थव्यवस्थाओं का बढ़ता हुआ एकीकरण। यह एकीकरण मुख्य रूप से व्यापार तथा वित्तीय प्रवाहों के माध्यम से होता है। व्यापार तथा वित्तीय प्रभाव अर्थात् निवेश के साथ-साथ श्रमिकों तथा टेक्नोलॉजी का भी ‘आगमन अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार होता है। भूमण्डलीकरण के सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं परिदृश्य सम्बन्धी आयाम भी हैं। किन्तु यहाँ हमने केवल आर्थिक बिन्दु पर ही केन्द्रीकरण किया है । अतः “विश्वव्यापीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें विश्व बाजारों के मध्य पारस्परिक निर्भरता उत्पन्न होती है और व्यापार देश की सीमाओं में प्रतिबन्धित न रहकर विश्व व्यापार में निहित तुलनात्मक लागत लाभ दशाओं का विदोहन करने की दशा में अग्रसर होता है । “

World Trade Organizaion: Introduction

World Trade Organization: Introduction विश्व व्यापार संगठन – परिचय विश्व व्यापार संगठन का जन्म 1 जनवरी, 1995 ई० को हुआ। यह General – Agreement on Tariff and Trade (GATT) का उत्तराधिकारी है। पूर्व में GATT के सदस्य देश समय-समय पर एकत्रित होकर विश्व व्यापार की समस्याओं पर वार्ता करते थे तथा उन्हें सुलझाते थे; किन्तु GATT के द्वारा WTO का रूप लिए जाने के पश्चात् अब इसे एक सुव्यवस्थित तथा स्थायी विश्व व्यापार संस्था के रूप में जाना जाने लगा है। विश्व व्यापार संगठन (WTO); विश्व बैंक (World Bank) तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) के समकक्ष ही स्थान रखता है।  विश्व व्यापार संगठन के कार्य  (Functions of WTO) विश्व के राष्ट्रों के मध्य आयात-निर्यात को संवर्द्धित करने के लिए ‘विश्व व्यापार संगठन’ अति महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहा है। इस क्षेत्र में उसके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं- (1) विश्व व्यापार समझौते तथा अन्य बहुपक्षीय समझौतों के क्रियान्वयन, प्रशासन एवं परिचालन हेतु आवश्यक सुविधाएँ प्रदान करना । (2) WTO के सदस्य देशों के मध्य उत्पन्न विवादों के निपटारे हेतु नियमों तथा प्रक्रियाओं को लागू करना। (3) Read More …

Meaning of Monetary Policy

Meaning of Monetary Policy मौद्रिक नीति से आशय मौद्रिक नीति से आशय एक ऐसी नीति से है जिसके द्वारा मुद्रा के मूल्य में स्थायित्व हेतु मुद्रा व साख की पूर्ति का नियमन किया जाता है। भारत में रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति का नियमन करता है। इसको साख के नियन्त्रणात्मक विस्तार की नीति के रूप में जाना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य कीमतों को नियन्त्रित रखना तथा आवश्यक सुख-सुविधाओं का विकास करना होता है। नियन्त्रित मौद्रिक विस्तार के द्वारा रिजर्व बैंक पर्याप्त वित्त का प्रबन्धन करता है तथा साथ ही देश में मूल्य-स्थिरता की अवस्था को बनाए रखता है। पॉल इंजिग के शब्दों में, “मौद्रिक नीति के अन्तर्गत उन सभी मौद्रिक निर्णयों और उपायों को सम्मिलित किया जाता है जिनका उद्देश्य मौद्रिक प्रणाली को प्रभावित करना होता है।” प्रो० कैण्ट के शब्दों में, “मौद्रिक नीति का आशय एक निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए चलन के विस्तार और संकुचन की व्यवस्था करने से है । ” प्रो० हैरी जॉनसन के शब्दों में, “मौद्रिक नीति का आशय उस नीति से है जिसके द्वारा केन्द्रीय बैंक सामान्य आर्थिक नीति के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मुद्रा की पूर्ति को नियन्त्रित करता है।” एक अच्छी मौद्रिक नीति वह है जिसमें आन्तरिक मूल्य स्तर में सापेक्षिक स्थिरता, विनिमय दरों में स्थायित्व, आर्थिक विकास, आर्थिक स्थिरता और रोजगार की समुचित व्यवस्था की जा सके। मौद्रिक नीति के निश्चित व अपरिवर्तनशील सिद्धान्त नहीं हैं वरन् देश, काल एवं परिस्थितियों के अनुसार इनमें परिवर्तन किया जा सकता है। मौद्रिक नीति के प्रमुख उद्देश्य (Main Objectives of Monetary Policy) मौद्रिक नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं- 1. आर्थिक विकास – कीमत स्थिरता एवं पूर्ण रोजगार का स्तर पाने के उद्देश्य, आर्थिक प्रगति के लिए सहायक होते हैं। मौद्रिक नीति आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए अपनायी जाती है। यह नीति आर्थिक उतार-चढ़ाव को रोकने के अस्त्र के रूप में अपनायी जाती है। आर्थिक विकास के लिए मौद्रिक नीति बचतों को प्रोत्साहित करती है एवं इन्हें उचित प्रकार से विनियोजित करने में भी मदद करती है । 2. आर्थिक विकास के लिए वित्तीय साधनों को बढ़ाना- मौद्रिक नीति देश के आर्थिक विकास के लिए वित्तीय साधनों को एकत्र करने एवं बढ़ाने में काफी योगदान करती है। क्योंकि विकासशील राष्ट्रों में वित्तीय साधनों का अभाव रहता है, अतः उचित मौद्रिक नीति के द्वारा मुद्रा तथा साख की पूर्ति को बढ़ाया जा सकता है। 3. कीमतों में स्थायित्व – कीमतों में उतार-चढ़ाव को रोकना ही कीमत स्थायित्व कहलाता है। कीमत स्तर ऐसा होना चाहिए जो कि विनियोजकों के लिए अधिक विनियोग हेतु प्रेरणादायक रहे तथा उपभोक्ता वर्ग के लिए भी न्यायोचित हो । अर्थव्यवस्था में कीमतों में निरन्तर उतार-चढ़ाव से विनियोग, उत्पादन, आय, प्रभावी माँग एवं राष्ट्रीय आय पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। मौद्रिक नीति में आवश्यक परिवर्तन करके कीमतों पर नियन्त्रण रखा जा सकता है एवं अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण चलों (Variables) की गति को सीमित किया जा सकता है तथा अर्थव्यवस्था को वांछित दिशा में मोड़ा जा सकता है।  4. Read More …

What do you mean by Foreign Investment?

What do you mean by Foreign Investment ? विदेशी निवेश से आपका क्या तात्पर्य है? उत्तर – विदेशी विनियोग का तात्पर्य है दूसरे देश में निजी कम्पनियों या व्यक्तियों द्वारा किया गया निवेश जो सरकारी सहायता नहीं है। लेकिन एक दूसरे मत के अनुसार विदेशी निवेश में सरकारी अधिकारी तथा निजी फर्म और व्यक्ति दोनों ही शामिल हैं। जिन देशों में निवेश की माँग की तुलना में घरेलू बचत कम पड़ती है, वहाँ विदेशी विनियोग तीव्र आर्थिक विकास के लिए सहायक सिद्ध हो सकता है। जिन देशों को भुगतान शेष की समस्या का सामना करना पड़ता है, वहाँ भी विदेशी निवेश समस्या को कम करने में सहायक हो सकता है। विदेशी विनियोग दो प्रकार का होता है— 1. विदेशी प्रत्यक्ष विनियोग 2. पोर्टफोलियो विनियोग । प्रश्न 13 – गतिहीन मुद्रा स्फीति को समझाइए। Explain Stagflation. उत्तर – गतिहीन मुद्रा स्फीति अर्थात् Stagflation शब्द, दो शब्दों‘Stagnation’ तथा ‘Inflation’ से मिलकर बना है, जो इस बात का प्रतीक है कि अर्थव्यवस्था में एक ओर तो कीमतें बढ़ती हैं तथा दूसरी ओर आर्थिक विकास अवरुद्ध होकर अर्थव्यवस्था में निष्क्रियता एवं जड़ता की स्थिति आ जाती है। इस स्थिति को ही गतिहीन मुद्रा स्फीति की स्थिति कहते हैं । प्रश्न 14 – प्रति व्यापार क्या है? — What is Counter trade? उत्तर – प्रति व्यापार, व्यापार की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें किसी विक्रेता से कोई वस्तु तभी खरीदी जाती है जब बदले में विक्रेता भी क्रेता से कोई वस्तु खरीदने को इच्छुक हो। इस तरह से अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में इस नीति का पालन तब किया जाता है जब किसी देश के पास मुद्रा भण्डार की कमी होती है। इसके तहत कोई देश तभी किसी देश से आयात करता है जब बदले में वह उस देश से निर्यात करने को इच्छुक हो ।

Advantages of Liberalizaion

Advantages of Liberalization उदारीकरण के लाभ उदारीकरण से अग्रलिखित लाभ हुए हैं— 1. उदारीकरण के दौर में कर-प्रणाली का सरलीकरण – सरकार द्वारा दीर्घकालिक राजकोषीय नीति की घोषणा के द्वारा कर प्रणाली को सरलीकृत कर युक्तिसंगत बनाया गया है। आयकर की अधिकतम सीमा को 30% कर दिया गया है। उत्पाद कर में कमी कर दी गई है। विदेशी कम्पनियों के लाभ-कर को कम कर दिया गया है। 2. ब्याज दरों का स्वतन्त्र निर्धारण- उदारीकरण के दौर में अब ब्याज दरों का निर्धारण रिजर्व बैंक द्वारा नहीं, अपितु इनका निर्धारण बाजार शक्तियों द्वारा पूर्ण स्वतन्त्रतापूर्वक किया जाएगा। 3. नए उद्यमी वर्ग का प्रादुर्भाव- उदारीकरण के परिणामस्वरूप देश में एक नए उद्यमी वर्ग का प्रादुर्भाव हुआ है, जो औद्योगिक गतिशीलता को बढ़ाते हुए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। 4. प्रतिस्पर्धी उद्यमिता का प्रारम्भ – उदारीकरण के नए दौर में नई तकनीक के आगमन तथा विदेशी कम्पनियों द्वारा भारत में निवेश करने के कारण भारतीय उद्यमियों में नई चेतना का संचार हुआ है तथा स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा के कारण मात्रात्मक ही नहीं, गुणात्मक सुधार भी हुआ जिसका सीधा लाभ उद्योग जगत को प्राप्त हो रहा है । 5. उत्पादन में वृद्धि – नियन्त्रणों की समाप्ति से देश में औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि हुई है। उदारीकरण से पूर्व देश में अनेक औद्योगिक एवं उपभोक्ता वस्तुओं की कमी थी। लेकिन कुछेक वर्षों में ही स्थिति बदल गई है। 6. विकास दर में वृद्धि — विकास दर किसी भी देश की प्रगति का मापदण्ड है। केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने 31 अगस्त को चालू वित्त वर्ष 2015-16 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2015) के आँकड़े जारी कर दिए हैं। इसके अनुसार इस दौरान आर्थिक विकास दर घटकर 7% पर आ गई है। जनवरी-मार्च 2015 में यह 7.5°% थी। टैक्स मामलों में सलाह देने वाली प्रमुख बहुराष्ट्रीय कम्पनी अर्न्स्ट एण्ड यंग (ईवाई) ने अक्टूबर 2015 मे जारी अपनी रिपोर्ट में भारत को निवेश के लिहाज से विश्व के सबसे आकर्षक स्थल के तौर पर चिह्नित किया है। उसके अनुसार भारत में कम्पनियों के लिए काम करना अब पहले से ज्यादा आसान हो गया है। आने वाले दो-तीन वर्षों तक भारत में होने वाले विदेशी निवेश में खासी वृद्धि होगी। इस निवेश का बड़ा हिस्सा मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में आ सकता है। रिपोर्ट में भारत पहले स्थान पर है, जबकि उसके बाद चीन, दक्षिण-पूर्वी एशिया, ब्राजील और उत्तर अमेरिका का नम्बर है। दुनिया की 500 बड़ी कम्पनियों के बीच किए गए इस प्रतिष्ठित सर्वेक्षण को 15 Read More …

Special Economic Zone : SEZ

Special Economic Zone : SEZ विशेष आर्थिक क्षेत्र – सेज  विशेष आर्थिक क्षेत्र एक ऐसा शुल्क मुक्त आर्थिक क्षेत्र है जहाँ विस्तृत रूप से विदेशी निवेश को आकर्षित करने के साथ-साथ निर्यात व्यापार को बढ़ावा दिया जाता है। सेज बनाने का मुख्य उद्देश्य निर्यात उत्पादन को नियमों व कानूनों की अड़चनों से मुक्त रखना है। भारत में सेज की स्थापना के लिए नीतिगत योजना 1 अप्रैल, 2000 से शुरू की गई ताकि निर्यात उत्पादन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी, एक बाधारहित वातावरण का निर्माण हो ।  (1) भारत में सेज स्थापित करने की योजना मुख्यतः चीन से प्रेरित है। चीन ने 1990 के दशक में सेज की स्थापना कर अपने निर्यात व्यापार में तीन गुना वृद्धि कर ली है।  (2) सेज की स्थापना के बाद भारत के निर्यात व्यापार की वार्षिक वृद्धि लगभग 15-18% के बीच रही है, जो इन क्षेत्रों की स्थापना के पहले की वृद्धि (8-10%) से लगभग दुगुनी है। (3) कांडला और सूरत (गुजरात), सांताक्रूज (महाराष्ट्र), कोच्चि (केरल), चेन्नई (तमिलनाडु), विशाखापट्टनम (आंध्र प्रदेश), फाल्टा (प० बंगाल) और नोएडा (उ०प्र०) स्थित सभी आठ निर्यात संवर्द्धन क्षेत्रों को विशेष आर्थिक क्षेत्र में बदल दिया गया है। विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम के अन्तर्गत निजी/ संयुक्त क्षेत्र में अथवा राज्य सरकारों और उसकी एजेंसियों को विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित करने के लिए औपचारिक अनुमति प्रदान कर दी गई है । सेज की मुख्य विशेषताएँ (Main Characteristics of SEZ) सेज की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं- (1) सेज के तहत कुछ ऐसे एनक्लेव यानी परिक्षेत्र स्थापित किए गए हैं, जिन्हें किसी आयात-निर्यात नियमों का पालन किए बगैर अपने विदेशी व्यापार करने की पूर्ण स्वतन्त्रता है।  (2) सेज की इकाइयाँ उत्पादन व्यवसाय या सेवा से सम्बन्धित कार्य करती हैं।  Read More …

What do you understand by Bank Rate ?

प्रश्न 9- बैंक दर से आपका क्या अभिप्राय है? What do you understand by Bank Rate ? उत्तर – बैंकों को अपने दैनिक कामकाज के लिए प्राय: ऐसी बड़ी रकम की जरूरत है जिनकी मियाद एक दिन से ज्यादा नहीं होती। इसके लिए बैंक जो विकल्प अपनाते हैं, उनमें सबसे सामान्य है केन्द्रीय बैंक (भारत में रिजर्व बैंक) से रात भर के लिए (ओवरनाइट) कर्ज लेना। इस कर्ज पर रिजर्व बैंकों को उन्हें जो ब्याज देना पड़ता है, उसे ही रीपो दर कहते हैं। रीपो रेट कम होने से बैंकों के लिए रिजर्व बैंक से कर्जा लेना सस्ता हो जाता है और इसलिए बैंक ब्याज दरों में कमी करते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा रकम कर्ज के तौर पर दी जा सके। रीपो दर में बढ़ोतरी का सीधा मतलब यह होता है कि बैंकों के लिए रिजर्व बैंक दूसरों को कर्ज देने के लिए जो ब्याज दर तय करते हैं, वह भी उन्हें बढ़ाना होगा।

What is Inflation ?

What is Inflation ? मुद्रा स्फीति (Inflation ) जब कोई देश अपने देश की मुद्रा के बदले दूसरे देश की मुद्रा को पहले से कम मूल्य में लेने के लिए तैयार होता है तो उसे मुद्रा का अवमूल्यन कहते हैं। मुद्रा स्फीति की कोई पूर्ण तथा सामान्य परिभाषा देना सरल नहीं है क्योंकि भिन्न-भिन्न अर्थशास्त्रियों ने भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से ‘मुद्रा स्फीति’ की व्याख्या की है। अतः मुद्रा स्फीति की स्थिति का सही परिचय पाने के लिए यहाँ कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषाओं का अध्ययन करना उचित होगा।  प्रो० कैमरर के शब्दों में – “मुद्रा स्फीति वह अवस्था है जिसमें मुद्रा का मूल्य गिरता है अर्थात् कीमतें बढ़ती हैं। “ यद्यपि प्रो० कैमरर का विचार अत्यन्त सरल, व्यावहारिक और स्पष्ट है तथापि इस परिभाषा को पूर्णतः सन्तोषजनक नहीं कहा जा सकता क्योंकि कीमत स्तर पर होने वाली प्रत्येक वृद्धि, मुद्रास्फीति नहीं होती है। “मुद्रा प्रसार वह अवस्था है जब वास्तविक व्यापार की मात्रा से चलन तथा निक्षेप की मात्रा अत्यधिक होती है।” इस परिभाषा के विश्लेषण से स्पष्ट है कि मुद्रा स्फीति उस समय उत्पन्न होती है जब विनिमय-साध्य वस्तुओं तथा सेवाओं की तुलना में मुद्रा का परिमाण बढ़ जाता है। प्रो० हा के शब्दों में — “वह स्थिति, जिसमें मुद्रा का अत्यधिक निर्गमन हो, मुद्रा – स्फीति कहलाती है।

Discuss three main weaknesses of industrial development in India.

Discuss the three main weaknesses of industrial development in India. भारत में औद्योगिक विकास की तीन मुख्य समस्याओं की व्याख्या कीजिए। उत्तर – 1. शक्ति के साधनों का अभाव  देश के समक्ष शक्ति के साधनों की आपूर्ति की समस्या है तथा फैक्ट्री को निरन्तर चलाने के लिए लगातार शक्ति के साधनों का होना अति आवश्यक है। शक्ति के साधनों में एल०पी०जी०, पेट्रोल, डीजल, बिजली का होना अति आवश्यक है। इस समस्या का समाधान सौर ऊर्जा और नदी-घाटी योजनाओं या अणु शक्ति द्वारा उत्पादित बिजली की आपूर्ति करके किया जाना चाहिए। 2. आधारभूत ढाँचे का अभाव – औद्योगिक ढाँचे के विकास के लिए आधारभूत ढाँचे का मजबूत होना अनिवार्य हैं, किन्तु देश में परिवहन, संचार, बैंकिंग आदि क्षेत्रों (जो कि आधारभूत ढाँचे के ही अंग हैं) का आज भी भली-भाँति विकास नहीं हो पाया है। का विकास सरकार को निजी क्षेत्र की मदद एवं विदेशी सहायता लेकर पिछड़े क्षेत्रों करना चाहिए। खासकर इन क्षेत्रों में आधारभूत ढाँचे को खड़ा किया जाना चाहिए। जो निजी आगे आते हैं उन्हें प्रोत्साहन तथा करों में छूट मिलनी चाहिए। 3. गुण नियन्त्रण की समस्या- – भारत में उत्पादों की गुणवत्ता विदेशी माल की तुलना में निम्न होती है, जिसकी वजह से विदेशों से अधिक मात्रा में निर्यात आदेश प्राप्त नहीं हो पाते हैं। – इस सन्दर्भ में गुणवत्ता सम्बन्धी प्रमाण-पत्र जारी करते समय कठोर जाँच की जानी चाहिए। कारखाना स्तर पर पूरी गुणवत्ता का ख्याल किया जाना चाहिए। अच्छे कच्चे माल का प्रयोग किया जाना चाहिए।

Write short note on Trends in World Trade.

Write short note on Trends in World Trade. प्रश्न 6 – विश्व व्यापार की प्रवृत्तियों पर लघु टिप्पणी लिखिए।  उत्तर—विश्व व्यापार जिन दो प्रमुख तत्त्वों से प्रभावित होता है, उनमें से एक तत्त्व है विकास की रणनीति–आयात प्रतिस्थापन या निर्यात प्रोत्साहन । विश्व व्यापार की वृद्धि के लिए आयात-प्रतिस्थापन की रणनीति हानिकारक होती हैं, जबकि निर्यात प्रोत्साहन की रणनीति सहायक होती है। विश्व व्यापार का दूसरा तत्त्व यह है कि विश्व उत्पाद की वृद्धि दर में तेजी आने का प्रभाव, विश्व व्यापार पर सकारात्मक होता है। 2004 में विश्व उत्पत्ति में 5.1% की वृद्धि हुई। इसी वर्ष विश्व व्यापार में 10.3% की प्रभावशाली वृद्धि हुई। 2008 की विश्वव्यापी मन्दी का कुछ प्रभाव विश्व व्यापार पर पड़ा। 2009 में विश्व उत्पत्ति में 2.2% का ह्रास होने के कारण विश्व व्यापार में 14.4% का हास हुआ। विश्व निर्यातों तथा विक्रासशील देशों के निर्यातों में सादृश्यता देखी जा सकती है। जब विश्व निर्यात बढ़ता है तब विकासशील देशों का निर्यात भी बढ़ता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में 2013 में 30%, 2014 में 3.6% तथा 2015 में 3. 9% की वृद्धि दर्ज की गई। इन्हीं अवधियों में विश्व व्यापार में क्रमश: 30%, 4. 3% तथा 5.3% की वृद्धि हुई। विश्व निर्यातों तथा विकासशील देशों के निर्यातों में सादृश्यता देखी जा सकती है। विश्व निर्यात बढ़ता है, विकासशील देशों का निर्यात भी बढ़ता है । वर्ष 2012 Read More …

Causes of Slow Growth in National Income in India

Causes of Slow Growth in National Income in India राष्ट्रीय आय में धीमी गति से वृद्धि के कारण भारत में योजनाकाल में राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में लगातार वृद्धि होती दिखाई दे रही है,किन्तु स्थिर कीमतों के आधार पर देखें तो यह वृद्धि सन्तोषजनक नहीं कही जा सकती। विश्व के अन्य देशों की तुलना में भारत की राष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि दर बहुत कम है योजनाकाल में भारत की राष्ट्रीय आय में धीमी गति से वृद्धि के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं- 1. कृषि का प्राकृतिक घटकों पर आश्रित होना- भारत की राष्ट्रीय आय की वृद्धि में कृषि क्षेत्र का महत्त्वपूर्ण योगदान है, किन्तु भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर करती है। मानसून अनुकूलन रहने पर कृषि उत्पादन बढ़ने से राष्ट्रीय आय बढ़ जाती है और मानसून के प्रतिकूल रहने पर कृषि उत्पादन घटने से राष्ट्रीय आय घट जाती है। यद्यपि कृषि की मानसून पर निर्भरता को कम करने के लिए योजनाकाल में सिंचाई के साधनों का विकास किया गया है, किन्तु ऐसा कुल कृषि क्षेत्र के केवल 1/3 भाग पर ही हो सका है। शेष क्षेत्र वर्षा पर ही आश्रित है। इससे राष्ट्रीय आय में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। W 2. जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि – भारत में प्रति व्यक्ति आय की धीमी वृद्धि का एक प्रमुख कारण जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि भी रहा है। भारत में जिस दर से जनसंख्या बढ़ रही है, वह सारे बढ़े हुए उत्पादन के लाभों को हजम कर जाती है और उत्पादन व राष्ट्रीय आय बढ़ने के बावजूद प्रति व्यक्ति आय में पर्याप्त वृद्धि नहीं हो पाती है। 3. अर्थव्यवस्था में मुद्रा प्रसार – भारतीय अर्थव्यवस्था मुद्रा प्रसार एवं आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में भारी वृद्धि से पीड़ित रही है। राष्ट्रीय आय के अनुमानों को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि चालू मूल्यों पर राष्ट्रीय आय में भारी वृद्धि हो रही है, किन्तु स्थिर कीमतों पर यह वृद्धि बहुत कम है जो कि स्पष्ट रूप से मुद्रा स्फीति की स्थिति की सूचक है। मूल्य वृद्धि के कारण राष्ट्रीय आय में वास्तविक वृद्धि बहुत कम है। मुद्रा स्फीति माँग और पूर्ति पक्ष दोनों को विपरीत रूप से प्रभावित करती है। 4. औद्योगिक क्षेत्र में विकास की मन्द गति – यद्यपि योजनाकाल में देश में औद्योगीकरण को गति मिली है, किन्तु औद्योगिक क्षेत्र में विकास की गति मन्द है। कुछ उद्योग तो केवल कृषि से सम्बन्धित कच्चे माल की पूर्ति पर ही आश्रित हैं; जैसे— सूती वस्त्र, चीनी, जूट, वनस्पति तेल उद्योग आदि। इन उद्योगों का विकास कच्चे माल की पूर्ति पर निर्भर है। कच्चे माल की कमी के अतिरिक्त शक्ति के साधनों का अभाव, यातायात सुविधाओं का अभाव, वित्त की कमी, प्रबन्ध श्रम सम्बन्ध आदि भी औद्योगिक विकास में बाधक रहे हैं। औद्योगिक विकास की मन्द गति के इन कारणों द्वारा भी राष्ट्रीय आय में धीमी गति से वृद्धि हो रही है। 5. कृषि उत्पादकता में वृद्धि की गति में कमी- Read More …