Promotion of Venture and External Environment

4
3

Promotion of Venture and External Environment

Contents

उपक्रम की स्थापना तथा बाह्य वातावरण

प्रश्न 1. उपक्रम की स्थापना करते समय व्यवसायी को किन-किन महत्वपूर्ण अवस्थाओं का अध्ययन करना आवश्यक है ? विवेचना कीजिए।

What are the important factors which a businessman should consider in promotion of a venture.अथवा

ans[- “उपक्रम की स्थापना के समय उद्यमी का एकमात्र लक्ष्य उपक्रम का निर्माण करना नहीं होता वरन् उसकी सफलता एवं विस्तार को सुनिश्चित करना भी होता है।” विवेचना कीजिए।

उत्तर-उपक्रम की स्थापना एक विशिष्ट कला है जो कि उद्यमीय कौशल से परिपूर्ण विशेष व्यक्ति द्वारा की जाती है क्योंकि नये उपक्रम के प्रवर्तन के लिए व्यवस्थित, संगठित एवं सामूहिक प्रयत्नों की आवश्यकता पड़ती है इसलिए प्रोफेसर बैटी का यह कथन सत्य प्रतीत होता है, “उपक्रम की स्थापना के समय उद्यमी का एकमात्र लक्ष्य उपक्रम का निर्माण करना नहीं होता वरन् उसकी सफलता एवं विस्तार को भी सुनिश्चित करना होता है।” अतः उद्यमी का अत्यन्त सजग होना आवश्यक है। जब कोई नवीन उपक्रम स्थापित होता है तो न केवल रोजगार, उत्पादन तथा आय का सृजन होता है बल्कि यह उपक्रम समाज और राष्ट्र की निरन्तर प्रगति व विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। अत: उपक्रम की स्थापना में प्रारम्भिक व सम्भावित समस्याओं के प्रति उद्यमी का अत्यन्त सजग होना आवश्यक होता है, इसलिए यह कहा जाता है कि नवीन उपक्रम गीली मिट्टी के समान होता है, जिससे उद्यमी द्वारा उपयुक्त योजना के अनुरूत्प आकार-प्रकार प्रदान किया जाता है ।

उपक्रम की स्थापना के महत्वपूर्ण घटक या अवस्थाएँ

(Important factors of Promotion of Venture)

नवीन उपक्रम की स्थापना एवं विस्तार के लिए उद्यमी की विभिन्न महत्वपूर्ण घटकों या तत्वों को ध्यान में रखना पड़ता है एवं विभिन्न अवस्थाओं से होकर गुजरना पड़ता है। यह महत्वपूर्ण घटक निम्नलिखित हैं-

(A) व्यावसायिक विचारों की खोज-उचित व्यावसायिक विचारों अथवा अवसरों की खोज व्यावसायिक उपकम की स्थापना का महत्वपूर्ण घटक है ।व्यावसायिक प्रवर्तन का कार्य व्यावसायिक अवसरों की खोज के साथ शुरू होता है। यह विचार विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न हो सकता है, जैसे-कहानी, किसी उत्पाद विशेष की बढ़ती हुई माँग, किसी व्यापार, प्रदर्शन को प्रारम्भ करने का अथवा किसी वर्तमान व्यवसाय को अधिगृहीत करने का हो सकता है। किसी भी व्यावसायिक विचार की खोज करने में निम्नलिखित स्रोत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैंमेले या

(1) बाजारों का निरीक्षण-बाजार का सर्वेक्षण विभिन्न उत्पादों की माँग एवं पूर्ति की दशाओं को दर्शाता है। उत्पाद के सक्रिय उपभोक्ताओं के नमूने एवं माँग की प्रवृत्ति सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए। बाजार निरीक्षण के द्वारा प्रतिस्पर्द्धा एवं कीमत प्रवृत्तियों का भी बोध हो जाता है। बाजार निरीक्षण एवं उत्पाद विश्लेषण को परिपूर्ण करने के लिए पेशेवर विशेषज्ञों, जैसे-डीलर्स, बैंक प्रबन्धक, विज्ञापन एजेन्सियों, परामर्शदाताओं आदि की सहायता भी प्राप्त की जा सकती है।

(2) भावी उपभोक्ताओं से सम्बन्ध- भावी उपभोक्ताओं से सम्बन्ध यह स्वतः प्रकट करता है कि उत्पाद अथवा सेवाओं की विशेषताएँ क्या होनी चाहिए। व्यवसाय की नींव का कार्य उपभोक्ता करता है तथा उसको चलाने में उपभोक्ता की महती भूमिका होती है। अतः उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं एवं पसन्द से सम्बन्धित समंक अवश्य एकत्र किये जाने चाहिएँ।

(3) व्यापार मेले तथा प्रदर्शनियाँ राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार मेले व्यावसायिक विचार का एक उत्तम स्रोत हैं। इन मेलों में उत्पादक एवं पूर्तिकर्ता अपने उत्पादों का प्रदर्शन करते हैं। इन उत्पादों में अधिकांश उत्पाद नये होते हैं । इन मेलों में उत्पादन, क्रय सह-संगठन, डीलरशिप आदि विचारों पर सौदा एवं समझौता वार्ता होती है।

(4) विभिन्न सरकारी संस्थाएँ- विभिन्न सरकारी संस्थाएँ उद्यमियों को व्यावसायिक विचार की खोज करने में अत्यधिक सहायक सिद्ध होती हैं। विनियोग केन्द्र, राज्य औद्योगिक विकास बैंक, तकनीकी सलाह संगठन, निर्यात सम्वर्द्धन समिति आदि विभिन्न संस्थाएँ उद्यमियों को तकनीकी, वित्तीय एवं अन्य व्यावसायिक सलाह व सहायता प्रदान करती हैं। व्यापार एवं उद्योग पर प्रकाशित सरकारी प्रकाशन भी नवीन व्यावसायिक विचार खोजने में सहायक हो सकते हैं।

(5) अन्य राष्ट्रों का विकास सामान्यतः विकसित देशों के फैशन, चलन आदि का अनुसरण अविकसित देशों के लोगों द्वारा किया जाता है। अतएव एक उद्यमी एक अच्छे व्यावसायिक विचार को प्राप्त कर सकता है। यदि वह विकसित राष्ट्रों में होने वाले हाल ही के विकासों पर ध्यान रखें ।

(6) परियोजनाओं की रूपरेखा का सूक्ष्म परीक्षण-समय-समय पर विभिन्न उद्योगों व परियोजनाओं की रूपरेखा का प्रकाशन अनेकों सरकारी व निजी एजेन्सियों द्वारा किया जाता है। एक उचित व्यवसाय चुनने में ऐसी परियोजनाओं की रूपरेखा का सूक्ष्म परीक्षण अति सहायक सिद्ध हो सकता है किन्तु इस कार्य को सम्पन्न करने व सफल बनाने हेतु तकनीकी व अन्य विशेषज्ञों को नियुक्त किया जाना चाहिए।

(7) अन्य स्रोत-उपर्युक्त स्रोतों के अतिरिक्त व्यावसायिक विचारों को खोजने में अप्रयुक्त संसाधन, असन्तुष्ट माँग, नवीन आविष्कार, निम्न कोटि के उत्पाद आदि स्रोत भी सहायक सिद्ध होते हैं।

(B) विचार का विश्लेषण एवं चयन-व्यावसायिक उपक्रम की स्थापना करते समय दूसरा महत्वपूर्ण घटक विचारों का विश्लेषण एवं चयन है, जिसका ध्यान रखना आवश्यक है । विचारों के चयन से पूर्व उसका विस्तृत विश्लेषण किया जाता है, जिसको निम्नलिखित अवस्थाओं में विभक्त किया गया है

(1) विचार मूल्यांकन एवं परीक्षण-व्यावसायिक विचारों की खोज के पश्चात् उसका विश्लेषण एवं परीक्षण किया जाता है। इस हेतु निम्नांकित तथ्य महत्वपूर्ण हैं-

(i) तकनीकी सुगमता-तकनीकी सुगमता से आशय किसी उत्पाद का उत्पादन करने की सम्भावनाओं से है। इसका निर्णय मशीन, श्रम, कौशल, कच्चा माल, आवश्यक तकनीकों की उपलब्धता आदि के आधार पर किया जाता है। इसको मापने के लिए तकनीकी विशेषज्ञों की सलाह एवं सहायता भी आवश्यक हो सकती है।

(ii) वाणिज्यिक सुगमता-वाणिज्यिक सुगमता से आशय प्रस्तावित परियोजनाओं की सजीवता एवं अवसरों को आँकने के लिए बाजार दशाओं एवं प्रचलित स्थितियों के विस्तृत अध्ययन करने से है। इस अध्ययन के अन्तर्गत विभिन्न संगणनाएँ करनी होती हैं; जेसे- सम्भावित मॉग, विक्रय कीमत, उत्पादन लागत, सम-विच्छेद बिन्दु आदि ।

(2) सप्पूर्ण विश्लेषण-विचारों के प्रारम्भिक मूल्यांकन एवं परीक्षण के बाद उपयुक्त विचार का समस्त कोणों से सम्पूर्ण विश्लेषण किया जाता है। यह अवस्था काफी महत्वपूर्ण होती है क्योंकि विचार की स्वीकृति अथवा अस्वीकृति का निर्णय इसी अवस्था पर किया जाता है। प्रस्तावित परियोजना की तकनीकी सुगमता एवं आर्थिक सजीवता की पूर्ण जाँच-पड़ताल की जाती है एवं उस विचार की वित्तीय एवं प्रबन्धकीयं सुगमता का परीक्षण किया जाता है। सम्पूर्ण विश्लेषण के पश्चात् निष्कर्षों को प्रतिवेदन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

(3) उपयुक्त विचार का चुनाव- परियोजना प्रतिवेदन प्राप्त होने पर उसका विश्लेषण कर उपयुक्त विचार का चयन कर लिया जाता है । इसका चयन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई उत्पाद सरकार द्वारा प्रतिबन्धित तो नहीं है तथा किस उत्पाद के लिए अनुदान या सरकारी प्रोत्साहन उपलब्ध है? इसके साथ-साथ कौन-से उत्पाद की माँग पूर्ति से ज्यादा है व किस उत्पाद में उच्च लाभदायकता है? कौन-सा उत्पाद देश की औद्योगिक लाइसेन्सिंग नीति के अनुरूप है आदि।

(C) व्यावसायिक वातावरण की जाँच-व्यावसायिक विचार के विश्लेषण एवं चयन के पश्चात् व्यावसायिक परिदृश्य अथवा वातावरण का मूल्यांकन अपरिहार्य होता है । व्यावसायिक परिवेश अनेक आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक, राजनीतिक एवं शासकीय तत्वों का सम्मिश्रण होता है। अत: उद्यमी को आज के गतिशील प्रतिस्पर्धात्मक परिवेश में उपक्रम को स्थापित एवं संचालित करना एक महत्वपूर्ण कौशल है । उद्यमी को ग्राहकों,पूर्तिकर्ताओं,मध्यस्थों,प्रतिद्वन्द्वियों के मानसिक दृष्टिकोण एवं सरकारी नीतियों, आर्थिक तत्वों के साथ-साथ प्राकृतिक एवं भौगोलिक तत्वों के मध्य उचित तारतम्य भी स्थापित करना पड़ता है। व्यावसायिक वातावरण की उपयुक्त जाँच व्यावसायिक उपक्रम को उन्नति के पथ पर अग्रसर कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

(D) आवश्यक संसाधनों को जुटाना-उद्यमी उपक्रम को प्रारम्भ करने के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने का कार्य करता हैं । उसे आवश्यक वित्त की व्यवस्था करनी होती है, भूमि भवन, मशीनरी, प्लाण्ट, फर्नीचर, पेटेण्ट आदि खरीदने होते हैं एवं कर्मचारियों की नियुक्ति करनी होती है। इन संसाधनों को निम्न भागों में विभक्त किया गया हैं

(1) सूचनाएँ- सूचनाओं का एकत्रीकरण एक महत्वपूर्ण कार्य है। उत्पाद व सेवा की माँग का आकार एवं प्रकृति, पूर्ति की मात्रा एवं स्रोत, उत्पाद की कीमत, लागत मात्रा सम्बन्ध से सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं । तकनीकी संयन्त्र एवं मशीनों के पूर्तिकर्ताओं, आवश्यक कर्मचारियों की संख्या एवं प्रकार स्रोत, कच्चे माल के स्रोत, प्रतिस्पर्धा की प्रकृति, आवश्यक कोषों के स्रोत से विभिन्न सूचनाएँ एकत्र करना उद्यमी का कार्य है। सूचनाओं के एकत्रीकरण व उनको सुरक्षित रखने में कम्प्यूटर का उपयोग अत्यधिक सहायक होता है।

(2) धन की व्यवस्था-धन किसी भी व्यवसाय को सुदृढ़ बनाने के लिए अति-आवश्यक है। वित्त किसी भी व्यवसाय के जीवनरक्त के समान होता है। व्यवसाय में लगे वित्त को व्यवसाय को पूँजी कहा जाता है। स्थायी सम्पत्तियों में लगा वित्त ‘स्थायी पूँजी’ एवं चालू सम्पत्तियों में लगा वित्त कार्यशील पूँजी’ कहलाती है। व्यवसाय के लिए आवश्यक कोषों का अनुमान लगाने के बाद उसके स्रोतों को ढूँढना एवं स्रोतों से प्राप्त होने वाले वित्त का अनुपात सुनिश्चित करना ‘पूँजी संरचना’ कहलाता है।

(3) कर्मचारियों का प्रबन्ध-उपक्रम हेतु कर्मचारियों का चयन करना भी एक महत्वपूर्ण व परम आवश्यक कार्य है । कर्मचारी संस्था की एक महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करते हैं । कर्मचारी संस्था की न हासित होने वाली सम्पत्ति होती है। कर्मचारियों का चयन आवश्यकतानुसार किया जाना चाहिए। भर्ती के स्रोत ज्ञात करके कर्मचारियों का चयन विधिसम्मत ढंग से करना चाहिए। उद्यमी को कर्मचारियों के निष्पादन मूल्यांकन की व्यवस्था करनी चाहिए तथा उनकी सुरक्षा, कल्याण, स्वास्थ्य हेतु प्रदान की जाने वाली सुविधाओं का ध्यान रखना चाहिए । इनको उपलब्ध कराना उद्यमी का महत्वपूर्ण कर्त्तव्य है।

(E) उद्यम स्थापना-ऊपर वर्णित कार्यविधि पूर्ण हो जाने के उपरान्त व आवश्यक संसाधनों के एकत्र हो जाने के पश्चात् उपक्रम का कार्यशील ढाँचा तैयार करने की कार्यवाही की जाती है। इसे निम्नलिखित शीर्षकों से स्पष्ट किया गया है

(1) संगठन संरचना-उद्यमी अपने द्वारा चयनित विचार के अनुरूप उपक्रम का संगठन करते हैं । व्यावसायिक विचार के अनुरूप उपक्रम का आकार निर्धारित करते हैं । एकल स्वामित्व, साझेदारी संगठन, संयुक्त पूँजी वाली कम्पनी या सहकारी संगठन के रूप में वैधानिक कार्यवाही को पूर्ण कर अपने विचार को मूर्त रूप प्रदान किया जा सकता है।

(2) व्यावसायिक संगठन-उद्यमी को व्यवसाय के अनेक पहलुओं के सम्बन्ध में योजनाएँ बनानी पड़ती हैं । व्यावसाय समग्र की समग्र योजनाओं के प्रमुख अंग निम्नलिखित हैं-

 (i) उत्पाद नियोजन-उत्पाद नियोजन से आशय उत्पादित किये जाने वाले उत्पाद के सम्बन्ध में योजना बनाने से है। प्रस्तावित वस्तु के सम्बन्ध में योजना बनाते समय उद्यमी को यह पता लगाने का प्रयास करना चाहिए कि लोगों की आवश्यकताएँ क्या हैं? एवं उनके अनुरूप उत्पाद को डिजाइन करना चाहिए। उद्यमी को विशिष्ट उत्पादों के सम्बन्ध में सभी परिणामों पर मनन करना, उत्पाद के सुधार के तरीकों पर विचार करना, मितव्ययी उत्पादन पद्धति बनाना, उत्पाद के पैंकिंग, ब्राण्ड नाम आदि की योजना बनाना आदि तथ्यों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

(ii) उत्पाद नियोजन-उत्पाद हेतु योजना का मौलिक उद्देश्य सम्भव उच्चतम विनिर्माण कार्य-कुशलता के साथ उत्पादन की विभिन्न शाखाओं में पूर्व निर्धारित आपूर्ति, समय-सूची के अनुसार वस्तुओं के प्रकार और मात्रा के रूप में विक्रय संस्था की आवश्यकता को सन्तुष्ट करना है।

(iii) वित्तीय नियोजन- वित्तीय नियोजन का आशय उन सम्पत्तियों के प्रकार सम्बन्ध निर्णय लेने एवं इन सम्पत्तियों में निवेश की सीमा से है, जिनमें वित्तीय संसाधन निवेशित होते हैं। सामान्यतः उद्यमी को यह पग उठाना होता है कि वह कुल वित्त में से कम से कम पूँजी निदेशित करे व अधिकतम सामान उधार ले

(iv) कोष नियोजन-उद्यमी का महत्वपूर्ण कार्य कोषों का बुद्धिमत्तापूर्वक सदुपयोग करना होता है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में उद्यमी को फण्ड निवेश के सम्बन्ध में वैज्ञानिक ढंग से सोचना होता है । उद्यम के आकार एवं सूचना प्रौद्योगिकी का ज्ञान तथा धन एकत्रीकरण एवं व्यय सम्बन्धी जानकारी आवश्यक होती है।

(v) लाभ नियोजन-लाभ नियोजन उत्पादन लाइन के चयन में मूल्य निर्धारण, लागत तथा उत्पादन परिमाण की ओर संकेत करता है अतएव लाभ नियोजन, निवेश एवं वित्त सम्बन्धी निर्णय की एक पूर्वापेक्षा है।

(vi) विपणन नियोजन-विपणन नियोजन उपक्रम के समग्र नियोजन का एक भाग है। इसके अन्तर्गत निम्न घटकों के सम्बन्ध में निर्णय लेने होते हैं-

(a) कीमत नियोजन-उद्यमी के द्वारा उत्पाद का प्रथम बार मूल्य निर्धारण करना एक समस्या के समान होता है। कीमत-निर्धारण करते समय उत्पादन की सम्भावित माँग, माँग (लोच) के सन्दर्भ में मूल्य, लक्ष्य समूह एवं उसकी क्रय-शक्ति, प्रचार की नीति एवं विक्रय पद्धति व उनके व्ययों को ध्यान में रखना चाहिए।

(b) वितरण नियोजन-उद्यमी को उत्पादन के वितरण हेतु उपयुक्त माध्यम का चुनाव करते समय नेटवर्क पर ध्यान देना चाहिए। वितरण की कड़ी जितनी छोटी होती है, नियन्त्रण उतना ही प्रभावी होता है। वितरण पद्धति बाजार पहुँच के साथ मितव्ययी होनी चाहिए।

(c) विक्रय सम्वर्द्धन-वस्तुओं के सफल विक्रय के लिए कुशल विक्रेताओं की भर्ती करनी चाहिए तथा सम्वर्द्धन के विभिन्न माध्यमों जैसे-विज्ञापन एवं बिक्री बढ़ाने के अन्य उपायों पर विचार करना चाहिए। इसके साथ-साथ विज्ञापन माध्यम, बजट एवं समयावधि आदि पर भी विचार करना चाहिए।

प्रश्न 2. आन्तरिक एवं बाह्य वातावरण से क्या अभिप्राय है? यह किस प्रकार किसी विशेष उद्योग को प्रभावित करता है?

What is meant by internal and external environment? How does it effect a particular indusry?

उत्तर-चुनौतियों को स्वीकार करते हुए स्वयं रोजगार के लिए नये उद्यम विकसित करने की क्रिया को उद्यमिता कहते हैं। उद्योगों एवं उद्यमियों के विकास में व्यावसायिक पर्यावरण का महत्वपूर्ण योगदान होता है । उद्योग एवं व्यावसायिक वातावरण एक दूसरे से अर्न्तसम्बन्धित होते हैं । व्यावसायिक पर्यावरण का एक ऐसा भी पक्ष है, जो उद्यमी के नियन्त्रण में नहीं है,

व्यवसाय का सूक्ष्म पर्यावरण

(Micro Environment of Business)

व्यवसाय के सूक्ष्म पर्यावरण के अन्तर्गत उन सभी घटकों को शामिल किया जाता है, जो व्यावसायिक उद्यम के निकटतम वातावरण से सम्बन्धित होते हैं तथा ग्राहकों की सेवा करने में उद्यमी की योग्यता को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं-

(1) ग्राहक-व्यवसाय मे गाहक का एक महत्वपूर्ण स्थान होता है। उद्यमी का एक प्रमुख कार्य ग्राहकों का आकृष्ट करके सन्तुष्ट करना होता है। व्यावसायिक उपक्रम के ग्राहक अनेक प्रकार के होते हैं, जैसे-व्यक्ति, थोक विक्रेता, फुटवर विक्रेता, जमाकर्ता, लोक संस्थाएँ, सरकार आदि।

(2) पूर्तिकत्ता-सूक्ष्म पर्यावरण को प्रभावित करने वाला दूसरा महत्वपूर्ण घटक पूर्तिकर्ता है। व्यावसायिक उद्यमियों का कार्य है आदाय को प्रदाय में बदलना। अतः यह आवश्यक होता है कि आदाय की पूर्ति नियमित रूप से तथा उचित कीमतों पर होती रहे ।

(3) प्रतिस्पर्द्धा-बाजार की संरचना के अनुसार एक उद्योग में अनेक फर्मे हो सकती हैं या केवल एक । ऐसी फर्मों के मध्य अनेक प्रकार की प्रतियोगिता होती हैं, जैसे–प्रजातिगत या बाण्ड से लेकर । इस प्रकार की प्रतियोगिताओं का सामना उद्यमों को करना पड़ता है, जो किसी एक फर्म के निचत्रण में नहीं है।

(4) जनता-जनता से आशय एक ऐसे समूह से है, जिसे उद्यमी की सफलता में अपना टाभ दिखता है या जित्तको गतिविधियों का प्रभाव उद्यम की कार्यवाही पर पड़ता है। सामान्य जनता ग्राहक संघ, सरकार वित्तीय संस्थाएँ कर्मचारीगण, मीडिया के लोगों आदि को इस समूह के अन्तर्गत रखा जा सकता है।

(5) बाजार के माध्यम-प्रत्येक उद्यमी को अपनी उत्पादित वस्तुओं को बेचने के लिए मध्यस्यों की आवश्यकता होती है। ऐसे मध्यस्थ एजेण्ट या व्यापारी हो सकते हैं, जो उत्पाद का बाजार में बेचने के लिए विज्ञापन, रेडियो, टी. वी. तथा विभिन्न आधुनिक संचार माध्यमों का सहारा ले सकते हैं।

व्यवसाय का व्यापक पर्यावरण

(Macro Environment of Business)

व्यवसाय के व्यापक, पर्यावरण या समष्टि पर्यावरण में उन घटकों की विवेचना की जाती हे जिनकः नियन्त्रण किसी एक व्यवसाय के अन्तर्गत नहीं होता है । इन घटकों को दो रूपों में विभक्त किया जा सकता है- आर्थिक तथा अनार्थिक । अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से इन्हें निम्न शीपका के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है

(1) आर्थिक पर्यावरण-उद्यमिता विकास में आर्थिक पर्यावरण का अनूठा महत्व माना जाता है : अनुकुल आर्थिक पर्यावरण उद्यम के विकास में सहायक सिद्ध होता है जबकि प्रतिकूल आर्थिक पर्यावरण उद्यमों के विकास को कुण्ठित कर देता है। आर्थिक पर्यावरण के अर्न्तगत औद्योगिक नीति, विदेशी विनिमय नीति, बैंकिंग नीति, लाइसेन्स नीति, बचत एवं निवेश नीति आदि को शामिल किया जाता है।

(2) सामाजिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण-उद्यम समाज का एक अंग है और समाज का मानवीय सस्था है, जिसका सम्बन्ध उन सभी व्यक्तियों से है जो इसमें रहते हैं। सांस्कृतिक पर्यावरण का सम्बन्ध रीति-रिवाज, खान-पान आदि से है। अत: सांस्कृतिक पर्यावरण को सामाजिक पर्यावरण का ही अंग माना जाता है। सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण आर्थिक विकास को प्रभावित करता है।

(3) भौतिक पर्यावरण-भौतिक पर्यावरण में देश के प्राकृतिक साधन, उनका वितरण, भूमि की उपजाऊ शक्ति, जलवायु, जंगल खनिज आदि को सम्मिलित किया गया है। भौगोलिक पर्यावरण किसी देश की आर्थिक विकास का प्रमुख निर्धारक घटक है । व्यावसायिक उन्नति के लिए भौतिक वातावरण के साथ पूँजी, श्रम, तकनीक, प्रबन्धकीय अनुभव के महत्व को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता है।

(4) राजनीतिक व विधि पर्यावरण-व्यावसाय तथा राजनीतिक पर्यावरण में घनिष्ठ सम्बन्ध है। आर्थर लेविस का कहना है कि, “सरकार का व्यवहार आर्थिक क्रियाओं को प्रोत्साहन एवं हतोत्साहन में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।” राजनीतिक तथा विधि के अन्तर्गत ही सरकार व उसका व्यवहार आ जाता है। राजनीतिक एवं विधि पर्यावरण समाज के आर्थिक एवं सामाजिक लक्ष्यों, विचारधाराओं तथा मूल्यों के आधार पर निर्मित होता है । व्यावसायिक उन्नति के लिए राजनीतिक स्थिरता होना एक महत्वपूर्ण घटक है।

(5) तकनीकी पर्यावरण-तकनीकी पर्यावरण के अन्तर्गत प्रौद्योगिकी विकास, यान्त्रिकी, आणविक शक्ति, वैज्ञानिक शोध, नव-प्रवर्तन आदि को शामिल किया जाता है। आधुनिक युग सूचना तकनीक का युग है। नित नये-नये आविष्कार हो रहे हैं। आधुनिक संचार तन्त्र के युग में जो इसके अनुरूप स्वयं को नहीं ढाल सकता, वह विकास की दौड़ में पिछड़ जाता है। अतः तकनीकी पर्यावरण उद्यमीय विकास की गति को प्रभावित करता है।

(6) अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण-अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य का सम्बन्ध विदेश नीति, प्रतिरक्षा नीति, विदेशी विनिमय नीति, अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों, विदेशी आर्थिक मन्दी, संरक्षण नीति आदि से है। अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य स्थिर नहीं है; यह हमेशा बदलता रहता है। इस बदलाव के साथ व्यावसायिक उद्यमों को भी बदलना तथा समायोजन करना है।

उपरोक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि प्रत्येक उद्यम की सफलता उसके व्यावसायिक वातावरण पर निर्भर करती है तथा बाह्य वातावरण का प्रभाव किसी भी उद्यम पर अवश्य पड़ता है। अतः उद्यमी योजनाएँ पर्यावरण के अनुरूप आधारित की जानी चाहिएँ । वातावरण ही उद्यमी गतिविधि को दिशा दिखाता है। बाह्य पर्यावरण का उद्यमिता के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है।

प्रश्न 3. संयन्त्र विन्यास से आप क्या समझते हैं ? संयन्त्र विन्यास को प्रभावित करने वाले घटकों को स्पष्ट कीजिए।

What do you mean by Plant Layout ? Explain the factor affecting plant layout ?

अथवा

संयन्त्र विन्यास क्या है? एक अच्छे संयन्त्र विन्यास की विशेषताएँ बताइये तथा संयन्त्र विन्यास के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।

What is Plant layout? Point out the Characteristics of an ideal Plant layout and explain the principles of an ideal plant layout.

संयन्त्र अभिन्यास(Plant Layout)

संयन्त्र विन्यास किसी कारखाने में मशीनों प्रक्रियाओं तथा संयन्त्र सेवाओं को स्थापित करने की एक ऐसी तकनीक है जिससे कि न्यूनतम सम्भव कुल उत्पादन लागत पर उच्च किस्म का अधिकतम उत्पादन किया जा सके। मूरे के अनुसार, “यन्त्रों एवं सुविधाओं की हर व्यवस्था सन्यन्त्र विन्यास से है।”

एक अच्छे सन्यन्त्र विन्यास की विशेषताएँ

(Characteristics of an ideal plant layout)

(1) सामग्री का प्रवाह निरन्तर बिना बाधा के होता रहे ।

(2) आन्तरिक परिवहन कम से कम हो ।

(3) स्थान का अधिकतम उपयोग।

(4) माल, मानव व मशीन के बीच उपयुक्त समन्वय होता है।

(5) श्रमिकों की पहुँच मशीनों तक आसान बनी रहे ।

(6) मशीनों के बीच पर्याप्त बिना बाधा के होता रहे।

(7) पर्याप्त लोच हो।

(8) साधनों का सर्वोत्तम उपयोग सम्भव हो सके।

(9) श्रमिकों को सुरक्षा की गारण्टी होती रहे ।

सन्यन्त्र विन्यास के सिद्धान्त

(Principles of Plant Layout)

एक श्रेष्ठ सन्यन्त्र विन्यास निम्न सिद्धान्तों पर आधारित होना चाहिए-

(1) उपलब्ध स्थान के अधिकतम उपयोग का सिद्धान्त (Principal of Maximum utilization of Space)-संयन्त्र स्थान तथा भवन में उद्यमी का सर्वाधिक पूँजी विनियोजन होता है। अतः संयन्त्र विन्यास ऐसा होना चाहिए जो भूमि व भवन का मितव्ययी व प्रभावी उपयोग कर सके।

 (2) साधनों के अधिकतम उपयोग का सिद्धान्त (Principal of Maximum utilization of Resources) इस सिद्धान्त के अन्तर्गत संयन्त्र विन्यास ऐसा होना चाहिए कि मशीनें बेकार न पड़ी रहें,कच्चे माल के आन्तरिक परिवहन में बाधा न आये एवं अर्ध-निर्मित माल एक ही स्थान पर एकत्रित न हो सके।

(3) कर्मचारी सन्तुष्टि तथा सुरक्षा का सिद्धान्त (Principal of Workers Statisfaction and Safety)-इस सिद्धान्त के अनुसार श्रम की उत्पादकता उसकी सन्तुष्टि पर निर्भर है। अत: संयन्त्र विन्यास ऐसा हो जोकि श्रमिकों की सन्तुष्टि व सुरक्षा की गारण्टी दे जिससे वे निश्चित होकर निष्ठा के साथ कार्य कर सकें।

(4) श्रम के अधिकतम उपयोग का सिद्धान्त (Principal of Maximum utilization of Labour)-श्रम लागत उत्पाद लागत का एक बहुत बड़ा भाग होती है। अतः संयन्त्र विन्यास इस तरीके से होना चाहिए कि श्रमिक खाली न रहे, उन्हें अनावश्यक एक कार्य-स्थान से दूसरे कार्य-स्थान तक चक्कर न लगाने पड़े।

(5) न्यूनतम आन्तरिक परिवहन का सिद्धान्त (Principal of Minimum Internal Transportation)-इस सिद्धान्त के अन्तर्गत संयन्त्र इस तरीके से स्थापित किये जाने चाहिए कि संयन्त्र एक दूसरे से अधिक दूर न हों जिससे आंतरिक परिवहन न्यूनतम हो सके ।

(6) न्यूनतम मशीनी हस्तक्षेप का सिद्धान्त (Principal of Minimum mechanical Interruption)-वर्तमान समय में बड़ी-बड़ी मशीनों का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जाने लगा है। अतः संयन्त्र विन्यास इस तरीके से किया जाना चाहिए कि मशीनों के शोर, कम्पन, गैस एवं धूल आदि के प्रभावों से श्रमिकों को बचाया जा सके ।

(7) उचित प्रवाह एवं सन्तुलन का सिद्धान्त (Principal of Proper flow and Balance)–संयन्त्र विन्यास इस प्रकार का होना चाहिए कि मशीनें एक सतत प्रवाह में कार्य करती रहें तथा अन्य क्रियाओं से कार्य प्रवाह में रुकावट उत्पन्न न हो

(8) लोच का सिद्धान्त (Principal of Flexibility) कोई भी संयन्त्र विन्यास अपने में परिपूर्ण व अन्तिम नहीं होता। अतः संयन्त्र विन्यास योजना इस प्रकार बनायी जानी चाहिए कि भविष्य में संयन्त्र के विस्तार व आधुनिकीकरण की दशा में न्यूनतम व्यय पर ही आवश्यक समायोजन किया जा सके।

(9) कुशल पर्यवेक्षण एवं नियन्त्रण का सिद्धान्त (Principal of skilled.supervision and control)-इस सिद्धान्त के अनुसार संयन्त्र विन्यास ऐसा होना चाहिए जिससे व्यक्तियों, संसाधनों व विभागों पर कुशल नियन्त्रण रखा जा सके।

(10) समन्वय का सिद्धान्त (Principal of Co-ordination)-इस सिद्धान्त के अनुसार संयन्त्र विन्यास ऐसा होना चाहिये जो माल, मशीन व उत्पादन प्रक्रियाओं के बीच अधिकतम समन्वय स्थापित करने में सक्षम हो।

 संयन्त्र विन्यास के लाभ अथवा महत्त्व या उद्देश्य

(Object, advantages or importance of Plant Layout)

श्रेष्ठ संयन्त्र विन्यास के निम्न लाभ हैं-

(1) उपलब्ध स्थान का पूर्ण उपयोग सम्भव हो जाता है।

(2) जोखिमों में कमी की जा सकती है।

(3) साधनों का समुचित उपयोग होता है।

(4) सामग्री का न्यूनतम आन्तरिक परिवहन होता है।

(5) उत्पादन प्रक्रिया सन्तुलित होती हैं।

(6) लोचशीलता बनी रहती है।

(7) कर्मचारी मनोबल में वृद्धि होती है।

संयन्त्र विन्यास को प्रभावित करने वाले घटक

(Factors Affecting the Plant Layout)

किसी औद्योगिक संस्था की सेवा में लगे संयन्त्रों, उपकरणों कर्मचारियों एवं मशीनों के बीच भौतिक सम्बन्ध जिन तत्वों से प्रभावित होते हैं उन्हें संयन्त्र अभिन्यास के तत्व या घटक कहते हैं। ये तत्व या घटक निम्नलिखित हैं-

(1) उद्योग व उत्पादन की प्रकृति ।

(2) क्रियाओं का क्रम ।

(3) स्थान की आवश्यकता।

(4) निर्माण की जाने वाली वस्तुओं की किस्म ।

(5) न्यूनतम हिलना डुलना।

(6) उतपादन की मात्रा।

(7) भूमि की उपलब्धता।

(8) मशीनों को क्रम में अथवा समूह में रखा जाना।

लघु उत्तरीय प्रश्न

(Short Answer Type Questions)

प्रश्न 1. राष्ट्रीय पर्यावरण (वातावरण) नीति के उद्देश्य बताइये। Discuss the objective of National Environment Policy.

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति

(National Environmental Policy)

पर्यावरण भौतिक, रासायनिक, जैविक एवं सामाजिक अन्तः क्रियाओं का एक जटिल और गतिशील मिश्रण है। जीवन अपने अस्तित्व तथा निरन्तर विकास के लिए इसी पर्यावरण पर निर्भर रहता है

किसी भी प्रकार के जीवन की गुणवत्ता उसके चारों ओर स्थित पर्यावरण की गुणवत्ता से जुड़ी हुई है। अपनी जरूरतों और महत्वाकांक्षाओं को संतुष्ट करने के लिए मनुष्य लगातार अपने वातावरण और पर्यावरण को परिवर्तित करता है । बढ़ती हुई जनसंख्या और तकनीकी प्रगति का दबाव कई बार पर्यावरण में अवांछनीय और अनुक्रमणीय (Irreversible changes) करने लगता है, जिसे वापस मूल रूप में लौटाया नहीं जा सकता। इसीलिए मनुष्य के अस्तित्व को बचाने के लिए आवश्यक हो जाता है कि पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए उसका विकास किया जाये ।

इसलिए अब यह आवश्यक हो गया है कि पर्यावरण की carrying capacity तथा भावी विकल्पों को नजरअंदाज किये बिना बढ़ती जनसंख्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय पर्यावरण नीति (National environmental policy) यह सुनिश्चित करे कि प्राकृतिक, मानव निर्मित तथा मानव संसाधन का विधिसम्मत इस्तेमाल हो सके । इसीलिए भारत सरकार ने निर्णय लिया है कि राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के उद्देश्य इस प्रकार होंगे

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति के उद्देश्य

(Objectives of National Environmental Policy)

(1) एक सुरक्षित, स्वस्थ, उत्पादक तथा सौन्दर्य बोध को संतुष्ट करने वाले पर्यावरण को सुरक्षित एवं विकसित करना।

(2) आजकल किसी नए उद्योग या उद्यम को लगाने से पहले उससे पर्यावरण पर पड़ सकने वाले प्रभाव का पूर्व निर्धारण (Environmental Impact Assessment) आवश्यक होता है। इसीलिए राष्ट्रीय पर्यावरण नीति की यह अपेक्षा रहती है कि पर्यावरण प्रभाव निर्धारण को ध्यान में रखते हुए विकास की योजनायें पारिस्थितिकी के सिद्धान्तों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करके बनायी जायें एवं पर्यावरण के विनाश से बचाव के सुरक्षा उपायों (Safeguards) को सम्मिलित किया जाये।

(3) ग्रामीण और शहरी रिहाइश को इस प्रकार उच्चस्तरित, विकसित तथा प्रबन्धित करना जिससे कि जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो ।

(4) जन्तुओं एवं पौधों की जैविक विविधता को बचाये रखने के लिए उनके स्थायी आवासों-जंगल, नदी, पहाड़ चारागाह, रेगिस्तान, झील आदि को उसी रूप में बचाये रखने के लिए तीन प्रकार के सुरक्षित स्थान निर्मित किये गये हैं

(i) अभयारण्य (Sanctuary)- इस हिस्से में पाये जाने वाले Fauna अर्थात् सभी जन्तु संरक्षित होते हैं और किसी भी जन्तु के शिकार पर प्रतिबन्ध रहता है। चरने (Grazing) पर प्रतिबन्ध नहीं है।

(ii) राष्ट्रीय उद्यान (National Park)- राष्ट्रीय उद्यान में पाये जाने वाले जन्तु (Fauna) तथा पौधे (Flora) दोनों के शिकार और विनाश पर पूर्ण प्रतिबन्ध है । यहां बकरी या गाय-भैंस के घास चरने या लकड़ी काटकर लाने पर भी प्रतिबन्ध रहता है। पकड़े जाने पर पांच हजार रुपये का जुर्माना या छ: महीने का कारावास (जमानत न हो सकने वाले वारण्ट के साथ) या दोनों सजाएँ एक साथ दी जा सकती हैं।

(iii) Biosphere Reserve-इस प्रकार के तेरह क्षेत्र भारत में तथा सम्पूर्ण विश्व में चौरासी क्षेत्र बनाये गये हैं, इन क्षेत्रों में जन्तुओं और पौधों के अलावा मिट्टी, पानी आदि अजीव घटक का विनाश भी प्रतिबन्धित है अर्थात् ऐसे क्षेत्र की मिट्टी या पानी भी आप नहीं ला सकते, इस प्रकार सम्पूर्ण पारितंत्र (Ecosystem) संरक्षित रहता है ।

(5) पर्यावरणीय मान्यताओं का विकास करना तथा सम्बन्धित जानकारियों के इकट्ठा करने, प्रचार और प्रसार तथा देखभाल की सशक्त तथा प्रभावशाली विधि स्थापित करना।

(6) पर्यावरण की सुरक्षा तकनीकियों को प्रोत्साहित किया जाये, संसाधनों का पुनः चक्रीयकरण किया जाये और बचे हुए अपशिष्टों (Wastes) का यथासंभव अन्य उत्पादक कार्यों में इस्तेमाल किया जाये।

(7) राष्ट्र के समुद्र तटवर्ती हिस्सों के पर्यावरण के आर्थिक हितों को संरक्षित करना । (8) पर्यावरण विज्ञान के क्षेत्र में शोध एवं अनुसंधान को प्रोत्साहित करना तथा पर्यावरण के संरक्षण तथा सुधार हेतु तकनीकी और सामाजिक परीक्षणों को बढ़ावा देना।

(9) सभी स्तर पर पर्यावरण की शिक्षा को प्रोत्साहित करना तथा सामान्य जन में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरुकता पैदा करना।

(10) देश में पारिस्थितिकीविद्, पर्यावरण विद् तथा उच्चकोटि के वैज्ञानिक, नीति निर्माता तथा प्रबन्धक आदि मानव संसाधन को विकसित करना तथा राष्ट्र के विकास हेतु उनके योगदान को प्रतिष्ठा तथा सम्मान प्रदान करना।

(11) पुरातत्व एवं सांस्कृतिक महत्व की इमारतों, उनके पर्यावरण तथा लैण्डरकेप के परिदृश्य को संरक्षित करना ।

प्रश्न 2. बाह्य वातावरणीय छानबीन एवं विश्लेषण की तकनीकों को समझाइये। Explain the various techniques for Environment search and Analysis.

वातावरणीय छानबीन एवं विश्लेषण की तकनीकें

(Technique for Environment Search and Analysis)

वातावरण विश्लेषण के मध्यन्तर व्यूहरचना नियोजनकर्ता निम्नलिखित विधियों का प्रयोग कर सकता है-

(1) सूचना एकत्रित करना (Information gathering)-किसी भी उद्यमी का अस्तित्व एवं विकास इस बात पर निर्भर होता है कि वह वातावरण के साथ कितना समायोजन कर पाता है। इसके लिए उसे सभी वातावरणीय घटकों की विस्तृत सूचनाएँ एकत्रित करनी होती हैं। एक उद्यम जिसकी व्यूहरचना वातावरणीय आवश्यकताओं के अनुरूप होती है,वह ज्यादा सफल कहा जाता है । इतना ही नहीं, उद्यम के विकास पतन या अन्य दीर्घकालीन परिवर्तनों का प्रमुख कारण वातावरणीय घटकों में निहित होता है, न कि आन्तरिक विकास के घटकों में। सूचनायें मौखिक तथा लिखित दोनों रूपों में एकत्रित की जाती हैं।

(2) भेद लगाना या जासूसी (Spying)-उद्योग जगत में सूचनाओं को एकत्रित करने की यह भी एक महत्वपूर्ण विधि है, जिसका प्रयोग प्रायः प्रतिस्पर्धियों से सम्बद्ध सूचनाओं को ज्ञात करने हेतु किया जाता है। अनेक बड़े उद्यमों में उच्च अधिशासी अन्य उद्यमियों के गोपनीय रहस्य एवं अन्य सूचनाएँ ज्ञात करने हेतु चयनित विशेषज्ञों एवं व्यक्तियों की नियुक्ति करते हैं। यह जासूस प्रतिस्पर्धा संस्था का कोई कर्मचारी, पूर्तिकर्ता, ग्राहक या कोई पेशेवर जासूस हो सकता है।

(3) पूर्वानुमान (Fore Casting)-सूचना एकत्रित करने का एक महत्वपूर्ण तरीका पूर्वानुमान होता है। अनेक संस्थाएँ, कम्पनी एवं उद्योग से सम्बन्धित भावी बातों के बारे में औपचारिक पूर्वानुमान तैयार करती है। यह पूर्वानुमान कम्पनी को प्रभावित करने वाले किसी विशेष मुद्दे पर केन्द्रित हो सकता है या सामान्य बातों के सन्दर्भ में हो सकता है।

(4) बाजार सर्वेक्षण (Market Survey)- गहन बाजार सर्वेक्षण के द्वारा उद्यमी बाजार में विकसित हो रही सभी प्रवृत्तियों एवं चुनौतियों के साथ उपयुक्त अवसरों को जान सकता है तथा उपभोक्ता की आवश्यकताओं एवं इच्छाओं की दृष्टि से किसी उद्यम के सम्बन्ध में उपयुक्त एवं इच्छाओं की दृष्टि से किसी उद्यम के सम्बन्ध में उपयुक्त निर्णय ले सकता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here