Element of Drama

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Element of Drama

(नाटक के तत्त्व)

Q. 1. In which work the elements of drama has been enumerated ? Name them.

किस कृति में नाटक के तत्वों का समावेश किया गया है? उनके नामों का उल्लेख कीजिए।

Ans. Most successful playwrights follow the theories of playwriting and drama that were established over two thousand years ago by a man named Aristotle. In his work Poetics Aristotle outlined the six elements of drama in his critical anlaysis of the classical Greek tragedy Oedipus Rex written by the Greek playwright, Sophocles, in the fifth century B.C. The six elements as they are outlined involve: Thought or Theme or Ideas; Action or Plot; Characters; Language; Music; and Spectacle..

अधिकांश सफल नाटककारों ने नाटक लेखन में उन सिद्धान्तों का समावेश किया है जिनको स्थापना आज से दो हजार वर्ष पूर्व अरस्तू नामक विद्वान द्वारा की गयी थी। अपनी कृति ‘Poetics में उसने यूनानी दुखान्तिका की समीक्षा करते हुए नाटक के छह तत्त्वों का निरूपण किया। यह समीक्षा पाँचवी शती ई०पू० में सोफोक्लीज द्वारा विरचित ‘ईडीपस रेक्स’ की थी। उनके द्वारा निरूपित छह तत्त्व है- विचार, कथानक, पात्र, कथोपकथन, संगीत और दृश्य।

Q. 2. Discuss thought and plot as two main elements of drama.

नाटक के दो मुख्य तत्त्वों के रूप में विषयवस्तु व कार्यव्यापार पर प्रकाश डालिए।

Ans. Thought/Theme/Ideas as first element What the play means as opposed to what happens (the plot). Sometimes the theme is clearly stated in the title. It may be stated through dialogue by a character acting as the playwright’s voice. Or it may be the theme in less obvious and emerges only after some study or thought. The abstract issues and feelings that grow out of the dramatic action.

Action/Plot as second element

The events of a play; the story as opposed to the theme; what happens rather than what it means. The plot must have some sort of unity and clarity by setting up a pattern by which each action initiating the next rather than standing alone without connection to what came before it or what follows. In the plot of a play, characters are involved in conflict that has a pattern of movement. The action and movement in the play begins from the initial entanglement, through rising action. climax, and falling action to resolution.

See also  DEVELOPMENT AND ELEMENTS OF DRAMA

बुद्धिव्यापार/विषयवस्तु/योजना पहले तत्त्व के रूप में

कार्यव्यापार जो परित होता है उससे पहले का विचार बिन्दु इसके अन्तर्गत आता है। कभी-कभी वयविषय का स्पष्ट दिग्दर्शन करा दिया जाता है। कभी-कभी संवाद की शैली में इसको स्पष्ट किया जाता है, ऐसा सूत्रधार के माध्यम से होता है जो नाटककार की आवाज का प्रतिनिधित्व करता है। कभी-कभी योजना इस रूप में निरूपित रहती है कि विशेष अध्ययन से ही उसका आकलन किया जा सकता है। अमूर्त पहलू व छिपी हुई भाव-भंगिमाओं का नियोजन इस तत्व का गुण है।

कार्यव्यापार/कथानक दूसरे तत्त्व के रूप में

इसमें नाटक की घटनाओं का समावेश होता है। यह योजना के विपरीत कहानी का अंग है। क्या अर्थ है के स्थान पर क्या पटित हो रहा है की प्रधानता रहती है। कथानक के तन्तुओं का आपस में जुड़ाव सही व व्यवस्थित स्वरूप में होना चाहिए। प्रत्येक कार्यव्यापार का सम्बन्ध अगले कथानक से ठाँक प्रकार हो । घटित हो चुके और घटित होने वाले के बीच एक सेतु सदैव बना रहता है। पात्रों के बीच इन्द्र जारी रहने से कार्यव्यापार को गति मिलती है। कथानक की शुरुआत किसी उलझन से होती है, फिर कथानक का आरोहण होता है, वह चरमोत्कर्ष पर पहुंचकर पुनः अधोगति की ओर लुढ़कने लगता है और इसी के साथ नियताप्ति अर्थात् समाधान हो जाता है।

Q. 3. Write a note on characters and language as the third and fourth elements of drama respectively.

नाटक के तीसरे व चौथे तत्त्व के रूप में पात्र व भाषा पर एक नोट लिखिए।

Ans. Characters as third element These are the people presented in the play that are involved in the perusing plot. Each character should have his or her own distinct personality, age, appearance, beliefs, socio-economic background, and language.

See also  DEVELOPMENT AND ELEMENTS OF DRAMA

Language as fourth element

The word choice made by the playwright and the enunciation of the actors of the language. Language and dialogue delivered by the characters moves the plot and action along, provides exposition, defines the distinct characters. Each playwright can create his own specific style in relationship to language choices he uses in establishing character and dialogue.

पात्र तीसरे तत्त्व के रूप में

कथानक के कार्यव्यापार को गतिशीलता से आगे बढ़ाने के उपागम होते हैं पात्रा प्रत्येक पात्र की अपनी पृथक पहचान होती है। उसका व्यक्तित्व, आयु, बनावट, विश्वास, सामाजिक-आर्थिक हालात और भाषा अन्यों से सर्वथा अलग प्रकार का होता है।

कथोपकथन चौथे तत्त्व के रूप में

शब्दों का चयन नाटककार द्वारा किया जाता है और उनका संप्रेषण पात्रों के मुख से होता है। पात्रों द्वारा उच्चारित किए गए शब्दों व वार्तालाप से कहानी का कलेवर आगे बढ़ता है। प्रत्येक पात्र का कार्य निर्धारित परिधि में सिमटा रहता है। प्रत्येक नाटककार अपनी सोच के अनुगामी कथोपकथन में अन्तर पैदा कर सकता है, उसी के अनुसार पात्रों को उनका इस्तेमाल करना होता है।

Q. 4. Highlight the attractions of music and spectacle as fifth and sixth elements of drama..

संगीत व दृश्य का पाँचवें व छठे तत्त्व के रूप में नाटक की सौन्दर्यवृद्धि में निर्धारण कीजिए।

Ans. Music as fifth element

Music can encompass the rhythm of dialogue and speeches in a play or can also mean the aspects of the melody and music compositions as with musical theatre. Each theatrical presentation delivers music, rhythm and melody in its own distinctive manner. Music is not a part of every play. But, music can be included to mean all sounds in a production. Music creates patterns and established tempo in theatre. The music moves the story to a higher level of intensity. Character’s wants and desires can be strengthened for the audience through lyrics and music.

See also  DEVELOPMENT AND ELEMENTS OF DRAMA

Spectacle as sixth element

The spectacle in the theatre can involve all of the aspects of scenery, costumes, and special effects in a production. The visual elements of the play created for theatrical event. The qualities. determined by the playwright that create the world and atmosphere of the play for the audience’s eye.

संगीत पाँचवें तत्त्व के रूप में

संगीत लहरियों द्वारा कथोपकथन व संवाद आकर्षक बनाया जा सकता है। इसके उपयोग से परिदृश्य में मधुरता घुलमिल जाती है। प्रत्येक रंगमंच सभागार विशिष्ट शैली में संगीतात्मकता व धुन का सृजन करता है। सभी नाटकों में संगीत का होना अपरिहार्य नहीं होता है लेकिन किसी भी कृति में संगीत सुरों को शामिल किया जा सकता है। संगीत एक विशिष्ट साँचे का निर्माण कर देता है और थियेटर के भीतर क्रियाशीलता को बढ़ा देता है। संगीत के सहारे कहानी पूरी घनीभूतता के साथ आगे की ओर बढ़ती जाती है। लयात्मकता व संगीत के सहारे पात्रों की आवश्यकताओं व इच्छाओं की पूर्ति होती है जो दर्शकदीर्घा में बैठे लोगों को संबल प्रदान करती है।

दृश्य छठे तत्त्व के रूप में

रंगमंच के अन्तर्गत दृश्य विधा में प्राय: दृश्यावली के सभी अंगों का समाहार हो जाता है। जिसमें साज-सज्जा और विशेष प्रभावोत्पादकता शामिल है। दृश्य भाग में इसका नियोजन करने का अभिप्राय रंगमंचीय स्वरूप को विस्तार देना ही था। यह नाटककार का अपना सोच होता था

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