Essentials of First Draft – Bcom Notes

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Essentials of First Draft – Bcom Notes

सन्देश का प्रथम प्रारूप लेखन (First Drafting ) – लेखन शैली के द्वितीय चरण में सन्देश का प्रथम प्रारूप तैयार किया जाता है। इसमें विचारों को शब्दों का रूप प्रदान करके वाक्यों व पैराग्राफों का निर्माण किया जाता है। इस लेखन में यह सुनिश्चित किया जाता है कि विचारों को कागज पर कैसे लाया जाए, किस प्रकार के शब्दों/वाक्यों का प्रयोग किया जाए तथा कहाँ बात को संक्षिप्त रूप में रखा जाए और कहाँ से विस्तृत रूप प्रदान किया जाए। मुख्य विचार के समर्थन में सम्बन्धित तथ्यों व आँकड़ों को एकत्र किया जाता है। इस प्रकार सभी तथ्यों को कागज पर उतार लेना ही प्रथम प्रारूप कहलाता है। 

एक अच्छे प्रारूपण के लिए आवश्यक बातें

(Essentials of First Draft)

एक अच्छे प्रारूपण के लिए निम्नलिखित बातें ध्यान में रखनी चाहिए –

1. तकनीकी सावधानियाँ (Technical Precautions ) – प्रारूप को तैयार करते समय तकनीकी बातों का ध्यान रखना भी आवश्यक होता है जैसे प्रारूप सदैव अन्य पुरुष में तैयार किया जाना चाहिए तथा यदि उत्तम पुरुष का प्रयोग आवश्यक हो तो वह व्यक्ति बोधक की बजाय पद-बोधक होना चाहिए। इसी प्रकार, प्रारूप किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रहों से प्रेरित नहीं होना चाहिए। प्रारूप निश्चित ढाँचे में निश्चित प्रणाली व निर्धारित वाक्यावली में ही तैयार किया जाना चाहिए। >

2. उद्धरण ( Quotation) – विषय को अधिक स्पष्ट करने के लिए प्रारूपण में · विचारों, निर्णयों, आदेशों व उक्तियों का उद्धरण आवश्यक हो जाता है। विषय की गम्भीरता को काट-छाँट के ही मूल शब्दों में व्यक्त किया जाना चाहिए।

3. सरल, सुबोध एवं व्यावहारिक भाषा (Easy, Understandable Practical Language ) – प्रारूप की भाषा अत्यन्त सरल, सुबोध एवं व्यावहारिक होनी चाहिए। छोटे-छोटे सार्थक वाक्यों का प्रयोग किया जाना चाहिए तथा विषय के अनुकूल उससे सम्बन्धित तकनीकी शब्दों का भी प्रयोग किया जाना चाहिए।

4. पैराग्राफ (Paragraph) – एक विषय से सम्बन्धित अनेक उपविषय हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में प्रत्येक उपविषय को अलग पैराग्राफ में देना चाहिए तथा पैराग्राफों के लिए संख्या क्रम अंकित किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, पैराग्राफ बहुत अधिक बड़ा भी नहीं a होना चाहिए।

5. तथ्यों की संगति (Consistency of Data)- प्रारूप तैयार करते समय विषय से सम्बन्धित सभी तथ्यों को सम्मिलित किया जाना आवश्यक होता है। विभिन्न तथ्यों व तर्कों को व्यवस्थित क्रम में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। साथ ही साथ तथ्यों का तार्किक विश्लेषण इस प्रकार क्रम से करना चाहिए जिससे वह अपनी सम्पूर्ण संरचना को स्पष्ट कर सके।

6. सन्तुलित प्रस्तुतीकरण (Balanced Presentation) – एक अच्छे प्रारूप के लिए यह आवश्यक होता है कि विषय को सन्तुलित ढंग से प्रस्तुत किया जाए। सन्तुलित प्रस्तुतीकरण के लिए यह आवश्यक है कि सम्पूर्ण प्रारूप को उचित तरीके से विभाजित किया जाए जैसे विषय का ब्योरेवार वर्णन विषय सम्बन्धी पूर्व निर्देश, विषय से सम्बन्धित तथ्यों की क्रमवार जानकारी आदि ।

7. संलग्नक (Enclosures) — पत्र से सम्बन्धित या उससे जुड़ने वाले महत्त्वपूर्ण प्रपत्रों के कागजातों को संलग्नक कहा जाता है। विषय को स्पष्ट करने के लिए प्रारूप के साथ इनका जुड़ना अत्यन्त आवश्यक होता है। ये संलग्नक आगे की कार्यवाही में महत्त्वपूर्ण उपकरण के रूप में प्रयोग किए जाते हैं। मूल पत्र के नीचे संलग्नकों की संख्या क्रमवार अंकित की जानी चाहिए।

8. प्रतिलिपियाँ (Copy) — यदि आवश्यक हो तो प्रारूप की प्रतिलिपियाँ जहाँ भेजी जानी अपेक्षित हों, वहाँ अवश्य भेजी जानी चाहिए। इसके लिए व्यक्ति विशेष के नाम के साथ-साथ उसके विभाग या उपविभाग का भी ठीक-ठीक उल्लेख होना चाहिए।

9. विषय के अनुसार (According to Subject) — प्रारूपण को विषय के अनुसार. ही तैयार करना चाहिए। यदि प्रस्तुत विषय का सम्बन्ध इसी प्रकार के पूर्व पत्र से है तो इसमें उचित निर्देशों का होना भी आवश्यक होता है। प्रारूप तभी अर्थपूर्ण होगा जब उसमें पूर्व निर्देश ठीक से इंगित किया गया होगा।

10. ‘आप’ शब्द का प्रयोग (Use the ‘You’ Attitude)—व्यावसायिक पत्रों में आप शब्द का प्रयोग करना चाहिए। प्रथम प्रारूप में मैं और हम शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए। सन्देश को सही प्रकार से पहुँचाने के लिए मुझे, मेरे, हमारे के स्थान पर ‘आप’ और आपके शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। उदाहरण के लिए आपके आदेश पर कार्यवाही तब ही की जाएगी जब हमें पुराने आदेश की दूसरी कॉपी प्राप्त हो जाएगी। इस वाक्य के स्थान पर कृपया अपने आदेश की एक प्रति भेजें जिससे आदेश को शीघ्र भेजा जा सके, इस वाक्य का ‘प्रयोग अधिक उचित है।

हो सकता है कुछ परिस्थितियों में ‘आप’शब्द का प्रयोग उचित न रहे तो कटुता को कम करने के लिए अन्य प्रकार से भी बात कही जा सकती है जैसे आपके कारण एक समस्या उत्पन्न हो गई के स्थान पर यह लिखा जा सकता है कि एक समस्या उत्पन्न हो गई है।

11. सकारात्मक दृष्टिकोण पर बल (Emphasize the Positive Attitude)—प्रथम ड्राफ्ट सकारात्मक दृष्टिकोण से लिखा जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि पढ़ने वाले को स्पष्ट हो जाना चाहिए कि आप उसके लिए क्या कर सकते हैं और क्या करेंगे न कि आप क्या नहीं करेंगे या आपने क्या नहीं किया है। उदाहरण के लिए आपके आदेश की पूर्ति आज सम्भव नहीं है, इस वाक्य के स्थान पर हम आपके आदेश की पूर्ति अगले दो दिन में कर देंगे अधिक उपयुक्त है। इसी प्रकार आपने आदेश स्पष्ट रूप से नहीं दिया है। मात्रा, रंग, डिजाइन का वर्णन न होने की वजह से आपके आदेश की पूर्ति नहीं की जा सकती है। इस वाक्य के स्थान पर कृपया अपने आदेश में माल की मात्रा, रंग तथा डिजाइन का स्पष्ट रूप से उल्लेख करें जिससे हम आपके आदेश की पूर्ति कर सकें; अधिक उपयुक्त है।

सन्देश के प्रथम प्रारूप में संशोधन करना / पुनः निरीक्षण (Revising the First Draft)—प्रथम प्रारूप तैयार करने के बाद उसे दुबारा पढ़कर उसमें संशोधन किए जाते हैं अर्थात् अनाबश्यक सूचना को काट दिया जाता है तथा जो तथ्य प्रथम प्रारूप में लिखने से रह गए हैं उन्हें यथास्थान जोड़ा जाता है। सन्देश के उद्देश्य, विषय-वस्तु तथा लेखन शब्दों की समीक्षा की जाती है। व्याकरण, विराम चिह्नों तथा वाक्यों की बनावट पर भी ध्यान दिया जाता है। संशोधन की यह प्रक्रिया पुनर्लेखन भी कहलाती है।

अतः प्रथम प्रारूप को लिखने के पश्चात् यह आवश्यक है कि उसकी समीक्षा की जाए तथा उसमें वांछित सुधार किया जाए। कुछ लेखकों के अनुसार प्रथम प्रारूप में संशोधन के लिए उसे तीन बार निम्न प्रकार से पढ़ने की योजना बनानी चाहिए –

प्रथम संशोधन (First Revision ) – पहला संशोधन करते समय विषय-वस्तु अर्थात् पत्र लिखने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए –

  • क्या पत्र संस्था तथा प्राप्त करने वाले की सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है,
  • क्या पत्र में आवश्यक सभी जानकारी दी गई हैं तथा दी गई जानकारी सत्य हैं,
  • क्या सन्देश की भाषा स्पष्ट है,
  • क्या पत्र में दी गई सूचना के समर्थन में पर्याप्त आँकड़े तथा तथ्य उपलब्ध हैं। 

दूसरा संशोधन (Second Revision) — दूसरे संशोधन में यह देखना चाहिए कि पत्र का खाका (Layout) सही है तथा पत्र ठीक ढंग से व्यवस्थित है। अत: निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए –

(i) क्या पत्र का खाका वांछित उद्देश्यों को पूरा करने के साथ पाठक की स्थिति के अनुरूप है,

(ii) पत्र में किए गए विचारों में कोई बाधा तो नहीं है। विभिन्न पैराग्राफों के बीच भाषा का प्रवाह सही है,

(iii) पत्र का खाका पढ़ने वाले को दी जाने वाली सभी सूचनाओं को उपलब्ध करा रहा है,

(iv) पत्र के प्रारम्भिक एवं अन्तिम पैराग्राफ सही तथा प्रभावशाली हैं।

तीसरा संशोधन (Third Revision ) – इस अन्तिम संशोधन में पत्र की शैली एवं अभिव्यक्ति की जाँच करनी चाहिए। अतः निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए –

  • क्या पत्र की भाषा एवं शैली स्पष्ट और आसान है,
  • क्या सन्देश मैत्रीपूर्ण है तथा पक्षपातपूर्ण भाषा से मुक्त 
  • क्या पत्र, पढ़ने वाले को बताता है कि उसे क्या करना है ।

सम्पादन करना (Editing) — लेखन कुशलता के अन्तिम चरण सम्पादन में वाक्य संरचना, उच्चारण व व्याकरण आदि में सुधार किया जाता है। सम्पादन में यह देखा जाता है कि शब्दों का चुनाव ठीक किया गया है, प्रारूप की भाषा उच्च कोटि की है, कोई तकनीकी त्रुटि तो नहीं है, प्रारूप का फारमेट ठीक है या नहीं आदि। इस चरण में लेखन की सतही जाँच के द्वारा सम्पूर्ण सन्देश में मुख्य परिवर्तन किए जाते हैं तथा सन्देश को प्रभावशाली स्वरूप प्रदान किया जाता है। सम्पादन लेखन कुशलता का महत्त्वपूर्ण चरण है क्योंकि कभी-कभी लेखन में प्रूफ रीडिंग की छोटी-सी त्रुटि सन्देश के अर्थ को ही बदल देती है। सम्पादन करते समय निम्नलिखित तथ्यों को ध्यान में रखना चाहिए –

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