All contracts are agreement, but all agreements are not Contracts

All contracts are agreement, but all agreements are not Contracts सब अनुबन्ध ठहराव होते हैं, किन्तु सब ठहराव अनुबन्ध नहीं होते। All contracts are agreement, but all agreements are not Contracts उपर्युक्त कथन के दो भाग हैं 1. समस्त अनुबन्ध ठहराव होते हैं (All Contracts are Agreements) अनुबन्ध की उत्पत्ति ठहराव से होती है। अनुबन्ध अधिनियम के अनुसार, “अनुबन्ध एक ऐसा उहराव है जो राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय हो ।” इसका तात्पर्य यह है कि अनुबन्ध एक ठहराव है तथा ऐसा ठहराव जो राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय हो, अनुबन्ध का रूप धारण कर सकता है। कोई ठहराव जो राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होता अनुबन्ध का रूप धारण नहीं कर सकता है। ठहराव अनुबन्ध की आधारशिला है। बिना ठहराव के अनुबन्ध नहीं बन सकता। कई ठहराव ऐसे होते हैं जो ठहराव की श्रेणी में सम्मिलित किए जा सकते हैं, परन्तु जिन्हें अनुबन्ध नहीं कहा जा सकता। किसी भी ठहराव के अनुबन्ध बनने के लिए उसका राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय होना आवश्यक है। एक ठहराव के राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय होने के लिए उसमें कुछ विशेष लक्षणों का होना आवश्यक है। ये लक्षण इस प्रकार हैं— (i) ठहराव होना चाहिए अर्थात् पक्षकारों के बीच प्रस्ताव तथा (ii) उसकी स्वीकृति होनी चाहिए। ठहराव ऐसा हो जो वैधानिक रूप से लागू कराया जा सके, पक्षकारों में अनुबन्ध करने की क्षमता हो, उनमें स्वतन्त्र सहमति हो, ठहराव का प्रतिफल एवं उद्देश्य विधिपूर्ण हो, ठहराव ऐसा नहीं होना चाहिए जिसे विशेष रूप से व्यर्थ घोषित कर दिया गया हो। कानून की व्यवस्था के अनुसार लिखित, प्रमाणित तथा रजिस्टर्ड (जहाँ आवश्यक हो) होना चाहिए। जिस ठहराव में ये विशेषताएँ होंगी वही अनुबन्ध कहलाएगा। इस प्रकार एक अनुबन्ध के लिए ठहराव का होना आवश्यक है। इसलिए कहा जाता है “समस्त अनुबन्ध ठहराव होते हैं।” 2. समस्त ठहराव अनुबन्ध नहीं होते (All Agreements are not Contracts) – सभी ठहराव अनुबन्ध नहीं होते हैं। ठहराव (Agreement) के लिए केवल दो बातों प्रस्ताव तथा स्वीकृति का होना आवश्यक है। अन्य बातें, जो एक अनुबन्ध में होनी चाहिए, ठहराव के लिए आवश्यक नहीं हैं। ठहराव के लिए वैधानिक उत्तरदायित्व (Legal obligation) का होना भी आवश्यक नहीं है। गैर कानूनी कार्यों के लिए भी ठहराव हो सकते हैं। ठहराव का क्षेत्र विस्तृत होने के कारण धार्मिक (Religious), सांस्कृतिक (Cultural), सामाजिक (Social) … Read more

Business Regulatory Framework in Hindi Pdf Notes

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CHAPTER WISE

CHAPTER 1Law of Contract (1872)
CHAPTER 2Special Contracts
CHAPTER 3Sale of Goods Act (1930)
CHAPTER 4Negotiable Instrument Act (1881)
CHAPTER 5the consumer Protection Act (1986)
CHAPTER 6Foreign Exchange Manegement Act (2000)
 

Bcom 1st Year Business regulatory Framework pdf notes

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सहमति

Define Consent

भारतीय संविदा अधिनियम के अनुसार वैध संविदा होने के लिए यह आवश्यक है कि पक्षों की स्वतन्त्र सहमति हो। धारा 10 के अनुसार, “वे सभी समझौते जो संविदा के योग्य पक्षकारों की स्वतन्त्र सहमति से किए गए हों”। अत: अधिनियम में ‘पक्षकारों की स्वतन्त्र सहमति’ होनी आवश्यक है। पक्षों की स्वतन्त्र सहमति तब कहलाती है जब दो व्यक्ति एक बात पर एक ही अर्थ में राजी हो जाते हैं। तब कहा जाता है कि उन्होंने सहमति दी है। सहमति तब स्वतन्त्र मानी जाती है तब वह उत्पीड़न, अनुचित प्रभाव (Undue Influence), कपट (Fraud), मिथ्यावर्णन (Misrepresentation) अथवा गलता (Mistake) के कारण न दी गई हो। उदाहरणार्थ-यदि ‘अ’, ‘ब’ के समक्ष 500 में अपनी गाय बेचने का प्रस्ताव रखे और ‘ब’ उस प्रस्ताव पर अपनी स्वीकृति दे दे तो यह समझाता। 

इसके विपरीत यदि ‘अ’ छुरा दिखाकर ‘ब’ से अपनी गाय ₹ 600 में लेने के मा सहमति ले ले तो इसे ‘ब’ की स्वतन्त्र सहमति नहीं कहेंगे। धारा 13 तथा 14 के अन्तर्गत सहमति का अर्थ दिया गया है। धारा 13 के अनुसार, “दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा दी हई सहमति तब मानी जाती है, जबकि वे एक ही बात पर एक अर्थ में समहमत हो गए हों।’ इंस सम्बन्ध में Raffles Vs. Wichellhaus (1864) का निर्णय महत्त्वपूर्ण है जिसके अन्तर्गत यह माना गया है कि दोनों व्यक्तियों की एक ही बात पर सहमति आवश्यक है। इस सम्बन्ध में Sarat Chandra Vs. Kanai Lal (1921) का निर्णय भी महत्त्वपूर्ण । जिसमें भिन्न-भिन्न भाव से व्यक्तियों की सहमति उचित नहीं मानी गई। उदाहरणार्थ- अ ‘ब’ से 100 गाँठे रुई, जो कि मुम्बई से “पीअरलैस’ नाम के जहाज द्वारा आने को थीं। खरीदने के लिए सहमत हो जाता है। “पीअरलैस’ नाम के दो जहाज मुम्बई से आने वाले थे। ‘अ’ क अभिप्राय उस जहाज से था जो अक्टूबर में आने वाला था, जबकि ‘ब’ का अभिप्राय दूस जहाज से था जोकि दिसम्बर में आने वाला था। ऐसी दशा में उन दोनों में कोई अनुबन्ध नहीं हुआ क्योंकि दोनों पक्षकार एक ही बात पर एक ही भाव से सहमत नहीं हुए। एक अन्य उदाहरण को लेते हुए ‘अ’ मिथ्यावर्णन करके ‘ब’ से एक प्रपत्र पर हस्ताक्षर करा लेता है। ‘ब का अभिप्राय केवल साक्षी के रूप में एक हस्ताक्षर करना था, जबकि ‘अ’ ने उससे एक पक्षकार के रूप में हस्ताक्षर कराए थे। ऐसी दशा में भी सहमति नहीं कह सकते, क्योंकि दोनों पक्षकार एक ही बात पर भिन्न-भिन्न भाव से सहमत होते हैं। 

धारा 14 के अनुसार स्वतन्त्र सहमति उस दशा में समझी जाएगी, जबकि वह (i) उत्पीड़न, (ii) अनुचित प्रभाव, (iii) कपट, मिथ्यावर्णन या गलती से प्रदान न की गई हो। यदि किसी पक्ष ने अपनी सहमति इन कारणों से प्रभावित होकर दी हो तो उसकी सहमति स्वतन्त्र नहीं मानी जाएगी। उदाहरणार्थ-यदि ‘अ’ छुरा दिखाकर ‘ब’ से एक चैक पर ₹ 10,000 के भुगतान के लिए हस्ताक्षर करा ले तो ऐसी स्थिति में ‘ब’ द्वारा चैक पर किए गए 

वैधानिक पर प्रभाव (Effect on validity)-

ठहराव में ‘सहमति’ न होने की दशः में वह अर्थ (void) होता है, परन्तु यदि सहमति तो हो, लेकिन स्वतन्त्र सहमति’ (Free consent) न हो तो जिस पक्ष की सहमति स्वतन्त्र नहीं है उसकी इच्छा पर ठहराव व्यर्थनीर (voidable) होता है। 

प्रस्ताव का अर्थ एवं परिभाषा 

(Meaning and Definition of Proposal)

किसी समझौते के लिए प्रस्ताव (Proposal) तथा उसकी स्वीकृति (झोनी आवश्यक है। धारा 2 (a) के अनुसार, जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति कार्य को करने अथवा न करने के विषय में अपनी इच्छा को इस आशय से प्रकट को व्यक्ति उसके कार्य को करने अथवा न करने के लिए अपनी सहमति प्रदान करे तो हम को प्रस्ताव कहते हैं। प्रस्ताव रखने वाले को वचनदाता या प्रस्तावक कहा जाता है । जिसके समक्ष प्रस्ताव रखा जाता है उसे वचनगृहीता कहते हैं। उदाहरणार्थ- ‘क’ र यह कहे कि वह 10 क्विटल गेहूँ ,175 प्रति क्विटल के हिसाब से बेचने के लिए तैयार कर कहेंगे कि ‘क’ ने ‘ख’ के समक्ष बेचने का प्रस्ताव रखा। इसी प्रकार ‘अ’, ‘ब’ से कहता के यदि ‘ब’ उसे ₹ 500 दे दे तो वह ₹ 700 का दावा न करे। यहाँ पर ‘अ’, ‘ब’ से दावा करने रुकने का प्रस्ताव रखता है। 

प्रस्ताव के मुख्य लक्षण

(Main Characteristics of a Proposal)-

प्रस्ताव में निम्नलिखित लक्षण होने चाहिए 

1. दोनों पक्षों का होना (Existing of two Parties)—प्रस्ताव के लिए दो पक्ष होने चाहिए एक वचनदाता और दूसरा वचनगृहीता, कोई भी व्यक्ति अपने आप प्रस्ताव नहीं कर सकता। 

2. प्रस्ताव का सकारात्मक अथवा नकारात्मक रूप (Positive or Negative  Proposal)-प्रस्तावक द्वारा किसी कार्य को करने या उससे विरत रहने की तत्परता अथवा इच्छा प्रकट की जाती है। इस प्रकार से प्रस्ताव किसी कार्य को करने (Positive) अथवा उसे न करने (Negative) से सम्बन्धित होता है। उदाहरणार्थ-यदि ‘हवाई प्रकाशन -40,00,000 में अपना कारोबार ‘चित्रा प्रकाशन’ को बेचने के लिए तैयार हो तो यह किसा कार्य को करने के सम्बन्ध में सकारात्मक प्रस्ताव कहलाएगा। इसके विपरीत, यदि हवाई प्रकाशन’  50,000 देकर ‘चित्रा प्रकाशन’ से कहे कि वह दो वर्ष तक उसके विरुद्ध प्रतियोग व्यापार न खोले तो इसे हम किसी कार्य को न करने के सम्बन्ध में नकारात्मक प्रस्ताव कहेंगे।। 

3. एक पक्ष द्वारा इच्छा प्रकट किया जाना (To make An Offer by one, Party)-एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष के समक्ष किसी कार्य को करने अथवा न करने के सम्बन्ना में इच्छा प्रकट की जाती है। 

4.सहमति प्राप्त करने का उद्देश्य (Aim to get Consent on the Proposal) एक पक्ष दूसरे पक्ष के समक्ष अपना प्रस्ताव इस दृष्टि से रखता है कि दूसरा पक्ष उस का करने अथवा न करने के सम्बन्ध में अपनी सहमति प्रदान कर सके। यदि कोई व्यक्ति दूसर, से सहमति लेने के लिए बात न कहे तो उसे न तो प्रस्ताव कहा जा सकता है और न पदाति ही दी जा सकती है। उदाहरणार्थ-‘अ’ अपनी मित्र-मण्डली में बैठकर यह र अपनी पत्री का विवाह किसी सुयोग्य वर से करना चाहता है. तब यह बात न ता । समक्ष प्रस्ताव है और न ही किसी व्यक्ति द्वारा इस पर सहमति ही दी जा सकती है। हैरिस बनाम निकरसन के मामले में प्रतिवादी ने यह विज्ञापन दिया कि वह अपना कुछ न लन्दन से दूर निश्चित स्थान पर नीलामी द्वारा बेचेगा। विज्ञापन के अनुसार वादी लन्दन से उस नियुक्त स्थान पर पहँचा, परन्तु उसने पाया कि वहाँ सामान नीलाम नहीं किया गया। इस पर वादी ने प्रतिवादी के विरुद्ध अनुबन्ध खण्डन के लिए वाद प्रस्तुत किया। यह निर्णय किया गया कि प्रतिवादी ने विज्ञापन द्वारा प्रस्ताव करने के लिए अपने केवल अभिप्राय की घोषणा की, वास्तव में कोई प्रस्ताव नहीं किया। 

इस प्रकार कोई अमुक कथन वास्तविक प्रस्ताव है या प्रस्ताव करने का केवल अभिप्राय, यह एक तथ्य सम्बन्धी प्रश्न है जिस पर न्यायालय मामले की सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर निर्णय कर सकता है। 

इस प्रकार बातचीत में किसी अभिप्राय के कथन मात्र से ही बाधित वचन नहीं हो जाता, यद्यपि दूसरे पक्षकार ने उस कथन मात्र के आधार पर ही कार्य किया हो। एक मामले में एक ससर ने अपने होने वाले दामाद को लिखा, “मेरी पुत्री.. का उस सम्पत्ति में एक भाग होगा, जो कि उसकी माँ की मृत्यु के पश्चात् मेरे पास होगी।” यह निर्णय किया गया कि यह ., केवल अभिप्राय का एक कथन मात्र था। 

प्रस्ताव सम्बन्धी वैधानिक नियम

(Legal Provisions in regard to Proposal)

माननीय न्यायाधीशों के निर्णय के आधार पर प्रस्ताव सम्बन्धी कुछ वैधानिक नियम बनाए गए हैं जिनमें से मुख्य इस प्रकार हैं –

1. प्रस्ताव विनय के रूप में हो (Proposal as a Request)-प्रस्ताव एक विनय के रूप में होना चाहिए, आज्ञा के रूप में नहीं। उदाहरणार्थ-यदि ‘कमल’, ‘दीपक’ से यह कहे कि वह दिल्ली जाकर उसके लिए स्कूटर ला दे जिसके लिए उसे पारिश्रमिक दिया जाएगा तो यह एक आज्ञा है, निवेदन नहीं, अत: प्रस्ताव नहीं कहलाएगा।

2. प्रस्ताव का विशेष अथवा सामान्य रूप (Proposal may be Specific or General)-किसी व्यक्ति-विशेष के सम्मुख प्रस्तुत किया हुआ प्रस्ताव ‘विशेष प्रस्ताव’ कहलाता है। इसके विपरीत, जनसाधारण के लिए सम्बोधित किया हुआ प्रस्ताव ‘सामान्य प्रस्ताव’ कहा जाता है। उदाहरणार्थ-यदि ‘कमल’, ‘कान्ति’ से अपनी घड़ी 200 में बेचने के लिए प्रस्ताव रखे तो यह स्पष्ट प्रस्ताव कहलाएगा और यदि वह विज्ञापन द्वारा समस्त जनसमुदाय को ₹ 200 में अपनी घड़ी बेचने के लिए प्रस्ताव रखे तो इसे हम सामान्य प्रस्ताव कहेंगे। इस सम्बन्ध में Carlill Vs. Carbolic Smoke Ball Company (1893) का निर्णय महत्त्वपूर्ण है जिसके अन्तर्गत कम्पनी की विज्ञप्ति के अनुसार, “जो कोई व्यक्ति कम्पनी की दवा प्रयोग करने के उपरान्त इन्फ्लुएन्जा का शिकार होगा उसे कम्पनी 1,000 पण्डि देगी।” श्रीमती कालिल ने दवा का प्रयोग किया। बाद में उन्हें इन्फ्लुएन्जा हो गया जिसके लिए उन्होंने वाद प्रस्तुत किया। कम्पनी ने अपनी दलील देते हुए इसे प्रस्ताव न कहकर प्रस्ताव के लिए निमन्त्रण कहा। बाद में यह दलील व्यर्थ मानी गई। 

न्यायालय के अनुसार विज्ञापन इनाम देने के अभिप्राय का एक कथन मात्र ही नहीं था; बाल्क एक निश्चय था, और यद्यपि प्रस्ताव किसी व्यक्ति विशेष के लिए न होकर सामान्य नता के लिए था, फिर भी वह ऐसे किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा स्वीकार किया जा ता था जिन्होंने अपने व्यवहार से अथवा शर्तों का निष्पादन करके उसे स्वीकार किया। 

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Contract of Indemnity

Contract of Indemnity भारतीय संविदा अधिनियम 1872 की धारा 124 के अनुसार, “हानि रक्षा (क्षतिपूर्ति) संविदा ऐसा समझौता है जिसके द्वारा एक पक्ष दूसरे पक्ष को उन सब हानियों से बचाने का वचन देता है, जो स्वयं वचनदाता अथवा अन्य किसी व्यक्ति द्वारा वचन पाने वाले को पहँचे। जो व्यक्ति हानि से बचाने का वचन देता है उसे क्षतिपूर्तिकर्त्ता (Indemnifier)कहते हैं और जिसको वचन दिया जाता है उसको क्षतिपूर्तिधारी (Indemnified) कहते हैं।” उदाहरणार्थ— ‘अ’, ‘ब’ को ₹5000 के एक ऋण के सम्बन्ध में ‘स’ के व्यवहार से होने वाली हानि को पूरा करने का करार करता है। भारतीय संविदा अधिनियम के अनुसार, यह क्षतिपूर्ति की संविदा है। भारतीय न्यायालय ने इस परिभाषा को संकुचित माना है। इस सम्बन्ध में Gajanan Vs. Moreshar (1942) का निर्णय महत्त्वपूर्ण है जिसमें न्यायालय ने क्षतिपूर्ति (हानि रक्षा) की इस परिभाषा को ठीक नहीं माना है। अंग्रेजी राजनियम के अनुसार, “क्षतिपूर्ति (हानि रक्षा) संविदा एक ऐसी संविदा है जिसके अनुसार किसी दूसरे व्यक्ति को होने वाली किसी ऐसी हानि से रक्षा का वचन दिया जाता है जो वचनदाता के कहने पर किए गए व्यवहार की परिणति हो।” क्षतिपूर्ति संविदाएँ दो प्रकार की हो सकती हैं— स्पष्ट तथा गर्भित । गर्भित अनुबन्ध मामले की परिस्थितियों से ज्ञात हो जाता है; जैसे – (i) ‘अ’ की इच्छा पर ‘ब’ द्वारा किए कार्यों अथवा (ii) पक्षकारों के सम्बन्धों से उत्पन्न हुए दायित्वों पर आधारित हो सकता है, जैसे अपने एजेन्ट द्वारा किए गए सभी अधिकृत कार्यों के लिए नियोक्ता द्वारा क्षतिपूर्ति (हानि रक्षा) का गर्भित अनुबन्ध होता है। सामान्य नियमों का उल्लंघन मान्य नहीं – क्षतिपूर्ति (हानि रक्षा) का अनुबन्ध भी अनुबन्ध का ही एक रूप है और इसलिए इसमें भी अनुबन्ध के सामान्य नियमों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए, अर्थात् पक्षकारों में अनुबन्ध करने की क्षमता, उनकी स्वतन्त्र सहमति व वैध उद्देश्य आदि। इनके बिना क्षतिपूर्ति (हानि रक्षा) अनुबन्ध वैधानिक दृष्टि से अमान्य हो जाएगा। इसलिए कपट द्वारा प्राप्त किया गया हानि-रक्षा का कोई भी वचन विधि में कभी भी मान्य नहीं होगा। इसी प्रकार यदि ‘अ’, ‘ब’ से ‘स’ को पीटने के लिए कहता है, और यह वचन देता है कि वह उसके परिणामों से होने वाली हानि से रक्षा करेगा। ‘ब’, ‘स’ को पीटता है और उस पर ₹500 जुर्माना होता है। ‘ब’ इस धन को ‘अ’ से प्रतिपूर्ति नहीं करा सकता । क्षतिपूर्ति (हानि रक्षा) संविदा वास्तव में संविदा का ही एक भाग है और इसमें संविदा के सभी लक्षण विद्यमान होने के कारण यह आवश्यक है कि संविदा के सामान्य नियमों का उल्लंघन न किया जाए। कपट, मिथ्यावर्णन, अनुचित प्रभाव के द्वारा, संविदा के अयोग्य पक्षकारों द्वारा की गयी संविदाएँ वैधानिक रूप से दोनों पक्षकारों द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हो सकतीं। … Read more

Meaning of Free Consent

स्वतन्त्र सहमति का अर्थ  (Meaning of Free Consent) भारतीय संविदा अधिनियम के अनुसार, वैध संविदा होने के लिए यह आवश्यक है कि पक्षों की स्वतन्त्र सहमति हो। धारा 10 के अनुसार, “वे सभी समझौते जो संविदा के योग्य पक्षकारों की स्वतन्त्र सहमति से किए गए हों .”।  अतः अधिनियम में पक्षकारों की स्वतन्त्र सहमति’ होनी आवश्यक है। पक्षों की स्वतन्त्र सहमति तब कहलाती है जब दो व्यक्ति एक बात पर एक ही अर्थ में राजी हो जाते हैं, तब कहा जाता है कि उन्होंने सहमति दी है। सहमति तब स्वतन्त्र मानी जाती है जब वह उत्पीड़न (Coercion), अनुचित प्रभाव (Undue Influence), कपट (Fraud), मिथ्यावर्णन (Misrepresentation) अथवा गलती (Mistake) के कारण न दी गई हो । ……. प्रश्न 5 – प्रस्ताव एवं स्वीकृति पर टिप्पणी लिखिए। Write a note on Proposal and Acceptance. किसी समझौते के लिए प्रस्ताव (Proposal) तथा उसकी स्वीकृति (Acceptance) होनी आवश्यक है। धारा 2 (a) के अनुसार, जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से किसी कार्य को करने अथवा न करने के विषय में अपनी इच्छा को इस आशय से प्रकट करे कि दूसरा व्यक्ति उसके कार्य को करने अथवा न करने के लिए अपनी सहमति प्रदान करे तो इस इच्छा को प्रस्ताव कहते हैं। प्रस्ताव रखने वाले को वचनदाता या प्रस्तावक कहा जाता है, जबकि जिसके समक्ष प्रस्ताव रखा जाता है उसे वचनगृहीता कहते हैं। किसी भी समझौते को वैधानिक रूप (संविदा) देने के लिए आवश्यक है कि एक पक्ष द्वारा प्रस्ताव किया जाए जिसकी स्वीकृति दूसरा पक्ष (वचनगृहीता) दे। स्वीकृति से तात्पर्य प्रस्ताव की शर्तरहित स्वीकृति से है। जब वह व्यक्ति जिससे प्रस्ताव किया गया है प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे देता है तब प्रस्ताव स्वीकृत किया हुआ माना जाता है। स्वीकार किया हुआ प्रस्ताव वचन या समझौता कहलाता है। धारा 2 (b) के अनुसार, “जब वह व्यक्ति जिसके समक्ष प्रस्ताव रखा गया हो, अपनी सहमति दे देता है तो कहेंगे कि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया।” Become an Agent एजेन्ट कोई भी व्यक्ति हो सकता है। एजेन्ट बनने के लिए अनुबन्ध करने की क्षमता होना आवश्यक नहीं है क्योंकि तृतीय पक्षकारों के प्रति एजेन्ट के द्वारा किए गए कार्यों के लिए प्रधान (नियोक्ता) स्वयं उत्तरदायी होता है। इसलिए एक अवयस्क अथवा अस्वस्थ मस्तिष्क वाला व्यक्ति भी एजेन्ट बन सकता है, परन्तु ऐसा व्यक्ति नियोक्ता के प्रति अपने कार्यों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। दूसरे शब्दों में, एजेन्ट को नियोक्ता के प्रति उत्तरदायी ठहराने के लिए आवश्यक है कि वह वयस्क हो तथा स्वस्थ मस्तिष्क वाला हो। 

Sale by Auction

नीलामी द्वारा विक्रय (Sale by Auction) नीलाम द्वारा विक्रय वह विक्रय है जिसके अन्तर्गत आवाज लगाकर क्रेताओं को वस्तु के मूल्य का अधिकार दिया जाता है, अर्थात् आवाज लगाकर लोगों को क्रय करने के लिए आमन्त्रित किया जाता है और जो भी व्यक्ति उस वस्तु के लिए सर्वाधिक मूल्य लगाता है उसे वह वस्तु दे दी जाती है। नीलाम विक्रय के सम्बन्ध में धारा 64 (1-6) तक के प्रावधानों में उल्लेख किया गया है जो अग्र प्रकार है- 1. भिन्न-भिन्न ढेरियाँ भिन्न-भिन्न संविदे की वस्तुएँ मानी जाएँगी–धारा 64 (1) के अनुसार, यदि माल अनेक ढेरियों में रखा जाता है तो प्रत्येक ढेर का विषय एक पृथक् संविदा मानी जाएगी। 2. विक्रय संविदे की समाप्ति – धारा 64-(2) के अनुसार, इस विक्रय की समाप्ति तब मानी जाएगी जब विक्रेता डंके की चोट पर अथवा अन्य प्रचलित रीति से ‘एक दो तीन’ कहकर नीलामी बन्द कर दे। जब तक बोली समाप्त न कर दी जाए तब तक बोलने वाला अपनी बोली वापस ले सकता है। 3. विक्रय का अधिकार – धारा 64 (3) के अनुसार, विक्रय का अधिकार स्पष्टतः विक्रेता के द्वारा अथवा उसके द्वारा अधिकृत अन्य किसी व्यक्ति के द्वारा हो सकता है अर्थात् स्वयं या उसका अधिकृत व्यक्ति निम्न व्यवस्थाओं के अनुसार बोली बोल सकता है- (i) नीलामी की पूर्व सूचना–धारा 64 (4) के अनुसार, कार्य न किए जाने पर विक्रय कपटपूर्ण माना जाएगा। (ii) न्यूनतम मूल्य का निर्धारण – धारा 64 (5) के अनुसार, बिक्री के लिए कोई सुरक्षित मूल्य नियत किया जा सकता है, जिससे विक्रेता के हितों की रक्षा हो सके।  (iii) बनावटी बोली –– धारा 64 (6) के अनुसार, यदि विक्रेता मूल्य बढ़ाने के उद्देश्य से कुछ बनावटी बोली (Pretending Bidding) बोलता है तो विक्रय क्रेता की इच्छा पर व्यर्थनीय माना जाएगा।