Corporate Veil meaning

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समामेलन का पर्दा (Corporate Veil)

समामेलन का पर्दा (Corporate Veil) नियम कम्पनी की स्वतन्त्र वैधानिक सत्ता के सिद्धान्त पर आधारित है। इसके अनुसार कम्पनी एवं सदस्यों के बीच एक पर्दा या आवरण होता है। जो कम्पनी को अपने सदस्यों से अलग वैधानिक अस्तित्व प्रदान करता है और कम्पनी की देनदारियों का दायित्व कम्पनी पर होता है और सदस्यों पर नहीं। कभी-कभी पर्दे को बांधकर कम्पनी के नाम से पर्दे में रहकर काम कर रहे व्यक्तियों की सच्चाई जानना आवश्यक हो जाता है। अतः उस समय न्यायालय कम्पनी की पृथक् वैधानिक सत्ता नहीं मानते। इस परिवर्तन को कम्पनी या निगम के आवरण को बेधन करना कहते हैं। 

कम्पनी/निगम आवरण सिद्धान्त के अपवाद 

(Exceptions of the Principle of Company Corporate veil)

(1) कपट या अनुचित व्यवहार की दशा में

(2) राजस्व की चोरी होने पर

(3) विदेशी दुश्मन के अधिकार में कम्पनी का नियन्त्रण होना।

(4) जब सदस्य संख्या वैधानिक न्यूनतम सीमा से कम हो जाये

(5) विनिमय-विपत्रों पर कम्पनी का नाम निर्दिष्ट न करने पर .

(6) प्रविवरण में मिथ्यावर्णन की दशा में ..

(7) प्रार्थना-पत्र की राशि न लौटाने की स्थिति में

(8) कम्पनी का पूरा नाम प्रकट न किये जाने पर

(10) कम्पनी द्वारा अंशधारियों के एजेण्ट के रूप में कार्य करने पर

(11) सूत्रधारी तथा सहायक कम्पनी के रूप में सम्बन्धित होने की दशा में

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अवैधानिक संघ 

(Illegal Association) in Company Law

अवैधानिक संघ से आशय ऐसे संघ से हैं जिसका निर्माण कम्पनी अधिनियम 2013, की धारा 464 का उल्लंघन करके दिया जाता है। जैसे किसी कम्पनी संघ या साझेदारी संस्था में जो बैंकिग व्यवसाय करती है 10 से अधिक व्यक्ति और अन्य की दशा में 20 से अधिक व्यक्ति नहीं होने चाहियें अर्थात जब किसी कम्पनी, संघ या साझेदारी संस्था में उक्त संख्या से अधिक सदस्य हो जाते हैं तो वह अवैधानिक संघ कहलाते हैं। अवैध संघों के प्रभाव-यदि कम्पनी अधिनियम की धारा 11 का उल्लंघन करके अवैध संघों का निर्माण किया जाता है तो उसके निम्नलिखित प्रभाव होंगे –

(1) यह संघ अपने नाम से कोई अनुबन्ध नहीं कर सकता। 

(2) ऐसा संघ न तो किसी बाहरी व्यक्ति पर और न ही अपने सदस्य पर वाद प्रस्तुत कर सकता है । यही नहीं, ऐसे संघ का कोई भी सदस्य किसी अन्य सदस्य पर भी वाद प्रस्तुत नहीं कर सकता।

(3) एक अवैध संघ उसके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दी गयी राशि को वापिस नहीं किया जा सकता है। 

(4) एक अवैध संघ का कोई पृथक् वैधानिक अस्तित्व नहीं होता है  

(5) अधिनियम की व्यवस्थाओं के अन्तर्गत लेनदार व सदस्य की इच्छा पर इसका समापन नहीं किया जा सकता।

(6) अवैधानिक संस्था के लाभों पर आयकर लगाया जाता है और कर की राशि को चुकाने के लिए संस्था का प्रत्येक सदस्य उत्तरदायी होता है। 

(7) ऐसी संस्था के लेनदार अपनी धनराशि वसूल करने के लिये संस्था के समापन हेतु न्यायालय में मुकदमा नहीं चला सकते

अपवाद (Excaption) 

(1) ऐसी संस्था पर जिसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं है यह नियम लागू नहीं होता। 

(2) पारिवारिक व्यवसाय कर रहे एक संयुक्त हिन्दू परिवार पर भी यह व्यवस्थ लाग नहीं होगी। उसमें चाहे कितने भी वयस्क सदस्य क्यों न हों। 

एक व्यक्ति वाली कम्पनी 

(One Man Company)

कम्पनी अधिनियम 2013 धारा 2(62) के अनुसार एक निजी कम्पनी में कम से कम दो व सार्वजनिक कम्पनी में कम से कम सात सदस्य होने अनिवार्य हैं। अतः विधान के अन्तर्गत एक व्यक्ति कम्पनी का प्रावधान नहीं है। लेकिन कुछ चालाक व्यक्ति वैधानिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कम से कम दो या सात जैसा आवश्यक हो. नाम मात्र के सदस्य दिखाकर कम्पनी का पंजीयन करा लेते हैं और उसके अधिकांश अंश स्वयं खरीद लेते है और शेष सदस्य जो उसके अपने रिश्तेदार होते हैं को मात्र एक या दो अंश देते हैं। इस प्रकार कम्पनी के समस्त कार्य-कलापों पर उनका नियमन एवं नियन्त्रण हो जाता है। ऐसी कम्पनी को एक व्यक्ति कम्पनी कहते हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि वह व्यक्ति जिसके पास किसी कम्पनी के 50% से अधिक अंशपूंजी या लगभग सारी अंश पूंजी होती है उसे एक व्यक्ति वाली कम्पनी कहा जाता है। इस तरह वह व्यक्ति सीमित दायित्व के साथ व्यापार के सभी लाभों का आनन्द लेता है। ऐसी कम्पनियां पूर्णतया वैध हैं एवं गैर कानूनी नहीं है। 

कम्पनी अधिनियम, 2013 

(Company Act, 2013)

कम्पनियों के सम्बन्ध में विधि को एकीकृत एवं संशोधित करता है । इस अधिनियम में 470 धारायें है जिन्हें 29 अध्यायों में दिया गया है । इस अधिनियम के साथ 7 अनुसूचियाँ लगी हैं। 

कम्पनी अधिनियम, 2013 के उद्देश्य निम्नलिखित है-

1. कम्पनियों के सम्बन्ध में विधि को स्वीकृत एवं संशोधित करना

2. खुले वैश्विक बाजार में उद्यमियों को मुक्त पहुँच प्रदान करना,

3. कम्पनियों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करना,

4. निवेशकों एवं स्टेकधारकों के हितों का संरक्षण करना। 

कम्पनी अधिनियम, 2013 का प्रशासन 

(Administration of the Companies Act, 2013)

वर्तमान में कम्पनी अधिनियम 2013 का प्रशासन निम्निलिखित एजेन्सियों द्वारा किया जाता है  –

(1) केन्द्रीय सरकार (The Central Government) – केन्द्रीय सरकार द्वारा कम्पनी कार्य विभाग के माध्यम से कम्पनी अधिनियम 2013 का प्रशासन किया जाता है। कम्पनी शक्तियों एवं कर्तव्यों को किसी उचित प्राधिकारी को प्रत्योजित करने की शक्ति प्राप्त है। केन्द्रीय सरकार द्वारा कम्पनी विधि के प्रशासन सम्बन्धी शक्तियों को कम्पनी अधिनियम के अधीन गठित प्राधिकारी को प्रत्यायोजित कर दिया गया है।

(2) राष्ट्रीय कम्पनी विधि न्यायाधिकरण (National Comapny Law Tribunal NCLT)- कम्पनी लॉ बोर्ड के स्थान पर राष्ट्रीय कम्पनी विधि न्यायाधिकरण बनाया गया है। कम्पनी लॉ बोर्ड के समक्ष विचारधीन मामलों को अब न्यायाधिकरण को अन्तरित किया जायेगा। कम्पनी लॉ बोर्ड को कुछ शक्तियों केन्द्रीय सरकार के पास तथा कुछ राष्ट्रीय कम्पनी विधि न्यायाधिकरण को अन्तरित कर दी गयी है। 

(3) अपीलीय न्यायाधिकरण (Appellate Tribunal)- राष्ट्रीय कम्पनी विधि न्यायाधिकरण के निर्णय या आदेश से पीड़ित व्यक्ति राष्ट्रीय कम्पनी विधि अपीलीय न्यायधिकरण में अपील कर सकता है। राष्ट्रीय कम्पनी विधि न्यायाधिकरण के आदेश या निर्णय के 45 दिन के भीतर अपील की जा सकती है। परन्तु अपीलीय न्यायाधिकरण को पर्याप्त कारण बताये जाने पर वह और आगे 45 दिन तक अपील को स्वीकार कर सकता है। 

(4) कम्पनी रजिस्ट्रार (Registrar of Companies)- कम्पनी रजिस्ट्रार एक सार्वजनिक कार्यालय होता है जहाँ कम्पनियों को प्रपत्र एवं विवरणपत्र फाइल करने होते हैं तथा जनता द्वारा इन प्रपत्रों का निरीक्षण किया जा सकता है। 

(5) राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिग प्राधिकरण National Financial Reporting Authority (NFRA) – कम्पनी अधिनियम 1956 के अधीन गठित लेखांकन प्रमापों पर राष्ट्रीय परामर्श समिति का नाम कम्पनी अधिनियम, 2013 द्वारा बदलकर राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण कर दिया गया है। यह अर्द्ध-सरकारी प्राधिकरण है। 

(6) भारतीय प्रतिभति एवं विनिमय बोर्ड (Securitics and Exchange Boardan SEBI)- केन्द्रीय सरकार ने विनियोजकों के हित संरक्षण हेतु भारतीय प्रतिभागि विनिमय बोर्ड (सेबी) का गठन किया है। यह प्रतिभूति बाजार का नियमन करता है। सेबी अपने कर्तव्यों एवं कार्यों को प्रभावी ढंग से निभा सके,केन्द्रीय सरकार ने इसे सूचीयत कम्पनियों का दशा में प्रतिभतियों के निगमन एवं हस्तान्तरण तथा लाभांश का भुगतान न करने के बारे में शक्तियाँ दी है। 

(7) सरकारी समापक (Offical Liquidators)– राष्ट्रीय कम्पनी विधि न्यायाधिकरण द्वारा कम्पनियों के समापन के उददेश्यार्थ एक सरकारी समापक होगा। सरकारी समापन दस एकाउन्टेटों, वकीलों, कम्पनी सचिवों लागत एवं कार्य लेखाकारों की पेशेवर फौ पनल नियुक्त किया जा सकता है। यह केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित पेशेवरों वाला नियमित निकाय हो सकता है। 

निगमित कम्पनियाँ 

(Incorporated companies)

कम्पनियाँ आगे लिखी हुई पद्धतियों से निगमित की जा सकती हैं 

(1) राज्य आज्ञा पत्र द्वारा (By Royal Charter)- जब किसी विशेष कार्य करने की आवश्यकता पड़ती थी, तो सरकार द्वारा राज्य आज्ञापत्र से कम्पनी का निर्माण किया जाता था। ऐसी कम्पनी का उदाहरण ईस्ट इण्डिया कम्पनी है। वर्तमान कम्पनियों की तुलना में इन कम्पनियों के बहुत अधिकार होते थे। अब इस प्रकार की कम्पनियाँ न तो इंग्लैण्ड में हैं और न भारत में। 

(2) संसद के विशेष अधिनियम द्वारा (By Special Act of Parliament)– संसद व विधानसभाएँ विशेष अधिनियम द्वारा कम्पनियों की स्थापना करती हैं। इस प्रकार की कम्पनियाँ राष्ट्रीय महत्व का व्यापार करने के लिए स्थापित की जाती हैं। ऐसी कम्पनियों को वैधानिक कम्पनियाँ (Statutory Companies) कहा जाता है। भारत में इस प्रकार की कम्पनियों के बहुत से उदाहरण हैं, जैसे-भारत का स्टेट बैंक एवं रिजर्व बैंक, जीवन बीमा निगम, औद्योगिक वित्त निगम एवं वित्त निगम एवं भारत का यूनिट ट्रस्ट, आदि। इन कम्पनियों के नाम के अन्त में ‘लिमिटेड’ नहीं लिखा जाता है। 

(3) कम्पनी अधिनियम द्वारा (By Incorporation Under Companies Act)– विशेष अधिनियम द्वारा स्थापित कम्पनियों को छोड़कर भारत की सभी कम्पनिया कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित की जाती हैं। बहुत-सी ऐसी कम्पनियाँ हैं, जिनका जीकरण किसी अन्य अधिनियम के अन्तर्गत होता है,परन्तु वे साथ ही साथ कम्पनी अधिनियम, 105 द्वारा भी विनियमित होती हैं, जैसे बैंकिंग कम्पनियों के लिए बैंकिंग रेगुलेशन अधिनियम, बीमा कम्पनियों के लिए बीमा अधिनियम, 1938; और बिजली कम्पनियों के लिए बिजली (पूर्ति) अधिनियम, 1948 बनाये गये हैं। 

विदेशी कम्पनी 

(Meaning of Foreign Company)

विदेशी कम्पनी से आशय ऐसी कम्पनी से है जो भारत के अतिरिक्त किसी अन्य देश म समामेलित हो, किन्त वह भारत में व्यापार कर रही हो । कम्पनी अधिनियम की धारा 2(42) के अनुसार, “विदेशी कम्पनी से आशय भारत के बाहर समामेलित उस कम्पनी से है जिसन (i) 1 अप्रैल, 1956 के बाद भारत में व्यापार करने का स्थान स्थापित किया है या (ii) 1 अप्रैल, 1956 से पूर्व भारत में व्यापार करने का स्थान स्थापित किया था जो 1 अप्रैल, 1956 तक चालू रहा।”

विदेशी कम्पनियों द्वारा रजिस्ट्रार को प्रस्तुत किये जाने वाले प्रपत्र-

कम्पनी अधिनियम के आधीन प्रत्येक विदेशी कम्पनी को जो कम्पनी अधिनियम लागू होने के उपरान्त भारत में अपने व्यापार का स्थान स्थापित करती है तो उसे स्थान स्थापित करने । के 30 दिन के अन्दर रजिस्ट्रार के पास रजिस्ट्री के लिये निम्नलिखित प्रपत्र पेश करने पड़ते  है –

(i) कम्पनी के चार्टर, परिनियम (Statutes) या पार्षद सीमानियम और अन्तर्नियम अथवा उसके संविधान से सम्बन्धित किसी अन्य विलेख की प्रमाणित प्रतिलिपि । यदि ये प्रपत्र अंग्रेजी भाषा में नहीं हैं तो अंग्रेजी अनुवाद की एक प्रमाणित प्रतिलिपि । 

(ii) कम्पनी के पंजीकृत अथवा प्रधान कार्यालय का पूरा पता। .

(iii) कम्पनी के संचालकों एवं सचिव की सूची जिसमें प्रत्येक का पूरा नाम तथा उपनाम, आवासीय पता, राष्ट्रीयता, पेशा आदि का उल्लेख रहना चाहिए। 

(iv) भारत में रहने वाले किसी एक अथवा उससे अधिक व्यक्तियों के नाम पते जो कम्पनी की ओर से सूचना अथवा अन्य प्रलेख प्राप्त करने के लिए अधिकृत किये गए हों। 

(v) कम्पनी के भारत स्थित कार्यालय का पूरा पता जिसे भारत में उसके कारोबार का प्रधान कार्यालय माना जाता है।। 

कम्पनी अधिनियम के अनुसार यदि उपर्युक्त प्रपत्रों में किसी भी प्रपत्र में कोई परिवर्तन किया जाता है तो कम्पनी को निर्दिष्ट समय के अन्दर रजिस्ट्रार को सूचित कर देना होगा।

एक विदेशी कम्पनी को निम्न दशाओं में भारतीय कम्पनी माना जायेगा 

(1) जब कम्पनी भारत में व्यापार करती है तथा कम्पनी का भारत में व्यापारिक स्थल स्थापित है तथा 

(2) इस कम्पनी की चुकता पूँजी का 51% भाग निम्न के स्वामित्व में है

(i) एक या अधिक भारत के नागरिकों के स्वामित्व में अथवा

(ii) भारत में समाभेलित किसी एक या अधिक संस्था या संस्थाओं के स्वामित्व में।

Difference Between Company and Partnership firm

Difference Between Public Company and Private Company

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