Nature of Communication pdf Notes

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Nature of Communication pdf Notes

सम्प्रेषण की प्रकृति 

सम्प्रेषण की प्रकृति के नाना रूप दृष्टिगत होते हैं। इनको प्रमुख बिन्दुओं के रूप में निम्नवत् उद्घाटित किया जा सकता है 

उचित माध्यम का चयन (Selection of Proper Media)-सम्प्रेषण के लिए किसी माध्यम का होना अत्यन्त आवश्यक है। सम्बन्धित सन्देश हेतु प्रयुक्त उचित माध्यम, सन्देश की विषय-वस्त से भी मेल खा जाता है। सन्देश के प्रसारण के लिए उचित माध्यम हो, जिससे सन्देश को स्पष्ट रूप से सम्प्रेषित किया जा सके। 

तथ्यों व अनुभवों से सम्बद्ध (Related to Facts and Experience) सम्प्रेषण की प्रकृति तथ्यपरक तथा अनुभवों के हस्तान्तरण के रूप में होती है। निश्चित का सम्प्रेषण किया जाता है। 

सतत प्रक्रिया (Regular Process)- सम्प्रेषण की क्रिया प्रारम्भ हा सतत रूप से तब तक चलती रहती है जब तक कि सम्बन्धित विषय पूण 7 बारम्बारता में विघ्न उत्पन्न नहीं होता है, अन्यथा सम्प्रेषण का उद्देश्य खण्डित हो जाएगा।

4. कला का विकसित रूप (Developed form of Art) – सम्प्रेषण द्वारा कार्य को सर्वोत्तम ढंग से प्रस्तुत किया जाता है, जो कला का मूल तत्त्व है | कला व विज्ञान दोनों के सही मिश्रण से ही सम्प्रेषण को प्रभावशाली बनाया जाता है।

5.जन्मजात प्रकृति (Nature by Birth)-सम्प्रेषण के कारण ही मानव अन्य प्राणियों से भिन्न ISS)-सम्प्रेषण की क्रिया प्रारम्भ होने के पश्चात्न्धित विषय पूर्ण न हो जाए। उसकी सम्प्रषण का उद्देश्य खण्डित हो जाएगा।

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सम्प्रेषण के प्रमुख तत्त्व 

(Main Elements of Communication)

सम्प्रेषण के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं

(1) सम्प्रेषण मानवीय विचारों एवं तथ्यों के कारण विस्तृत क्षेत्र वाला होता है। 

(2) सम्प्रेषण का अस्तित्व उसके प्रवाह, क्रम एवं अनुक्रम की शृंखला पर निर्भर करता है। सम्प्रेषण प्रक्रिया के अन्तर्गत विचारों को जन्म से लेकर उन्हें उचित माध्यम द्वारा उचित व्यक्ति तक पहुँचाने की प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है ताकि सूचनाग्राही इस प्राप्त सूचना का अनुकूल एवं प्रभावी प्रयोग कर सके। 

(3) सम्प्रेषण के अन्तर्गत सूचनाओं का संचरण एवं बोधगम्यता होती है। इसका अभिप्राय है कि प्रभावी सम्प्रेषण एक द्विमार्गी प्रक्रिया है। 

(4) सम्प्रेषण में तीन आन्तरिक परिपथ-आरोही, अवरोही व पालवीय होते हैं, जिनमें आपस में अन्तर्सम्बद्धता व क्रॉस होते हैं। 

(5) सम्प्रेषण का एक माध्यम होता है जिसके द्वारा विचारों एवं सूचनाओं को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाना होता है, चाहे वह मौखिक रूप से है या लिखित रूप से, चित्र द्वारा अथवा शारीरिक यात्रा द्वारा पहुँचाया जाए। 

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सम्प्रेषण के उद्देश्य 

(Objectives of Communication)

सही व्यक्ति को सही तरीके से, सही जगह पर, सही सूचना पहुँचाना ही सम्प्रेषण का प्रमुख उद्देश्य होता है। संक्षेप में सम्प्रेषण के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं 

कार्यों में समन्वय (Coordination in Works)-सम्प्रेषण का प्रमुख उद्देश्य संवेगों को निश्चित व्यक्ति तक सही रूप में पहँचाना होता है। इसमें सूचना, आदेश, तथ्य, सलाह आदि को प्रेषित किया जाता है। इसके लिए समस्त कार्य-कलापों में समन्वय होना आवश्यक होता है। 

नीतियों का क्रियान्वयन (Application of Policies)- क्रियान्वयन का को इस प्रकार से गठित किया जाता है कि सम्प्रेषण के उद्देश्य का क्षय न हो पाए। शीघ्र निर्णय लेने के लिए समंकों का संकलन आवश्यक क्रिया है। अतः सम्बन्धित सूचनाओं का उचित संकलन किया जाता है। 

3. प्रबन्धन कौशल में वृद्धि (Increase in Management Skill) — सम्प्रेषण का मुख्य उद्देश्य मानव-व्यवहार को सही समय पर सही रूप में समझना भी है। सम्प्रेषण के द्वारा सीखने की क्रिया पूर्णत्व को प्राप्त करती है ।

4. सही सूचनाओं का प्रेषण ( Communication of Correct Information ) – सही सूचना का प्रेषण करना ही सम्प्रेषण का प्रमुख उद्देश्य माना गया है। उचित व्यक्ति तक समुचित सन्देश पहुँचाना इसका परम लक्ष्य है। यदि सम्प्रेषण की सामग्री प्राप्तकर्त्ता तक उचित रूप में नहीं पहुँच पाती है तो सम्प्रेषण का मूल उद्देश्य ही खण्डित हो जाएगा। अधिकारियों व कर्मचारियों के मध्य सुझावों का आदान-प्रदान सम्प्रेषण के द्वारा निश्चयात्मकता को प्राप्त करता है और लक्ष्य की ओर तीव्रता से बढ़ता जाता है ।

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