Various Concepts Regarding Unemployment in India

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Various Concepts Regarding Unemployment in India

बेरोजगारी सम्बन्धी विभिन्न अवधारणाएँ 

किसी अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी क्यों उत्पन्न होती है, इस प्रश्न पर समय अनेक विचारकों ने अपना मत प्रकट किया है।

1.प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों का विचार

प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों की यह अवधारणा थी कि स्वतन्त्र प्रतिस्पर्धात्मक अर्थव्यः नियम की क्रियाशीलता (मल्य तन्त्र) के कारण साम्य की दशा में सदैव ही पूर्ण राजा दृष्टिकोण प्रमुख हैं म सदैव ही पूर्ण रोजगार की स्थिति पायी जाती है। राज्य के हस्तक्षेप या अन्य कारणों से यदि कमी असन्तुलन की दशा उत्पन्न हो जाती है और फलस्वरूप बेरोजगारी उत्पन्न हो जाती है तो वह अल्पकालीन और अस्थायी होगी तथा उस बेरोजगारी से पारिश्रमिक में कमी करके सरलता से निपटा जा सकता है। 

2. क्रान्तिकारी विचारक कार्ल मार्क्स तथा समाजवादी विचारकों का विश्वास था कि बेरोजगारी पूँजीपरक क्रियाओं (Capitalistic-type Activities) के कारण जन्म लेती है। 

3. कीन्स ने बेरोजगारी के सम्बन्ध में एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया और कहा “प्रभावपूर्ण माँग की अपर्याप्तता ही रोजगार की मात्रा में होने वाली वृद्धि को पूर्ण रोजगार के स्तर तक पहुंचने से पहले रोक देती है।’ इस प्रकार बेरोजगारी के लिए उपभोग प्रवृत्ति का निम्न स्तर मूल रूप से उत्तरदायी है। वस्तुत: आर्थिक शक्तियाँ अत्यन्त प्रावैगिक (Dynamic) तथा बहुमुखी (Manifold) होती हैं और मुख्यतः उनकी क्रियाशीलता ही बेरोजगारी के लिए उत्तरदायी है। अत: यह कहना अनुचित होगा कि विश्व की समस्त अर्थव्यवस्थाओं में बेरोजगारी की अवस्था किसी एक कारण से ही उत्पन्न होती है, वरन् सत्य तो यह है कि बेरोजगारी असन्तुलित अवस्था की प्रतीक है और अर्थव्यवस्था में अनेक कारणों से असन्तुलन उत्पन्न हो’ सकता है। 

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Various Concepts Regarding Unemployment

बेरोजगारी के प्रमुख कारण

(Main Causes of Unemployment)

बेरोजगारी के लिए प्रायः निम्नलिखित कारक उत्तरदायी माने जाते हैं-

  1. व्यापार चक्र (Trade Cycles)-पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत कभी व्यापार में अभिवृद्धि होती है तो कभी अवसाद की स्थिति आती है। अवसाद के दिनों में बेकारी चारों ओर फैलने लगती है। .. 

2 मौसमी कार्य (Seasonal Work)-अनेक उद्योग प्रकृति से मौसमी होते हैं। इन उद्योगों में संलग्न व्यक्ति वर्ष के कुछ महीनों के लिए बेरोजगार हो जाते हैं। 

3.श्रम बाजार की अपूर्णता (Imperfectness of Labour Market)-जब श्रम बाजार में व्यवस्था तथा संगठक का अभाव पाया जाता है तो ऐसी दशा में श्रम की माँग और पूर्ति में सन्तुलन नहीं रह पाता, फलत: रोजगार के अवसरों के उपरान्त भी बेकारी पायी जाती है। Various Concepts Regarding Unemployment in India 

4.प्राविधिक परिवर्तन (Technological Changes)- विशेष रूप से श्रम की बचत करने वाले उपकरणों के प्रयोग के कारण बेकारी तीव्र गति से बढ़ती है। . 

5.ऊँचा पारिश्रमिक तथा औद्योगिक अशान्ति (Higher Wages. and Industrial Unrest)- जब श्रमिक ऊँचे पारिश्रमिक की माँग को लेकर हड़ताल कर देते हैं अथवा नियमानुसार कार्य पद्धति (Work of Rule) को अपनाते हैं, तब सेवायोजक तालाबन्दी कर देते हैं। ऐसी दशा में बेरोजगारी फैलती है। 

6. अत्यधिक बचत (Too Much Savings)— विकसित देशों के सन्दर्भ में प्रो० कीन्स ने अत्यधिक बचत को बेरोजगारी का एक प्रमुख कारण माना है। उनका कथन है माँग (Effective)है, जिससे कि अत्यधिक बचत का उपभोग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिससे समर्थ माँग (ne Demand) में कमी आ जाती है, फलतः उत्पादन के लिए की गई मांग कम परती उत्पादन घटाया जाने लगता है और सेवायोजक श्रमिकों को काम से हटा देते हैं। 

7. जनसंख्या में वृद्धि (Population Growth)- जनसंख्या के अनकल सिद्धान्त (Optimum Theory of Population) के अनुसार बराजगारा उस समय उत्पा । हो जाती है जब जनसंख्या आर्थिक संसाधनों की तुलना में अधिक हो जाती है। 

8. अन्य कारक (Other Factors)- व्यवस्था तथा संरचना सम्बन्धी परिक राजनीतिक तथा सामाजिक वातावरण, औद्योगीकरण की मन्द गति, उचित शिक्षा का अ आर्थिक संसाधनों का अपूर्ण एवं अपर्याप्त विकास, अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि, नगरीकरण बन व विनियोग की अल्प दर तथा उपयुक्त रोजगार नीति का अभाव आदि कारक भी बेरोजगारी लिए उत्तरदायी हैं। उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि बेरोजगारी एक बहुमुखी समस्या के जिसके कारणों को किसी दायरे में बाँधना कोई सरल कार्य नहीं है।

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 बेरोजगारी के प्रभाव 

(Effects of Unemployment)

बेरोजगारी के परिणाम सदैव ही बड़े घातक होते हैं। बेरोजगारी से ग्रस्त देशों में सामाजिक आर्थिक तथा राजनीतिक सभी क्षेत्रों में संकट उत्पन्न हो जाता है। संक्षेप में, बेरोजगारी के विभिन्न प्रभावों का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है –

1.आर्थिक प्रभाव (Economic Effects)- बेकारी का लोगों के जीवन-स्तर, कार्य-क्षमता तथा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। क्रय शक्ति का अभाव रहने से उनके उपभोग में गुणात्मक तथा परिमाणात्मक (Qualitative and Quantitative) दोनों ही रूपों में कमी आ जाती है। इससे न केवल उनकी कार्य-क्षमता में कमी होती है, अपितु जीवन-स्तर भी दयनीय दशा में पहुँच जाता है। कार्य-क्षमता में ह्रास होने से राष्ट्रीय आय (National Income) तथा रोजगार के स्तर (Level of Employment) में और कमी होती है, जिससे आय की विषमता बढ़ जाती है और सामाजिक न्याय मात्र एक स्वप्न बनकर रह जाता है। क्रय-शक्ति के अभाव में वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्य गिर जाते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था में अवसाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। 

2.सामाजिक प्रभाव (Social Effects)- बेकारी सामाजिक मूल्यों के प्रति अविश्वास उत्पन्न करती है जिससे सामाजिक नियन्त्रण कमजोर हो जाते हैं और सामाजिक विघटन को प्रोत्साहन मिलता है। बेरोजगारी के कारण लोगों की आसक्ति अनैतिक तथा असामाजिक कार्यों के प्रति हो जाती है, जिससे समाज में चोरी, डकैती, कालाबाजारी, तस्करी, शराबखोरी तथा जुए को प्रोत्साहन मिलता है। अन्ततः बेरोजगारी भुखमरी, दरिद्रता आर ऋणग्रस्तता को जन्म देकर समाज में निराशा और मानसिक वेदना के बीज बो देती है। 

3. राजनीतिक प्रभाव (Political Effects)- राजनीतिक दष्टिकोण से बेरोजगारा क प्रभावों की तुलना ज्वालामुखी से की जा सकती है। जिस प्रकार ज्वालामुखी सक्रिय हान र  अन्दर-ही-अन्दर धधकता रहता है और सक्रिय होकर सम्पूर्ण व्यवस्था को नष्ट कर है ठीक उसी प्रकार बेरोजगार व्यक्ति निर्माणात्मक कार्यों के स्थान पर विध्वंसात्मक में में रुचि लेते हैं और उनका दैनिक कार्य सरकार की आलोचना करना, श्रमिकों को उत्तेजित करना तथा तोड़-फोड़ करना हो जाता है। 

4.अन्य प्रभाव (Other Effects)- बेरोजगारी के अन्य प्रभावों में हम इसके मैतिक तथा मनोवैज्ञानिक प्रभावों की चर्चा कर सकते हैं। बेकारी के कारण व्यक्ति का नैतिक ” न की चरम सीमा पर पहुँच जाता है। वह नैतिक अपराध स्वाभाविक क्रियाओं की करने लगता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से एक बेरोजगार व्यक्ति का मनोबल इतना गिर जाता है कि उसे स्वयं पर भी विश्वास नहीं रहता। 

बेरोजगारी के प्रकार 

Types of Unemployment 

भारत में बेरोजगारी की समस्या जनसंख्या में वृद्धि की वजह से बढ़ रही है क्योंकि श्रम बढती जा रही है। इसके अलावा भारत में रोजगार संसाधनों जैसे भूमि, पूँजी, उद्यम, .. सीकी ज्ञान आदि की कमी तथा ऐसे कई और भी कारण हैं जिनकी वजह से भी बेरोजगारी की समस्या बढ़ती ही जा रही है। हमारे राष्ट्र में बेरोजगारी मुख्यत: संरचनात्मक है। देश में व्याप्त बेरोजगारी के विभिन्न स्वरूप निम्नलिखित हैं –

1.खुली बरोजगारी (Open Unemployment)- जब बेरोजगारों को काम ढूँढने के बावजद भी काम नहीं मिल पाता तो इसे ‘खुली बेरोजगारी’ कहा जाता है। इसे हम ‘दृश्य बेरोजगारी’ (Visible Unemployment) भी कहते हैं। अल्पविकसित देशों में खुली बेरोजगारी कम मात्रा में पायी जाती है क्योंकि वहाँ श्रमिकों का उपयोग विस्तृत पैमाने पर होता है। प्राय: सभी विकासशील देशों में मानवीय संसाधनों का अल्प उपयोग होता है, अर्थात् जो लोग काम करना चाहते हैं उन्हें उतना काम नहीं मिलता जितना कि वे करना चाहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा स्वरूप अल्प रोजगार का होता है। इसे ‘मौसमी अल्प रोजगार’ भी कहा जाता है।  Various Concepts Regarding Unemployment in India

खुली बेरोजगारी को निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है- .

(i)एक कार्य को स्वीकार न करना तथा दूसरे अच्छे कार्य की प्रतीक्षा करना।

(ii) श्रम की मात्रा तथा पूर्ति के सम्बन्ध पर; जैसे-माँग की तुलना में पूर्ति अधिक होने 

पर।

(iii)तीव्र गति से जनसंख्या वृद्धि के कारण भारत में खुली बेरोजगारी बढ़ती जा रही है।

(iv) गाँवों से भी रोजगार की तलाश में लोग शहरों में आते हैं। इससे भी खुली बेरोजगारी बढ़ जाती है।

(v) खुली बेरोजगारी असफलताओं का परिणाम भी हो सकती है।

(vi) खुली बेरोजगारी गलत आकांक्षाओं की वजह से भी हो सकती है। .. 

2.प्रर्षणात्मक बेरोजगारी (Frictional Unemployment)- नये-नये यन्त्रों के प्रयोग में लाए जाने के फलस्वरूप नित्य नए साधनों की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार विकासशील देशों में जब यान्त्रिक शक्ति से उत्पादन किया जाने लगता है, तब अकुशल एवं अप्रशिक्षित व्यक्तियों के स्थान पर कुशल एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों की आवश्यकता होती है) और अप्रशिक्षित व्यक्तियों को जब तक प्रशिक्षण न दिया जाए, उन्हें रोजगार नहीं दिया जा सकता है। इस प्रकार की बेरोजगारी को कभी-कभी तकनीकी या प्राविधिक (Technological) बेरोजगारी भी कहा जाता है। यह सदैव अल्पकालीन होती है। प्रो० लिप्से घर्षणात्मक बेरोजगारी का आर्थिक विकास से प्रत्यक्ष सम्बन्ध मानते हैं। वे इसे ‘नियमित बेरोजगारी (Permanent Unemployment) कहते हैं। उनका कथन है कि जैसे-जैसे आर्थिक विकास की गति बढ़ती है, घर्षणात्मक बेरोजगारी भी बढ़ती जाती है। Various Concepts Regarding Unemployment in India

3.मौसमी बेरोजगारी (Seasonal Unemployment)- मौसमी बेरोजगारी की व्याख्या करते हुए प्रो० लिप्से ने लिखा है कि कुछ काम-धन्धे मौसमी होते हैं जो वर्ष के कुछ महीने तक ही चलते हैं, अतः इन धन्धों में लगे व्यक्ति कुछ समय तक नियमित रूप से बेरोजगार रहते हैं। इसे ही “मौसमी बेरोजगारी’ कहा जाता है। स्पष्ट है कि मौसमी बेरोजगारी का प्रमुख कारण उद्योग की विशिष्ट प्रकृति का होना है; जैसे—भारत में चीनी उद्योग तथा कृषि उद्योग। 

4.संरचनात्मक बेरोजगारी (Structural Unemployment)- अर्थव्यवस्था की औद्योगिक संरचना में परिवर्तन आते रहते हैं। इन परिवर्तनों के फलस्वरूप कभी-कभी असाम्य की स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं और पर्याप्त संख्या में लोगों को दीर्घकाल तक बेरोजगार रहना पड़ता है। ऐसी बेरोजगारी को ‘संरचनात्मक बेरोजगारी’ कहा जाता है। इसे ‘दीर्घकालीन बेरोजगारी’ तथा ‘माक्सियन बेरोजगारी’ के नाम से भी पुकारा जाता है। मार्क्स (Marx) का विश्वास था कि इस प्रकार की बेरोजगारी पूँजीवादी देशों मुख्य रूप से पायी जाती है। यह उल्लेखनीय है कि संरचनात्मक बेरोजगारी मौसम बेरोजगारी की भाँति आकस्मिक तथा अल्पकालीन नहीं होती, वरन् यह एक गम्भीर स्थिति की परिचायक है। इससे मुक्ति पाना केवल पर्याप्त आर्थिक विकास के द्वारा ही सम्भव है।। 

5.चक्रीय बेरोजगारी (Circular Unemployment)- इस प्रकार की बेरोजगारी मुख्यत: पूजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में पायी जाती है क्योंकि वहाँ व्यापार चक्र क्रियाशील रहते हैं। अभिवृद्धि काल में पूँजी विनियोग के कारण उत्पादन सम्बन्धी गतिविधियों में वृद्धि होती है, फलतः श्रम की माँग एवं कीमत बढ़ जाती है। परन्तु अवसाद की स्थिति में श्रम की माँग बहुत कम रह जाती है क्योंकि इस समय विनियोग और उत्पादन दोनों में कमी आ जाती है, जिससे बेरोजगारी तीव्रता से फैलती है। आर्थिक मन्दी के कारण इस बेरोजगारी को केन्सियन बेरोजगारी (Keynesian Unemployment) भी कहा जाता है। वर्तमान समय में इस प्रकार की बेरोजगारी केवल ऐतिहासिक घटना-मात्र बनकर रह गई है। 

6.अदृश्य बेरोजगारी (Disguised Unemployment)-जन श्रमिक की सीमान्त उत्पादकता शून्य (0) अथवा ऋणात्मक ( –ve) होती है तो ऐसी दशा अदृश्य बेरोजगारी की दशा कहलाती है; जैसे—यदि किसी कार्य को 10 व्यक्ति सफलतापूर्वक कर सकते हों, परन्त वहाँ 15 व्यक्ति काम में संलग्न हों तो स्पष्ट है कि वहाँ 5 व्यक्ति किसी प्रकार का योगदान नहीं दे रहे हैं। यदि इन्हें हटा भी दिया जाए तो कुल उत्पादन में कमी नहीं आएगी। अन्य शब्दों में, इन 5 व्यक्तियों की सीमान्त उत्पादकता शून्य है। यही अदृश्य या प्रच्छन्न बेरोजगारी है। इस प्रकार का अनुमान लगाना बहुत कठिन कार्य है। भारत का कृषि उद्योग इसी अदृश्य बेरोजगारी से पीड़ित है। 

7. दृश्य बेरोजगारी (Visible Unemployment)— इस प्रकार की बेरोजगारी प्राय: विकसित देशों में पायी जाती है। जब अर्थव्यवस्था में प्रभावपूर्ण माँग के कम हो जाने या श्रम की पूर्ति में वृद्धि हो जाने अथवा आर्थिक उच्चावचनों (Fluctuations) के कारण लागा को वृत्तिहीन (बेकार) रहना पड़ता है, तो वह दृश्य बेरोजगारी कहलाती है। ) 

8. शिक्षित बेरोजगारी (Educated Unemployment)- शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ विगत कुछ वर्षों से इस प्रकार की बेरोजगारी का प्रसार होने लगा है। इस प्रकार की बेरोजगारी मुख्यतः नगरों में पायी जाती है। 

9.तकनीकी बेरोजगारी (Technological Unemployment)- इस प्रकार की बेरोजगारी का प्रमुख कारण ऐसी उत्पादन विधियों का प्रचलित होना है जिनमें अपेक्षाकृत कम जनशक्ति की आवश्यकता होती है। 

बेरोजगारी की समस्या के समाधान हेतु कुछ उपाय एवं सुझाव

Practical Measures and Suggestions to solve the problem of Unemployment

किसी भी देश में व्याप्त बेरोजगारी की समस्या के समाधान के लिए निम्नलिखित उपाय एवं सुझाव उपयोगी हो सकते हैं- 

1.पूँर्जी विनियोग को प्रोत्साहन (Promotion to Capital Investment)– रोजगार में वृद्धि करने का सबसे प्रभावशाली उपाय यह है कि पूँजी के विनियोग को यथासम्भव प्रोत्साहित किया जाए। निजी क्षेत्र के अतिरिक्त स्वयं सरकार सार्वजनिक क्षेत्र में कारखाने तथा उत्पादन इकाइयों का विकास एवं विस्तार करे। श्रम-बहुल देशों में सरकार द्वारा श्रमप्रधान उद्योगों (Labour Intensive Industries) के विकास पर विशेष बल दिया जाता है। कीन्स ने इस नीति का प्रबल समर्थन किया है। उनके शब्दों में, “लोक विनियोग देश की राष्ट्रीय आय तथा रोजगार को बढ़ाने में लाभदायक होते हैं।’ पूँजी के विनियोग में वृद्धि करने के लिए सरकार कई दिशाओं में कदम उठा सकती है; जैसे-देश की मौद्रिक, राजकोषीय, औद्योगिक तथा अन्य नीतियों में वांछनीय सुधार करना आदि। इन उपायों का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है –

(i).मौद्रिक नीति (Monetary Policy)- रोजगार के अधिक अवसर प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि देश की मौद्रिक नीति में इस प्रकार परिवर्तन किए जाएँ कि, आर्थिक तथा सामाजिक दृष्टि से वांछनीय क्षेत्रों को आवश्यक धनराशि यथेष्ट मात्रा में प्राप्त हो सके, और यह तभी सम्भव है जबकि देश में बैंकिंग सुविधाओं का तीव्र गति से विस्तार हो तथा व्याज की ऊँची दरों पर उदार साख सुविधाएँ उपलब्ध हों। 

(ii).राजकोषीय नीति (Fiscal Policy)- पूँजी के विनियोग पर देश की राजन नीति का भी व्यापक प्रभाव पड़ता है। अतः देश की समस्त राजकोषीय क्रियाओं is करारोपण, सार्वजनिक ऋण तथा सार्वजनिक व्यय आदि का मुख्य उद्देश्य बचत तथा विनियोग को प्रोत्साहन देना होना चाहिए। 

(iii).औद्योगिक नीति (Industrial Policy)- जहाँ तक औद्योगिक नीति की प्रश्न है इसका देश की औद्योगिक संरचना पर निर्णायक प्रभाव पड़ता है। औद्योगिक नीति का अन्तिम ध्येय एक ऐसी औद्योगिक संरचना का निर्माण होना चाहिए जिसमें वृहत्, मध्यम की तथा कुटीर सभी प्रकार के उद्योगों का समुचित विकास हो सके औरअधिक-से-अधिक लोगों को लाभदायक रोजगार की सुविधाएँ मिल सकें।) 

2. श्रम-शक्ति पर नियन्त्रण (Control Over Labour Power)- श्रम-शक्ति में निरन्तर अभिवृद्धि को रोकने के लिए यहआवश्यक है कि जनसंख्या की वृद्धि पर प्रभावपर्ण नियन्त्रण रखा जाए। इस ध्येय की पूर्ति परिवार नियोजन (Family Planning) कार्यक्रम के माध्यम से हो सकती है। ) 

3.जनशक्ति नियोजन (Planning for Man-Power)— नियोजन के इस यग में जनशक्ति के सर्वोत्तम उपयोग की दृष्टि से इसका नियोजन करना एक अनिवार्यता है। 

4.कृषि का विकास (Development of Agriculture)-भारतीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला आज भी कृषि ही है, अतः हरित क्रान्ति (Green Revolution) को और अधिक सफल बनाने के प्रयास किए जाने चाहिए। 

5.उद्योगों का विकास (Development of Industries)-वस्तुतः प्रत्येक औद्योगिक योजना का प्रधान लक्ष्य रोजगार के अवसरों में वृद्धि करना होना चाहिए। अन्य शब्दों में, एक ऐसी रोजगारप्रधान योजना बनानी चाहिए, जिसमें आधारभूत उद्योगों के साथ-साथ लघु तथा कुटीर उद्योगों को भी उचित स्थान प्राप्त हो ग्रामों में लघु तथा कुटीर उद्योग ही सम्भावित रोजगार के केन्द्र-बिन्दु हैं। इनसे ही गाँवों का औद्योगीकरण सम्भव है। 

6.उत्पादन शक्ति का पूर्ण उपयोग (Complete Utilization of Production Capacity) –उद्योगों की पूर्ण उत्पादन क्षमता के अनुसार उत्पादन करना चाहिए, तभी उत्पादन लागत में कमी हो सकेगी तथा अतिरिक्त रोजगार के अवसर भी उपलब्ध होंगे। यह भी स्मरणीय है कि इस समय भारत में भी अनेक उत्पादन इकाइयाँ ऐसी हैं जिनकी उत्पादन क्षमता का पूर्ण उपयोग नहीं किया जा रहा है। 

7.शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन (Fundamental Changes in Education System)- 19वीं शताब्दी की कालातीत (outdated) शिक्षा प्रणाली को तुरन्त बदल देना चाहिए क्योंकि यह केवल नौकरशाही वर्ग (Bureaucratic Class) को जन्म देती है। 

8.प्रशिक्षण तथा मार्गदर्शन योजनाएँ (Training and Guidance Schemes)- विकासशील देशों की सबसे बड़ी दुर्बलता यह है कि यहाँ श्रम-शक्ति तो बहुलता में प्राप्त होती है, परन्तु कुशल श्रम-शक्ति का प्रायः अभाव पाया जाता है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि इन देशों में प्रशिक्षण तथा मार्गदर्शन सुविधाओं का विस्तार किया जाए ताकि जनशक्ति की कुशलता में वृद्धि हो सके। 

9.सामाजिक सुधारों का विस्तार (Extension of Social Reforms)-आर्थिक विकास का सामाजिक पहल अत्यन्त सबल है. अतः आवश्यकता इस बात की है कि भसामाजिक प्रजातियों को नियन्त्रित किया जाए तथा सामाजिक सुविधाओं को बढ़ाया जाए, जिससे आर्थिक विकास के लिए एक उपयुक्त वातावरण तैयार हो सके। 

10.रोजगार कार्यालयों का विस्तार (Expansion of Employment Plnchanges)- Sम की मांग और पति में सम्पर्क स्थापित करने की दृष्टि से सेवायोजन कार्यालयों का विस्तार किया जाना चाहिए। 

11.सेवा क्षेत्र को प्रोत्साहन (Instigation to Service Sector)- विकासशाल देशों में विशेष रूप से सेवा क्षेत्र का यथासम्भव विकास किया जाना चाहिए क्योंकि यह क्षेत्र तकनीकी विशेषज्ञों को रोजगार के व्यापक अवसर प्रदान कर सकता है। 

12.स्वरोजगार के अवसरों में वृद्धि (Growth of Selfemployment Opportunities)- भारत जैसे विकासशील देशों में अभी भी यह सम्भव नहीं है कि सरकार सभी व्यक्तियों को रोजगार अथवा बेरोजगारी भत्ता (Unemployment Allowance) प्रदान कर सके, अत: तकनीको विशेषज्ञों को चाहिए कि वे अपना रोजगार खोलें और इसके लिए सरकार उन्हें वित्तीय सहायता (Financial Aid) प्रदान करे। 

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