Classification of Audit Notes

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Classification of Audit Notes

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चालू (सतत्, लगातार या निरन्तर) अंकेक्षण

(Continuous Audit)

इसे विस्तृत अंकेक्षण भी कहते हैं। यह अंकेक्षण संस्था का वित्तीय वर्ष प्रारम्भ होने के साथ ही शुरू हो जाता है एवं वर्ष-पर्यन्त चलता रहता है अर्थात् इस प्रकार के अंकेक्षण में लेखांकन एवं अंकेक्षण पूरे वर्ष साथ-साथ होता रहता है

वस्तुतः चालू अंकेक्षण से हमारा अभिप्राय ऐसे अंकेक्षण से है जिसके अन्तर्गत । अंकेक्षक तथा उसके कर्मचारी वर्ष-पर्यन्त निश्चित अथवा अनिश्चित समय पर आकर तब तक हिसाब-किताब की पुस्तकों की जाँच कुरते रहते हैं जब तक कि चालू वर्ष के अन्तिम खातों का अंकेक्षण नहीं कर लिया जाता है। यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि अंकेक्षक अपनी रिपोर्ट वर्ष के अन्त में सम्पूर्ण हिसाब-किताब की पुस्तकों की जाँच के बाद ही देता है।

डब्ल्यू डब्ल्यू बिग के अनुसार-“चालू अंकेक्षण वह है जिसमें अंकेक्षक का स्टाफ वर्ष भर खातों की जाँच में लगातार लगा रहता है।”

चालू अंकेक्षण की आवश्यकता

(Need of Continuous Audit)

चालू अंकेक्षण निम्नलिखित परिस्थितियों में आवश्यक एवं उपयोगी होता है-

(1) जिन व्यवसायों में वित्तीय वर्ष के समाप्त होते ही तुरन्त अंकेक्षित अन्तिम खाते प्रकाशित करना होता है। जैसे—बैंक, बीमा कम्पनी तथा बिजली कम्पनी आदि में अंकेक्षित अन्तिम खातों को प्रकाशित करना पड़ता है।

(2) उन व्यवसायों में जहाँ व्यापारिक लेन-देनों की संख्या अधिक होती है

(3) उन व्यवसायों में जहाँ खातों की गहन जाँच आवश्यक हो । ।

(4) अन्य व्यवसायों में, जहाँ आन्तरिक निरीक्षण प्रणाली न अपनाई जाती हो और यदि हो तो सन्तोषजनक न हो

(5) उन व्यवसायों में, जहाँ पर अन्तिम खाते मासिक, त्रैमासिक, छमाही आधार पर तैयार करने की आवश्यकता पड़ती है।

(6) उन व्यवसायों में जहाँ विक्रय अधिक मात्रा में होता है

(7) बड़े आकार की सेवा कम्पनियों में।

चालू अंकेक्षण के लाभ

(Advantages of Continuous Audit)

चालू अंकेक्षण से निनलिखित लाभ प्राप्त होते हैं-

1. खातों की विस्तृत एवं गहन जाँच

2. अशुद्धियों की जानकारी प्रारम्भ में ही हो जाना

3. त्रुटि एवं कपट शीघ्र प्रकट होना

4. कर्मचारियों पर नैतिक प्रभाव

5. अंकेक्षण में सुविधा

6. अन्तिम खातों का शीघ्र प्रकाशन

7. अन्तरिम लाभांश की घोषणा में सहायक

8. उचित सुझावों की प्राप्ति

9. कार्य के छूटने का भय नहीं

10. अन्तरिम लेखों का निर्माण संभव

चालू अंकेक्षण की हानियाँ

(Disadvantages of Continuous Audit)

चालू अंकेक्षण से निम्नलिखित हानियाँ हैं-

1. अंकेक्षित खातों में हेर-फेर की सम्भावना (Possibility of Alteration in Figures)

2. कार्य में असुविधा (Inconvenience o. work)- संस्था में अंकेक्षक के वर्ष पर्यन्त बार-बार आवागमन से कर्मचारियों को कार्य करने में असुविधा होती है।

3. कर्मचारियों से साँठ-गाँठ (Secret Pact with Employees)- चालू अंकेक्षण में अंकेक्षक का स्टाफ बार-बार संस्था में आता है जिससे संस्था के कर्मचारियों से उनकी मित्रता हो जाती है। अत: वह संस्था के कर्मचारियों के साथ साँठ-गाँठ करके महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाने में सहयोग प्रदान कर सकता है ।

4. अंकेक्षक की प्रभावहीनता (Less Effectiveness of the Auditor); अंकेक्षक के बार-बार आने-जाने से कर्मचारियों के बीच में उसका प्रभाव घटने लगता है। कर्मचारी उन्हें अपने मित्र के रूप में समझने लगते हैं और कभी-कभी वे इसका गलत लाभ भी उठा लेते हैं।

5. अंकेक्षक के कार्य की श्रृंखला टूटने का भय-इसमें अंकेक्षण का कार्य अनेक भागों में किया जाता है, अत: अंकेक्षक के कार्य की श्रृंखला टूटने का सदैव भय रहता है।

6. अत्यधिक खर्चीला (More expensive)- अंकेक्षण की यह पद्धति खर्चीली होने के कारण छोटी-संस्थाओं के लिए उपयोगी नहीं है। इसे केवल बड़ी व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा ही अपनाया जाता है।

7. कार्य का यंत्रवत् व शिथिल होना-चालू अंकेक्षण में कार्य यन्त्रवत् हो जाता है और अंकेक्षण का स्टाफ कम रुचि लेता है जिससे कार्य की किस्म घट जाती है।

चालू अंकेक्षण की हानियों से बचने के उपाय

(Precautions)

चालू अंकेक्षण की उपरोक्त हानियों से बचने के लिए निम्नलिखित सावधानियाँ बरतनी चाहियें-

1. कर्मचारियों को निर्देश-अंकेक्षक को संस्था के कर्मचारियों एवं अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश देना चाहिए कि वे अंकेक्षण के पश्चात् अंकेक्षित हिसाब-किताब के अंकों में कोई परिवर्तन न करें। यदि अंकों में परिवर्तन करना अनिवार्य हो तो इसकी पूर्व-सूचना अंकेक्षक को देनी चाहिए और जर्नल में संशोधन प्रविष्टि (Rectification Entry) करनी चाहिए।

2. गुप्त चिन्हों का प्रयोग नैत्यक परीक्षण में अंकेक्षक स्टाफ को महत्वपूर्ण अंकों पर गुप्त चिन्ह लगा देने चाहियें, जिससे कि अंकेक्षण के उपरान्त परिवर्तित किये हुए अंकों का आसानी से पता लग जाये 3. अंकेक्षण-पुस्तिका का प्रयोग–अंकों व लेखों में परिवर्तनों का पता लगाने के लिए अंकेक्षक को चाहिए कि वह अपनी ऑडिट नोट बुक में मुख्य-मुख्य जोड़ों (Totals) एवं बाकियों को नोट कर ले। अगली बार अंकेक्षण कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व ऑडिट नोट बुक में लिखी गई सूचनाओं को एक बार मिला लेना चाहिए ।

4. अंकेक्षण कार्यक्रम-अंकेक्षक को अपना कार्य प्रारम्भ रने से पहले ही एक सुव्यवस्थित कार्यक्रम बना लेना चाहिए। ऐसा करने से कार्य के छूटने का भय नहीं रहता है।

5. विभिन्न श्रेणियों की जाँच एक ही लिपिक द्वारा होना-विभिन्न श्रेणियों की जाँच यथासंभव एक ही लिपिक द्वारा की जानी चाहिए।

6. आन्तरिक निरीक्षण व्यवस्था का प्रयोग-चालू अंकेक्षण अपने उद्देश्य में तब अधिक सफलता प्राप्त कर सकता है, जबकि संस्था में आन्तरिक निरीक्षण प्रणाली का प्रयोग किया जाता हो।

7. अंकेक्षण के एक उपकार्य को एक बार में पूरा करना-अंकेक्षक को चाहिए कि वह अंकेक्षण कार्य के प्रत्येक भाग को विभाजित कर ले, और अपने सहयोगियों को यह निर्देश दे कि प्रत्येक उपकार्य को एक बार में ही पूरा कर लें ताकि कोई कार्य छूटने न पाये।

8. अव्यक्तिगत खातों की जाँच वर्ष के अन्त में व्यापारिक लेन-देनों को व्यक्तिगत खातों में लिखा जाता है। अत: उनका निरन्तर अंकेक्षण होना चाहिए। किन्तु अव्यक्तिगत खातों को वर्ष के अन्त में ही बंद करना चाहिए क्योंकि उनमें गबन होने की सम्भावना अधिक होती है।

9. स्टाफ में परिवर्तन-अंकेक्षक को चाहिए कि वह अपने स्टाफ में भी परिवर्तन करता रहे जिससे कर्मचारी व स्टाफ के सदस्य किसी प्रकार की साँठ-गाँठ न कर सकें ।

10. अंकेक्षण प्रगति सारणी पुस्तक का निर्माण-अंकेक्षक को अंकेक्षण टिप्पणी पुस्तक के साथ-साथ अंकेक्षण प्रगति सारणी पुस्तक भी बना लेनी चाहिए, ताकि अंकेक्षण कार्य की प्रगति का पता लग सके।

11. आकस्मिक निरीक्षण-अंकेक्षक को बिना पूर्व सूचना के नियोक्ता के व्यापारिक कार्यालय का आकस्मिक निरीक्षण करना चाहिए।

सामयिक, वार्षिक, चिट्ठा या अन्तिम अंकेक्षण

(Periodical Audit or Annual Audit or Balance Sheet Audit or Final Audit)

सामयिक अंकेक्षण से आशय ऐसे अंकेक्षण से है, जो वित्तीय वर्ष के समाप्त होने पर जब अन्तिम खाते पूर्ण रूप से तैयार हो जाते हैं, प्रारम्भ किया जाता है और तब तक चलता रहता है जब तक कि अंकेक्षण कार्य पूर्ण न हो जाये । सामान्य तौर पर अंकेक्षण का आशय इसी अंकेक्षण से लगाया जाता है। चूंकि इस प्रकार का अंकेक्षण वर्ष के अन्त में होता है, इसलिए इसे वार्षिक अंकेक्षण (Annual Audit) या अन्तिम अंकेक्षण (Final Audit) भी कहते हैं। इसे चिट्ठा अंकेक्षण (Balance Sheet Audit) भी कहते हैं क्योंकि इसे चिट्ठा बनने के बाद प्रारम्भ किया जाता है, परन्तु अमेरिका में चिट्ठा अंकेक्षण का अर्थ केवल चिट्टे के अंकेक्षण से ही लिया जाता है। यह अंकेक्षण वर्ष में केवल एक बार ही किया है। व्यवहार में इस अंकेक्षण का प्रयोग सबसे अधिक होता है। वस्तुतः यह अंकेक्षण छोटी संस्थाओं में अत्यन्त सुविधाजनक एवं व्यावहारिक होता है।

सामयिक अंकेक्षण की मुख्य परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं-

1. लॉरेन्स आर० डिक्सी (Lawrance R. Dicksee) के अनुसार, “सामयिक अंकेक्षण वह है, जो उस वित्तीय अवधि की समाप्ति के बाद प्रारम्भ होता है, जिससे वह सम्बन्धित होता है। इसमें चालू अंकेक्षण के लाभ नहीं पाये जाते ।”

2. वाल्टर डब्ल्यू० बिग (Walter W. Bigg) के अनुसार, “सामयिक अंकेक्षण से आशय उस अंकेक्षण से है जो वित्तीय वर्ष की समाप्ति से पहले प्रारम्भ नहीं किया जाता है और फिर उस समय तक किया जाता है, जब तक यह समाप्त न हो जाये।”

3. डी पॉला (De Paula) के अनुसार, “सामयिक अंकेक्षण वह है, जिसमें अंकेक्षक लेखों की अवधि की समाप्ति तक कार्य नहीं करता है तथा बाद में सम्पूर्ण जाँच को एक बार में समाप्त कर देता है।”

4. स्पाइसर एवं पैगलर (Spicer and Pegler) के अनुसार, “अन्तिम या पूर्णकृत अंकेक्षण से साधारणतया उस अंकेक्षण का बोध होता है जो वित्तीय अवधि के समाप्त होने से पूर्व प्रारम्भ नहीं किया जाता और तब तक चलता रहता है, जब तक कि वह पूरा न हो जाये।”

सामयिक अंकेक्षण की उपयोगिता का क्षेत्र

सामयिक अंकेक्षण निम्नलिखित परिस्थितियों में उपयोगी रहता है-

1. छोटा व्यापार या कम सौदे-यदि व्यापार का आकार काफी छोटा है एवं लेन-देन भी कम ही हैं तो सामयिक अंकेक्षण सबसे अधिक उपयुक्त है।

2. अन्तिम खातों की तुरन्त आवश्यकता न होना-यदि संस्था को वित्तीय वर्ष की समाप्ति के तुरन्त बाद अन्तिम खातों की आवश्यकता नहीं है तो सामयिक अंकेक्षण उचित है।

3. सुदृढ़ आन्तरिक निरीक्षण प्रणाली होना–यदि संस्था ने समुचित आन्तरिक निरीक्षण प्रणाली अपना रखी है तो चालू वर्ष के मध्य में अंकेक्षण की आवश्यकता नहीं है ।

4. गहन जाँच की आवश्यकता न होना-एकाकी व्यापारी अथवा साझेदारी फर्म में, जहाँ मालिकों का प्रत्यक्ष नियन्त्रण रहता है, हिसाब-किताब की अधिक गहन जाँच की आवश्यकता नहीं होती। अतः सामयिक अंकेक्षण ठीक रहता है।

5. अन्तरिम खातों की आवश्यकता न होना-जिस संस्था में अन्तरिम लाभांश वितरित करने या अन्य किसी कारण से वर्ष के मध्य में अन्तरिम खातों की आवश्यकता नहीं पड़ती, वहाँ पर सामयिक अंकेक्षण ही उपयोगी है।

सामयिक अंकेक्षण के लाभ

(Advantages of Periodical Audit)

1. सुविधाजनक (Convenient)– चूँकि इसके अन्तर्गत एक ओर अंकेक्षक को बार-बार आने की आवश्यकता नहीं पड़ती; दूसरी ओर, कर्मचारियों को भी बार-बार परेशान नहीं होना पड़ता। अतः यह अंकेक्षक तथा कर्मचारियों दोनों के दृष्टिकोण से सुविधाजनक होता है।

2. अंकेक्षण में सततता (Continuity in Audit)- इसके अन्तर्गत अंकेक्षण का कार्य एक बार प्रारम्भ हो जाने के बाद लगातार चलता रहता है और यह तब तक चलता रहता है जब तक समाप्त नहीं हो जाये । अतः किसी तथ्य के छूट जाने का भय समाप्त हो जाता है।

3. कार्य में बाधा न होना-इस प्रकार के अंकेक्षण में अंकेक्षक केवल वर्ष की समाप्ति पर ही आता है जिससे वर्ष भर कर्मचारियों के कार्य में किसी प्रकार की बाधा नहीं पड़ती। जबकि चालू अंकेक्षण में अंकेक्षक के समय-समय पर आने से कर्मचारियों के कार्य में बाधा उत्पन्न होती है।

4. मितव्ययिता (Economical)- सामयिक अंकेक्षण तुलनात्मक रूप से मितव्ययी होता है क्योंकि इसके अन्तर्गत अंकेक्षक को वर्ष में एक ही बार में समस्त लेखा पुस्तकों की जाँच करली होती है जिससे अंकेक्षण कार्य में उसको समय और श्रम की बचत होती है। फलतः उसका पारिश्रमिक (Remuneration) भी कम होता है।

5. अंक परिवर्तन की सम्भावना नहीं (No Change of Figures)- सामयिक अंकेक्षण में लेखा पुस्तकों में अंक परिवर्तन की सम्भावना नहीं होती है क्योंकि सामयिक अंकेक्षण अन्तिम खाते तैयार कर लेने के पश्चात् ही किया जाता है तथा अंकेक्षण कार्य समाप्त होने तक पुस्तकें अंकेक्षक के अधिकार में रहती हैं।

6. कार्य का समय पर पूर्ण होना (Work is done in Time)- सामयिक अंकेक्षण में अंकेक्षण का समस्त कार्य पूर्व निर्धारित योजना के आधार पर किया जाता है जिससे अंकेक्षण का कार्य समय पर समाप्त हो जाता है एवं अंकेक्षक समय से ही अपनी अंकेक्षण रिपोर्ट पेश कर देता है।

7. समय की बचत (Saving of Time)- वार्षिक अंकेक्षण में अंकेक्षक को संस्था में बार-बार तथा वर्ष पर्यन्त आने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इसी प्रकार विभिन्न तथ्यों के स्पष्टीकरण हेतु कर्मचारियों को बार-बार अंकेक्षक के पास नहीं जाना पड़ता है इस प्रकार कर्मचारी एवं अंकेक्षक दोनों के समय की बचत होना स्वाभाविक है।

8. कर्मचारियों पर नैतिक प्रभाव (Moral Effect on Employees)- अंकेक्षक के संस्था में बार-बार नहीं आने से कर्मचारियों पर नैतिक प्रभाव पड़ता है, दूसरी ओर अंकेक्षक एवं कर्मचारियों के मध्य पर्याप्त दूरी बनी रहती है जिससे अंकेक्षक को प्रभावित करना कठिन होता है। अत: अंकेक्षक की प्रतिष्ठा एक अंकेक्षक के रूप में यथावत् बनी रहती है।

9. छोटे व्यवसायियों के लिए उपयुक्त-छोटे-छोटे व्यापारियों के लिये सामयिक अंकेक्षण अधिक उपयुक्त है, क्योंकि इसमें अधिक व्यय नहीं होता।

सामयिक अंकेक्षण की हानियाँ

(Disadvantages of Periodical Audi’)

1. गहन जाँच का अभाव-चालू अंकेक्षण की भाँति सामयिक अंकेक्षण में हिसाब-किताब की सूक्ष्म जाँच नहीं हो पाती क्योंकि अंकेक्षण कार्य के लिए पर्याप्त समय है

2. नैतिक प्रभाव में कमी-संस्था के कर्मचारियों के मन में अंकेक्षण के कारण कोई नैतिक प्रभाव नहीं रहता। उन्हें पता होता है कि उनके द्वारा किये गये कार्यों की जाँच व्यापारिक वर्ष समाप्त होने के भी काफी बाद में होगी। अतः वे लापरवाह हो जाते हैं।

3. अशुद्धियों एवं छल-कपटों की देरी से जानकारी-सामयिक अंकेक्षण के अन्तर्गत अशुद्धियों एवं छल-कपटों की जानकारी बहुत देर से मिलती है। कभी-कभी तो यह भी हो जाता है कि जिन कर्मचारियों ने अशुद्धियाँ एवं छल-कपट किया है, वे संस्था छोड़कर जा चुके होते हैं।

4. समय-समय पर सलाह का अभाव-चालू अंकेक्षण में तो अंकेक्षक समय-समय पर संस्था में लेखों की जाँच के लिए प्रस्तुत होता है और मूल्यवान सुझाव अपने नियोक्ता को देता रहता है जिससे त्रुटि व कपट काफी सीमा तक कम हो जाते हैं। किन्तु सामयिक अंकेक्षण में अंकेक्षक के वर्ष के अन्त में आने से महत्त्वपूर्ण सलाह मिलने में बहुत देर हो जाती है।

5. अन्तिम खातों के प्रकाशन में विलम्ब-सामयिक अंकेक्षण वित्तीय वर्ष के समाप्त होने के पश्चात् प्रारम्भ होता है तथा अंकेक्षण कार्य पूरा होने में भी काफी समय लग जाता है, अतः अंकेक्षित अन्तिम खातों के प्रकाशन में विलम्ब होता है।

6. बड़े आकार के व्यापारों के लिए अनुपयुक्त-बड़े आकार के व्यापारों में अंकेक्षण कार्य काफी अधिक होता है जिसके लिए पर्याप्त समय आवश्यक होता है। अतः सामयिक अंकेक्षण ऐसे व्यवसायों के लिए उपयुक्त नहीं है।

7. अंकेक्षण रिपोर्ट में देरी-चूँकि सामयिक अंकेक्षण का कार्य अन्तिम खाते पूर्ण होने के पश्चात् प्रारम्भ होता है तथा लेखा पुस्तकों की जाँच करने में भी कुछ समय लगता है, अतः सामयिक अंकेक्षण में रिपोर्ट देर से मिलती है। अतः कम्पनियों में सदस्यों की वार्षिक साधारण सभा बुलाने में देर हो जाती है जिससे अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लेने में देर हो सकती है। अंकेक्षण रिपोर्ट में देरी के कारण लाभांश घोषणा करने में भी विलम्ब हो जाता है।

8. सावधानी एवं योजनाबद्ध तरीके से किये गये छल-कपटों का पता लगाना असम्भव-सामयिक अंकेक्षण में सावधानी एवं योजनाबद्ध तरीके से किये गये छल-कपटों का पता लगाना कठिन होता है।

वैधानिक या अनिवार्य अंकेक्षण

(Statutory or Compulsory Auditing)

जब किसी संस्था के हिसाब-किताब का अंकेक्षण अनिवार्यतः किसी विधान के अन्तर्गत कराया जाता है तो उसे वैधानिक या अनिवार्य अंकेक्षण कहते हैं। इस प्रकार के अंकेक्षण में अंकेक्षक का कार्य क्षेत्र, अंकेक्षक की योग्यता व अयोग्यता, अंकेक्षक के अधिकार एवं कर्तव्य विधान द्वारा निश्चित किये जाते हैं। नियोक्ता अथवा अंकेक्षक दोनों में से किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह विधान द्वारा निर्धारित अंकेक्षण के कार्यक्षेत्र में कमी कर दे। यदि विधान द्वारा निर्धारित कार्यक्षेत्र से अधिक विस्तृत जाँच आवश्यक है तो अंकेक्षण के कार्य क्षेत्र का विस्तार किया जा सकता है। भारतवर्ष में निम्नलिखित संस्थाओं को कानूनन अंकेक्षण कराना अनिवार्य है-

(1) कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित कम्पनियों को,

(ii) बैंकिंग नियमन अधिनियम, 1949 के अन्तर्गत बैंकों को,

(iii) बीमा अधिनियम, 1938 के अनुसार बीमा कम्पनियाँ,

(iv) सहकारी समिति अधिनियम, 1922 के अनुसार सहकारी समितियाँ,

(v) अन्य अधिनियमों के अन्तर्गत स्थापित कम्पनियाँ जैसे बिजली कम्पनियाँ एवं गैस कम्पनियाँ.

(vi) प्रन्यासों का अंकेक्षण।

रोकड़ अंकेक्षण (Cash Audit)

जब कोई संस्था किसी निश्चित अवधि के लिए रोकड़ के लेन-देनों की जाँच करने के लिए अंकेक्षक की नियुक्ति करती है तो इसे रोकड़ अंकेक्षण के नाम से पुकारा जाता है । इस प्रणाली के अन्तर्गत आवश्यक प्रमाणों की सहायता से अंकेक्षक के द्वारा आय-व्यय के नकदी लेन-देनों का ही अंकेक्षण किया जाता है। स्पष्ट है कि यह अंकेक्षण रोकड़ बही तक ही सीमित होता है।

सरकारी अंकेक्षण (Government Audit)

सरकारी विभागों के हिसाब-किताब की जाँच करना सरकारी अंकेक्षण कहलाता है । इस कार्य के लिये जिन अंकेक्षकों की नियुक्ति की जाती है, उनके अधिकार एवं कर्त्तव्य सरकारी नियमों के अनुसार होते हैं। केन्द्रीय सरकार के विभागों के वित्तीय खातों के अंकेक्षण के लिये एक अलग विभाग होता है, जिसका सबसे बड़ा अधिकारी कम्पट्रोलर एण्ड आडीटर जनरल कहलाता है।

अन्तरिम या मध्य अंकेक्षण (Interim Audit)

वित्तीय वर्ष के बीच में किसी विशेष उद्देश्य से लेखा-पुस्तकों का किया जाने वाला अंकेक्षण अन्तरिम अथवा मध्य अंकेक्षण कहलाता है।

आकस्मिक अंकेक्षण (Casual Audit)

आकस्मिक अंकेक्षण से अभिप्राय ऐसे अंकेक्षण से है, जो विशिष्ट उद्देश्य से विशेष समय पर कराया जाता है, जैसे-साझेदारी संस्था में नए साझेदार के प्रवेश होने तथा किसी साझेदार के अवकाश या मृत्यु होने पर।

चिट्ठा अंकेक्षण (Balance Sheet Audit)

चिट्ठा अंकेक्षण से आशय चिट्ठे की विभिन्न मदों के अंकेक्षण से है। दूसरे शब्दों में, चिट्टे के सम्पत्ति एवं दायित्व दोनों पक्षों की विभिन्न मदों का अंकेक्षण ही चिट्ठा अंकेक्षण कहलाता है।

प्रमाप अंकेक्षण (Standard Audit)

प्रमाप अंकेक्षण का आशय उस अंकेक्षण से है जिसमें कुछ विशेष मदों की पूर्ण जाँच की जाती है तथा शेष मदों की जाँच सरसरी निगाह (Test Checking) से की जाती है ।

आन्तरिक अंकेक्षण (Internal Audit)

यदि नियोक्ता अपने हिसाब-किताब की जाँच अपने वेतनभोगी नियमित कर्मचारियों द्वारा कराता है तो इसे आन्तरिक अंकेक्षण कहते हैं। ऐसी जाँच करने वाले व्यक्तियों के लिये व्यावसायिक योग्यता प्राप्त होना आवश्यक नहीं है। अन्तरिम अंकेक्षण तथा आन्तरिक अंकेक्षण में अन्तर वित्तीय वर्ष के बीच में किसी विशेष उद्देश्य से संस्था की लेखा-पुस्तकों का बाहरी व्यक्तियों से कराया जाने वाला अंकेक्षण अन्तरिम अंकेक्षण कहलाता है, जबकि नियोक्ता द्वारा अपने ही कर्मचारियों से कराया जाने वाला अंकेक्षण आन्तरिक अंकेक्षण कहलाता है अर्थात् आन्तरिक अंकेक्षण संस्था की कार्य-व्यवस्था का ही अंग मात्र है।

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