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Bcom 2nd year leadership-Concept, styles and Theories

Bcom 2nd year leadership-Concept, styles and Theories

नेतृत्व 

(Leadership)

नेतृत्व प्रबन्ध की आत्मा है । प्रबन्ध के लिये नेतृत्व गुणों को इतना अधिक महत्व दिया गया है कि अनेक बार लोगों को यह प्रतीत होने लगता है कि प्रबन्धक एवं नेता एक समान हैं। कूण्ट्ज एवं ओ’डोनेल ने प्रबन्ध में नेतृत्व की भूमिका दर्शाते हुए कहा है कि “प्रबन्धकों को नेता अवश्य होना चाहिए, चाहे नेतागण प्रबन्धक हों अथवा नहीं।” अतः कोई प्रबन्धक अपने नेतृत्व गुणों से अधीनस्थों से वांछित कार्य को पूर्ण नहीं करा लें, तब तक संगठन के उद्देश्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता है। 

नेतृत्व से आशय मार्गदर्शन करना, संचालन करना, निर्देशित करना तथा पहले स्वयं आगे आकर पहल करना आदि है। व्यक्तियों में बड़ी योग्यताएँ छिपी होती हैं, नेता उनको विकसित कर उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए श्रेष्ठतम उपयोग करवाने में अपने अनुयायियों की सहायता करना है। नेता एक नये वातावरण को जन्म देता है, जिसके अन्तर्गत लोग उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बैचेन हो जाते हैं। 

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कई विद्वानों ने नेतृत्व की परिभाषाएँ दी हैं। उनमें से अग्रलिखित प्रमुख हैं 

जॉर्ज आर० टैरी के अनुसार, “नेतृत्व ऐसे व्यक्तियों का सम्बन्ध है, जिसके अन्तर्गत एक व्यक्ति अथवा नेता दूसरों को सम्बन्धित कार्यों पर स्वेच्छा के साथ-साथ कार्य करने को प्रभावित करता है, ताकि नेता द्वारा इच्छित उद्देश्यों की प्राप्ति की जा सके।” – मूने एवं मेले के अनुसार, “प्रक्रिया में प्रवेश करते समय अधिकारी वर्ग जो स्वरूप धारण करता है, उसे नेतृत्व कहते हैं।” 

नेतृत्व के लक्षण/विशेषताएँ 

(Characteristics of Leadership)

प्रभावी नेतृत्व के प्रमुख लक्षण अग्रलिखित होते हैं- 

(1) आदर्श आचरण-नेता अपने आचरण द्वारा अनुयायियों के समक्ष एक आदर्श प्रस्तात करता है। उनके अनुयायी यह चाहते हैं कि उनका नेता केवल नेता ही न रहकर एक आदर्श पुरुष भी हो, ताकि वे उसका अनुसरण कर सकें। 

(2) परिस्थितियों का ध्यान नेतत्व बहत कछ परिस्थितियों एवं वातावरण पर निर्भर है। हो सकता है कि एक व्यक्ति कल परिस्थितियों में तो सफलता प्राप्त कर भार ।। 

(3) गतिशील प्रक्रिया प्रत्येक संगठन में नेतृत्व की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। संस्थान की स्थापना से लेकर जब तक संस्थान विद्यमान रहता है, तब तक नत्व का माक्रया चलती रहती है। 

(4) हितों की एकता नेता तथा उसके अनुयायियों के हितों में एकता होती है। नेतृत्व उस समय प्रभावहीन हो जाता है जबकि नेता तथा उसके अनुयाया पृथक-पृथक ७६चा क लिए काय करते हैं । जॉर्ज आर० टैरी के शब्दों में “नेतत्व परस्पारिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए लोगों को स्वेच्छा से प्रयत्न करने के लिए प्रभावित करने की क्रिया है।”

(5) यथार्थवादी दृष्टिकोण नेतृत्व के इस लक्षण के अनुसार उसका मानव आचरण के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण होना चाहिए।

(6) अनुयायियों का होना-अनुयायियों के अभाव में नेतृत्व की कल्पना तक नहीं की जा सकती है । अतः नेता के साथ-साथ उसके अनुयायियों का भी होना नितान्त आवश्यक है। जितने अधिक अनुयायी होंगे, नेता का महत्व उतना ही अधिक होगा। 

(7) क्रियाशील सम्बन्ध–नेता तथा उसके अनुयायियों का पारस्परिक सम्बन्ध निष्क्रिय न होकर क्रियाशील होता है। किसी कार्य का निष्पादन करने में नेता सबसे आगे खड़ा होकर अपने अनुयायियों का मार्गदर्शन करता है। . (8) आत्मबोध-नेतृत्व के इस अंतिम लक्षण के अनुसार नेता को स्वयं के विषय में भ्रान्ति नहीं होनी चाहिए । उसे अपनी शक्तियों एवं दुर्बलताओं का सही-सही ज्ञान होना चाहिए। 

नेतृत्व के कार्य 

(Functions of Leadership)

नेतृत्व के कार्यों को कई अर्थों में लिया जाता है, लेकिन मुख्यतया नेतृत्व के निम्न कार्य माने जा सकते हैं- 

(1) अभिप्रेरणा व समन्वय नेतृत्व का दूसरा कार्य है, समूह सदस्यों को क्षमतानसार कार्य करने के लिए प्रेरित करना तथा उनके कार्य में समन्वय उत्पन्न कर लक्ष्य को प्राप्त करना । 

(2) निर्देशन एवं नियोजन नेतृत्व का प्रमुख कार्य है, कार्य का नियोजन तथा उपक्रम के सदस्यों का लक्ष्य प्राप्ति की ओर निर्देशन । समूह का नेता समूह के प्रतिनिधि के रूप में उच्च स्तरीय बैठकों में भाग लेता है तथा उपक्रम के लक्ष्य एवं नीतियाँ निर्धारित करने में सहयोग करता है। इसके उपरान्त वह उन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सदस्यों का मार्गदर्शन करता है। 

(3) स्वास्थ्यप्रद वातावरण का निर्माण-एक उपक्रम में संगठनात्मक वातावरण का कर्मचारियों के कार्य पर बहुत प्रभाव पड़ता है । नेता का यह कार्य है कि वह अपने विभाग में ऐसे स्वस्थ व मित्रतापूर्ण वातावरण का निर्माण करे, जिससे कर्मचारी इच्छापूर्वक तथा प्रसन्नता  के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित हों। कर्मचारियों के मध्य व्याप्त आपसा माना ” कदुताओं को दूर करने का प्रयास भी नेता को करना चाहिए, अन्यथा इनसे काय वा दूषित होता है। 

(4) सदस्यों को प्रोन्नति तथा विकास-नेतत्व का यह महत्वपूर्ण कार्य है कि वह अपने समूह सदस्यों की आकांक्षाओं तथा इच्छाओं को समझे और उन्हें सन्तुष्ट करने में योगदान दे । इसके साथ ही सदस्यों को आगे बढ़ने और विकास करने के अवसर भी प्रदान करे ।

(5) पुरस्कार व दण्ड की व्यवस्था करना-नेतत्व अपने समह सदस्यों के लिए पुरस्कार व दण्ड की व्यवस्था करता है। वह अच्छा कार्य करने वालों को पुरस्कार तथा अक्षम था ” कार्य करने वालों को दण्ड देता है अथवा उच्च प्रबन्ध को इस सम्बन्ध में सिफारिश करता ह। नेता को ही अपने समह सदस्यों के मनोभावों का ठीक से पता रहता है कि किस प्रकार का पुरस्कार उन्हें अच्छा कार्य करने के लिए प्रेरित कर सकता है ।

(6) अधीनस्थों का सहयोग प्राप्त करना नेता को चाहिए कि वह नेतृत्व की ऐसी शैली अपनाये जो उसे अधीनस्थों का पूर्ण सहयोग प्रदान कर सके । इस दृष्टि से वह जनतान्त्रिक दष्टिकोण अपना सकता है जिसमें समय-समय पर समस्याओं के समाधान हेतु कमचारिया का परामर्श प्राप्त किया जा सकता है और प्रबन्धकीय निर्णयों में उन्हें भागीदार बनाया जा सकता है

(7) सूचनाएं व तकनीकी सहायता प्रदान करना नेतृत्व का यह कार्य है कि वह समूह के सदस्यों को उनके कार्य तथा हितों से सम्बन्धित सूचनाएँ प्रेषित करे तथा उन्हें कार्य करते समय कठिनाई उत्पन्न होने पर तकनीकी तथा अन्य प्रकार की सहायता भी प्रदान करे।

(8) आदर्श प्रस्तुत करना–नेतृत्व निष्पक्ष, निस्वार्थी, योग्य व साहसी होना चाहिए । नेतृत्व को समूह के सदस्यों के सामने अपने व्यवहार व आचरण से ऐसे आदर्श प्रस्तुत करने चाहिए, जैसे-वह अपने अनुयायियों से अपेक्षा रखता है। आचरण द्वारा आदर्शों का प्रस्तुतीकरण नेतृत्व को प्रभावशाली बनाने का एकमात्र अचूक शस्त्र है। 

नेतृत्व की आवश्यकता तथा महत्व 

(Need and Importance of Leadership)

अच्छे नेतृत्व की आवश्यकता न केवल व्यावसायिक उपक्रमों को ही है, बल्कि सरकार, शिक्षण संस्थानों, सामाजिक व धार्मिक संस्थानों को भी प्रभावशाली नेतृत्व की आवश्यकता होती है। वास्तव में एक उपक्रम के लिए प्रभावशाली नेतृत्व का निम्न कारणों से महत्व हैं- 

(1) सामाजिक, सांस्कृतिक एवं तकनीकी परिवर्तन का सामना करना आधुनिक समय में टेक्नोलॉजिकल, सामाजिक व सांस्कृतिक परिवर्तन तीव्रता के साथ हो रहे हैं, जिनका सामना करने के लिए उपक्रम की संगठन संरचना तथा कर्मचारी नीतियों में शीघ्र ही आवश्यक परिवर्तन करने होते हैं। इन परिवर्तनों का पूर्वानुमान करने तथा उसके अनुरूप कदम उठाने में एक उपक्रम तभी सफल हो सकता है, जब उसे अच्छा नेतृत्व प्राप्त हो। 

(2) सामहिक प्रयासों की प्रेरणा-ऐसे लोग कम होते हैं, जिनमें कार्य करने की स्वतः प्रेरणा पायी जाती हो, बल्कि अधिकांश लोगों में यह प्रेरणा जाग्रत करनी होती है। इस प्रेरणा को जाग्रत करने में नेतृत्व की प्रमुख भूमिका होती है । इस प्रकार उपक्रम के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कर्मचारियों को प्रेरणादायक शक्ति के रूप में नेतृत्व का विशिष्ट महत्व है। 

(3) सहयोग में वृद्धि-एक उपक्रम के कर्मचारी विभिन्न सम्प्रदायों, धर्मों, शैक्षणिक पृष्ठभूमियों तथा आर्थिक स्तरों वाले होते हैं। इन विविधताओं के रहते हुए उनमें समूह भावना उत्पन्न करना और बनाये रखना उपक्रम की सफलता के लिए अत्यन्त आवश्यक है । एक अच्छा नेतृत्व ही समूह-भावना विकसित करने में समर्थ हो सकता है । 

(4) संगठन संरचना तथा नियोजन की अपूर्णताओं की पर्ति-एक उपक्रम में नियोजन तथा संगठन संरचना उच्च प्रबन्ध के महत्वपूर्ण कार्य हैं । परन्तु आधुनिक बड़े संगठनों में इसमें कुछ अपूर्णताएँ तथा खामियाँ रह जाना स्वाभाविक है। प्रभावशाली नेतृत्व अपने गुणों तथा अनुभव द्वारा इन अपूर्णताओं को भर देता है और उपक्रम को हानि नहीं होने देता।

(5) अनौपचारिक नेतृत्व के प्रभाव को रोकना-यदि एक उपक्रम के प्रबन्धकों में नेतृत्व क्षमता का अभाव है. तो कर्मचारी-समहों के मध्य से अनौपचारिक नेतृत्व उभरकर सामने आ जाता है, जो प्रबन्धकों के साथ संघर्ष उत्पन्न कर सकता है। अतः एक उपक्रम के सफलतापूर्वक संचालन के लिए प्रबन्धकों में नेतृत्व क्षमता का विकसित किया जाना नितान्त आवश्यक है। 

अतः यह कहा जा सकता है कि प्रभावशाली प्रबन्धकीय नेतृत्व एक उपक्रम की सफलता तथा विकास का मूलाधार है । 

नेतृत्व के प्रकार अथवा भेद 

(Types of Leadership)

विभिन्न विद्वानों ने नेतृत्व को भिन्न-भिन्न प्रकार से विभक्त किया है जिसे अध्ययन अथवा प्रकृति की दृष्टि से निम्न भागों में विभक्त किया जा सकता है- 

(1) जनतन्त्रीय नेता-

यह नेता लक्ष्यों एवं नीतियों के निर्धारण में अपने कर्मचारियों से सहयोग लेता है। यह वही करता है जो समूह चाहता है । इस प्रकार का व्यक्ति अपने अधिकारों के विकेन्द्रीयकरण के सिद्धान्त में विश्वास रखता है । यह अनुयायियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाता है वह उनकी आवश्यकताओं व सुविधाओं का पूर्ण ध्यान रखता है।  

(2)व्यक्तिगत नेता-

यह नेता व्यक्तिगत सम्बन्धों के आधार पर नेतृत्व की स्थापना करता है। ऐसा नेता किसी कार्य के निष्पादन के सम्बन्ध में निर्देश एवं अभिप्रेरण स्वयं व्यक्तिगत रूप से देता है । इस प्रकार का नेता अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी होता है क्योंकि अपने अनुयायियों से इसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। इसमें नेता के बौद्धिक ज्ञान का विशेष महत्व होता है। 

(3) अव्यक्तिगत नेता-

अव्यक्तिगत नेतृत्व की स्थापना अप्रत्यक्ष रूप से नेता के सहायकों के माध्यम से लिखित आदेशों, अनुदेशों, नीतियों, योजनाओं, कार्यक्रमों आदि के माध्यम से होता है । इस प्रकार का नेतृत्व वहाँ स्थापित किया जाता है, जहाँ कर्मचारियों की संख्या अधिक होती है तथा नेता के लिए यह सम्भव नहीं होता कि वह प्रत्येक कर्मचारी से व्यक्तिगत सम्पर्क कर सके । वर्तमान में यह नेतृत्व अधिकांश उपक्रमों में पाया जाता है। 

(4) निरंकुश नेता-

इसे तानाशाह नेता भी कहते हैं। यह नेता सभी अधिकारों को अपने पास केन्द्रित रखता है और सभी निर्णय स्वयं लेता है। निर्णयन के क्रियान्वयन हेत अन्यायियों को आवश्यक निर्देश देता है। अनुयायियों को लक्ष्यों की जानकारी नहीं होती अत: वे पूर्णत: नेता पर आश्रित रहते हैं। इसमें नेता की यह धारणा होती है कि व्यक्ति स्वभाव से ही आलसी होते हैं तथा उत्तरदायित्व से बचना चाहते हैं । 

(5) निर्बाधवादी नेता-

यह नेता निर्देशन करने के लिए उत्सुक नहीं होता। यह अनुयायियों को स्वयं अपने लक्ष्य निर्धारित करने एवं आवश्यक निर्णय लेने की स्वतन्त्रता देता है। इससे नेता केवल एक सम्पर्क कडी का कार्य करता है, वह उन्हें कार्य करने के लिए केवल आवश्यक सूचना और साधन प्रदान करता है। इसमें नेता की यह धारणा होती है कि स्वतन्त्रता से कर्मचारियों में दायित्व बोध उत्पन्न होता है तथा अच्छे परिणामों की प्राप्ति होती है। 

(6) व्यक्ति केन्द्रित नेता-

यह नेता उत्पादन की तुलना में कर्मचारियों की आवश्यकताओं, कल्याण एवं भावनाओं पर बल देते हैं। ये समह में मानवीय सम्बन्धों को उच्च प्राथमिकता देते हैं तथा दलीय भावना को प्रोत्साहित करते हैं। ये अपने अनुयायिया क दृष्टिकोण एव भावनाओं का पूर्ण आदर करते हैं। 

(7) क्रियात्मक नेता–

क्रियात्मक नेता वह होता है. जो अपनी योग्यता, कुशलता, अनुभव एवं ज्ञान के आधार पर अपने अनुयायियों का विश्वास प्राप्त करता है । वह जाटल १११॥ सम्बन्ध में अपने अनुयायियों को आवश्यक निर्देश एवं परामर्श देता है। 

(8) चमत्कारिक नेता-

ऐसे नेता अपने आकर्षक व्यक्तित्व, सहक नेतृत्व शला तथा अपने विचारों व प्रस्तुतीकरण के तरीके से व्यक्तियों को प्रभावित करत हैं। उनके व्यक्तित्व म एक अपील होती है । ये असाधारण प्रतिभा, अद्भुत वाक्चातुर्य, गहन आत्म विश्वास, दूरदृष्टि, दृढ़ संकल्प, फौलादी इरादों तथा आर्दश व्यवहार के धनी होते हैं। 

(9) अनौपचारिक नेता-

यह समूह का स्वाभाविक एवं वास्तविक नेता होता है। कुछ व्यक्ति संगठन में यद्यपि उनके पास कोई औपचारिक पद या सत्ता नहीं होती है वह अपने ज्ञान, व्यक्तित्व, सम्बन्धों, सन्दर्भो अथवा अन्य असाधारण प्रतिभा के कारण नेतृत्व कायम कर लेते हैं। अनौपचारिक नेता प्रबन्ध पर पूरा दबाव बनाये रखता है। प्रबन्धक भी ऐसे नेताओं को महत्व देते हैं। 

(10) रूपान्तरित नेता-

ऐसे नेता संगठन में क्रान्तिकारी परिवर्तनों को प्रेरित करते हैं। ये नेता संस्था में नयी व्यवस्था, व्यूह रचनात्मक सुधारों व नवीन प्रणालियों का सूत्रपात करते 

(11) व्यवहारात्मक नेता-

यह नेता भूमिकाओं तथा कार्य की जरूरतों को स्पष्ट करते हुए अपने अनुयायियों को पूर्व निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में उत्प्ररित व निर्देशित करते हैं। 

निर्देशन का सिद्धान्त-

(Theories of Leadership)

वर्तमान व्यावसायिक जगत में नेतृत्व प्रबन्ध का मूल घटक है। नेतृत्व के सम्बन्ध में समय-समय पर भिन्न-भिन्न विचारों को प्रबन्धशास्त्रियों ने प्रकट किया। यदि इन विद्वानों द्वारा प्रकट किये गये विचारों का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाये तो नेतृत्व के प्रमुख सिद्धान्त या विचारधाराएँ निम्नलिखित स्पष्ट होती है। 

(1) निर्देशन का सिद्धान्त-

यह सिद्धान्त यह बताता है कि एक उपक्रम में निर्देशन व नेतृत्व जितना प्रभावशाली होगा. उपक्रम के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कर्मचारी उतना अधिक योगदान देगा।

(2) अभिप्रेरणा का सिद्धान्त-

इस सिद्धान्त के अनुसार अनुयायियों से कुशलतापक व अधिक कार्य लेने के लिए यह आवश्यक है कि अनुयायियों को अभिप्रेरित किया जा नेतृत्व मूलतः अभिप्रेरण पर ही निर्भर करता है। 

(3) व्यवहारवादी सिद्धान्त-

इस सिद्धान्त के अनुसार नेता का आचरण व्यवहारवाटी होना चाहिये। यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि नेतृत्व का अध्ययन नेता क्या करता है, के आधार पर किया जाना चाहिये, न कि नेता क्या है के आधार पर। दूसरे शब्दों में इस विचारधारा का सम्बन्ध नेता के व्यवहार से है न कि उसके व्यक्तिगत गुणों से। रे० ए० किलियन के अनुसार, “चाहे एक नेता मूलरूप में निर्णय लेता हो, सामंजस्य सुलझाने वाला हो परामर्श देने वाला हो, सूचना देने वाला हो अथवा नियोजन देने वाला हो, उसे अनुयायियों के समक्ष आदर्श व्यवहार प्रस्तुत करना चाहिये। 

(4) अनुयायी सिद्धान्त-

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन एफ० एच० सेन्सफोर्ड ने किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार अनुयायियों को कुछ प्राथमिक आवश्यकताएँ होती हैं और जो व्यक्ति इन आवश्यकताओं की पूर्ति में सबसे अधिक रूचि लेते हैं वे उसी को अपना नेता मान लेते हैं। अत: वही व्यक्ति नेता है जिसे अधिकांश अनुयायी स्वीकार तथा पसन्द करते हैं। 

(5) गुणमूलक सिद्धान्त-

इस सिद्धान्त या विचारधारा का प्रतिपादन वर्नार्ड तथा आर्डवेटीड ने किया है । यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि वही व्यक्ति एक सफल नेता हो सकता है जिसमें नेतृत्व सम्बन्धी कुछ विशिष्ट गुण होते हैं। इन गुणों में शारीरिक, मानसिक तथा मनोवैज्ञानिक गुणों को सम्मिलित किया जाता है।

(6) उद्देश्यों में एकता का सिद्धान्त-

इस सिद्धान्त के अनुसार नेता तथा उसके अनुयायियों के उद्देश्यों में एकता होनी चाहिए। अन्य शब्दों में संस्था के उद्देश्य उसके नेता और उनके अनुयायियों के उद्देश्यों के समान होने चाहिए क्योंकि दोनों मिलकर संस्था के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए ही कार्यरत हैं।

(7) क्रियाशील सम्बन्धों का सिद्धान्त-

इस सिद्धान्त के अनुसार नेता और उसके अनुयायियों के मध्य क्रियाशील सम्बन्धों का होना नितान्त आवश्यक है। किसी कार्य का निष्पादन कराने में नेता सबसे आगे खड़ा होकर अपने अनुयायियों का मार्गदर्शन करता है।

(8) प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण का सिद्धान्त-

इस सिद्धान्त के अनुसार नेता अपने अनुयायियों की क्रियाओं का प्रत्यक्ष रूप से पर्यवेक्षण करता है । नेता एवं कर्मचारियों के मध्य जितना अधिक व्यक्तिगत व प्रत्यक्ष सम्पर्क होगा, नेतृत्व भी उतना ही अधिक प्रभावशाली होगा। 

(9) नियन्त्रण के विस्तार का सिद्धान्त-

इस सिद्धान्त के अनुसार नेतृत्व की प्रभावशीलता के लिए यह भी आवश्यक है कि नियन्त्रण का विस्तार सीमित हो अर्थात् नेता के आधीन कार्यरत अनुयायियों की संख्या सीमित होनी चाहिए।

(10) आदेश की एकता का सिद्धान्त-

इस सिद्धान्त के अनुसार अनुयायियों को एक ही नेता से आदेश व निर्देश प्राप्त होने चाहिए। इससे किसी बात का भ्रम नहीं रहता फलतः उनके कार्य में गति व सुधार आता है। 

हसें एवं ब्लैन्चार्ड की पारिस्थितिक नेतृत्व विचारधारा या जीवन चक्र नेतृत्व मॉडल 

प्रसिद्ध प्रबन्धशास्त्री पॉल हर्से तथा केनेथ ब्लैन्चार्ड की नेतृत्व विचारधारा इस मान्यता पर निर्भर करती है कि प्रभावशाली नेतृत्व शैली अनुयायियों के परिपक्वता स्तर (Level of Maturity) तथा परिस्थिति की माँग के अनुसार बदलती रहती है। इन्होंने अपनी अध्ययन के दो आयाम–’उत्पादन एवं सम्बन्धों’ का प्रयोग किया है। इनके विचार से नेता अपने अनुयायियों की परिपक्वता की स्थिति तथा परिस्थिति की माँग के हिसाब से अपनी शैली में परिवर्तन लाता है। यह इसीलिए ‘पारिस्थितिक नेतृत्व विचारधारा’ कहलाती है। यह मॉडल निम्न तत्वों के बीच सम्बन्धों पर आधारित है 

(अ) कार्यव्यवहार की मात्रा-जिसमें निर्देशन करना कार्य निष्पादन पर जोर देना है। 

(ब) सम्बन्ध व्यवहार की मात्रा-जिसमें संगठन से सम्बन्धित व्यक्तियों का भला-बुरा तथा सामाजिक भावनात्मक समर्थन का स्तर आदि आता है। 

(स) अनुयायियों की कार्य संगत परिपक्वता का स्तर–इसमें कार्य,दायित्व एवं विशेष उद्देश्य की ओर ध्यान देना, नेतृत्व जिसका निष्पादन चाहता है।

इस प्रकार कार्य संगत परिपक्वता’ इस विचारधारा की केन्द्रबिन्दु है। यह व्यक्ति की उपलब्धि की इच्छा, इसके उत्तरदायित्व को स्वीकार करने की योजना, कार्य विशेष के ज्ञान, अनुभव एवं कौशल पर पूर्णतः जोर देती है। इस विचारधारा की नेतृत्व शैली में प्रमुख रूप से निर्देशन,समर्थन, सहभागिता एवं प्रत्यायोजन (अधिकारों का अन्तरण) आदि ही सम्मिलित किये जाते हैं। 

नेतृत्व के मार्ग में अनेक बाधाएँ समय-समय पर उपस्थित होती रहती हैं, जिनके कारण नेतृत्व अपने वांछित लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता ।

कुछ प्रमुख बाधाएँ निम्न प्रकार हैं –

(1) कुछ नेता अपने अनुसरणकर्ताओं के निकट सम्पर्क में नहीं होते हैं जिससे उनकी प्रतिक्रियाओं का यथासमय पता नहीं लग पाता।

(2) कुछ नेता अस्थिर भावना वाले होते हैं, जिसके कारण वे विपरीत परिस्थितियों में ‘ अपना सन्तुलन खो देते हैं।

(3) कुछ नेता प्रशंसा एवं सम्मान की अपेक्षा अर्थदण्ड या पुरस्कार की प्रेरणा को अधिक महत्व देते हैं।

(4) कुछ नेता अपने अधीनस्थों को अपना दृष्टिकोण नहीं समझा पाते,अत: उनका विश्वास अर्जित नहीं होता है।.

(5) कुछ नेता व्यवहारकुशलता के गुण में परिपक्व न होने के कारण अन्य लोगों के साथ मधुर सम्बन्ध नहीं बना पाते हैं  

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