Legal Position of Promoter

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(Legal Position of Promoter)

प्रवर्तक की वैधानिक स्थिति 

प्रवर्तक कम्पनी का एजेन्ट नहीं हो सकता क्योंकि उसके प्रवर्तक बने रहने तक कम्पनी अस्तित्व में नहीं होती जबकि बिना स्वामी के कोई एजेन्ट नहीं होता। अतः प्रवर्तक कम्पनी का कम्पनी का प्रवर्तन एवं समामेलन (पंजीयन)/ 23 एजेन्ट नहीं है। प्रवर्तक कम्पनी का ट्रस्टी नहीं हो सकता क्योंकि पहले से कम्पनी को कोई अस्तित्व ही नहीं होता। इसके फलस्वरूप भी प्रवर्तक का कम्पनी के साथ विश्वासाश्रित सम्बन्ध होता है। 

लार्ड लिण्डले (Lord Lindley) ने प्रवर्तकों की वैधानिक स्थिति के सम्बन्ध में निम्न पाँच बातें बतायी हैं-

(1) विश्वासाश्रित सम्बन्ध-प्रवर्तक का कम्पनी के साथ और उन व्यक्तियों के साथ जिन्हें वह कम्पनी का अंशधारी बनाने के लिये प्रेरित करता है, विश्वासाश्रित सम्बन्ध होता है।

(2) अनुबन्ध के लिये बाध्य करना-कम्पनी का निर्माण हो जाने के बाद कम्पनी के संचालक प्रवर्तकों को किसी ऐसे अनुबन्ध से बाध्य कर सकते हैं जो प्रवर्तकों ने कम्पनी के प्रवर्तन की दशा में किये हों। 

(3) संचालकों का व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी न होना-यदि संचालकों ने अपने अधिकारों के अन्तर्गत उचित सावधानी तथा ईमानदारी से कम्पनी के हित में कार्य किया है तो ये कम्पनी के प्रति उन हानियों के लिये व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं होते जो कम्पनी ने प्रवर्तकों की गलतियों व भूलों के कारण उठाये हैं। 

(4) मिथ्यावर्णन के आधार पर हए अनुबन्ध को समाप्त करना कम्पनी बनने पर संचालकों द्वारा प्रवर्तकों को अनेक प्रकार व्यय का भुगतान किया जा सकता है लेकिन भुगतान न मिलने की दशा में प्रवर्तक कम्पनी पर इन व्ययों को प्राप्त करने के लिये वाद प्रस्तुत नहीं कर सकते क्योंकि प्रवर्तक को तथ्यों के मिथ्यावर्णन के आधार पर अनुबन्ध में सम्मिलित होने के लिये प्रेरित किया है, समाप्त किया जा सकता है, यद्यपि ऐसा मिथ्यावर्णन कपटमय न हो। 

(5) पक्षकारों की स्थिति के परिवर्तन के बाद व्यर्थनीय अनुबन्धों का समाप्त न होना-एक . व्यर्थनीय अनुबन्ध पक्षकारों की स्थिति में परिवर्तन होने के बाद समाप्त नहीं किया जा सकता। यदि प्रवर्तक कम्पनी के साथ कोई अनुबन्ध करते हैं तो वे उस अनुबन्ध से कम्पनी को तब तक बाध्य नहीं कर सकते जब तक कि वे कम्पनी को उस अनुबन्ध के उन सब आवश्यक तथ्यों को न बता दें, जिन्हें कम्पनी को अवश्य जानना चाहिये। 

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प्रवर्तकों के प्रकार 

(Types of Promoters)

(1) व्यावसायिक प्रवर्तक (Professional Promoters)-ऐसे प्रवर्तकों का मुख्य व्यवसाय नई कम्पनियों का प्रवर्तन करना होता है। ये प्रवर्तन सम्बन्धी कार्यों में कुशल होते हैं  और पारिश्रमिक लेकर अपनी विशेषज्ञ सेवाओं द्वारा कम्पनी का निर्माण करते हैं।

(2) सामयिक प्रवर्तक (Occasional Promoters)-इनका मुख्य व्यवसाय कम्पनियों का प्रवर्तन न होकर कुछ और होता है । कभी-कभी किसी अवसर पर ये प्रवर्तन का काम करते हैं और कम्पनी के निर्माण में रुचि लेते हैं।

(3) वित्तीय प्रवर्तक (Financial Promoters)-ऐसे प्रवर्तक जो वित्तीय लाभ प्राप्त करने के लिए प्रवर्तन कार्य में वित्तीय सहायता देते हैं । वित्तीय प्रवर्तक कहलाते हैं।

(4) तकनीकी प्रवर्तक (Technical Promoters)-तकनीकी ज्ञान के कारण ऐसे व्यक्ति कम्पनी में प्रवर्तक हो जाते हैं।
(5) विशिष्ट संस्थाएँ (Specialised Institutions)-ऐसी विशिष्ट संस्थायें जो कम्पनियों के प्रवर्तक का काम करने के लिये स्थापित की जाती हैं, विशिष्ट संस्थाएँ कहलाती कम्पनी अधिनियम/24 हैं। जैसे-राष्ट्रीय औद्योगिक विकास निगम (National Industrial Development Corporation) 

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