Arab’s Conquest on Sindh

अरबों द्वारा सिन्ध की विजय (Arab’s Conquest on Sindh)

डॉ० ईश्वरीप्रसाद ने लिखा है, “सिन्ध पर मुहम्मद-बिन-कासिम का आक्रमण इतिहास की एक रोमांचकारी घटना है।’

मुहम्मद साहब की मृत्यु के पश्चात् 100 वर्ष के अन्दर ही खलीफाओं ने तलवार के बल पर इस्लाम धर्म का प्रचार सीरिया, मेसोपोटामिया, ईरान, अफगानिस्तान, बिलोचिस्तान, ट्रांसऑक्सियाना, दक्षिणी फ्रांस, पुर्तगाल, मिस्र और अफ्रीका के सम्पूर्ण उत्तरी तट पर कर दिया। अरबों के आक्रमण के समय भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर तीन हिन्दू राज्य थे-उत्तर में कपिशा (काबुल), दक्षिण में सिन्ध और इन दोनों के बीच में साओकूट (साओली)। अरबों का भारत पर सबसे पहला आक्रमण 636-637 ई० में खलीफा उमर के शासनकाल में ‘उमन’ नामक स्थान पर हुआ। 643-644 ई० के बीच उम्मैद खलीफाओं ने भारत पर आक्रमण किया परन्तु इन आक्रमणों के द्वारा भारत में अरबवासी अपने राज्य स्थापित करने में विफल रहे। 711 ई० में अरबों ने मुहम्मद-बिन-कासिम के नेतृत्व में सिन्ध पर आक्रमण किया। यह आक्रमण भारत के मुस्लिम इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है।

अरबों के सिन्ध पर आक्रमण के कारण (Causes of the Invasion of Arb’s on Sindh)

विभिन्न विद्वानों ने अरबों के सिन्ध पर आक्रमण के अनेक कारण बताए हैं, जिनमें प्रमुख कारणों का वर्णन निम्नवत् है-

(1) अरबों का सेनापति एक वीर योद्धा था और उसका उद्देश्य भारत को जीतकर अरब साम्राज्य का विस्तार करना था।

(2) भारत की अतुल धन-सम्पत्ति ने भी मुहम्मद-बिन-कासिम को भारत पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया।

(3) धार्मिक उत्साह अरबों के आक्रमण का एक प्रमुख कारण रहा।

(4) अरब आक्रमण का तात्कालिक कारण यह था कि आठवीं शताब्दी श्रीलंका के राजा ने उपहार से भरे हुए कुछ जहाज इराक के गवर्नर हज्जाज के लिए भेजे, परन्तु इन जहाजों को सिन्ध के बन्दरगाह देवल के निकट कुछ समुद्री डाकुओं ने लूट लिया। उस समय सिन्ध और मुल्तान का शासक राजा दाहिर था। हज्जाज ने जब राजा दाहिर से क्षतिपूर्ति देने के लिए कहा, तो दाहिर ने उत्तर दिया कि यह डाकू मेरे अधीन नहीं हैं। इस पर हज्जाज ने 711 ई० में उबेदुल्लाह के नेतृत्व में सिन्ध पर आक्रमण के लिए एक सेना भेजी, जो परास्त हो गई। तब उसने अपने नवयुवक भतीजे और दामाद मुहम्मद-बिन-कासिम को, जिसकी आयु उस समय केवल सत्रह वर्ष की ही थी, एक सेना के साथ सिन्ध पर आक्रमण करने के लिए

अरबों की सिन्ध विजय (Arab’s Conquest of Sindh)

मुहम्मद-बिन-कासिम एक कुशल सेनापति था। वह 712 ई० में मकरान (बलूचिस्तान) के मार्ग से भारत में प्रविष्ट हुआ। उसने भारत में प्रवेश करते ही देवल नगर को जीत लिया। फिर वह सिन्ध को पार करके आगे बढ़ा। इसी समय सिन्ध के कुछ देशद्रोही और राजा दाहिर की एक रानी उससे मिल गए, जिससे उसका कार्य काफी सरल हो गया। उसने नीरून, सेहवान, सीसम और रावर को जीत कर ब्राह्मणाबाद का घेरा डाल दिया। 20 जून, 712 ई० को ब्राह्मणाबाद में दोनों सेनाओं के मध्य भीषण युद्ध हुआ, दाहिर पराजित हुआ और में मारा गया। का सामना

युद्ध दाहिर की विधवा महारानी ने दुर्ग का आश्रय लेकर बड़ी वीरता से मुसलमानों किया, परन्तु जब सफलता की कोई आशा न रही, तो वह अपने सतीत्व की रक्षा के लिए बहुत-सी स्त्रियों के साथ अग्नि में जलकर मर गई। ब्राह्मणाबाद पर विजय प्राप्त करने के बाद उसने अरोर पर विजय प्राप्त की। 713 ई० में मुहम्मद-बिन-कासिम ने मुल्तान पर अधिकार कर लिया लेकिन मुहम्मद-बिन-कासिम का अन्त बहुत ही दु:खद रहा।

अरबों की सफलता के कारण (Causes of the Success of Arab’s)

सिन्ध पर अरबों की विजय तथा उनकी सफलता के अनेक कारण बताए जाते हैं। सिन्धवासियों का सामाजिक भेदभाव, राजा दाहिर की अलोकप्रियता, सिन्ध की उत्तरी भारत से पृथकता, सिन्ध के लोगों का अन्धविश्वास, अरबों का धार्मिक उत्साह, अरब सैनिकों की अधिक संख्या, अरबों की रणकुशलता, मकरान से सहायता, दाहिर की सेना का विश्वासघात, दाहिर की भूलें और मुहम्मद-बिन-कासिम का आकर्षक व्यक्तित्व आदि के कारण अरबों ने सिन्ध पर सफलतापूर्वक विजय प्राप्त कर ली थी।

अरब आक्रमण के परिणाम या प्रभाव (Effects or Results of Arab’s Invasion)

लेनपूल के शब्दों में, “भारत और इस्लाम के इतिहास में अरबों द्वारा सिन्ध विजय किया जाना एक घटना मात्र थी।” सिन्ध पर अरबों की विजय के निम्नलिखित प्रभाव पड़े-

(1) अनेक हिन्दू, जजिया कर से बचने के लिए मुसलमान बन गए, जिससे सिन्ध सदैव के लिए एक मुस्लिम बहुसंख्यक प्रान्त बन गया।

(2) बगदाद के खलीफा ने अनेक भारतीय विद्वानों को अपने यहाँ बुलाया जिन्होंने भारतीय दर्शन, ज्योतिष आदि के संस्कृत ग्रन्थों का अरबी भाषा में अनुवाद किया।

(3) अनेक भारतीय वैद्य भी बगदाद के अस्पतालों में नियुक्त किए गए।

(4) अरबों ने हिन्दुओं से राज्य प्रबन्ध से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त की।

(5) इसी प्रकार, अरबों ने भारतीय दर्शन, ज्योतिष, वैद्यक’, गणित आदि का अध्ययन किया और उन्होंने यूरोप पहुँचकर इस ज्ञान का प्रसार किया।

(6) अरबों की विजय ने ही भारत में इस्लाम के प्रसार का सूत्रपात किया। अपने आक्रमण के उपरान्त मुहम्मद-बिन-कासिम ने ही सर्वप्रथम हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया था।

निष्कर्ष हैवेल ने ठीक ही लिखा है, “इस्लाम के प्रारम्भिक प्रभाव ग्रहण करने योग्य वर्षों में यूनान की अपेक्षा भारत ने ही अरबों को शिक्षित किया, उनकी दार्शनिक भावनाओं एवं धार्मिक आदर्शों का निर्माण किया और साथ ही साहित्य, कला और स्थापत्य के क्षेत्र में उनकी अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित किया।”

भारत की राजनीतिक दशा (Political Condition of Northern India)

सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् भारत की राजनीतिक एकता छिन्न-भिन्न हो गई। राजपूत काल के विभिन्न राजाओं ने शान-शौकत और दिखावे को अधिक महत्त्व दिया और उस युग में कोई भी ऐसा सम्राट नहीं हुआ जो समस्त उत्तरी भारत की राजनीतिक एकता को एक सूत्र में बाँध सकता। यहाँ हम तुर्कों के आक्रमण से पूर्व की उत्तरी भारत की राजनीतिक स्थिति पर संक्षेप में प्रकाश डालेंगे-

(1) कश्मीर-कश्मीर पर मौर्यों और कुषाणों ने राज्य किया था। छठी शताब्दी में हूण सरदार मिहिरकुल ने यहाँ अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। 9वीं शताब्दी तक यहाँ कार्कोट-वंश का शासन रहा। तत्पश्चात् वहाँ उत्पल-वंश का शासन स्थापित हुआ। इस वंश में अवन्तिवर्मन और शंकरवर्मन नामक दो महान् शासक हुए। सन् 1339 ई० के लगभग शाहमीर नामक एक स्थानीय मुसलमान ने कश्मीर में अपना शासन स्थापित कर लिया।

(2) नेपाल–सातवीं शताब्दी में नेपाल तिब्बत राज्य के अधीन हो गया था, परन्तु आठवीं शताब्दी में पुन: स्वतन्त्र हो गया। हर्ष के समय में यह अंशुवर्मन के अधीन था। सन् 879 ई० में यहाँ एक नए राजवंश की स्थापना हुई जिसका राज्य काफी समय तक रहा। प्रो० एस० आर० शर्मा के अनुसार नेपाल पर मुसलमानों का पहला आक्रमण 14वीं शताब्दी में तुगलक सुल्तानों के समय हुआ, जिसके फलस्वरूप मुसलमानों ने नेपाल के तिरहुत नामक कर दिया और इसकी राजधानी शिमराओ को घेर लिया था।

 (3) आसाम– -नेपाल की भाँति ही आसाम का भी भारतीय इतिहास में विशेष स्थान नहीं है। सम्राट समुद्रगुप्त ने उसको अपने राज्य में मिला लिया था। सम्राट हर्ष के शासन-काल में यहाँ भास्करवर्मन का राज्य था। हर्ष की मृत्यु के पश्चात् यह स्वतन्त्र राज्य बन गया और 13वीं शताब्दी में यहाँ अहोमों ने एक नवीन वंश की स्थापना की। दिल्ली के सुल्तानों के राज्यकाल में भी आसाम एक स्वतन्त्र राज्य के रूप में अपना अस्तित्व बनाए रहा।

(4) कन्नौज-हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् कन्नौज का महत्त्व बहुत कम हो गया था, परन्तु आठवीं शताब्दी में वहाँ यशोवर्मन नामक एक प्रतापी सम्राट हुआ। उसने बंगाल से लेकर गोदावरी तक के प्रदेश और राजपूताना को अपने अधिकार में कर लिया। वह एक वीर शासक ही नहीं, बल्कि विद्या और कला-प्रेमी भी था। 750 ई० में कश्मीर के नायक ललितादित्य ने यशोवर्मन का वध करवाकर कन्नौज पर अधिकार कर लिया। ललितादित्य का शासन बहुत दिनों तक नहीं चला और 50 वर्ष तक कन्नौज में परिवर्तन होते रहे। 816 ई० में गुर्जर प्रतिहार वंश के नागभट्ट ने कन्नौज को जीतकर उस पर अपना अधिकार कर लिया।

नागभट्ट ने 17 वर्ष तक कन्नौज पर राज्य किया और ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की। 833 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। उसका उत्तराधिकारी रामभद्र केवल दो वर्ष तक रहा। 835 ई० में मिहिरभोज राजा बना। वह बहुत प्रतापी और बलवान् था। उसने बंगाल के शासक देवपाल की शक्ति को क्षीण कर दिया और दक्षिण के राष्ट्रकूटों को पराजित किया। उसके शासन-काल में प्रतिहारों की विशेष उन्नति हुई।

मिहिरभोज के पश्चात् महेन्द्रपाल भी योग्य पिता का योग्य पुत्र था। उसने लगभग 20 वर्ष तक राज्य किया और कन्नौज को छिन्न-भिन्न होने से रोका। परन्तु उसकी मृत्यु उसके राज्य का विघटन प्रारम्भ हो गया। उसके उत्तराधिकारी महीपाल, देवपाल, विजयपाल और राजपाल आदि थे। वे अपने राज्य की स्थिति को दृढ़ नहीं कर सके। के पश्चात्

1060 ई० के लगभग कन्नौज के शासन की बागडोर प्रतिहार-वंश के हाथ से गहड़वाल वंश के हाथ में चली गई। इस वंश के राजाओं ने लगभग एक शताब्दी तक राज्य किया। इस वंश के राजाओं में महीचन्द, मदनपाल, विजयचन्द और जयचन्द आदि प्रसिद्ध हैं। इन राजाओं ने पालवंश, मालवा और गुजरात के शासकों के साथ युद्ध किया। इस वंश का अन्तिम प्रतिभाशाली सम्राट जयचन्द था जिसको पराजित करके मुहम्मद गोरी ने कन्नौज पर अधिकार किया था। कुछ लोगों का मत है कि थोड़े समय तक जयचन्द के पुत्र हरिश्चन्द ने भी कन्नौज में राज्य किया। परन्तु सत्य तो यह है कि वह एक अधीन शासक रहा होगा। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि कन्नौज का पतन मुसलमानों के हाथों हुआ।

(5) मालवा-मालवा राज्य मध्य-भारत में था। हर्षवर्धन के शासनकाल में वह राज्य में शामिल हो गया, परन्तु वर्धन राज्य के अन्तिम दिनों में वह एक स्वतन्त्र राज्य हो गया था। 816 और 908 ई० के मध्य मालवा पर कन्नौज राज्य के प्रतिहारों का शासन रहा। 908 ई० में जब प्रतिहारों का पतन प्रारम्भ हुआ तो उनकी दुर्बलता का लाभ उठाकर परमार वंश ने स्वतन्त्र शासन स्थापित कर लिया। इस वंश के शासकों में मुंज और भोज के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। भोज के दरबार में धनपाल, धनिक, धनञ्जय, पद्मगुप्त आदि विद्वान रहते थे। उस काल में साहित्य और कला की विशेष उन्नति हुई।

भोज परमार वंश का बहुत प्रतिभाशाली सम्राट था। साहित्य-प्रेमियों के मध्य भोज का नाम सर्वोपरि लिया जाता है। कहा जाता है कि उसने अपने राज्य में 104 मन्दिरों का निर्माण करवाया था। वह एक महान् विजेता और शासक ही नहीं, बल्कि संस्कृत का महान् उपासक भी था। डॉ० डी० सी० गांगुली ने उसके कार्यों की चर्चा करते हुए उसे मध्य भारत के सर्वोत्तम राजाओं के बीच स्थान दिया है।

भोज की मृत्यु के पश्चात् दुर्बल उत्तराधिकारी परमार वंश के शासन को दृढ़ न रख सके। अनेक छोटे-छोटे युद्धों के कारण उनके राज्य की सीमाएँ कम होती गईं। गुजरात तथा चेदि शासकों के द्वारा उनको बहुत अधिक क्षति उठानी पड़ी। अन्त में 1310 ई० में अलाउद्दीन ने उसे अपने राज्य में मिला लिया।

(6) गुजरात-आठवीं शताब्दी में गुजरात भी कन्नौज साम्राज्य में सम्मिलित था। दसवीं शताब्दी के मध्य जब प्रतिहारों और राष्ट्रकूटों की शक्ति क्षीण हो गई तो सोलंकी वंश के साहसी युवक मूलराज ने गुजरात पर अपना अधिकार कर लिया। मूलराज बहुत वीर और महत्त्वाकांक्षी था। कहा जाता है कि उसने अपने समकालीन राजपूत राजाओं के साथ ही एक बार मुहम्मद गोरी को भी पराजित किया था। 995 ई० के लगभग उसकी मृत्यु हो गई। उसका पुत्र अत्यन्त विलासी था, इसलिए 1007 ई० में इस वंश के शासन की बागडोर उसके हाथ से निकल गई।

सोलंकी वंश का प्रतिभाशाली सम्राट कुमारपाल था। वह बहुत वीर, साहसी एवं कला-साहित्य का प्रेमी था। उसकी मृत्यु के पश्चात् गुजरात की दशा दिन-प्रतिदिन क्षीण होती गई। तत्पश्चात् गुजरात में बघेल वंश के शासन की स्थापना हुई। अन्तिम सम्राट कर्णदेव को पराजित करके अलाउद्दीन के सेनापतियों ने गुजरात पर अधिकार कर लिया।

(7) अजमेर-अजमेर में सांभर के चौहानों का राज्य था। अजमेर सांभर राज्य का एक भाग था। चौहान वंश का सबसे पहला शासक जिसका प्रामाणिक इतिहास मिलता है, बीसलदेव चौहान था। उसने मुसलमानों से युद्ध किया, प्रतिहारों से दिल्ली छीनी और अपने राज्य की सीमा हिमालय से विंध्याचल तक विस्तृत की।

चौहान वंश का सबसे प्रतिभाशाली सम्राट पृथ्वीराज था। पृथ्वीराज ने तराइन के युद्ध में 1191 ई० मुहम्मद गोरी को पराजित किया, परन्तु पृथ्वीराज और जयचन्द की फूट के फलस्वरूप दूसरी बार मुहम्मद गोरी ने उसे बुरी तरह हराया। पृथ्वीराज बन्दी बना लिया गया और दिल्ली तथा अजमेर पर मुसलमानों का शासन स्थापित हो गया।

(8) बुन्देलखण्ड-कन्नौज से कुछ दक्षिण की ओर बुन्देलखण्ड में चन्देलों का राज्य था। पहले चन्देल कन्नौज के राजपूतों के अधीन थे, परन्तु 800 ई० के लगभग नन्नुक नामक एक राजपूत सरदार ने अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया। चन्देल वंश में दो प्रसिद्ध शासक धंग और परमाल हुए। सुबुक्तगीन के आक्रमण के समय धंग ने पंजाब के शासक जयपाल की सहायता की थी। परमाल और पृथ्वीराज के बीच पुराना वैर था। कहा जाता है कि शीशगढ़ नामक स्थान पर इन दोनों के मध्य घमासान युद्ध हुआ था। इस युद्ध में आल्हा और ऊदल नामक दो योद्धाओं ने भाग लिया था। इस युद्ध में पृथ्वीराज की विजय हुई और महोबा पर उसका अधिकार हो गया। तत्पश्चात् 1203 ई० में कुतुबुद्दीन ने कालिंजर और महोबा पर अपना अधिकार कर लिया और बुन्देलखण्ड उसके राज्य में सम्मिलित हो गया।

(9) मेवाड़-मेवाड़ में गहलौत वंश का शासन था। इस वंश का संस्थापक था। मुहम्मद-बिन-कासिम के आक्रमण के समय बप्पारावल बड़ी वीरता से लड़ा था। फलस्वरूप उसे 730 ई० में मेवाड़ का सिंहासन प्राप्त हुआ था। जलालुद्दीन खिलजी के समय तक मेवाड़ में इस वंश का शासन रहा और वे निरन्तर मुसलमानों से लोहा लेते रहे।

(10) बिहार तथा बंगाल-हर्षवर्धन का राज्य बंगाल तक के पश्चात् से 8वीं शताब्दी तक का बंगाल का इतिहास अन्धकार के गर्त में है। 8वीं शताब्दी में गोपाल नामक एक व्यक्ति ने वहाँ पालवंश की नींव डाली और उसके उत्तराधिकारी धर्मपाल ने अपना प्रभाव कन्नौज से विंध्याचल तक फैला लिया। तत्पश्चात् इस वंश का सर्वशक्तिमान शासक देवपाल सिंहासनारूढ़ हुआ। उसने आसाम और कलिंग पर भी अपना अधिकार जमा लिया। देवपाल की मृत्यु के पश्चात् पाल वंश पतन की ओर अग्रसर होता गया और 12वीं शताब्दी में इस वंश के पतन के पश्चात् वहाँ सेन वंश की नींव पड़ी। सेन वंश में विजयसेन और बल्लालसेन नाम के प्रसिद्ध राजा हुए। लक्ष्मण सेन इस वंश का अन्तिम प्रतापी राजा हुआ। अन्त में मुहम्मद-बिन-बख्तियार खिलजी ने बंगाल पर अपना अधिकार जमा लिया।

निष्कर्ष-उपर्युक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मुसलमानों के आक्रमण के समय समस्त उत्तरी भारत अनेक छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था और सभी राज्यों में अराजकता की-सी स्थिति थी। कोई सुदृढ़ केन्द्रीय शक्ति न होने के कारण यत्र-तत्र छोटे-छोटे राजा अपना सिर उठाते रहते थे। उसी वातावरण के मध्य तुर्कों ने भारत पर आक्रमण किया और देश की राजनीतिक स्थिति से लाभ उठाकर वे भारतीयों को धूल-धूसरित करने में सफल हुए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1 ‘अरबों की सिन्ध विजय परिणामहीन विजय थी।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।

अथवा सिन्ध पर अरबों की विजय का कोई स्थायी प्रभाव क्यों नहीं पड़ा?

उत्तर-लेनपूल का मत है, “अरबों ने सिन्ध पर विजय तो अवश्य प्राप्त की, तथापि यह विजय ऐतिहासिक और इस्लाम धर्म की एक घटना मात्र रही। यह प्रभावरहित विजय थी।” इस मत की पुष्टि करते हुए वूल्जले हेग ने भी लिखा है, “अरबों की सिन्ध विजय के विषय में अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता। यह केवल एक ऐतिहासिक घटना थी, जिसने विशाल देश के छोटे-से भाग को प्रभावित किया”

इस प्रकार, सिन्ध पर अरबों की विजय का कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ सका। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

(1) अरबों की सभ्यता व संस्कृति की तुलना में भारतीय सभ्यता व संस्कृति अधिक विकसित थी। अतः भारतीय सभ्यता पर अरबों का कोई स्थायी प्रभाव न पड़ सका।

(2) अरब के निवासियों को शासन-व्यवस्था की कला का ज्ञान नहीं था।

(3) सिन्ध प्रदेश आर्थिक दृष्टि से समृद्ध नहीं था।

(4) सिन्ध प्रदेश बगदाद से बहुत दूर था। अत: उस पर बगदाद से नियन्त्रण रख पाना अत्यन्त कठिन था।

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