Meaning of Company Promotor Notes

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Meaning of Company Promotor Notes

कम्पनी प्रवर्तक का अर्थ एवं परिभाषा 

कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(69) के अनुसार, वह व्यक्ति जिसके मस्तिष्क में कम्पनी स्थापित करने का विचार उत्पन्न होता है और जो कम्पनी निर्माण से पूर्व उसकी समस्त क्रियाओं को अपनी जिम्मेदारी पर करता है, उसे प्रवर्तक कहते हैं । कम्पनी अधिनियम में प्रवर्तक शब्द की कोई परिभाषा नहीं दी गई हैं, किन्तु कम्पनी निर्माण में इसके द्वारा किये गये कार्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रवर्तक का आशय ऐसे व्यक्ति से है जो एक निश्चित योग्यतानुसार कार्य करके कम्पनी का निर्माण एवं संचालन करता है । विभिन्न विद्वानों ने इसकी परिभाषा इस प्रकार दी है-

कॉक बर्न-“प्रवर्तक वह है जो किसी निश्चित उद्देश्यों के लिये कम्पनी का निर्माण करता है और अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये आवश्यक कार्यवाही करता है।” 

गुथमैन एण्ड डूगल-“प्रवर्तक वह व्यक्ति होता है जो पूँजी व सामग्री का एक चालू संस्था के रूप में एकत्रीकरण करता है।” 

उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि एक प्रवर्तक कम्पनी का जन्मदाता होता है। . 

प्रवर्तकों की भूमिका एवं कार्य 

(Role and Functions of Promoters)

किसी कम्पनी के.प्रवर्तन के सम्बन्ध में प्रवर्तकों की भूमिका (कार्य) निम्नलिखित हैं-

(1) कम्पनी के निर्माण का विचार उत्पन्न करना।

(2) विक्रेता से सम्बन्ध स्थापित करना।

(3) विशेषज्ञों की रिपोर्ट तैयार करना। 

(4) ऐसे व्यक्तियों की खोज करना जो पार्षद सीमानियम पर हस्ताक्षर करें तथा प्रथम संचालक बनने के लिये अपनी सहमति दें। 

(5) कम्पनी के नाम, प्रधान कार्यालय का स्थान, कम्पनी के उद्देश्य, पूँजी की मात्रा एवं अभिगोपकों के साथ अनुबन्ध का निश्चय करना। 

(6) बैंकर्स, अंकेक्षक, दलाल एवं कानूनी सलाहकार आदि का चयन करना। 

(7) पार्षद सीमानियम एवं पार्षद अन्तर्नियमों को तैयार करना एवं रजिस्ट्रार के यहाँ भिजवाना। 

(8) समामेलन का प्रमाण-पत्र प्राप्त करना।

(9) प्रविवरण प्रकाशित करना।

(10) पूंजी के निर्गमन सम्बन्धी प्रबन्ध करना।

(11) यदि कोई चालू व्यवसाय क्रय करना है तो उसके लिये बातचीत करना। 

(12) विक्रेता, अभिगोपकों तथा प्रबन्ध अभिकर्ता आदि के साथ कम्पनी के हित में अनुबन्ध करना। 

(13) रजिस्ट्रार से व्यापार प्रारम्भ करने का प्रमाण-पत्र प्राप्त करना।

(14) प्रारम्भिक व्ययों का भुगतान करना। . .

(15) प्रविवरण प्रत्रिका के प्रकाशन एवं विज्ञापन का प्रबन्ध करना ।

(16) नयूनतम अभिदान (Minimum Subscription) का प्रबन्ध करना। 

इस प्रकार कम्पनी के प्रारम्भ करने से व्यवसाय के आरम्भ करने तक जो भी कार्यवाही होनी है वह प्रायः प्रवर्तक ही सम्पन्न करते हैं। 

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प्रर्वतकों के अधिकार 

(Rights of Promoters)

(1) प्रारम्भिक व्यय लेने का अधिकार--कम्पनी के समामेलन तक समस्त कार्यों पर किया जाने वाला व्यय प्रवर्तकों द्वारा किया जाता है, जिसे प्रारम्भिक व्यय कहते हैं। प्रवर्तक को कम्पनी से इस प्रकार के व्यय प्राप्त करने का अधिकार है। किन्तु यदि कम्पनी इन प्रारम्भिक व्ययों का प्रवर्तक को भुगतान नहीं करती तो प्रवर्तक कम्पनी के ऊपर वाद प्रस्तुत नहीं कर सकता। 

(2) सह-प्रवर्तकों से अनुपातिक राशि प्राप्त करने का अधिकार--यदि प्रविवरण में मिथ्या वर्णन के आधार पर सह-प्रवर्तकों में से किसी एक प्रवर्तक को क्षतिपूर्ति करनी पड़ती है तो वह प्रवर्तक सह-प्रवर्तकों से आनुपातिक राशि प्राप्त कर सकता है। 

(3) पारिश्रमिक पाने का अधिकार--कम्पनी के प्रवर्तन से सम्बन्धित किये जाने वाले कार्यों के लियो – I mrane d तशी अधिकारी होते हैं जबकि प्रवर्तक ने पारिश्रमिक के सम्बन्ध में कम्पनी से समामेलन के बाद इस आशय का अनबन्ध कर लिया कम्पनी प्रवर्तक को देय पारिश्रमिक की धनराशि अंशों, ऋण-पत्रों, नकद, सम्पत्तियों के क्रय कमीशन तथा सम्पत्ति क्रय पर लाभ के रूप में दे सकती है। इसके लिये यह आवश्यक है कि प्रवर्तक को दिये जाने वाले पारिश्रमिक का उल्लेख प्रविवरण में अवश्य होना चाहिये। 

प्रवर्तकों के कर्त्तव्य एवं दायित्व 

(Duties and Liabilities of Promoters)

(1) गुप्त लाभ अर्जित न करना–प्रवर्तक का कम्पनी के साथ विश्वासाश्रित सम्बन्ध होता. है अतः प्रवर्तक को कम्पनी से किसी भी प्रकार से कोई गुप्त लाभ नहीं कमाना चाहिये। 

(2) सारे तथ्य प्रकट करना–कम्पनी निर्माण के दौरान किये गये कार्यों, अनबन्धों । व्यवहारों से यदि प्रवर्तक का कोई हित व लाभ है तो उसका यह कर्तव्य है कि वह अपने हितों व लाभों से सम्बन्धित सभी तथ्य कम्पनी के सम्मुख प्रकट करे अन्यथा वह कपट का दोषी माना जायेगा।

(3) लाभ समर्पित करना-यदि प्रवर्तक ने प्रवर्तन के दौरान, अपने हितों को प्रकट किये बिना, कम्पनी से सम्बन्धित किसी व्यवहार में कोई गुप्त लाभ कमाया है तो उसका यह कर्त्तव्य है। कि वह उस लाभ को कम्पनी को वापिस कर दे। 

(4) निजी सम्पत्ति बेचकर लाभ न कमाना-प्रवर्तक का यह कर्त्तव्य है कि वह अपनी निजी सम्पत्तियों को कम्पनी को बेचकर अनुचित लाभ न कमाये। 

(5) निजी हित व लाभों को प्रकट करना—कम्पनी के लिये कार्य करते समय यदि किसी अनुबन्ध में किसी सम्पत्ति के क्रय-विक्रय में या कम्पनी के किसी भी अन्य व्यवहार में प्रवर्तक का कोई निजी हित, रुचि या लाभ है तो उसका कर्तव्य है वह उसे प्रकट कर दे अन्यथा वह कर्त्तव्य भंग का दोषी माना जायेगा।

(6) प्रविवरण में कपट के लिये दायित्व- प्रवर्तक,जो प्रविवरण के निर्गमन में भाग लेते हैं प्रविवरण में किये गये कपट के लिये अंशधारियों के प्रति उत्तरदायी होते हैं। 

(7) दिवालिया होने पर दायित्व-प्रवर्तक के दिवालिया हो जाने पर भी उसकी सम्पत्ति में से उसके दायित्व की राशि वसूल की जा सकती है। 

(8) आर्थिक दण्ड व सजा-यदि प्रवर्तक कम्पनी अधिनियम में प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं तो इसके लिये वह आर्थिक व दण्डनीय दोनों प्रकार का दायित्व होगा। जैसे–यदि प्रविवरण में कोई मिथ्यावर्णन है तो इसके लिये प्रत्येक प्रवर्तक पर 2 वर्ष की सजा या 5,000 रु. तंक या दोनों प्रकार का दण्ड हो सकता है। 

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