Importance of Communication for Managers – Bcom Notes

Importance of Communication for Managers – Bcom Notes

प्रबन्धकों के लिए सम्प्रेषण / संचार का महत्त्व 

आधुनिक युग में प्रबन्ध और व्यवसाय में प्रभावी सम्प्रेषण का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अब व्यवसाय का क्षेत्र स्थानीय, प्रान्तीय तथा राष्ट्रीय सीमाओं को पार करके अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में पहुँच चुका है। अत: व्यवसाय के सफल संचालन हेतु सुव्यवस्थित सम्प्रेषण पद्धति आज की आवश्यकता बन गई है। नीतियों एवं नियोजन का क्रियान्वयन कार्य प्रगति एवं नियन्त्रण, अधीनस्थों की कठिनाइयाँ एवं उनका निराकरण, सामूहिक निर्णयन एवं प्रबन्ध में हिस्सेदारी, अभिप्रेरित एवं ऊँचे मनोबल वाले मानव संसाधन आदि के लिए प्रभावी आन्तरिक सम्प्रेषण आवश्यक होता है। इसीलिए थियो हैमन ने कहा है “प्रबन्धकीय कार्यों की सफलता प्रभावी सम्प्रेषण पर निर्भर है। “

व्यवसाय के सफल संचालन के लिए सम्प्रेषण के महत्त्व को स्पष्ट करते कीथ हुए डेविस ने लिखा है कि “सम्प्रेषण व्यवसाय के लिए उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार मनुष्य के लिए रक्त आवश्यक है।” प्रबन्धकों के लिए व्यावसायिक सम्प्रेषण के महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है-

1. प्रबन्धकीय कार्यों का आधार (Basis of Managerial Functions) – प्रभावशाली सम्प्रेषण प्रबन्ध की आधारशिला है क्योंकि इसकी आवश्यकता निर्देश में ही नहीं बल्कि प्रबन्ध के प्रत्येक कार्य में पड़ती है। प्रबन्ध अपने सहयोगियों एवं अधीनस्थों से विचार-विमर्श करके ही योजनाएँ बनाता है और सम्प्रेषण द्वारा ही वह निर्धारित उद्देश्यों नीतियों एवं कार्यक्रमों से दूसरों को अवगत कराता है। सम्प्रेषण के अभाव में नियोजन एक कागजी कार्यवाही है। चेस्टर बर्नाड के अनुसार, “सम्प्रेषण की व्यवस्था का विकास करना एवं उसे बनाए रखना प्रबन्ध का प्रथम कार्य है । ” “

2. संगठन के समन्वय में सहायक (Helpful in Co-ordination of Organization ) – व्यावसायिक संगठन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, इसके विभिन्न समूहों के बीच समन्वय एवं कार्य एकरूपता का होना नितान्त आवश्यक है। यह समन्वय तभी सम्भव हो सकता है जबकि उनके मध्य सन्देशों एवं विचारों का आदान-प्रदान सरलता एवं सुगमता से हो सके। सम्प्रेषण ही ऐसा माध्यम है जो प्रबन्धकों को विचारों एवं सन्देशों के आदान-प्रदान का सुअवसर प्रदान करके संगठन में सद्भाव एवं समन्वय बनाए रखने में सहायता करता है।

3. व्यवसाय का सफल संचालन ( Successful Operation of the Business)—व्यावसायिक क्रियाओं के सफल संचालन के लिए आन्तरिक एवं बाह्य पक्षों से निरन्तर सम्पर्क बनाए रखने के लिए संचार की आवश्यकता होती है। हेरोल्ड मॉस्किन के अनुसार, “संचार व्यवस्था हमारे व्यवसाय के संचालन में अधिकाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। हमें अनेक व्यक्तियों को सूचना देनी होती है, अनेक व्यक्तियों को सुनना होता है तथा उनसे समस्याओं के सुलझाने में सहायता लेनी पड़ती है और अन्य अनेक विषयों के सम्बन्ध में बातचीत करनी होती है।” इस प्रकार सम्प्रेषण व्यवसाय के सफल संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। इसीलिए थियो हैमन ने कहा है कि “सम्प्रेषण एक-दूसरे के मध्य सूचना एवं समझदारी बनाए रखने की प्रक्रिया है। “

4. भारार्पण एवं विकेन्द्रीकरण (Delegation and Decentralization) – बड़े व्यावसायिक संगठनों में उच्च प्रबन्धक समस्त कार्यों की देखरेख स्वयं नहीं कर सकते इसलिए उन्हें भारार्पण व विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया को अपनाना पड़ता है तथा प्रभावी सम्प्रेषण की सहायता से ही भारार्पण व विकेन्द्रीकरण सफल हो सकता है।

5. बाह्य संस्थाओं से श्रेष्ठ सम्पर्क (Good Relation with External Institutions)—आधुनिक युग गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा का युग है। व्यापारिक सफलता के लिए संस्था का बाह्य संसार से बेहतर और मधुर सम्पर्क बनाए रखना अत्यन्त आवश्यक होता है। एक संस्था संचालक या प्रबन्धक को प्रशासनिक तन्त्र, उपभोक्ता संगठनों, श्रम संघों, सरकार एवं अन्य सम्बद्ध व्यक्तियों से सम्प्रेषण बनाए रखना होता है। इससे संस्था बाहरी पक्षकारों की भावनाओं को समझ सकती है तथा उन्हें अपनी समस्याओं एवं प्रगति से अवगत कराकर अच्छे सम्बन्ध स्थापित कर सकती है।

6. व्यवसाय सन्तुष्टि द्वारा उच्च उत्पादकता की प्राप्ति (Achieving High Productivity through Job Satisfaction) – संचार के माध्यम से व्यवसाय सन्तुष्टि की भावना विकसित होती है जिसका परिणाम संगठन के कर्मचारियों द्वारा उच्च उत्पादकता के परिणाम के रूप में परिलक्षित होता है क्योंकि संचार के द्वारा ही व्यक्ति अपने व्यवसाय, भूमिका और सम्भावनाओं के बारे में बता सकते हैं। यदि संचार असफल होता है तो संस्था के कर्मचारियों की सन्तुष्टि का स्तर गिरता है, फलस्वरूप उत्पादन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

7. सामूहिक नेतृत्व में सहायक (Helpful in Leadership ) — सम्प्रेषण व्यवस्था द्वारा प्रबन्ध एवं कर्मचारी निरन्तर सम्पर्क में बने रहते हैं और विचारों, समस्याओं एवं सुझावों का आदान-प्रदान करते रहते हैं। इससे कार्यों के सम्पादन में सामूहिक नेतृत्व की भावना उत्पन्न होती है। श्रमिक व कर्मचारी यह अनुभव करते हैं कि निर्णयन में उसकी सहभागिता है तथा व्यवसाय को उसकी आवश्यकता है जिससे संस्था में स्वस्थ कार्य वातावरण निर्मित होता है।

8. मानवीय सम्बन्धों की स्थापना (Establish Human Relations) कुशल सम्प्रेषण व्यवस्था के अभाव में अच्छे मानवीय सम्बन्धों की स्थापना नहीं हो सकती। राबर्ट डी० बर्थ के अनुसार, “बिना सम्प्रेषण के मानवीय सम्बन्धों की स्थापना तथा बिना मानवीय सम्बन्धों की स्थापना के सम्प्रेषण असम्भव है।” इस प्रकार स्पष्ट है कि ये दोनों ही एक-दूसरे की स्थापना में सहायक हैं।

9. प्रजातान्त्रिक प्रबन्ध व्यवस्था (Democratic Management System) – प्रत्येक व्यवसाय में कार्यरत प्रत्येक व्यक्ति प्रबन्ध में भागीदारी चाहता है व एक कुशल प्रबन्धक ही अपने अधीनस्थों के लिए इस प्रकार का वातावरण निर्मित करता है जिससे वे अधिकाधिक रूप से प्रबन्धकीय निर्णयों में भागीदार हों। इसमें श्रेष्ठ एवं प्रभाव संचार की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है जिससे समस्त कर्मचारियों एवं अधिकारियों के मध्य निरन्तर सम्पर्क बना रहता है।

10. प्रतियोगी सूचनाएँ प्राप्त करने में सहायक (Helpful in Providing Competitive Information ) – वर्तमान प्रतिस्पर्द्धा के युग में केवल वही व्यवसाय जीवित रह सकता है जो प्रतिस्पर्द्धा की चुनौतियों का सामना करने के लिए निरन्तर अधिक-से-अधिक सूचनाएँ प्राप्त करता रहता है। प्रबन्धक प्रभावी सम्प्रेषण व्यवस्था के द्वारा उपयोगी सूचनाएँ प्राप्त करके चुनौतियों से निपटने के लिए सही कदम उठा सकते हैं।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि प्रबन्धकीय एवं व्यावसायिक प्रगति प्रभावी सम्प्रेषण प्रक्रिया पर निर्भर करती है। अतः व्यवसाय में प्रबन्धकों को अपना अधिकांश समय सम्प्रेषण कार्यों में लगाना पड़ता है। कोई भी प्रबन्धक अपने कार्य में सफल नहीं हो सकता यदि उसमें सम्प्रेषण क्षमता का अभाव है।