Meaning of Listening pdf – Bcom Notes

Meaning of Listening pdf – Bcom Notes श्रवणता से अभिप्राय श्रवणता, इतनी सरल क्रिया नहीं है जितनी कि समझी जाती है। अधिकांश व्यक्ति इस बारे में अक्षम होते हैं। वे सुनने व सोचने के बारे में सावधानी नहीं रखते, अतः वे जितना सुनते हैं उससे कुछ कम ही याद कर पाते हैं। फ्लोड जे० जेम्स के शब्दों में— “श्रवण क्षमता की न्यूनता प्रत्येक स्तर पर हमारे कार्य से सम्बन्धित समस्याओं की उत्पत्ति का मुख्य स्रोत है।” व्यावसायिक क्षेत्रों में श्रवणता की महत्ता किसी भी रूप में सम्प्रेषण से कम नहीं आँकी जा सकती । सुनने अर्थात् श्रवण की क्रिया को ध्यानपूर्वक सुव्यवस्थित ढंग से करने पर उसका प्रतिफल उच्च आयामों को प्राप्त होता है। वास्तव में, “श्रवणता स्वीकार करने, ध्यान लगाने तथा कानों से सुने गए शब्दों का अर्थ निरूपण करने की एक क्रिया है । “ श्रवणता के प्रकार (Types of Listening) व्यावसायिक क्षेत्र में श्रवणता का महत्त्व अब सुस्थापित हो चुका है। परिस्थितियों के अनुसार इसके प्रकारों में भी कम या अधिक अन्तर आ जाता है। मुख्य रूप से श्रवणता के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित रूप में प्रकट होते हैं 1.एकाग्र श्रवणता (Focus Listening) – इसमें एकाग्रता के तत्त्व का महत्त्व अपेक्षित रूप से सर्वाधिक होता है। इसकी ग्राह्यता अन्य प्रकारों से कई गुना अधिक होती है।  2. विषयगत श्रवणता (Subjective Listening) – ग्राह्य व्यक्ति में सम्प्रेषित विषय की जितनी जानकारी होती है, उसी के अनुसार श्रवणता का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। इसका सम्बन्ध व्यक्ति की समझ से होता है। 3. अन्तःप्रज्ञात्मक श्रवणता (Inter Listening) – जब सहज बोधगम्यतावश सन्देश को ग्रहण किया जाता है, तब इसके समानान्तर अन्य विचार मस्तिष्क में आते रहते हैं। यह स्थिति सन्देश को सम्पूर्ण अर्थ में समझने में सहायता करती है । 4. समीक्षात्मक श्रवणता (Analytical Listening) – Read More …

Essentials of First Draft – Bcom Notes

Essentials of First Draft – Bcom Notes सन्देश का प्रथम प्रारूप लेखन (First Drafting ) – लेखन शैली के द्वितीय चरण में सन्देश का प्रथम प्रारूप तैयार किया जाता है। इसमें विचारों को शब्दों का रूप प्रदान करके वाक्यों व पैराग्राफों का निर्माण किया जाता है। इस लेखन में यह सुनिश्चित किया जाता है कि विचारों को कागज पर कैसे लाया जाए, किस प्रकार के शब्दों/वाक्यों का प्रयोग किया जाए तथा कहाँ बात को संक्षिप्त रूप में रखा जाए और कहाँ से विस्तृत रूप प्रदान किया जाए। मुख्य विचार के समर्थन में सम्बन्धित तथ्यों व आँकड़ों को एकत्र किया जाता है। इस प्रकार सभी तथ्यों को कागज पर उतार लेना ही प्रथम प्रारूप कहलाता है।  एक अच्छे प्रारूपण के लिए आवश्यक बातें (Essentials of First Draft) एक अच्छे प्रारूपण के लिए निम्नलिखित बातें ध्यान में रखनी चाहिए – 1. तकनीकी सावधानियाँ (Technical Precautions ) – प्रारूप को तैयार करते समय तकनीकी बातों का ध्यान रखना भी आवश्यक होता है जैसे प्रारूप सदैव अन्य पुरुष में तैयार किया जाना चाहिए तथा यदि उत्तम पुरुष का प्रयोग आवश्यक हो तो वह व्यक्ति बोधक की बजाय पद-बोधक होना चाहिए। इसी प्रकार, प्रारूप किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रहों से प्रेरित नहीं होना चाहिए। प्रारूप निश्चित ढाँचे में निश्चित प्रणाली व निर्धारित वाक्यावली में ही तैयार किया जाना चाहिए। > 2. उद्धरण ( Quotation) – विषय को अधिक स्पष्ट करने के लिए प्रारूपण में · विचारों, निर्णयों, आदेशों व उक्तियों का उद्धरण आवश्यक हो जाता है। विषय की गम्भीरता को काट-छाँट के ही मूल शब्दों में व्यक्त किया जाना चाहिए। 3. सरल, सुबोध एवं व्यावहारिक भाषा (Easy, Understandable Practical Language Read More …

Importance of Communication for Managers – Bcom Notes

Importance of Communication for Managers – Bcom Notes प्रबन्धकों के लिए सम्प्रेषण / संचार का महत्त्व  आधुनिक युग में प्रबन्ध और व्यवसाय में प्रभावी सम्प्रेषण का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अब व्यवसाय का क्षेत्र स्थानीय, प्रान्तीय तथा राष्ट्रीय सीमाओं को पार करके अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में पहुँच चुका है। अत: व्यवसाय के सफल संचालन हेतु सुव्यवस्थित सम्प्रेषण पद्धति आज की आवश्यकता बन गई है। नीतियों एवं नियोजन का क्रियान्वयन कार्य प्रगति एवं नियन्त्रण, अधीनस्थों की कठिनाइयाँ एवं उनका निराकरण, सामूहिक निर्णयन एवं प्रबन्ध में हिस्सेदारी, अभिप्रेरित एवं ऊँचे मनोबल वाले मानव संसाधन आदि के लिए प्रभावी आन्तरिक सम्प्रेषण आवश्यक होता है। इसीलिए थियो हैमन ने कहा है “प्रबन्धकीय कार्यों की सफलता प्रभावी सम्प्रेषण पर निर्भर है। “ व्यवसाय के सफल संचालन के लिए सम्प्रेषण के महत्त्व को स्पष्ट करते कीथ हुए डेविस ने लिखा है कि “सम्प्रेषण व्यवसाय के लिए उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार मनुष्य के लिए रक्त आवश्यक है।” प्रबन्धकों के लिए व्यावसायिक सम्प्रेषण के महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है- 1. प्रबन्धकीय कार्यों का आधार (Basis of Managerial Functions) – प्रभावशाली सम्प्रेषण प्रबन्ध की आधारशिला है क्योंकि इसकी आवश्यकता निर्देश में ही नहीं बल्कि प्रबन्ध के प्रत्येक कार्य में पड़ती है। प्रबन्ध अपने सहयोगियों एवं अधीनस्थों से विचार-विमर्श करके ही योजनाएँ बनाता है और सम्प्रेषण द्वारा ही वह निर्धारित उद्देश्यों नीतियों एवं कार्यक्रमों से दूसरों को अवगत कराता है। सम्प्रेषण के अभाव में नियोजन एक कागजी कार्यवाही है। चेस्टर बर्नाड के अनुसार, “सम्प्रेषण की व्यवस्था का विकास करना एवं उसे बनाए रखना प्रबन्ध का प्रथम कार्य है । ” “ 2. संगठन के समन्वय में सहायक (Helpful in Co-ordination of Organization ) – व्यावसायिक संगठन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, इसके विभिन्न समूहों के बीच समन्वय एवं कार्य एकरूपता का होना नितान्त आवश्यक है। यह समन्वय तभी सम्भव हो सकता है जबकि उनके मध्य सन्देशों एवं विचारों का आदान-प्रदान सरलता एवं सुगमता से हो सके। सम्प्रेषण ही ऐसा माध्यम है जो प्रबन्धकों को विचारों एवं सन्देशों के आदान-प्रदान का सुअवसर प्रदान करके संगठन में सद्भाव एवं समन्वय बनाए रखने में सहायता करता है। 3. व्यवसाय का सफल संचालन ( Successful Read More …

Meaning of Feedback pdf – Bcom Notes

Meaning of Feedback pdf – Bcom Notes प्रतिपुष्टि का आशय  प्रतिपुष्टि एक प्रत्यार्पित सन्देश होता है, जो सन्देश प्राप्तकर्ता सम्प्रेषक को देता है। जब सम्प्रेषक सूचनाग्राही अथवा प्राप्तकर्ता को सन्देश भेजता है तो सम्प्रेषक उस भेजे गए सन्देश की प्रतिक्रिया चाहता है ।  सन्देश प्राप्त कर लेने के बाद सन्देश प्राप्तकर्ता द्वारा उस सन्देश को उचित प्रकार से समझा जाता है, तत्पश्चात् सन्देश पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की जाती है। इस प्रतिक्रिया का स्वरूप अनुकूल भी हो सकता है अथवा प्रतिकूल भी हो सकता है। यही प्रतिक्रिया प्रतिपुष्टि कहलाती है। प्रतिपुष्टि सन्देश प्रक्रिया का अन्तिम महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। प्रतिपुष्टि के अभाव में कोई भी सम्प्रेषण प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो सकती। प्रतिपुष्टि के आधार पर ही सम्प्रेषक द्वारा पूर्व सन्देश में परिवर्तन, सुधार अथवा संशोधन कर प्रभावी स्वरूप प्रदान किया जाता है। प्रतिपुष्टि प्रक्रिया (Feedback Process ) एक सन्देश प्राप्तकर्त्ता उचित प्रतिपुष्टि उसी स्थिति में कर सकता है जब वह सम्प्रेषक द्वारा भेजे गए सन्देश को ठीक से समझे अथवा सुने तथा उस सन्देश को उसी दृष्टिकोण से समझे, जिस दृष्टिकोण से सम्प्रेषक उसे समझाना चाहता है। जब सन्देश प्राप्तकर्त्ता सन्देश की कोई प्रतिक्रिया देता है, तभी सम्प्रेषण प्रक्रिया में प्रतिपुष्टि प्रक्रिया की उपस्थिति मानी जाएगी। प्रतिपुष्टि निम्नांकित चित्र द्वारा समझी जा सकती है – प्रतिपुष्टि प्रतिक्रिया में जब सम्प्रेषक सन्देश प्राप्तकर्ता को सन्देश भेजता है तो वह सन्देश मौखिक, लिखित, शाब्दिक अथवा अशाब्दिक हो सकता है। सम्प्रेषण प्रक्रिया में सम्प्रेषण के लिए वह बात जाननी आवश्यक है कि जब सम्प्रेषक सन्देश प्राप्तकर्त्ता को सन्देश भेजता है तो सन्देश प्राप्तकर्ता उस सन्देश के प्रति कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। लीलेण्ड ब्राउन के अनुसार, “सम्प्रेषण व प्राप्तकर्ता दोनों की प्रभावशीलता की एक वांछित मात्रा अत्यन्त आवश्यक होती है । ” प्रतिपुष्टि के प्रभाव (Effects of Feedback) प्रतिपुष्टि के प्रभाव निम्नलिखित हैं- (1) एक सम्प्रेषण प्रक्रिया के अन्तर्गत जिस प्रकार सम्प्रेषक की प्रत्येक क्रिया प्राप्तकर्त्ता की प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करती है. ठीक उसी प्रकार प्राप्तकर्ता की प्रतिक्रियाएँ भी सम्प्रेषक की क्रियाओं को प्रभावित करती हैं। (2)एक सम्प्रेषण प्रक्रिया के अन्तर्गत प्राप्तकर्ता सम्प्रेषक को अपने द्वारा व्यक्त प्रतिक्रिया के स्वरूप के आधार पर नियन्त्रित करने का प्रयत्न करता है।  (3) यदि सन्देश प्राप्तकर्त्ता द्वारा कोई प्रतिपुष्टि प्राप्त नहीं होती है तो पूर्व भेजे गए सन्देश को बदल देते हैं। एक सम्प्रेषण प्रक्रिया के अन्तर्गत प्राप्तकर्ता की प्रतिक्रियाएँ ही प्रतिपुष्टि कहलाती हैं, जो सम्प्रेषक को उसके उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कुशलता प्रदान करती हैं। प्रतिपुष्टि की विधियाँ Read More …

Outline of Business Letter : Introduction – bcom pdf Notes

Outline of Business Letter : Introduction -Bcom pdf Notes व्यावसायिक पत्र का खाका – परिचय किसी पत्र को लिखने से पहले एक प्रभावी योजना बनाना आवश्यक है। पत्र की प्रभावपूर्ण संरचना के लिए योजना में उद्देश्य की पहचान, श्रोताओं का विश्लेषण, मुख्य विचार को परिभाषित करना एवं विचारों के समर्थन में आँकड़े एकत्र करने चाहिए। जिस प्रकार भवन का निर्माण कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व एक नक्शा तैयार किया जाता है जो भवन के विभिन्न भागों के बारे में जानकारी देता है, उसी प्रकार व्यावसायिक पत्रों को लिखने से पहले इनका एक खाका तैयार किया जाता है जो इन पत्रों में दी जाने वाली विभिन्न सूचनाओं को विधिवत् रूप से व्यवस्थित करने में सहायक होता है। सामान्यत: खाके का आशय होता है कि ‘कहाँ क्या है?’ व्यावसायिक पत्र के विभिन्न भाग होते हैं; जैसे— भेजने वाले का नाम व पता, विषय, शीर्षक, विभिन्न वाक्य-खण्ड इत्यादि । व्यावसायिक पत्र के खाके में पत्र के इन सभी भागों को सम्मिलित किया जाता है तथा जब इन भागों को विधिवत् रूप से व्यवस्थित कर दिया जाता है तो यह एक आदर्श व्यावसायिक पत्र बन जाता है। व्यावसायिक पत्र, विक्रय प्रतिनिधि के कार्य को पूरा करता है अत: एक विक्रय प्रतिनिधि की भाँति व्यावसायिक पत्र को भी पाठक के मन पर सुप्रभाव डालना चाहिए। यदि कोई विक्रय प्रतिनिधि स्वयं को ठीक प्रकार से उपस्थित नहीं कर पाता है या फर्म के बारे में उसे पूर्ण जानकारी नहीं है तो उसका ग्राहक पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ेगा। यही स्थिति पत्र की होती है। यदि पत्र की भाषा प्रभावी नहीं है या पत्र की विषय-सामग्री को ठीक प्रकार से व्यवस्थित नहीं किया गया है या उसमें गलतियाँ हैं, तो पाठक उससे बिल्कुल प्रभावित नहीं होता। पत्र के ढाँचे को निर्धारित करते समय पूर्ण ध्यान रखना चाहिए कि उसमें कोई कमी न रह जाए, उसका कोई भाग छूट न जाए। पत्र का कोई भाग छूट जाने से पत्र की भी वही स्थिति होगी जो एक अपंग व्यक्ति की होती है। पत्र के प्रमुख भाग (Important parts of a Letter) पत्र के प्रमुख भाग निम्न प्रकार हैं– 1. पत्र का शीर्षक (Letter-head) किसी भी पत्र का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग उसका शीर्षक होता है, जिसमें पत्र भेजने वाली फर्म या संस्था का नाम, Read More …

Meaning of Report pdf – Bcom Notes

Meaning of Report pdf – Bcom Notes प्रतिवेदन से आशय संचार माध्यमों में आए चहुँमुखी विकास के कारण आज देश-विदेश में कार्यक्रम आदि की तथ्यात्मक जानकारी पाने और भेजने के लिए ‘प्रतिवेदन’ का सहारा लिया जाता है। ‘प्रतिवेदन’ को अंग्रेजी में ‘रिपोर्ट’ या ‘रिपोर्टिंग’ कहते हैं। यह एक प्रकार का लिखित विवरण होता है, जिसमें किसी संस्था, सभा, दल, विभाग, सरकारी, गैर-सरकारी, सामान्य अथवा विशेष आयोजन की तथ्यात्मक जानकारी प्रस्तुत की जाती है। इसका उद्देश्य सम्बन्धित व्यक्तियों को संस्था के कार्य, परिणाम, जाँच या प्रगति की सही-सही तथा पूरी जानकारी देना होता है। प्रतिवेदन के प्रकार (Kinds of Reports) प्रतिवेदन कई प्रकार के होते हैं। उदाहरण के लिए हम इन्हें निम्नलिखित श्रेणियों में रख सकते हैं- (1) सभा, गोष्ठी या सम्मेलन का प्रतिवेदन | (2) संस्था (सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक) आदि का मासिक अथवा वार्षिक प्रतिवेदन। (3) व्यावसायिक प्रगति या स्थिति का प्रतिवेदन | (4) जाँच समिति द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन | Read More …

Meaning of Business Letter pdf- Bcom Notes

Meaning of Business Letter pdf- Bcom Notes व्यावसायिक पत्र का आशय व्यावसायिक कार्यों के लिए किया जाने वाला पत्रों का आदान-प्रदान ‘ व्यावसायिक पत्र ‘व्यवहार’ कहलाता है और ऐसे पत्रों को ‘व्यावसायिक पत्र’ कहते हैं। आधुनिक युग में व्यावसायिक पत्र निश्चित रूप से एक अपरिहार्य आवश्यकता का रूप ग्रहण कर चुके हैं। किसी-न-किसी रूप में तथा कभी-न-कभी व्यावसायिक पत्रों के आदान-प्रदान की आवश्यकता प्रत्येक व्यवसायी तथा उद्यमी को पड़ती है। अपने नियमित कार्य को करने हेतु व्यवसायी को विभिन्न पक्षों से सूचनाओं का आदान-प्रदान करना पड़ता है। पूछताछ करने के लिए, आदेश प्रेषित करने के लिए, आदेशों को पूरा करने के लिए, साख की अनुमति एवं स्वीकृति प्राप्त करने के लिए, देनदारों को उनके खातों का विवरण भेजने के लिए, माल की पूर्ति में की गई कमी की शिकायत के लिए ग्राहकों की समस्याओं का समाधान करने के लिए तथा फर्म की ख्याति में वृद्धि करने के लिए प्रत्येक संस्था में सम्प्रेषण की आवश्यकता होती है। व्यावसायिक पत्रों के उचित माध्यम व सम्प्रेषण के द्वारा ही उद्योग जगत में फैले विशाल जनसमुदाय से सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। भौगोलिक दूरी की प्राकृतिक बाधा को व्यावसायिक पत्रों के द्वारा सहजरूपेण ही पार कर लिया जाता है। व्यावसायिक पत्र का महत्त्व (Importance of a Business Letter) आधुनिक व्यापार की सफलता काफी सीमा तक व्यावसायिक पत्र-व्यवहार पर भी निर्भर करती है। हरबर्ट एन० केसन के अनुसार, “एक श्रेष्ठ पत्र उस मास्टर – चाबी के समान होता है जो ताला लगे दरवाजे को भी खोल देती है। यह बाजार का निर्माण करता है तथा वस्तुओं व सेवाओं के विक्रय हेतु मार्ग प्रशस्त करता है। ऐसा पत्र फर्म का चित्र प्रस्तुत करता है।” व्यावसायिक पत्र अपने श्रेष्ठ रूप में व्यवसाय में अन्तर्निहित उद्देश्य को प्राप्तकर्त्ता तक पहुँचाने में कारगर सिद्ध होता है। सुदूर क्षेत्रों में स्थित लोगों तक इस पत्र के द्वारा ही प्रतिष्ठान की ख्याति पहुँचती है। अच्छे व्यावसायिक पत्रों के द्वारा फर्म की ख्याति स्थायित्व को प्राप्त करती है। वास्तव में एक व्यावसायिक पत्र इतना प्रभावी होना चाहिए कि जिस सीमा तक सम्भव हो, लेखक का भी स्थान ले सके। व्यावसायिक पत्र लिखने के कारण / आवश्यकता (Reasons / Need to write a Business Letter) एल० गार्टसाइड ने व्यावसायिक पत्रों को लिखने के चार मुख्य कारण बताए हैं, जो निम्नलिखित हैं- Read More …

Meaning of Dunning Letter – Bcom Notes

Meaning of Dunning Letter – Bcom Notes तगादे के पत्र का अभिप्राय  यदि कोई व्यापारी या व्यक्ति नियत समय पर अथवा नियत अवधि के भीतर, खरीदी हुई वस्तु का मूल्य नहीं चुकाता है तो ऐसी स्थिति में उसको जो पत्र लिखा जाता है उसे ‘तगादे का पत्र’ अथवा ‘रुपया वसूली का पत्र’ कहते हैं। ऐसे पत्र बकाया राशि या अदत्त राशि वसूल करने के उद्देश्य से लिखे जाते हैं। ऐसे पत्रों को लिखते समय काफी सावधानी की आवश्यकता होती है, अत: तगादे के पत्र का लेखन पर्याप्त चातुर्य एवं सावधानी से होना चाहिए ताकि भुगतान भी प्राप्त हो जाए एवं ग्राहक भी बना रहे । सामान्यतः ऐसे व्यापारिक मामलों में पर्याप्त संयम रखा जाना चाहिए। इसमें शीघ्रता की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि अत्यधिक शीघ्रता करने पर न्यायिक विवाद की स्थिति उत्पन्न होने से श्रम एवं पैसे की हानि तो होती ही है, साथ ही व्यापारिक साख पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। तगादे सम्बन्धी पत्र लिखते समय ध्यान देने योग्य बातें  (Points to be kept in Mind while drafting a Dunning Letter) तगादे का पत्र लिखते समय लेखक का मूल ध्येय यह होना चाहिए कि अदत्त अथवा रुकी हुई राशि भी प्राप्त हो जाए एवं ग्राहक भी बना रहे, अत: इनका लेखन करते समय जिन महत्त्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखना आवश्यक होता हैं, वे निम्नलिखित हैं- (1) प्रत्येक दशा में भाषा-शैली पर नियन्त्रण होना आवश्यक है क्योंकि भुगतान से अधिक महत्त्वपूर्ण ग्राहक को बनाए रखना होता है। ( 2 ) प्रारम्भ में अदत्त राशि का विवरण, सम्बन्धित व्यापारी के पास भेजा जाना चाहिए तथा आशा की जानी चाहिए कि वह इस विवरण को प्राप्त करने के पश्चात् भुगतान कर देगा।  (3) यदि इसके बाद भी कोई उत्तर न आए तो व्यापारी को तगादे का प्रथम पत्र लिखना चाहिए। इस प्रथम पत्र की शैली सामान्य होनी चाहिए। Read More …

What is Group Discussion ? – Bcom Notes

What is Group Discussion ? – Bcom Notes जब एक से अधिक व्यक्तियों की राय के अनुसार कोई निर्णय लेना होता है तब ऐसे सभी व्यक्तियों को आपस में बैठकर उस विषय पर वार्तालाप करना होता है। इस वार्तालाप को सामूहिक परिचर्चा का नाम दिया जा सकता है। विस्तृत अर्थ के रूप में सामूहिक परिचर्चा सामूहिक निर्णय लेने की ऐसी तकनीकी है जिससे अधिकांश अथवा सभी लोग उस निर्णय के पक्ष में हों। सामूहिक परिचर्चा व्यक्तियों के बीच विचारों के आदान-प्रदान और सम्प्रेषण शैली की एक परीक्षा है। इसके अन्तर्गत प्रतिभागियों के समूह को एक निश्चित समय अवधि के बीच परिचर्चा के लिए एक विषय दे दिया जाता है। प्रत्येक प्रतिभागी परिचर्चा के दौरान प्रस्तुति के आधार पर उसके सम्प्रेषण कौशल की जाँच की जाती है। असल में इस परिचर्चा के माध्यम से कोई व्यक्ति सामूहिक स्थिति में किस प्रकार दूसरों से विचार विनिमय कर पाता है इसी क्षमता को आँका जाता है। क्या होती है सामूहिक परिचर्चा (What is Group Discussion) प्रबन्धन संस्थानों तथा नौकरियों की तलाश कर रहे विद्यार्थियों की सम्प्रेषणशीलता या कम्यूनिकेटिव स्किल की जाँच करने के लिए सामूहिक परिचर्चा एक सशक्त माध्यम है। आज के प्रतियोगितात्मक एवं प्रतिस्पर्द्धात्मक युग में विभिन्न सहयोगियों के बीच सम्प्रेषणकला के महत्त्व को समझते हुए विभिन्न प्रबन्धन संस्थान तथा चयनकर्त्ता लिखित परीक्षा और व्यक्तिगत साक्षात्कार के अलावा सामूहिक परिचर्चा परीक्षण का सहारा लेकर योग्य आवेदनकर्त्ताओं का चयन करते हैं। प्राय: देखा जाता है कि प्रबन्धन संस्थान सम्पूर्ण चयन प्रक्रिया में सामूहिक परिचर्चा तथा व्यक्तिगत साक्षात्कार को लगभग पैंतीस प्रतिशत या इससे भी अधिक अंक का महत्त्व देते हैं। आजकल की प्रतियोगी परीक्षाओं में सामूहिक परिचर्चा का योगदान और भागीदारी बढ़ती ही जा रही है। सामूहिक निर्णय के लाभ (Advantages of Group Discussion ) सामूहिक निर्णय के लाभों का विवेचन निम्न प्रकार से किया जा सकता है – (1) समूह के पास एक व्यक्ति की अपेक्षा ज्ञान और सूचनाओं का विशाल भण्डार होता है। (2) समूह से विचारों की विविधता का लाभ मिलता है ।  (3) समूह हमेशा नवीन विचारों का पक्षधर होता है।  (4) सामूहिक निर्णय किसी भी समाधान की सहमति को बढ़ाते हैं।  (5) व्यक्तिगत निर्णय स्वैच्छिक होते हैं इसलिए सर्वग्राही नहीं हो सकते।  (6) सामूहिक निर्णयों में विशेषज्ञों की राय का लाभ मिलता है।  (7) सामूहिक निर्णय कर्मचारियों के हित में होते हैं जबकि व्यक्तिगत निर्णय सबके हितों को ध्यान में नहीं रखता है। (8) क्योंकि सामूहिक निर्णय सार्वजनिक निर्णयों को ध्यान में रखते हैं अतः प्रबन्ध एवं अधीनस्थों के मध्य सम्बन्ध मधुर बने रहते हैं। अतः सामूहिक निर्णय संगठन को शक्तिशाली बनाते हैं। सामूहिक निर्णयन के दोष Read More …

Meaning of Speech Bcom Notes in hindi

Meaning of Speech Bcom Notes in hindi भाषण का अर्थ  भाषण सम्प्रेषण का शक्तिशाली माध्यम है। व्यावसायिक सम्प्रेषण में भाषण औपचारिक श्रृंखला के अन्तर्गत आता है। भाषण के अन्तर्गत वक्ता अपनी वाक् शक्ति द्वारा व्यवस्थित भाषा में समयोचित दैहिक एवं पार्श्व भाषा के साथ वक्तव्य को सम्प्रेषित करता है, जो श्रोताओं को विचारों के साथ बहा ले जाता है। इस वक्तव्य या सम्बोधन को ही भाषण कहा जाता है। समाज में कई ऐसे औपचारिक व अनौपचारिक अवसर आते हैं, जब हमें व्याख्यान या भाषण देने की आवश्यकता महसूस होती है। उदाहरणार्थ – उद्घाटन समारोह, संगोष्ठियाँ कम्पनी की बैठकें – परिचर्चा इत्यादि ऐसे अवसर होते हैं, जब हम प्रमुख अतिथियों के स्वागतार्थ कुछ उद्बोधन देते हैं। अनेक अवसरों पर व्याख्यानमाला का विशिष्ट अवदान होता है। व्याख्यान के आकार को निश्चित किया जाना सम्भव नहीं है। यह समय व अवसर के अनुसार छोटा अथवा विस्तृत हो सकता है। कुछ विद्वानों द्वारा दी गई भाषा सम्बन्धी परिभाषाएँ निम्नलिखित रूप में है”- Speech is power: Speech is to persuade, to convert, to compel.”, – Emerson “भाषण मानव के मस्तिष्क पर शासन करने की एक कला है।” – सेनेका “भाषण मस्तिष्क का दर्पण है।” -प्लेटो  “The ability to speak in a hortative way to distinction, Read More …

Modern Means of Communication Bcom Notes

Modern Mans of Communication Bcom Notes वर्तमान युग सूचना – क्रान्ति का युग है। बीसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में सम्प्रेषण के नए मशीनी यन्त्रों ने आकार ग्रहण किया । इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में हम इसको अधिक मुखरित होते हुए देख रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक तकनीक ने तो इस विधा को आकाश की ऊँचाइयों का स्पर्श करा दिया है। आज कम्प्यूटर, इण्टरनेट, उपग्रह द्वारा सम्प्रेषण जैसी क्रियाएँ अत्यन्त लोकप्रिय हो चुकी हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में मानव ने आशातीत सफलता अर्जित की है। फैक्स तथा ई-मेल से सूचना के साधन अधिकाधिक जनसंख्या को सुलभ होते जा रहे हैं। इक्कीसवीं शताब्दी में जन संचार ने नए सोपानों का स्पर्श किया है। आधुनिक संचार प्रणाली ने सम्प्रेषण को नए रूपाकार में अत्यन्त सुविधाजनक व लाभकारी बना दिया है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि यदि मुझे एक बार सेवा का अवसर दिया गया तो मैं अपनी योग्यता दिखा सकूँगा। प्रार्थना पत्र के साथ प्रमाण-पत्रों की सत्यापित प्रतिलिपियाँ संलग्न हैं। – संलग्न-पत्र — आठ  (प्रमाण-पत्रों की सत्यापित प्रतिलिपियाँ) दिनांक : 1 अगस्त, 2017 प्रार्थी, ह० ( ……………) विवेक कुमार 56, डालमपाड़ा, मेरठ। सम्प्रेषण के आधुनिक साधन (Modern Means of Communication) इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में सम्प्रेषण के साधन के रूप में विभिन्न यन्त्रों का आविष्कार हो चुका है। सम्प्रेषण के आधुनिक साधन निम्नलिखित हैं (1) फैक्स, (2) इलेक्ट्रॉनिक मेल अथवा ई-मेल, (3) इण्टरनेट, (4) सेल्युलर फोन्स । सम्प्रेषण के प्रमुख अत्याधुनिक साधनों की विस्तृत विवेचना इस प्रकार है- 1. Read More …

Concept of Resume- Meaning and Definition pdf nots in Hindi

Concept of Resume- Meaning and Definition pdf nots in Hindi जीवनवृत्त सारांश का आशय (Concept of Resume) करीकुलम विटे (सी० वी०) अर्थात् जीवनवृत्त – सारांश एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है, यदि यह प्रभावशाली होगा तो आपको अवश्य ही साक्षात्कार के लिए बुलाया जाएगा, और यदि यह प्रभावशाली नहीं हुआ तो आपको बिना साक्षात्कार के लिए बुलाए नौकरी की पात्रता के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। इसलिए यह कहा जा सकता है कि जीवनवृत्तसारांश के माध्यम से ही आप अपने को नौकरियों और रोजगार के बाजार में ठीक से स्थापित कर सकते हैं। आपका जीवनवृत्त सारांश एक ऐसा विजिटिंग कार्ड है जिसके द्वारा साक्षात्कार लेने वाले को यह ज्ञात होता है कि आप कौन हैं। जीवनवृत्त-सारांश का उद्देश्य यह दिखाना है कि नियोक्ता जिस तरह के आदमी की तलाश कर रहा है वह आप ही हैं और आप बखूबी पद की जिम्मेदारियाँ पूरी कर सकते हैं। जीवनवृत्त – सारांश को इस तरह तैयार किया जाना चाहिए कि इसके माध्यम से आपके नौकरी की तलाश के अभियान में आपको मदद मिले, अर्थात् नियोक्ताओं की आप में रुचि जाग्रत हो, वे आपको साक्षात्कार के लिए आमन्त्रित करें, आप नियोक्ता के सामने बैठकर अपने आपको प्रस्तुत कर सकें और अपने भौगोलिक क्षेत्र से बाहर आपके लिए रोजगार की संभावनाएँ बढ़ें। जीवनवृत्त- सारांश ऐसा होना चाहिए कि किसी भी पद के लिए आवेदन करने वालों की भीड़ में आप अलग ही दिखाई दें। जीवनवृत्त सारांश सावधानी से तैयार किया गया किसी विपणन का औजार है जिसके माध्यम से पूर्व निर्धारित समूह के समक्ष किसी व्यक्ति के, रोजगार के लिए उपयुक्त होने का विवरण संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसे तैयार करते समय इसके दो पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए – पहला विषयवस्तु और दूसरा प्रस्तुतीकरण । जीवनवृत्त-सारांश कोई इकबालिया बयान नहीं है जिसमें आप प्रत्येक बात को यथातथ्य प्रस्तुत करें, आप अपनी कमजोरियों को थोड़ा कम करके अपनी खूबियों को बढ़ा-चढ़ाकर अपने आपको प्रस्तुत कर सकते हैं, ऐसा करना गलत भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि आपके प्रतिद्वंद्वी भी यही सब ही तो कर रहे हैं। लेकिन अगर अन्तर्वस्तु कमजोर है, अर्थात् आपके पास प्रस्तुत करने के लिए कोई विशेष बात नहीं है तो आपका जीवनवृत्त – सारांश अच्छा नहीं बन पाएगा, लेकिन यह भी सत्य है कि अगर जीवनवृत्त – सारांश ठीक प्रकार से नहीं बनाया गया तो आपकी सारी उपलब्धियाँ धरी की धरी रह जाएँगी। — एक आदर्श जीवनवृत्त सारांश के प्रमुख तत्त्व (Main Elements of An Ideal Resume) 1. सज्जा — Read More …

Meaning of e-commerce in Hindi pdf Notes

Meaning of e-commerce in Hindi pdf Notes ई-कॉमर्स से आशय (Meaning of e-commerce) आज समाज के प्रत्येक क्षेत्र में सूचना क्रान्ति की तीव्रता स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। प्रशासनिक तन्त्र तथा व्यापारी जगत पर इसका प्रभाव विशेष रूप से परिलक्षित होता है। इस प्रौद्योगिकी ने व्यावसायिक, व्यापारिक, वाणिज्यिक गतिविधियों में दखल देकर अर्थव्यवस्था को एक नया आयाम ‘ई-कॉमर्स’ के रूप में दिया है। ‘ई-कॉमर्स’ में ‘ई’ से अभिप्राय ‘इलेक्ट्रॉनिक’ और ‘कॉमर्स’ से अभिप्राय ‘व्यापारिक लेन-देन’ से है। ‘ई-कॉमर्स’ के प्रयोग ने सूचना प्रौद्योगिकी व उन्नत कम्प्यूटर नेटवर्क की सहायता से व्यापारिक एवं व्यावसायिक गतिविधियों को अत्यन्त कार्यकुशल बनाया है। ‘ई-कॉमर्स’ ने कागजों पर आधारित पारस्परिक वाणिज्यिक पद्धतियों को अत्यन्त समर्थ व विश्वसनीय संचार माध्यमों से युक्त कम्प्यूटर नेटवर्क द्वारा विस्थापित करने का महत्त्वाकांक्षी प्रयास किया है। ई-कॉमर्स की कार्य-पद्धति (Mechanism of e-commerce ) ई-कॉमर्स प्रणाली का मुख्य आधार ‘इलेक्ट्रॉनिक डाटा-इण्टरचेंज’ है, जिसके अन्तर्गत आँकड़ों को परिवर्तित तथा स्थानान्तरित करने की सुविधा होती है। इस प्रणाली के अन्तर्गत ग्राहक जब वेबसाइट पर उपलब्ध सामान को पसन्द करके क्रय करता है तो उसे भुगतान के लिए कम्प्यूटर पर उपलब्ध एक फार्म भरना होता है। इस फार्म पर वह अपना क्रेडिट कार्ड नं०, देय राशि व पाने वाले व्यक्ति का नाम आदि सूचनाओं को अंकित करता है। इस फार्म के भरते ही व्यक्ति / ग्राहक के खाते में से उचित धनराशि विक्रेता के खाते में स्थानान्तरित हो जाती है। E.D.C. के अन्तर्गत ही वर्तमान समय में एक नई प्रणाली विकसित की गई है, जिसमें क्रेता कम्प्यूटर पर अपने डिजिटल हस्ताक्षर कर चैक काट सकने में भी सक्षम होता है। इसे ‘नेट चैक’ कहते हैं। ई-कॉमर्स के प्रकार (Types of e-commerce) Read More …

Main Principles of Effective Communication Notes

Main Principles of Effective Communication Notes सम्प्रेषण प्रक्रिया में सन्देश सदैव स्पष्ट होना चाहिए ताकि प्रेषक एवं प्राप्तकर्त्ता को आपसी समझ तथा वांछित प्रतिपुष्टि प्राप्त हो सके। सम्प्रेषण की स्पष्ट अभिव्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि सूचना का सामान्य शब्दों एवं प्रभावी वाक्यों में आदान-प्रदान किया जाए। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सम्प्रेषण के कुछ सिद्धान्त निर्धारित किए गए हैं। इस प्रकार, सम्प्रेषण के सिद्धान्तों से आशय उन मार्गदर्शक नियमों से है, जिनके पालन करने पर सम्प्रेषण प्रक्रिया अपने निहित उद्देश्यों को प्राप्त कर लेती है । प्रभावी सम्प्रेषण के मुख्य सिद्धान्त (Main Principles of Effective Communication) व्यावसायिक सूचनाओं एवं सन्देशों के आदान-प्रदान में जिन महत्त्वपूर्ण नियमों या सिद्धान्तों को ध्यान में रखा जाना आवश्यक है, वे निम्नवत् हैं- 1. स्पष्टता (Clarity) – प्रभावशाली सम्प्रेषण के लिए यह आवश्यक है कि सन्देश एवं उच्चारण स्पष्ट होना चाहिए, जिससे सम्बन्धित व्यक्ति सन्देश को उसी रूप व अर्थ में समझे, जिस रूप व अर्थ में सन्देश को प्रसारित किया गया है। स्पष्टता के अन्तर्गत सम्प्रेषण व्यवस्था में निम्नलिखित बातें आवश्यक होती हैं- (i) अभिव्यक्ति की स्पष्टता – सन्देशग्राही को यह स्पष्ट होना चाहिए कि सन्देश-प्रेषक से किस प्रकार सन्देश लिया जाए। सेना में ‘कोड’ शब्द प्रचलित हैं, अतः दोनों पक्षों के मध्य कोड स्पष्ट होने चाहिए। शब्दों के चयन में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए – ] (a) निश्चित एवं स्पष्ट अभिव्यक्ति का प्रयोग होना चाहिए। (b) सरल शब्दों का प्रयोग करना चाहिए ।  (c) निवारक रूपों को प्राथमिकता देनी चाहिए। (ii) विचारों की स्पष्टता – सन्देश देने वाले व्यक्ति के मस्तिष्क में जैसे ही विचार आता है तभी सन्देशकर्त्ता को स्वयं सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि सामग्री क्या ह- (a) सम्प्रेषण की (b) Read More …

Meaning of Self-development pdf Notes in hindi

Meaning of Self-development pdf Notes in hindi स्व-विकास का अर्थ स्व-विकास का अर्थ है – व्यक्ति द्वारा अपना विकास करना। स्वविकास व्यक्तिनिष्ठ एवं सापेक्षिक है जिसका अध्ययन मानव व्यवहार की पूर्णता को जानने के लिए किया जाता है। भिन्न-भिन्न लोगों के लिए इसके भिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं। उदाहरणार्थ- आध्यात्मिक व्यक्ति के लिए चेतना के उच्च स्तरों की खोज, वैज्ञानिक के लिए उसकी खोजों में सफलता और वृद्धि तथा एक खिलाड़ी के लिए पुराने कीर्तिमानों को तोड़ना एवं नये कीर्तिमानों को बनाना आदि आत्मविकास ( स्व – विकास) हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने अस्तित्व एवं व्यक्तित्व के अनुसार इसको परिभाषित करता है और इसका विस्तार करता है। स्व-विकास दो शब्दों ‘स्व’ तथा ‘विकास’ से मिलकर बना है। यहाँ ‘स्व’ शब्द का आशय व्यक्ति के गुणों की समग्रता से है जो उसके निजी गुणों एवं लक्षणों से सम्बन्धित है। विकास का आशय व्यक्ति में नई-नई विशेषताओं एवं क्षमताओं का विकसित होना है जो प्रारम्भिक जीवन से शुरू होकर परिपक्वावस्था तक चलता है । स्व-विकास शरीर के गुणात्मक परिवर्तनों का नाम है जिसके कारण व्यक्ति की कार्यक्षमता एवं व्यवहार में प्रगति या अवनति होती है। दूसरे शब्दों में आत्मविकास (स्व-विकास) से आशय एक व्यक्ति में शारीरिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक, भौतिकवाद आदि गुणों के सन्तुलित शैली में विकास से है । संक्षेप में, ‘स्व-विकास’ एक व्यक्ति में शारीरिक, बौद्धिक, भौतिक व आध्यात्मिक गुणों के विकास की एक प्रक्रिया है। स्व-विकास के अन्तर्गत व्यक्ति निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर स्वयं से चाहता है – उपर्युक्त प्रश्नों का सही हल खोज लेना ही व्यक्ति का आत्मविकास है। इन प्रश्नों का हल वह स्वयं ही खोजता है, किन्तु कभी-कभी दूसरों की आलोचना या प्रशंसा से भी इनके जवाब मिल जाते हैं और व्यक्ति का आत्मविकास होने लगता है । वस्तुत: आत्मविकास शरीर के गुणात्मक परिवर्तनों का नाम है जिसके कारण व्यक्ति की कार्यक्षमता, कार्यकुशलता और व्यवहार में प्रगतिशील परिवर्तन होता है। स्व-विकास व संचार की पारस्परिक निर्भरता  (Inter-dependence of Self-development and Communication) स्व-विकास व सम्प्रेषण की पारस्परिक निर्भरता को निम्नलिखित प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है – Read More …