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bcom 2nd year company meaning and definition

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कम्पनी का अर्थ एवं प्रकार 

Meaning and Kinds of Company

कम्पनी का अर्थ 

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औद्योगिक क्रान्ति के बाद बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरु हुआ। बड़े पैमाने के उद्योगों को संचालित करने के लिये कुशल प्रवन्ध व बड़ी मात्रा में पूँजी की जरुरत महसूस की गई जिसकी पूर्ति न तो एकाकी व्यापारी द्वारा ही सम्भव थी और न ही साझेदारी संस्था द्वारा। अतएव इस स्थिति में व्यवसाय के जिस स्वरूप ने जन्म लिया उसे कम्पनी कहा जाता है। 

सरल शब्दों में किसी सामान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिये बनाये गये व्यक्तियों के संघ को कम्पनी कहते हैं। जब यह संघ कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत पंजीकृत (रजिर्टड) हो जाता है तो यह अविछिन्न (शाश्वत) उत्तराधिकार व सार्वमुद्रा के साथ विधान द्वारा निर्मित कृत्रिम व्यक्ति बन जाता है। 

कम्पनी की परिभाषा 

Definition of Company

परिभाषा- अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से कम्पनी की परिभाषाओं को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं। 

(A) वैधानिक परिभाषायें 

(B) न्यायिक परिभाषायें 

(C) सैद्धान्तिक

वैधानिक परिभाषायें

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2 (20) के अनुसार-“कम्पनी का आशय” इस अधिनियम के अधीन निर्मित एवं पंजीकृत कम्पनी से या एक विद्यमान कम्पनी से है। एक विद्यमान कम्पनी वो है “जिसका निर्माण व पंजीयन इस अधिनियम के पूर्व किसी कम्पनी अधिनियम के अधीन हुआ है।” न्यायिक परिभाषायें 

न्यायाधीश जेम्स-“सामान्य उद्देश्य के लिये संगठित व्यक्तियों का संघ कम्पनी है।” 

अमेरिका के प्रमुख न्यायाधीश मार्शल के अनुसार-निगम (संयुक्त पूंजी वाली कम्पनी) एक अदृश्य और अमूर्त कृत्रिम व्यक्ति है जिसका केवल कानून की निगाहों में ही अस्तित्व है।” सैद्धान्तिक परिभाषायें . एल० एच० हैने–“कम्पनी विधान द्वारा निर्मित एक कृत्रिम व्यक्ति है जिसका पृथक् एवं स्थायी अस्तित्व होता है तथा जिसकी एक सार्वमुद्रा होती है।”

फील्ड हाऊस “संयुक्त पूंजी कम्पनी किसी व्यवसाय या उपक्रम करने के हेतु निर्मित की गई व्यक्तियों की एक समिति है।” किम्बाल एवं किम्बाल-“निगम या कम्पनी प्रकृति से एक कृत्रिमव्यक्ति है जिसे किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिये विधान द्वारा बनाया गया है या अधिकृत किया गया है।” उपर्युक्त परिभाषाओं का विश्लेषण करने के पश्चात् संक्षेप में हम कह सकते हैं कि 

“कम्पनी कानून द्वारा एक निर्मित व्यक्ति है जिसका पृथक् अस्तित्व; सतत उत्तराधिकार तथा सार्वमद्रा होती है। जिसका निर्माण किसी विशेष उद्देश्य से होता है । तथा जिसके सदस्यों का दायित्व सामान्यतया सीमित है। 

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कम्पनी की प्रकृति एवं विशेषताएँ (लक्षण) 

Nature and Characteristics of a Company

कृत्रिम व्यक्ति (Artifical Man)

कम्पनी अधिनियम 2013 के अनुसार कम्पनी कानन द्वारा निर्मित एक कृत्रिम व्यक्ति है परन्तु इसके कार्य अधिकतर एक प्राकृतिक मनुष्य के समान ही होते हैं । कम्पनी में एक वास्तविक व्यक्ति की भाँति हाड-माँस नहीं होता है। अतः इसलिये इसे कृषि व्यक्ति की संज्ञा प्रदान की गई है। 

पाश्वत या अविछिन्न या स्थायी अस्तित्व (Prepetual Existence)

कम्पनी का अस्तित्व है। अत: अंशधारियों के मर जाने अथवा व्यक्तिगत रूप से दिवालिया कम्पनी का अर्थ एवं प्रकार/3 हो जाने या कम्पनी से अलग होने का कम्पनी के अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 

पृथक् वैधानिक अस्तित्व (Separate Legal Entity)-

कम्पनी का अस्तित्व अपने सदस्यों से अलग होता है। अतः कम्पनी अपने अंशधारियों से किसी भी प्रकार का अनुबन्ध कर सकती है । एक कम्पनी अपने अशंधारियों के प्रति तथा अंशधारी कम्पनी के प्रति वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। इस प्रकार कोई भी अंशधारी कम्पनी के कार्यों के लिये उत्तरदायी नहीं होता, भले ही उसने उस कम्पनी के सभी अंश क्यों न ले रखे हों। 

सीमित दायित्व (Limited Liability)-

संयुक्त स्कन्ध कम्पनी के सदस्यों का सीमित दायित्व होता है अर्थात् प्रत्येक अंशधारी का दायित्व उसके द्वारा क्रय किये गये अंशों के मूल्य तक ही सीमित होता है। 

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अभियोग चलाने का अधिकार (Right to Sue)-

कम्पनी को विधान के अनुसार अपने नाम से दूसरों पर वाद प्रस्तुत करने का अधिकार है । 

सार्वमुद्रा (Common Seal)

कम्पनी एक कृत्रिम व्यक्ति होने के कारण हस्ताक्षर नहीं कर सकती, वरन् कम्पनी द्वारा निर्गमित प्रत्येक प्रलेख पर इसकी सार्वमुद्रा को लगाया जाता है । इसीलिये इसका रूप संयुक्त होता है।

संयुक्त पूँजी (Joint Capital)

कम्पनी के अन्तर्गत अंशधारियों द्वारा प्राप्त पूँजी को संयुक्त रूप से लगाया जाता है। इसीलिये इसका रूप संयुक्त होता है। 

क्रियाओं का सीमित क्षेत्र (Limited Scope of Activities)

कम्पनी के उद्देश्य पार्षद सीमानियम (Memorandum of Association) में दिये होते हैं तथा उद्देश्य

पूर्ति तथा कार्य संचालन सम्बन्धी नियम कम्पनी के पार्षद अन्तर्नियमों (Articles of Association) में दिये होते हैं। अतः कम्पनी अपने पार्षद अन्तर्नियमों की सीमा के अन्दर ही कार्य करती है, इनसे परे कोई कार्य नहीं कर सकती।

अंशों का हस्तान्तरण (Transfer of Shares)-

साधारणतया कोई भी अंशधारी अपने अंशों का हस्तान्तरण स्वेच्छा से किसी भी समय कर सकता है, उसे ऐसा करने के लिये कम्पनी की आज्ञा लेने की जरूरत नहीं होती। 

कम्पनी का समापन (Winding-up of a Company)-

जिस प्रकार कम्पनी का जन्म अधिनियम में वर्णित समामेलन के द्वारा होता है उसी प्रकार उसका अन्त भी अधिनियम में वर्णित समापन की विधियों के द्वारा ही किया जा सकता है। 

अंशधारी एजेन्ट नहीं (Shareholders are not Agents)-

कम्पनी का अंशधारी कम्पनी के एजेन्ट के रूप में कार्य नहीं कर सकता। 

सदस्यों की संख्या (Number. of Members)-

एक सार्वजनिक कम्पनी में सदस्यों की न्यूनतम संख्या सात और अधिकतम संख्या निर्गमित अंशों की संख्या से अधिक नहीं हो सकती । जबकि एक निजी कम्पनी में सदस्यों की न्यूनतम संख्या दो और सदस्यों की अधिकतम संख्या 200 होती है। 

कम्पनी नागरिक नहीं- भारतीय विधान की धारा 19 के अनुसार कम्पनी एक नागरिक नहीं है। इसे नागरिक की भाँति मौलिक अधिकार भी प्राप्त नहीं हैं। अतः कम्पनी अपने मौलिक अधिकारों के लिए वाद प्रस्तुत नहीं कर सकती। 

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निजी कम्पनी से आशय

Meaning of Private Company

भारतीय कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 2 (68) के अनुसार, एक निजी कम्पनी से आशय ऐसी कम्पनी से है जो अपने अन्तर्निमयों द्वारा 

(i)अपने अंशों के हस्तान्तरण के अधिकार पर प्रतिबन्ध लगाती है।

(ii) अपने सदस्यों की संख्या 200 तक सीमित करती है।

(iii) कम्पनी के अंशों अथवा ऋणपत्रों को जनता द्वारा क्रय करने के लिये निमन्त्रण देने पर रोक लगाती है।निजी कम्पनी के निर्माण के लिये कम से कम दो सदस्यों काहोना अनिवार्य है और अपने नाम के अन्त में Private Limited शब्द लिखना अनिवार्य है। निजी कम्पनी को प्राप्त विशेषाधिकार एवं छूटें (Privileges and Exemptions of Private Co.)-कम्पनी अधिनियम 2013, में एक निजी कम्पनी को विशेष दशाओं में एक सार्वजनिक कम्पनी की अपेक्षा कुछ छूटे प्राप्त हैं जिनको निजी कम्पनी के विशेषाधिकार कहा जाता है। इन विशेषाधिकारों को हम दो भागों में बाँट सकते हैं 

  • सभी निजी कम्पनियों को प्राप्त विशेषाधिकार या छूट।

(II) स्वतन्त्र निजी कम्पनी को प्राप्त विशेषाधिकार (जो सार्वजनिक कम्पनी की सहायक कम्पनी नहीं है) . 

सभी निजी कम्पनी को प्राप्त विशेषाधिकार

(Privileges available to all private companies)

(1) सदस्य संख्या (Number of Members)—

एक निजी कम्पनी की न्यूनतम सदस्य संख्या केवल 2 है। 

(2) अंशों का आवंटन (Allotement of Shares)

निजी कम्पनी न्यूनतम अभिदान राशि प्राप्त होने से पहले ही शेयरों का आवंटन आरम्भ कर सकती है। अर्थात् निजी कम्पनी में अंशों के आवंटनपर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। 

(3) प्रविवरण (Prospectus)

एक निजी कम्पनी प्रविवरण अथवा स्थानापन्न प्रविवरण (statemetnt in liew of prospectus) पंजीयक के पास फाइल किये बिना शेयरों का आवंटन कर सकती है। 

(4) नये शेयर जारी करना (Further issue of shares)-

धारा 81 के प्रावधान जो नये शेयर जारी करने के बारे में हैं, निजी कम्पनी पर लागू नहीं होते। 

(5) व्यापार शुरु करना (Commencement of business)-

एक निजी कम्पनी समामेलन का प्रमाण पत्र लेने के तुरन्त बाद व्यापार शुरू कर सकती है। 

(6) वित्तीय सहायता (Financial assistance)

एक निजी कम्पनी अपने या अपनी सूत्रधारी कम्पनी के शेयर खरीदने के लिए किसी को भी वित्तीय सहायता दे सकती है । 

(7) वैधानिक सभा (Statutory Meeting)

निजी कम्पनी को वैधानिक सभा बुलाने अथवा वैधानिक रिपोर्ट फाइल करने की आवश्यकता नहीं है। 

(8) संचालकों की संख्या (Number of directors)-

एक निजी कम्पनी के लिए 2 से अधिक संचालक रखना आवश्यक नहीं है।

(9) चुनाव की मांग (Demand for poll)

यदि सात से कम लोग व्यक्तिगत रूप से उपस्थित है (personaly present) तो किसी भी प्रस्ताव पर कोई एक सदस्य या प्रोक्सी चुनाव की माँग कर सकता है । यदि यह गिनती 7 से ज्यादा है तो कोई दो ऐसे लोग चुनाव की मांग कर सकते हैं। 

(10) संचालकों से सम्बन्धित नियम (Rules regarding directors)

संचालक के रूप में कार्य करने सम्बन्धित स्वीकृति फाइल करना, योग्यता शेयर खरीदना, उन अनुबन्धों के सम्बन्ध में मत देने की मनाही जहां उनका अपना हित हो, यह सभी रुकावटें निजी कम्पनी के संचालकों पर लागू नहीं होती। एक ही प्रस्ताव द्वारा दो या इससे अधिक निर्देशक भी नियुक्त किए जा सकते हैं। अन्तर्नियमों में दी गई सीमा से अधिक निर्देशक नियुक्त करने के लिए केन्द्रीय सरकार की आज्ञा नहीं लेना पड़ती। 

(11) प्रबन्ध पारिश्रमिक (Managerial Remuneration)–

एक निजी कम्पनी में प्रबन्धकीय पारिश्रमिक के प्रतिशत की अधिकतम सीमा अर्थात् 11% लागू नहीं होती। 

स्वतन्त्र निजी कम्पनी के विशेषाधिकार (Special Privileges of an Independent private company)

एक निजी कम्पनी जो सार्वजनिक कम्पनी की सहायक कम्पनी नहीं है, को निम्नलिखित विशेषाधिकार प्राप्त हैं –

(1) अपने शेयर खरीदने या उन पर अभिदान के लिए निजी कम्पनी वित्तीय सहायता दे सकती है। 

(2) अपनी साधारण सभा, सूचना,कोरम, चेयरमैन,प्राक्सी,मतदान तथा चुनाव के सम्बन्ध में निजी कम्पनी अपने अन्तर्नियमों में प्रावधान बना सकती है फिर उस पर कम्पनी अधिनियम के यह प्रावधान लागू नहीं होते। 

(3) प्रबन्धकीय पारिश्रमिक के प्रावाधान निजी कम्पनी में लागू नहीं होते।

(4) कोई भी संस्था, फर्म या संघ ऑफिस ग्रहण कर सकता है। 

(5) संचालकों एवं मैनेजर से सम्बन्धित विशेषाधिकार एवं छूटे-संचालकों के सम्बन्ध में एक निजी कम्पनी को निम्नलिखित विशेषाधिकार एवं छूटे प्राप्त हैं  एक निजी कम्पनी के संचालकों को बारी-बारी से अवकाश ग्रहण करना आवश्यक 

(i) एक निजी कम्पनी को अपने संचालकों की संख्या बढ़ाने के लिये केन्द्रीय सरकार की सहमति लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती। 

(iii) प्रत्येक संचालक की नियुक्ति के लिये निजी कम्पनी में अलग प्रस्ताव की आवश्यकता नहीं है। दो या दो से अधिक संचालक एक ही प्रस्ताव द्वारा नियुक्त किये जा सकते हैं। 

(iv) संचालकों के नियुक्ति के प्रतिबन्ध एक निजी कम्पनी पर लागू नहीं होते ।

(v) एक निजी कम्पनी अपने संचालकों को ऋण आदि दे सकती है। (vi) एक निजी कम्पनी के संचालक मण्डल के अधिकारों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। 

(vii) यदि निजी कम्पनी के साथ कोई ऐसा प्रसंविदा है. जिसमें संचालकों का हित है, तो वे संचालक इस प्रसंविदे से सम्बन्धित बातचीत में भाग ले सकते हैं तथा वोट भी दे सकते 

(viii) एक निजी कम्पनी के संचालकों के पारिश्रमिक में वृद्धि करने के लिए केन्द्रीय सरकार की सहमति की आवश्यकता नहीं है । 

(ix) एक निजी कम्पनी प्रबन्ध संचालक की तरह एक ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति कर सकती है जो पहले से ही एक से अधिक कम्पनियों का प्रबन्ध संचालक या मैनेजर हो । 

(7) अन्य कम्पनियों को ऋण देने सम्बन्धित प्रतिबन्ध इन कम्पनियों पर लागू नहीं होते। 

इन विशेषाधिकारों के कारण ही निजी कम्पनी को समामेलित साझेदारी (incorporated Partnership) कहते हैं । इसको दोनों लाभ प्राप्त हैं—साझेदारी जैसी गोपनीयता एवं कम्पनी सा शाश्वत अस्तित्व । यदि निजी कम्पनी अन्तर्नियमों द्वारा लगाई शर्तों का उल्लंघन करती है तो इसके यह विशेषाधिकार छिन जाते हैं।

एक सार्वजनिक कम्पनी मानी जाने वाली निजी कम्पनी (deemed public company)-ऊपरलिखित विशेषाधिकारों पर अधिकार नहीं रखती। इसी तरह एक निजी कम्पनी, जो सार्वजनिक कम्पनी की सहयोगी कम्पनी है, को भी यह सभी विशेषाधिकार नहीं मिलते। 

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सार्वजनिक कम्पनी से आशय 

Meaning of Public Company

कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 2 (71) के अनुसार “सार्वजनिक कम्पनी वह कम्पनी है जो निजी कम्पनी नहीं है।” यद्यपि यह परिभाषा निजी कम्पनी की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करती तथापि इससे यह जरूर समझ में आ जाता है कि सार्वजनिक कम्पनी पर लगने वाले प्रतिबन्ध निजी कम्पनी पर लागू नहीं होते। इस प्रकार सार्वजनिक कम्पनी के अन्तर्नियमों में निम्नलिखित प्रावधान होते हैं 

(1) न्यूनतम सदस्य संख्या 7 तथा अधिकतम सदस्य संख्य पर कोई रोक नहीं।

(2) शेयरों का सरलता से हस्तांतरण । 

(3) शेयरों तथा ऋणपत्रों को जन साधारण को जारी करने की स्वीकृति ।

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(I) निजी कम्पनी का सार्वजनिक कम्पनी में परिवर्तन 

(Conversion of a Private Company into a Public Company)

एक निजी कम्पनी निम्नलिखित तीन दशाओं में सार्वजनिक कम्पनी

में बदल सकती है।

(1) चूक द्वारा परिवर्तन

(2) कानूनी प्रक्रिया द्वारा परिवर्तन

(3) अपनी इच्छा से परिवर्तन हम यहाँ पर “अपनी इच्छा से परिवर्तन” विधि का अध्ययन करेंगे। 

Note-चूक द्वारा परिवर्तन व कानूनी प्रक्रिया द्वारा परिवर्तन विधियों का अध्ययन “निजी कम्पनी को सार्वजनिक कम्पनी माना जाना” शीर्षक के अन्तर्गत करेंगे। 

ऐच्छिक परिवर्तन

(Conversion by Choice)

यदि कोई निजी कम्पनी अपने को सार्वजनिक कम्पनी में परिवर्तित करना चाहे तो उसे कम्पनी अधिनियम 2013 की धारा 243 के अन्तर्गत निम्न विधि अपनानी होगी 

(1) अन्तर्नियमों में परिवर्तन करना (To Change the Articles of Association).

-यदि एक निजी कम्पनी अपने पार्षद अन्तर्नियमों में परिवर्तन करने हेतु उन प्रतिबन्धों को हटाती है जो अंश हस्तान्तरण सदस्यों की संख्या तथा अंश अभिदान से सम्बन्धित होते है. तो ऐसी निजी कम्पनी को इस सम्बन्ध में प्रस्ताव पारित करने की तिथि से सार्वजनिक कम्पनी माना जाएगा। 

(2) रजिस्ट्रार को प्रविवरण या स्थानापन्न प्रविवरण भेजना (To File the Prospectus or Statement in Lieu of Prospectus with the Registrar)

यदि कोई निजी कम्पनी सार्वजनिक कम्पनी में बदलने के लिए प्रस्ताव पारित करती है तो ऐसी निजी कम्पनी को अपने पार्षद अन्तर्नियमों में किए गए परिवर्तन के 30 दिन के अन्दर रजिस्ट्रार के पास या तो प्रविवरण या स्थानापन्न प्रविवरण फाइल करना चाहिए। इस प्रविवरण में वह सब विषय लिखना चाहिए जो द्वितीय अनुसूची के प्रथम भाग में दिया हुआ है अथवा उसके स्थानापन्न विवरण में चतुर्थ अनुसूची के भाग में दी हुई सूचनाएँ लिखी जानी चाहिए। 

(3) नाम एवं पंजी वाक्य में परिवर्तन करना (To change the Name and Capital Clause)-

इस उद्देश्य के लिए अंशधारियों को 21 दिन के नोटिस पर एक सभा बुलाई जाएगी। नाम वाक्य में परिवर्तन अर्थात ‘प्राइवेट’ शब्द को हटाकर तथा इसके स्थान पर लिमिटेड शब्द को जोड़ने के लिए उपस्थित अंशधारियों के 3/4 बहुमत के द्वारा एक विशेष प्रस्ताव पारित करना होगा। पंजी वाक्य में परिवर्तन अर्थात कल पूँजी की मात्रा और उसके विभिन्न प्रकार के अंशों में विभाजन एवं इनके स्वतन्त्र हस्तान्तरण हेतु एक साधारण प्रस्ताव पारित किया जाएगा।

(4) सदस्यों एवं संचालकों की संख्या में परिवर्तन (To Change the number of Members & Directors)-

एक निजी कम्पनी का सार्वजनिक कम्पनी में परिवर्तन करने के लिए आवश्यक है कि कम्पनी में कम से कम 7 सदस्य और 3 संचालक हो । 

(5) दण्ड की व्यवस्था (Provision of Penalty)-

वैधानिक व्यवस्था एवं प्रक्रिया का पालन न करने पर कम्पनी तथा कम्पनी के प्रत्येक दोषी अधिकारी पर जो यह गलती करता है,500 रुपये प्रतिदिन की दर से दण्ड लगाया जा सकता है। .

(6)विधि (Procedure)-

जब किसी निजी कम्पनी को सार्वजनिक कम्पनी में बदलना होता है तो संचालक ऐसा करने के लिए एक प्रस्ताव रखते हैं और असाधारण सभा (Extra-ordinary Meeting) इस प्रस्ताव को पारित करने के लिए बुलाते हैं। जिस दिन यह प्रस्ताव विशेष प्रस्ताव की तरह पारित हो जाता है उसी दिन से निजी कम्पनी सार्वजनिक कम्पनी में परिवर्तित हो जाती है। इसकी सूचना रजिस्ट्रार को भेजनी पड़ती हैं । ऐसा परिवर्तन कम्पनी के वैधानिक अस्तित्व को प्रभावित नहीं करता।

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(II) सार्वजनिक कम्पनी को निजी कम्पनी में परिवर्तित करना 

(Conversion of Public Company into a Private Company) 

कम्पनी अधिनियम की धारा 2(68) के अनुसार किसी भी सार्वजनिक

कम्पनी को निजी कम्पनी में बदलने के लिये निम्न विधि अपनाई

जानी चाहिये 

(1) अन्तर्नियमों में परिवर्तन-किसी भी सार्वजनिक कम्पनी में विशेष प्रस्ताव केद्वारा अन्तर्नियमों में परिवर्तन करके एक निजी कम्पनी में बदला जा सकता है।

(2) केन्द्रीय सरकार की स्वीकृति प्राप्त करना-अन्तर्नियमों में किये गये परिवर्तनों पर जब तक केन्द्रीय सरकार की स्वीकृति प्राप्त नहीं होती तब तक कोई भी कम्पनी सार्वजनिक कम्पनी से निजी कम्पनी नहीं बन सकती। 

(3) परिवर्तित अन्तर्नियमों की प्रतिलिपि रजिस्टार के पास प्रस्तुत करना-जब कम्पनी को अन्तर्नियमों में परिवर्तन के पश्चात् सरकार की अनुमति प्राप्त हो जाती है तो इस अनुमति के मिलने के पश्चात् 30 दिन के भीतर परिवर्तित अन्तर्नियमों की प्रतिलिपि को कम्पनी रजिस्ट्रार के पास भेजना आवश्यक है, ताकि वह अपने रजिस्टर में उस कम्पनी को सार्वजनिक कम्पनी के बदले निजी कम्पनी लिख. सके।कोई भी सार्वजनिक कम्पनी यदि उपर्युक्त शर्ते पूरी कर देती है तो निश्चय ही वह निजी कम्पनी के रूप में परिवर्तित हो जाएगी। इसके पश्चात् उसे तुरन्त अपने सदस्यों की संख्या को निजी कम्पनी के लिए निर्धारित सीमा तक कम करना तथा अपने नाम के पश्चात् ‘प्राइवेट शब्द लिखना अनिवार्य होगा। 

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समामेलन का पर्दा (Corporate Veil)

समामेलन का पर्दा (Corporate Veil) नियम कम्पनी की स्वतन्त्र वैधानिक सत्ता के सिद्धान्त पर आधारित है। इसके अनुसार कम्पनी एवं सदस्यों के बीच एक पर्दा या आवरण होता है। जो कम्पनी को अपने सदस्यों से अलग वैधानिक अस्तित्व प्रदान करता है और कम्पनी की देनदारियों का दायित्व कम्पनी पर होता है और सदस्यों पर नहीं। कभी-कभी पर्दे को बांधकर कम्पनी के नाम से पर्दे में रहकर काम कर रहे व्यक्तियों की सच्चाई जानना आवश्यक हो जाता है। अतः उस समय न्यायालय कम्पनी की पृथक् वैधानिक सत्ता नहीं मानते। इस परिवर्तन को कम्पनी या निगम के आवरण को बेधन करना कहते हैं। 

कम्पनी/निगम आवरण सिद्धान्त के अपवाद 

(Exceptions of the Principle of Company Corporate veil)

(1) कपट या अनुचित व्यवहार की दशा में

(2) राजस्व की चोरी होने पर

(3) विदेशी दुश्मन के अधिकार में कम्पनी का नियन्त्रण होना।

(4) जब सदस्य संख्या वैधानिक न्यूनतम सीमा से कम हो जाये

(5) विनिमय-विपत्रों पर कम्पनी का नाम निर्दिष्ट न करने पर .

(6) प्रविवरण में मिथ्यावर्णन की दशा में ..

(7) प्रार्थना-पत्र की राशि न लौटाने की स्थिति में

(8) कम्पनी का पूरा नाम प्रकट न किये जाने पर

(10) कम्पनी द्वारा अंशधारियों के एजेण्ट के रूप में कार्य करने पर

(11) सूत्रधारी तथा सहायक कम्पनी के रूप में सम्बन्धित होने की दशा में

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अवैधानिक संघ 

(Illegal Association)

अवैधानिक संघ से आशय ऐसे संघ से हैं जिसका निर्माण कम्पनी अधिनियम 2013, की धारा 464 का उल्लंघन करके दिया जाता है। जैसे किसी कम्पनी संघ या साझेदारी संस्था में जो बैंकिग व्यवसाय करती है 10 से अधिक व्यक्ति और अन्य की दशा में 20 से अधिक व्यक्ति नहीं होने चाहियें अर्थात जब किसी कम्पनी, संघ या साझेदारी संस्था में उक्त संख्या से अधिक सदस्य हो जाते हैं तो वह अवैधानिक संघ कहलाते हैं। अवैध संघों के प्रभाव-यदि कम्पनी अधिनियम की धारा 11 का उल्लंघन करके अवैध संघों का निर्माण किया जाता है तो उसके निम्नलिखित प्रभाव होंगे 

(1) यह संघ अपने नाम से कोई अनुबन्ध नहीं कर सकता। 

(2) ऐसा संघ न तो किसी बाहरी व्यक्ति पर और न ही अपने सदस्य पर वाद प्रस्तुत कर सकता है । यही नहीं, ऐसे संघ का कोई भी सदस्य किसी अन्य सदस्य पर भी वाद प्रस्तुत नहीं कर सकता।

(3) एक अवैध संघ उसके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दी गयी राशि को वापिस नहीं किया जा सकता है। 

(4) एक अवैध संघ का कोई पृथक् वैधानिक अस्तित्व नहीं होता है  

(5) अधिनियम की व्यवस्थाओं के अन्तर्गत लेनदार व सदस्य की इच्छा पर इसका समापन नहीं किया जा सकता।

(6) अवैधानिक संस्था के लाभों पर आयकर लगाया जाता है और कर की राशि को चुकाने के लिए संस्था का प्रत्येक सदस्य उत्तरदायी होता है। 

(7) ऐसी संस्था के लेनदार अपनी धनराशि वसूल करने के लिये संस्था के

समापन हेतु न्यायालय में मुकदमा नहीं चला सकते

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अपवाद (Excaption) 

(1) ऐसी संस्था पर जिसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं है यह नियम लागू नहीं होता। 

(2) पारिवारिक व्यवसाय कर रहे एक संयुक्त हिन्दू परिवार पर भी यह व्यवस्थ लाग नहीं होगी। उसमें चाहे कितने भी वयस्क सदस्य क्यों न हों। 

एक व्यक्ति वाली कम्पनी 

(One Man Company)

कम्पनी अधिनियम 2013 धारा 2(62) के अनुसार एक निजी कम्पनी में कम से कम दो व सार्वजनिक कम्पनी में कम से कम सात सदस्य होने अनिवार्य हैं। अतः विधान के अन्तर्गत एक व्यक्ति कम्पनी का प्रावधान नहीं है। लेकिन कुछ चालाक व्यक्ति वैधानिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कम से कम दो या सात जैसा आवश्यक हो. नाम मात्र के सदस्य दिखाकर कम्पनी का पंजीयन करा लेते हैं और उसके अधिकांश अंश स्वयं खरीद लेते है और शेष सदस्य जो उसके अपने रिश्तेदार होते हैं को मात्र एक या दो अंश देते हैं। इस प्रकार कम्पनी के समस्त कार्य-कलापों पर उनका नियमन एवं नियन्त्रण हो जाता है। ऐसी कम्पनी को एक व्यक्ति कम्पनी कहते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि वह व्यक्ति जिसके पास किसी कम्पनी के 50% से अधिक अंशपूंजी या लगभग सारी अंश पूंजी होती है उसे एक व्यक्ति वाली कम्पनी कहा जाता है। इस तरह वह व्यक्ति सीमित दायित्व के साथ व्यापार के सभी लाभों का आनन्द लेता है। ऐसी कम्पनियां पूर्णतया वैध हैं एवं गैर कानूनी नहीं है। 

कम्पनी अधिनियम, 2013 

(Company Act, 2013)

कम्पनियों के सम्बन्ध में विधि को एकीकृत एवं संशोधित करता है । इस अधिनियम में 470 धारायें है जिन्हें 29 अध्यायों में दिया गया है । इस अधिनियम के साथ 7 अनुसूचियाँ लगी हैं। 

कम्पनी अधिनियम, 2013 के उद्देश्य निम्नलिखित है 1. कम्पनियों के सम्बन्ध में विधि को स्वीकृत एवं संशोधित करना 2. खुले वैश्विक बाजार में उद्यमियों को मुक्त पहुँच प्रदान करना, 3. कम्पनियों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करना, 4. निवेशकों एवं स्टेकधारकों के हितों का संरक्षण करना। 

कम्पनी अधिनियम, 2013 का प्रशासन 

(Administration of the Companies Act, 2013) वर्तमान में कम्पनी अधिनियम 2013 का प्रशासन निम्निलिखित एजेन्सियों द्वारा किया जाता है  

(1) केन्द्रीय सरकार (The Central Government)

केन्द्रीय सरकार द्वारा कम्पनी कार्य विभाग के माध्यम से कम्पनी अधिनियम 2013 का प्रशासन किया जाता है। कम्पनी शक्तियों एवं कर्तव्यों को किसी उचित प्राधिकारी को प्रत्योजित करने की शक्ति प्राप्त है। केन्द्रीय सरकार द्वारा कम्पनी विधि के प्रशासन सम्बन्धी शक्तियों को कम्पनी अधिनियम के अधीन गठित प्राधिकारी को प्रत्यायोजित कर दिया गया है।

(2) राष्ट्रीय कम्पनी विधि न्यायाधिकरण (National Comapny Law Tribunal NCLT)-

कम्पनी लॉ बोर्ड के स्थान पर राष्ट्रीय कम्पनी विधि न्यायाधिकरण बनाया गया है। कम्पनी लॉ बोर्ड के समक्ष विचारधीन मामलों को अब न्यायाधिकरण को अन्तरित किया जायेगा। कम्पनी लॉ बोर्ड को कुछ शक्तियों केन्द्रीय सरकार के पास तथा कुछ राष्ट्रीय कम्पनी विधि न्यायाधिकरण को अन्तरित कर दी गयी है। 

(3) अपीलीय न्यायाधिकरण (Appellate Tribunal)-

राष्ट्रीय कम्पनी विधि न्यायाधिकरण के निर्णय या आदेश से पीड़ित व्यक्ति राष्ट्रीय कम्पनी विधि अपीलीय न्यायधिकरण में अपील कर सकता है। राष्ट्रीय कम्पनी विधि न्यायाधिकरण के आदेश या निर्णय के 45 दिन के भीतर अपील की जा सकती है। परन्तु अपीलीय न्यायाधिकरण को पर्याप्त कारण बताये जाने पर वह और आगे 45 दिन तक अपील को स्वीकार कर सकता है। 

(4) कम्पनी रजिस्ट्रार (Registrar of Companies)-

कम्पनी रजिस्ट्रार एक सार्वजनिक कार्यालय होता है जहाँ कम्पनियों को प्रपत्र एवं विवरणपत्र फाइल करने होते हैं तथा जनता द्वारा इन प्रपत्रों का निरीक्षण किया जा सकता है। 

(5) राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिग प्राधिकरण National Financial Reporting Authority (NFRA)

कम्पनी अधिनियम 1956 के अधीन गठित लेखांकन प्रमापों पर राष्ट्रीय परामर्श समिति का नाम कम्पनी अधिनियम, 2013 द्वारा बदलकर राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण कर दिया गया है। यह अर्द्ध-सरकारी प्राधिकरण है। 

(6) भारतीय प्रतिभति एवं विनिमय बोर्ड (Securitics and Exchange Boardan SEBI)-

केन्द्रीय सरकार ने विनियोजकों के हित संरक्षण हेतु भारतीय प्रतिभागि विनिमय बोर्ड (सेबी) का गठन किया है। यह प्रतिभूति बाजार का नियमन करता है। सेबी अपने कर्तव्यों एवं कार्यों को प्रभावी ढंग से निभा सके,केन्द्रीय सरकार ने इसे सूचीयत कम्पनियों का दशा में प्रतिभतियों के निगमन एवं हस्तान्तरण तथा लाभांश का भुगतान न करने के बारे में शक्तियाँ दी है। 

(7) सरकारी समापक (Offical Liquidators)

राष्ट्रीय कम्पनी विधि न्यायाधिकरण द्वारा कम्पनियों के समापन के उददेश्यार्थ एक सरकारी समापक होगा। सरकारी समापन दस एकाउन्टेटों, वकीलों, कम्पनी सचिवों लागत एवं कार्य लेखाकारों की पेशेवर फौ पनल नियुक्त किया जा सकता है। यह केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित पेशेवरों वाला नियमित 

निकाय हो सकता है। 

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निगमित कम्पनियाँ 

(Incorporated companies)

कम्पनियाँ आगे लिखी हुई पद्धतियों से निगमित की जा सकती हैं 

(1) राज्य आज्ञा पत्र द्वारा (By Royal Charter)-

जब किसी विशेष कार्य करने की आवश्यकता पड़ती थी, तो सरकार द्वारा राज्य आज्ञापत्र से कम्पनी का निर्माण किया जाता था। ऐसी कम्पनी का उदाहरण ईस्ट इण्डिया कम्पनी है। वर्तमान कम्पनियों की तुलना में इन कम्पनियों के बहुत अधिकार होते थे। अब इस प्रकार की कम्पनियाँ न तो इंग्लैण्ड में हैं और न भारत में। 

(2) संसद के विशेष अधिनियम द्वारा (By Special Act of Parliament)

संसद व विधानसभाएँ विशेष अधिनियम द्वारा कम्पनियों की स्थापना करती हैं। इस प्रकार की कम्पनियाँ राष्ट्रीय महत्व का व्यापार करने के लिए स्थापित की जाती हैं। ऐसी कम्पनियों को वैधानिक कम्पनियाँ (Statutory Companies) कहा जाता है। भारत में इस प्रकार की कम्पनियों के बहुत से उदाहरण हैं, जैसे-भारत का स्टेट बैंक एवं रिजर्व बैंक, जीवन बीमा निगम, औद्योगिक वित्त निगम एवं वित्त निगम एवं भारत का यूनिट ट्रस्ट, आदि। इन कम्पनियों के नाम के अन्त में ‘लिमिटेड’ नहीं लिखा जाता है। 

(3) कम्पनी अधिनियम द्वारा (By Incorporation Under Companies Act)

विशेष अधिनियम द्वारा स्थापित कम्पनियों को छोड़कर भारत की सभी कम्पनिया कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित की जाती हैं। बहुत-सी ऐसी कम्पनियाँ हैं, जिनका जीकरण किसी अन्य अधिनियम के अन्तर्गत होता है,परन्तु वे साथ ही साथ कम्पनी अधिनियम, 105 द्वारा भी विनियमित होती हैं, जैसे बैंकिंग कम्पनियों के लिए बैंकिंग रेगुलेशन अधिनियम, बीमा कम्पनियों के लिए बीमा अधिनियम, 1938; और बिजली कम्पनियों के लिए बिजली (पूर्ति) अधिनियम, 1948 बनाये गये हैं। 

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विदेशी कम्पनी 

(Foreign Company)

विदेशी कम्पनी से आशय ऐसी कम्पनी से है जो भारत के अतिरिक्त किसी अन्य देश म समामेलित हो, किन्त वह भारत में व्यापार कर रही हो । कम्पनी अधिनियम की धारा 2(42) के अनुसार, “विदेशी कम्पनी से आशय भारत के बाहर समामेलित उस कम्पनी से है जिसन (i) 1 अप्रैल, 1956 के बाद भारत में व्यापार करने का स्थान स्थापित किया है या (ii) 1 अप्रैल, 1956 से पूर्व भारत में व्यापार करने का स्थान स्थापित किया था जो 1 अप्रैल, 1956 तक चालू रहा।” विदेशी कम्पनियों द्वारा रजिस्ट्रार को प्रस्तुत किये जाने वाले प्रपत्र- . … कम्पनी अधिनियम के आधीन प्रत्येक विदेशी कम्पनी को जो कम्पनी अधिनियम लागू होने के उपरान्त भारत में अपने व्यापार का स्थान स्थापित करती है तो उसे स्थान स्थापित करने । के 30 दिन के अन्दर रजिस्ट्रार के पास रजिस्ट्री के लिये निम्नलिखित प्रपत्र पेश करने पड़ते 

(i) कम्पनी के चार्टर, परिनियम (Statutes) या पार्षद सीमानियम और अन्तर्नियम अथवा उसके संविधान से सम्बन्धित किसी अन्य विलेख की प्रमाणित प्रतिलिपि । यदि ये प्रपत्र अंग्रेजी भाषा में नहीं हैं तो अंग्रेजी अनुवाद की एक प्रमाणित प्रतिलिपि । 

(ii) कम्पनी के पंजीकृत अथवा प्रधान कार्यालय का पूरा पता। .

(iii) कम्पनी के संचालकों एवं सचिव की सूची जिसमें प्रत्येक का पूरा नाम तथा उपनाम, आवासीय पता, राष्ट्रीयता, पेशा आदि का उल्लेख रहना चाहिए। 

(iv) भारत में रहने वाले किसी एक अथवा उससे अधिक व्यक्तियों के नाम पते जो कम्पनी की ओर से सूचना अथवा अन्य प्रलेख प्राप्त करने के लिए अधिकृत किये गए हों। 

(v) कम्पनी के भारत स्थित कार्यालय का पूरा पता जिसे भारत में उसके कारोबार का प्रधान कार्यालय माना जाता है।। 

कम्पनी अधिनियम के अनुसार यदि उपर्युक्त प्रपत्रों में किसी भी प्रपत्र में कोई परिवर्तन किया जाता है तो कम्पनी को निर्दिष्ट समय के अन्दर रजिस्ट्रार को सूचित कर देना होगा। एक विदेशी कम्पनी को निम्न दशाओं में भारतीय कम्पनी माना जायेगा 

(1) जब कम्पनी भारत में व्यापार करती है तथा कम्पनी का भारत में व्यापारिक स्थल स्थापित है तथा 

(2) इस कम्पनी की चुकता पूँजी का 51% भाग निम्न के स्वामित्व में है

(i) एक या अधिक भारत के नागरिकों के स्वामित्व में अथवा

(ii) भारत में समाभेलित किसी एक या अधिक संस्था या संस्थाओं के स्वामित्व में।

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