ba 2nd year Akbar Deccan Policy

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ba 2nd year Akbar Deccan Policy

अकबर की दक्षिण नीति

the Deccan Policy of Akbar

दक्षिण नीति के अन्तर्गत अकबर दक्षिण-भारत को अपनी अधीनता में लाने के लिए अति उत्साहित था। सन् 1591 ई० में उसने दक्षिण के खानदेश, बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुण्डा राज्यों के शासकों के पास सन्देश भेजा कि वे उसकी अधीनता को स्वीकार कर लो खानदेश मुगलों को सीमा के सबसे अधिक निकट था और एक प्रकार से दक्षिण भारत का प्रवेशद्धार भी था। खानदेश के शासक अलीखाँ ने मुगल-आधिपत्य स्वीकार कर लिया और वार्षिक कर देने के लिए भी तैयार हो गया। अन्य तीनों राज्यों ने अकबर का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। अकबर ने 1593 ई० में शहजादा मुराद और अब्दुर्रहीम खानखाना को अहमदनगर पर आक्रमण करने के लिए भेजा। 1595 ई० में अहमदनगर के शासक बुरहान-उल-मुल्क की मृत्यु हो जाने से राज्य में आन्तरिक संघर्ष आरम्भ हो गया और राज्य के एक शासक विरोधी गुट ने मुराद को अपनी सहायता के लिए आमन्त्रित किया। परन्तु मुगलों के वहाँ पहुँचने के पहले ही वजीर मिंदान मंजू ने विद्रोह को दबा दिया और स्वयं बीजापुर की सीमा पर जा पहुँचा तथा किले की सुरक्षा का दायित्व चाँदबीबी को सौंप दिया। 1595 ई० में मुगलों ने अहमदनगर पर घेरा डाला। कई महीनों तक चाँदबीबी ने कुशलतापूर्वक किले की रक्षा की। 1596 ई० में पारस्परिक मतभेदों, रसद की कमी और बीजापुर एवं गोलकुण्डा से अहमदनगर के लिए सहायता आ जाने की सम्भावना के कारण मुगलों ने सन्धि करना उचित समझा। चाँदबीबी इसके लिए तैयार थी। एक सन्धि के द्वारा बुरहान-उल-मुल्क के पोते बहादुरशाह को अहमदनगर का शासक स्वीकार कर लिया गया। उसने अकबर की अधीनता को स्वीकार कर लिया तथा बरार का प्रदेश और अन्य अनेक भेटें मुगलों को प्रदान की। परन्तु यह सन्धि अधिक समय तक न रह सकी। चाँदबीबी ने स्वयं को शासन से पृथक् कर लिया और अन्य सरदारों ने सन्धि को टुकराकर बरार को मुगलों से छीनने को प्रयास किया। अकबर ने खानखाना और मुराद को अहमदनगर पर पुनः आक्रमण करने के लिए आदेश दिया परन्तु दोनों के मतभेदों को देखकर खानखाना के स्थान पर अबुल फजल को भेजा गया। 1597 ई० में शहजादा मुराद की मृत्यु हो गयी और खानखाना को शहजादा दानियाल के साथ भेजा गया। स्वयं अकबर भी दक्षिण की ओर चल दिया। 1599 ई० में दौलताबाद पर मुगलों का आधिपत्य हो गया। उसने 1600 ई० में अहमदनगर के किले को जीत लिया । इससे पहले ही चाँदबाबी को, जिसने मुगलों से सन्धि करने का प्रस्ताव रखा था, या तो उसी के सरदारों ने मार दिया अथवा उसने स्वयं आत्महत्या कर ली। बालक निजामशाह को ग्वालियर के किले में बन्दी बनाकर भेज दिया गया। इस प्रकार, वर्षों के संघर्ष के पश्चात् बरार, दौलताबाद और अहमदनगर के किले मुगलों को प्राप्त हो गए। 

परन्तु इससे अहमदनगर का राज्य समाप्त नहीं हुआ। अहमदनगर के सरदार एक बालक-शासक के नाम से मुगलों से संघर्ष करते रहे और अहमदनगर राज्य का अधिकार मुगल-सत्ता से स्वतन्त्र रहा। खानदेश का शासक राजा अलीखाँ वफादारी से मुगलों की तरफ से अहमदनगर में लड़ता हुआ मारा गया था। उसके पुत्र मीरन बहादुरशाह ने मुगल-आधिपत्य को मार इनकार कर दिया अपने पिता द्वारा की गयी मुगलों से सन्धि को भी ठुकरा दिया। अहमदन युद्ध चल रहा था उसी समय खानदेश ने स्वतन्त्रता के रुख को अपना लिया। 1599 ई. में अकबर ने खानदेश की राजधानी बुरहानपुर पर आक्रमण किया और उसे जीत लिया। पर मीरन बहादुरशाह ने अपनी सुरक्षा का प्रबन्ध असीरगढ़ के किले में किया। अकबर ने असीरगड का घेरा डाल दिया। कई माह के घेरे के पश्चात् मीरन बहादुरशाह ने डरकर 1600 ई० आत्मसमर्पण कर दिया। उसे ग्वालियर के किले में बन्दी बनाकर भेज दिया गया और 4.000 अशर्फियाँ उसके वार्षिक निर्वाह के लिए निश्चित कर दी गयीं। 

इस प्रकार, 1600 ई० तक मुगलों ने खानदेश के स्वतन्त्र राज्य को समाप्त कर दिया । और अहमदनगर से बरार तथा कुछ अन्य भू-प्रदेश छीन लिए। बुरहानपुर, असीरगढ. दौलताबाद और अहमदनगर के नगर और दृढ़ किलों पर भी अधिकार कर लिया गया।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अकबर ने अपने समय में न केवल मुगल-समाज्य को उत्तर-भारत में स्थायित्व प्रदान किया बल्कि उसका विस्तार भी किया। अपनी विजयों में अकबर ने कन्धार और काबुल से लेकर बंगाल तक और कश्मीर से लेकर बरार तक का भू-क्षेत्र अपने अधिकार में कर लिया। उसके समय में मुगल-साम्राज्य भारत में सर्वाधिक विस्तृत और सर्वशक्तिशाली साम्राज्य बन गया। मुगलों के विरोधी अफगान पूर्णतया समाप्त कर दिए गए। अब वे केवल अधीन जागीरदार रह गए और स्वतन्त्र राज्य की इच्छा उनकी शक्ति के बाहर की बात हो गयी। राजपूत शासक (मेवाड़ को छोड़कर) मुगलों के विरोधी न रहकर सहायक बन गए और मुगलों की अधीनता में चले गए। अकबर सम्पूर्ण भारत को विजय न कर सका, परन्तु उत्तर-भारत पूर्णतया उसके अधीन हो गया दक्षिण-भारत में उसने कुछ स्थानों पर सत्ता स्थापित कर ली। इसके अतिरिक्त उसने अपने उत्तराधिकारियों के लिए सम्पूर्ण भारत की विजय का मार्ग भी प्रशस्त किया। 

अकबर के समय के विद्रोह (Revolts of Akbar Reign)

1. उजबेग-वर्ग का विद्रोह – अकबर के शासनकाल में पुराने अमीरों में एक शक्तिशाली वर्ग उजबेग अमीरों का भी था। जौनपुर का सूबेदार खानमखाँ, उसका भाई बहादुरखाँ और चाचा इब्राहीमखाँ, अवध का सूबेदार खानेआलम और मालवा का सूबेदार अब्दुल्लाखाँ इस वर्ग के प्रमुख नेता थे। वे सभी महत्त्वाकांक्षी और स्वतन्त्र प्रकृति के थे। सत्ता को अपने हाथ में केन्द्रित करने की अकबर की नीति उन्हें पसन्द न थी। वे सोचा करते थे कि अकबर ने उन्हें उनकी योग्यता का उचित पुरस्कार नहीं दिया है। ई० में अब्दुल्लाखाँ ने अपनी स्वतन्त्र प्रकृति का परिचय दिया और अकबर के – विदोह कर दिया। उसके पश्चात् 1564 से 1567 ई० तक उजबेगों ने अकबर को परेशान किया परन्तु अन्त में वे पराजित हए।

2. मिर्जा-वर्ग का विद्रोह -अकबर के शासनकाल में विभिन्न सम्बन्धियों और मिर्जा-वर्ग के व्यक्तियों ने भी प्राय: समय विदोह किया जबकि उजबेगों ने विद्रोह किया था। इब्राहीम मिर्जा, मुहम्मद हुसैन मसद हुसैन मिर्जा, सिकन्दर मिर्जा और महमूद मिर्जा अकबर के रक्त-सम्बन्धी थे और के सदस्य होने के नाते अधिक सम्मान और पद की आकांक्षा रखते थे। उन्होंने राज्य की भमि पर बिना शाही आज्ञा के अधिकार स्थापित कर लिया। मुनीमखाँ ने उन्हें मालवा की और भगा दिया और वे वहाँ से गुजरात भाग गए। वे उस समय तक निरन्तर उपद्रव करते रहे जब तक कि अकबर ने गुजरात पर पुन: आक्रमण (1573 ई०) करके उनकी शक्ति को समाप्त नहीं कर दिया।

3. बंगाल और बिहार में विद्रोह – अकबर के शासनकाल में बंगाल और बिहार में 1580 ई० में विद्रोह हुआ। वहाँ के सबेदारों की कठोरता इस विद्रोह का कारण बनी। बंगाल में बाबाखाँ काकशल ने और बिहार में महम्मद मासूम काबुली तथा अरब बहादुर ने विद्रोहियों का नेतृत्व किया। वे सभी विद्रोही मिलकर एक हो गए। उन्होंने बंगाल के सूबेदार मुजफ्फरखाँ को धोखे से मार डाला और टाँडा के किले पर अधिकार कर लिया। सम्पूर्ण बिहार और बंगाल विद्रोहियों के हाथों में चला गया। अकबर ने राजा टोडरमल को इस विद्रोह को दबाने के लिए भेजा और उसने बड़ी नीति और बहादुरी से 1581 ई० तक इस विद्रोह को समाप्त कर दिया। अधिकांश विद्रोही भाग गए अथवा मार दिए गए।

4. शहजादा सलीम का विद्रोह-अकबर के अन्तिम दिनों में गद्दी के उत्तराधिकारी शहजादा सलीम ने अपने पिता अकबर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। लाड़-प्यार में पला होने के कारण सलीम विलासी और आरामपसन्द था। अकबर बहुत समय जीवित रहा, इस कारण सलीम गद्दी पर बैठने के लिए अधीर हो उठा। 1599 ई० में सलीम बिना आज्ञा के अजमेर से इलाहाबाद चला गया। वहाँ उसने एक स्वतन्त्र शासक की तरह व्यवहार करना आरम्भ कर दिया। अकबर ने जो उस समय असीरगढ़ के किले के घेरे में व्यस्त था, उस पर कोई ध्यान न दिया और चुपके-चुपके सलीम को मनाने का प्रयास किया। 1602 ई० में जब अकबर अपनी राजधानी वापस आया तब भी उसने उसे समझाने का प्रयत्न किया और इसी हेतु अपने मित्र अबुल फजल को दक्षिण से बुलाया, किन्तु सलीम के इशारे पर ओरछा के बुन्देला सरदार वीरसिंह देव ने मार्ग में अबुल फजल की हत्या कर दी जिससे अकबर बहुत दु:खी और क्रोधित हुआ। उस अवसर पर सलीमा बगम ने इलाहाबाद जाकर सलीम को समझाया। सलीम ने आगरा आकर (1603 ई०) अपने पता से माफी माँग ली और अकबर ने उसे माफ कर दिया। उसी वर्ष सलीम को मेवाड़ पर क्रमण करने के लिए भेजा गया। परन्तु वह अकबर से आज्ञा लेकर इलाहाबाद चला गया जहा वह शराब और नाच-रंग में डबा रहा। अकबर उसकी इन सभी आदतों को पसंद नहीं रता था। परन्तु अकबर के दोनों छोटे पुत्रों मुराद और दानियाल की मृत्यु हो चुकी थी, इस कारण अकबर ने सलीम को सभी आदतों को बर्दाश्त किया। जब सलीम 1604 ई० में अपनी दादी की मृत्यु पर आगरा आया तब भी अकबर ने उसे माफ कर दिया। उसके पश्चात सली अपने पिता के पास ही रहा। यद्यपि सलीम ने अकबर के विरुद्ध विद्रोह करके कोई युद्ध तो नहीं किया परन्तु अपने गलत और स्वतन्त्र व्यवहार से अकबर को उसके अन्तिम दिनों में द:खी अवश्य किया। 

इस प्रकार अकबर के विरुद्ध विभिन्न विद्रोह हुए परन्तु उनमें से कोई भी न तो सफल रहा और न ही राज्य को कोई गम्भीर हानि पहुंची। 

प्रश्न 3–साम्राज्य की एकता बनाए रखने के लिए अकबर ने कौन-से कार्य किए? 

उत्तर-अकबर ने हिन्दुस्तान में राजनीतिक, प्रशासनिक, धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में एकता स्थापित करने का गम्भीर प्रयास किया। उसके साम्राज्य में उसकी प्रजा को समानता और आर्थिक स्वतन्त्रता प्राप्त थी। धर्म, प्रजाति, सामाजिक स्तर–किसी भी आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं होता था। प्रशासन तथा न्याय के क्षेत्रों में सभी नागरिक समान थे। साम्राज्य किसी एक वर्ग या धर्म के अनुयायियों का नहीं था बल्कि सम्पूर्ण प्रजा का था और सम्राट किसी एक वर्ग का शासक न होकर सभी वर्गों का शासक था। इस प्रकार अकबर ने साम्राज्य को एक राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। 

राज्य का भारतीय स्वरूप-अकबर का प्रथम कार्य मुगलों के विदेशी स्वरूप को समाप्त करना था। मुगलों को विदेशी और आक्रमणकारी माना गया था और अफगान राजपूतों ने मिलकर बाबर को भारत से निकालने के लिए खानवा मे संयुक्त प्रयत्न किया था। अकबर ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए राजपूतो से विवाह सम्बन्ध स्थापित करके मुगल राजवंश को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करने का प्रयास किया। उसकी विवाह नीति पूर्ववर्ती मुस्लिम शासकों से हटकर थी। इन विवाहों में बल प्रयोग नहीं किया गया था बल्कि इन्हें स्वेच्छा से समानता के आधार पर किया गया था। इसमें पत्नियों या उनके परिवार के व्यक्तियों का धर्म परिवर्तन नहीं कराया गया था। इस प्रकार अकबर की राजपूत नीति से, जो समानता, धार्मिक स्वतन्त्रता और सद्भावना पर आधारित थी, मुगल राजवंश को राष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त हुआ तथा एक ऐसे शासक वर्ग का निर्माण हुआ जिसमें राजपूत सम्मिलित थे। साम्राज्य की विजयों में मुस्लिम सैनिकों के साथ राजपूत सैनिकों का भी योगदान था जिससे साम्राज्य के निर्माण में भी एकता की भावना उत्पन्न हुई। 

(1) राजनीतिक व प्रशासनिक एकता-अकबर ने भारत में राजनीतिक एकता स्थापित करने में साम्राज्यवादी नीति को अपनाया। राष्ट्रीय एकता की स्थापना के लिए राजनीतिक एकता स्थापित करना आवश्यक था। उसकी राजपूत नीति या विभिन्न विद्रोहों का दमन नीति को इसी दृष्टि से देखना चाहिए। उसने अपने युद्धों को धर्मयुद्ध घोषित नहीं किया था। उसने इस्लाम के प्रसार को या दार-उल-हर्ब को दारउल-इस्लाम बनाने की घोषणा नहीं की। उसने राजपूतों के समक्ष मुगल सार्वभौमिकता को स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा। इसी प्रकार का प्रस्ताव उसने दक्षिण के मुस्लिम राज्यों के समक्ष रखा था। उसे रूढ़िवादियों के विरोध का सामना भी करना पड़ा। अगर एक ओर राणा प्रताप ने उसका प्रस्ताव अस्वीकार किया तो दूसरी ओर, अफगानों, उजबेगों तथा अनेक मुस्लिम तत्त्वों ने उसे हटाकर इस्लामी राज्य की स्थापना का प्रयास किया। अकबर अपनी सूझ-बूझ से सफल हुआ और उसने भारत को राजनीतिक एकता प्रदान की। 

पौर्य सपाटों के समान अकबर ने समस्त साम्राज्य में प्रशासनिक एकता स्थापित की। यह शासनिक व्यवस्था जनकल्याणकारी भावना से ओत-प्रोत थी। इसमें बिना किसी भेदभाव के यी नागरिको को समान अधिकार तथा संरक्षण प्राप्त थे। सभी प्रान्तों, सरकारों तथा परगनों में का प्रशासन तन था। यह इस्लामी राज्य नहीं था, बल्कि प्रशासन के सभी पद योग्यता के in पर सभी धमों के अनुयायियों के लिए खोल दिए गए थे। धार्मिक भेदभाव समाप्त होने से गरिको को समानता मिल गई थी। यह प्रशासन सहिष्णता तथा लोक-कल्याण की भावना मेरित था। राज्य के नियम सभी व्यक्तियों पर समान रूप से लागू होते थे। 

(2) धार्मिक एकता–राष्ट्रीय एकता स्थापित करने की दिशा में अकबर का साहसिक और मौलिक कार्य धार्मिक क्षेत्र में था। सल्तनत काल में पूर्ववर्ती शासकों ने इस्लामी राज्य की अवधारणा के अनुसार शरीयत का पालन करते हुए हिन्दुओं पर विभेदक कर लगाए थे तथा धार्मिक अत्याचार किए थे। अकबर ने बलपूर्वक धर्मपरिवर्तन को समाप्त कर दिया, तीर्थ-यात्रा कर तथा जजिया कर को समाप्त करके हिन्दुओं को धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की। यह धार्मिक स्वतन्त्रता अकबर की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थो। वह हिन्दुओं का भी उसी प्रकार सम्राट था, जिस प्रकार मसलमानों का। विभिन्न धर्मावलम्बियों के मध्य सामाजिक सम्बन्ध तथा सहानुभूति का वातावरण निर्मित करने के लिए उसने विभिन्न उपाय किए। ‘सुलहकुल’ की नीति अपनाकर उसने हिन्दुओं को निष्ठा प्राप्त कर ली। इबादतखाने की स्थापना, महजर, दीन-ए-इलाही धार्मिक सद्भावना तथा समन्वय की दिशा में उसके महत्त्वपूर्ण कार्य थे।

(3) सामाजिक एकता–राजनीतिक समानता के द्वारा भेदभाव के समाप्त हो जाने से सामाजिक एकता का मार्ग भी प्रशस्त हुआ। अकबर के शासनकाल में पहली बार एक ऐसी भारतीय सामाजिक संस्कृति का निर्माण हुआ जिसमें हिन्दू और मुस्लिम आदर्शों का समन्वय हुआ था। मुगल अमीर वर्ग में हिन्दू और मुस्लिम दोनों पदाधिकारी थे। इससे मुगल दरबार में सामाजिक संस्कृति का विकास हुआ। वस्त्र, रहन-सहन, भाषा, शिष्टाचार की एकसमान संस्कृति को मुगल मनसबदारों ने अपनाया। मुगल दरबार में नौरोज का पारसी पर्व, ईद-शबेरात आदि मुस्लिम पर्व तथा दीपावली-दशहरा आदि हिन्दू पर्व मनाए जाते थे। इन पर्वो को संयुक्त रूप से मनाने से सामाजिक स्तर पर हिन्दू-मुस्लिम समाज में निचले स्तरों पर भी समन्वय हुआ। अकबर को हिन्दुओं का विश्वास प्राप्त था। अत: सामाजिक क्षेत्र में अकबर हिन्दू समाज में सुधार कार्य भी कर सका। उसने गौ-वध, सती-प्रथा, कन्या वध, जैसी कुरीतियों को समाप्त करने का प्रयास किया। उसने बाल-विवाह को भी बन्द करा दिया। इस प्रकार हिन्दुओं और मुसलमानों के सामाजिक आदर्शों को निकट लाकर सामाजिक एकता स्थापित करने का प्रयास अकबर ने किया जैसा उससे पहले किसी शासक ने नहीं किया था।

(4) आर्थिक एकता-इस इस्लामी राज्य में आर्थिक आधार पर भी भेदभाव किया जाता था। हिन्दुओं पर जजिया, तीर्थ कर आदि समाप्त करके अकबर ने कर प्रणाली को समानता के आधार पर गठित किया। चुंगी के मामले में हिन्दुओं को 5% तथा मुसलमानों को 2.5% लगाने की भेद-भावपूर्ण प्रणाली थी। इसे भी अकबर ने समाप्त कर दिया। इस प्रकार कर-प्रणाली को सभी वर्गों के लिए समान बनाया गया। शासकीय सेवाओं में हिन्दुओं और मुसलमानों का अन्तर समाप्त कर दिया गया और शासकीय सेवा के आर्थिक लाभ हिन्दओं को भा प्राप्त हुए। अकबर का उद्देश्य लोक-कल्याणकारी राज्य स्थापित करना था जिसमें उसकी प्रजा के सभी वर्गों की अधिक समृद्धि हो। इसके लिए उसने भू-राजस्व प्रणाली को पुनर्गठित किया जिसका लाभ कषकों को प्राप्त हआ जो अधिकांश हिन्दू थे। अकबर ने राज्य की ओर से आर्थिक सहायता देने में भी समानता का दृष्टिकोण अपनाया और राज्य की ओर से आर्थिक 

सहायता सभी वर्गों को प्रदान की। इस प्रकार आर्थिक क्षेत्र में भी साम्राज्य का राष्ट्रीय स्वरूप स्थापित किया गया। 

(5) सांस्कृतिक एकता : भारतीय इस्लामिक संस्कृति का विकास-अकबर के प्रयासों से सांस्कृतिक एकता स्थापित हुई और इण्डो-इस्लामिक संस्कृति का विकास हआ। उसने फारसो को राज्य की भाषा बनाया और एक अनुवाद विभाग की स्थापना की, जिसने अन्य भाषाओं; जैसे-संस्कृत, अरबी, यूनानी और तुर्को ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद किया। उसके दरबार में विभिन्न भाषाओं के विद्वान थे जिन्हें उसने राज्याश्रय प्रदान किया था। उसके काल में हो हिन्दी के श्रेष्ठ ग्रन्थों की रचना की गई। अब्दुर्रहीम खानखाना उसके दरबार का श्रेष्ठ हिन्द कवि था जिसका महाकवि तुलसीदास से घनिष्ठ परिचय था। अकबर के उदार शासनकाल में तुलसी ने रामचरितमानस तथा सूरदास ने कृष्ण-भक्ति के अमर गीतों की रचना की थी। कला के क्षेत्र में भारतीय-इस्लामी शैलियों के मिश्रण से नवीन शैली का जन्म हुआ। इस राष्ट्रीय शैली के अनुपम उदाहरण फतेहपुर सीकरी में आज भी देखे जा सकते हैं। इसी प्रकार चित्रकला तथा संगीत के क्षेत्रों में भी समन्वय हुआ। अकबर के दरबार में उत्कृष्ट चित्रकार तथा संगीतकार थे जिसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ही कलाकार थे जिन्हें अकबर के उदार वातावरण में नवीन शैलियों को विकसित करने का अवसर प्राप्त हुआ था। 

निष्कर्ष-अकबर की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक एकीकरण तथा समन्वय की नीतियों के कारण उसे राष्ट्रीय सम्राट कहना युक्तिसंगत है। इस राज्य में सभी वर्गों को समानता, धार्मिक स्वतन्त्रता, सम्मान प्राप्त था और किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं था। अकबर सभी वर्गों का सम्राट था और सभी वर्गों को समृद्ध तथा सुखी बनाना उसका उद्देश्य था। विभिन्न वर्गों को निकट लाकर एक राष्ट्र के निर्माण का महान कार्य उसने आरम्भ किया था। भारतीय इतिहास में उसे इसीलिए महान कहा गया है क्योकि मध्यकाल में वही एकमात्र सम्राट था जिसने इस कार्य को किया था। बाद के शासकों में इतनी क्षमता, दूरदर्शिता, शक्ति-सम्पन्नता नहीं थी कि वे इस कार्य को पूर्णता तक पहुँचाते। अतः यह महत्त्वपूर्ण उद्देश्य असफल हो गया। अकबर प्रशंसा का पात्र है क्योंकि उसने इस कार्य को करने का गम्भीर प्रयत्न किया था। 

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