Bcom 1st year business environment notes in Hindi

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TOPICS WISE

  1. Indian Business Environment
  2. Classification of Business Environment
  3. Meaning of Social Injustice Notes
  4. Meaning and Definition of Business Environment Notes
  5. New Five Yearly policy 2015-2020 Notes
  6. Balance of Trade
  7. Meaning of Poverty Notes in hindi
  8. Main factors Responsible for the Sickness of Small Scale Industries
  9. Meaning of Privatization Notes pdf
  10. Regional Imbalance in India Notes
  11. Various Concepts Regarding Unemployment in India
  12. Industrial Policy 1991 Notes
  13. Inflation Meaning in Hindi Notes
  14. National Income of India Notes
  15. Black Money in India Hindi
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व्यावसायिक वातावरण का अर्थ एवं परिभाषा

Meaning and Definition of Business Environment

किसी भी व्यवसाय का जीवन तथा अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता है

कि वह व्यवसाय अपने भौतिक साधनों, वित्तीय साधनों तथा अन्य क्षमताओं का उद्यम के अनुरूप किस प्रकार समायोजन करता है। किसी भी व्यावसायिक संस्था को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित करने वाले वातावरण को व्यावसायिक वातावरण के रूप में जाना जाता है। व्यावसायिक वातावरण का संस्था की कार्यकुशलता पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। इस व्यावसायिक वातावरण को निम्नलिखित दो रूपों में प्रकट किया जा सकता है

(i) बाह्य वातावरण,

(ii) आन्तरिक वातावरण।

यद्यपि आन्तरिक वातावरण को सम्यक् कारकों द्वारा नियन्त्रित किया जा सकता है, किन्तु बाह्य वातावरण को परिवर्तित करना सम्भव नहीं होता है अत: इसके प्रभाव क्षेत्र के अन्तर्गत रहते हुए ही व्यावसायिक कार्यों का निष्पादन करना होता है।

प्रमुख विद्वानों ने व्यावसायिक वातावरण को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया है

(1) विलियम ग्लूक व जॉक के शब्दों में, “व्यावसायिक वातावरण व्यावसायिक फर्मों तथा उद्योगों के बाहर की उन सभी बातों का योग है जो उनके संगठन एवं संचालन को प्रभावित करती हैं।”

(2) उर्विक तथा हण्ट के अनुसार, “व्यवसाय एक उद्यम है, जो किसी वस्तु या सेवा का निर्माण करता है, वितरण करता है या समाज के उन अन्य सदस्यों को प्रदान करता है जिन्हें उसकी आवश्यकता है तथा जो इसकी कीमत के भुगतान के लिए सक्षम तथा इच्छुक है। .

(3) डेविस के अनुसार, “व्यवसाय वस्तुओं तथा सेवाओं के उत्पादन करने, बाजार में उनकी बिक्री करने तथा इस प्रयास से लाभ प्राप्त करने वाले व्यक्तियों का संगठित प्रयास हो ।

उपर्यक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि जिन विशिष्ट दशाआ म रह हए व्यावसायिक संस्था को अपने क्रिया-कलापों को क्रियान्वित करना होता है, वे समस्त दशा व्यावसायिक पर्यावरण के अन्तर्गत ही आती हैं।

व्यावसायिक वातावरण का व्यावसाय पर आंशिक अथवा विस्तृत रूप में पड़ता है। प्रायः बाह्य कारकों को अपने अनुकूल करना सम्भव नहीं होता है, अतः उन का

के अनुगामी होकर हमें अपने कार्यों को दिशा देनी पड़ती है और उनके अनुकूल समायोजन करना पड़ता है। ऐसा न कर पाने की दशा में व्यवसाय में ह्रास का होना निश्चित हा

व्यावसायिक वातावरण की प्रकृति

Nature of Business Environment

व्यवसाय की सफलता एवं विकास के लिए स्वच्छ व कुशल वातावरण अत्यन्त आवश्यक है। प्रशासनिक व्यवस्था के सुचारु व सुदृढ़ होने पर व्यावसायिक नीतिया का निर्धारण व उनका निष्पादन सरलता के साथ सम्भव हो जाता है। प्रशासनिक सेवाओं के अकुशल तथा भ्रष्ट होने से लाभ की अपेक्षा हानि की अधिक सम्भावना रहती है। यह सर्वविदित है कि व्यवसाय तथा वातावरण के बीच एक विशिष्ट सम्बन्ध पाया जाता है। निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से यह सम्बन्ध स्पष्ट किया जा सकता है

1. वातावरण अथवा पर्यावरण से निरन्तर सम्पर्क—

प्रत्येक व्यावसायिक संस्था को लगातार वातावरण से सम्पर्क बनाकर रखना आवश्यक होता है। इसके लिए प्रत्येक संस्था को द्विमार्गीय संचार की आवश्यकता होती है। इससे संस्था को वातावरण में हो रहे परिवर्तनों की तुरन्त जानकारी मिलती रहती है तथा संस्था भी अपने नवीन उत्पादों एवं सेवाओं की जानकारी वातावरण को उपलब्ध कराने में सफल हो जाती है। यदि ये सम्पर्क सार्थक होते हैं तो संस्था का भविष्य उज्ज्वल होता है।

2. वातावरण की आवश्यकता की पूर्ति संस्था द्वारा किया जाना—

वातावरण की । आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संस्था द्वारा हर सम्भव प्रयास किया जाना आवश्यक होता है। यदि संस्था ऐसा नहीं कर पाती है तो वह धीरे-धीरे स्वतः ही समाप्त हो जाती है।

3. अनेक गतिशील तत्त्वों का निहित होना

-व्यावसायिक संस्था के वातावरण में अनेक गतिशील तत्त्व निहित रहते हैं। ये तत्त्व हमेशा परिवर्तित होते रहते हैं।

4. वातावरण ही विस्तृत बाजार-

संस्था का वातावरण ही उसका विस्तृत बाजार . होता है। प्रत्येक व्यावसायिक फर्म द्वारा उत्पादित वस्तुओं को अपने बाह्य वातावरण को उपलब्ध कराना होता है। जब वातावरण उन वस्तुओं अथवा सेवाओं को स्वीकार कर लेता है तो संस्था को विस्तृत बाजार उपलब्ध हो जाता है एवं संस्था की साख भी काफी बढ़ जाती है।

5. बाधाएँ एवं अनिश्चितताएँ–

प्रत्येक व्यावसायिक संस्था को व्यावसायिक वातावरण में कार्य करने में तथा वातावरण की अपेक्षाओं को सन्तुष्ट करने में अनेक अनिश्चितताओं व बाधाओं का सामना करना पड़ता है। जो संस्था इन अनिश्चितताओं एवं बाधाओं को पार कर लेती है और उपयुक्त अवसरों की खोज कर लेती है, वह सफल हो जाती है; किन्तु इसके विपरीत, यदि वह ऐसा करने में असमर्थ रहती है तो उसका अस्तिस्व ही समाप्त हो जाता है।

6. संस्था को आन्तरिक एवं बाह्य वातावरण द्वारा प्रभावित करना—

प्रत्येक प्रकार – की संस्था को आन्तरिक तथा बाहरी दोनों प्रकार का वातावरण प्रभावित करता है। संस्था अपने आन्तरिक वातावरण को भी नियन्त्रित कर सकती है, किन्तु बाह्य वातावरण अथवा परिदृश्य पर संस्था का कोई नियन्त्रण नहीं होता अत: किसी भी संस्था को अपने निर्णय बाह्य वातावरण को ध्यान में रखकर ही लेने होते हैं।

7. तत्त्वों में आपसी निर्भरता-

गतिशील पर्यावरण के तत्त्वों की एक यह भी होती है कि ये समस्त तत्त्व आत्मनिर्भर नहीं होते एवं ये एक-दसरे पानी उदाहरणार्थ-आर्थिक घटक तथा सामाजिक घटक, राजनीतिक घटक तथा एवं धार्मिक घटक तथा सामाजिक घटक आपस में एक-दूसरे को प्रभावित करते परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।

8. संसाधनों का विनिमय करना-

सभी व्यावसायिक प्रतिष्ठान वातावरण से प्राप्त करते हैं तथा इन संसाधनों का उपयोग करके वे वस्तओं उत्पादन करते हैं। बिना इन संसाधनों को प्राप्त किएं कोई भी संस्था अपने कार्यों को कर सकती। कुछ परिस्थितियों में तो इन संसाधनों को प्राप्त करने में संस्थानों कठिनाई उठानी पड़ती है तथा प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।

9. सभी वर्गों के प्रति उत्तरदायित्व-

एक व्यापारिक प्रतिष्ठान वातावरण के नाम घटकों/वर्गों के प्रति उत्तरदायी होता है। ये वर्ग, जिनके प्रति एक व्यापारिक प्रतिष्ठान उत्ता होता है, इस प्रकार हैं-उपभोक्ता, कर्मचारी, आम नागरिक, सरकारी तन्त्र, राष्टीयअन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, विनियोजक, प्रतिस्पर्धी प्रतिष्ठान इत्यादि। अत: प्रत्येक व्यापारिक प्रतिष्ठान को कोई भी निर्णय लेते समय इन सभी वर्गों का ध्यान रखना चाहिए।

10. रूपान्तरण से उपयोगिता को सृजित करना-

व्यवसाय अपने वातावरण से जो कुछ साधन प्राप्त करता है, वह उन्हें पुनः वातावरण को वापस करता है। इस प्रक्रिया में वह विभिन्न साधनों का रूपान्तरण करता है तथा उपयोगिता का सृजन भी करता है।

11. आकस्मिक परिवर्तनों के खतरे को सहना–

व्यावसायिक जगत को पर्यावरण में होने वाले आकस्मिक परिवर्तनों के खतरे को भी झेलना पड़ता है, चाहे वे व्यवसायी की क्षमता के अनुकूल हों या प्रतिकूल। ये आकस्मिक परिवर्तन अनेक प्रकार के हो सकते हैं; जैसे-बिजली की समस्या, मन्दी काल, ब्याज की दरों में वृद्धि हो जाना, कच्चे माल का यकायक भाव बढ़ जाना, बाजार में अत्याधुनिक माल का आ जाना इत्यादि।

12. समाज में परिवर्तन का माध्यम-

ऐसा नहीं है कि केवल वातावरण ही संस्थाओं को प्रभावित करता है, बल्कि देखा यह गया है कि कुछ संस्थाएँ भी वातावरण में परिवर्तन करने में अग्रणी रही हैं। अत: यह कहना उचित है कि “व्यवसाय वातावरण की उपज होने के साथ-साथ इसका सृष्टिकर्ता भी है।” व्यवसाय के द्वारा समय-समय पर समाज में शिक्षा, आचरण, जीवन-शैली तथा भौतिक एवं नैतिक स्तर में परिवर्तन लाए गए हैं और आग भावष्य में भी परिवर्तन किए जाते रहेंगे।

13. परिवर्तनों के साथ-साथ परिवर्तित होना आवश्यक

प्रत्येक व्यावसायिक समका अपना आस्तत्व बनाए रखने के लिए वातावरण के अनसार अपने आप को परिवतित करना होता है। ग्राहकों की रुचियों. जीवन-शैली. फैशन, उत्पादन तथा वितरण प्रतिस्पद्धां सरकारी नियमन एवं नीतियों तथा व्यापार चक्रों में लगातार पारवतन हा अत: समस्त संस्थाओं को इन परिवर्तनों के अनसार ही अपने आप को बदलना अनिवाय हा

14. सूचनाओं का आदान-प्रदान-

प्रत्येक व्यावसायिक संस्था अपने बाहरी वातावरण में अनेकानेक सूचनाओं का आदान-प्रदान भी करती है। सामान्यतः प्रत्येक संस्था बाह्य वातावरण का अध्ययन करती है तथा सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं तकनीकी वातावरण के सम्बन्ध में सूचनाओं को प्राप्त करती है। इन सूचनाओं के आधार पर ही विभिन्न घटकों का अध्ययन किया जाता है तथा अनुमान भी लगाया जाता है। इन सूचनाओं के माध्यम से ही व्यवसायी उत्पादन, वित्त, क्रय-विक्रय आदि के सम्बन्ध में योजना बनाता है तथा निर्णयन एवं नियन्त्रण करता है। साथ ही वातावरण की जटिलताओं को समझकर वह समस्या का समाधान भी खोज निकालता है।

व्यवसायी द्वारा स्वयं भी बाह्य वातावरण को सूचनाएँ प्रदान की जाती हैं। ये सूचनाएँ कभी-कभी अदालत के आदेशानुसार या सरकारी विभागों के द्वारा भी माँगी जा सकती हैं। साथ ही समय-समय पर वह अपने निवेशकों, कर्मचारियों एवं श्रम संघों को भी सूचनाएँ उपलब्ध कराता है। कभी-कभी संस्थाएँ स्वेच्छा से भी बाह्य वातावरण को सूचनाएँ उपलब्ध कराती हैं। ये सूचनाएँ प्रेस विज्ञप्तियों अथवा विज्ञापनों इत्यादि के द्वारा ही दी जा सकती हैं। .

15. अति विशिष्ट परिवर्तनों को जानना व्यवसाय का उत्तरदायित्व

जैसा कि विदित है; व्यावसायिक वातावरण निरन्तर गतिशील रहता है। साथ ही व्यवसाय से यह आशा की जाती है कि जो वातावरण में अति विशिष्ट परिवर्तन हों, उन सभी की जानकारी व्यवसायी को अवश्य होनी चाहिए। इसके लिए व्यवसायी को कोई बताएगा नहीं अपितु इन परिवर्तनों की जानकारी उसे स्वयं रखनी होगी। इन्हीं परिवर्तनों की यदि पहले से जानकारी रखी जाए तो व्यवसाय को काफी लाभ होने की सम्भावना होती है।

16. कुछ घटकों का असीमित प्रभाव-

कुछ घटक ऐसे भी होते हैं, जिनका असीमित प्रभाव होता है। वे घटक हैं-नए वैधानिक प्रावधान, नए कानून, नई सरकारी नीतियाँ, वैज्ञानिक शोध, सामाजिक दशाएँ, राजनीतिक व सत्ता परिवर्तन, विदेशी दबाव, तकनीकी परिवर्तन इत्यादि। ये ऐसे घटक हैं जिन पर वातावरण द्वारा नियन्त्रण स्थापित कर पाना सामान्यत: सम्भव नहीं होता है।

अत: यह कहा जा सकता है कि व्यवसाय तथा वातावरण के मध्य काफी गहरा सम्बन्ध

Classification of Business Environment

निम्नलिखित शीर्षकों के आधार पर व्यावसायिक वातावरण का वर्गीकरण कर सकते हैं

(अ) आन्तरिक वातावरण (Internal Environment), .

(ब) बाहरी वातावरण (External Environment)।

(अ) आन्तरिक वातावरण

Internal Environment

प्रत्येक व्यावसायिक संस्था का अपना एक संगठन (Organization) होता है जिसके माध्यम से वह अपना व्यावसायिक कार्य सम्पन्न करती है। यह संगठन ही उसका ” वातावरण होता है। यह आन्तरिक वातावरण अथवा पर्यावरण दो प्रकार और (Formal) तथा अनौपचारिक (Informal) का होता है। व्यावसायिक आन्तरिक वाताव नियंत्रणीय होता है, जिसे व्यवसायी द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। इसके महत्त्वपर्ण अंग निम्नलिखित हैं-

(i) व्यवसाय के प्रमुख लक्ष्य एवं उद्देश्य,

(ii) व्यवसाय की विचारधारा. दर्शन – दृष्टिकोण,

(iii) व्यावहारिक आचार संहिता तथा नैतिक मानदण्ड,

(iv) कारखाने का वातावरण

(v) व्यावसायिक एवं प्रबन्धकीय नीतियाँ,

(vi) उत्पादन की तकनीकें एवं कार्य-विधियाँ

(vii) श्रम-प्रबन्ध सम्बन्ध,

(viii) प्रबन्ध का सूचना-तन्त्र और व्यवस्था,

(ix) संगठन की संरचना व डिजाइन,

(x) संसाधनों की उपलब्धता, कार्यशीलता तथा उपयोगिता।

उपर्युक्त सभी घटकों का सम्बन्ध व्यवसाय के आन्तरिक वातावरण से है, अर्थात ऐसा . वातावरण जो व्यवसायी अथवा फर्म के नियंत्रण में है। फर्म चाहे तो इन घटकों को अपने पक्ष में करके सफलता हासिल कर सकती है। इसमें समय-समय पर परिवर्तन भी होते रहते हैं. लेकिन जो भी परिवर्तन होते हैं. उन पर संस्था का पूर्ण नियन्त्रण होता है।

(ब) बाहरी वातावरण

External Environment

बाहरी वातावरण या पर्यावरण से आशय संस्था के सम्पर्क में आने वाले सम्पूर्ण बाह्य व्यावसायिक संसार से है। बाह्य वातावरण को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है

(1) व्यवसाय का व्यष्टि परिवेश (Micro Environment),

(2) व्यवसाय का समष्टि परिवेश (Macro Environment)। ..

1. व्यवसाय का व्यष्टि परिवेश (Micro Environment)-

व्यष्टि परिवः सम्बन्धी घटक घनिष्ठता से कम्पनी के साथ जुड़े रहते हैं। सूक्ष्म शक्तियाँ आवश्यक रूप से . उद्योग की सभी फर्मों पर प्रभाव नहीं डालती हैं। ये किसी फर्म-विशेष पर ही प्रभाव डालता है। इस प्रकार के परिवेश में व्यवसाय के निकट वातावरण के निम्नलिखित कारकों का सामान किया जाता है जो ग्राहकों की सेवा करने में इसकी योग्यता को प्रभावित कर सकत

(i) ग्राहक,

(ii) प्रतिस्पर्धा,

(iii) पर्तिकर्ता,

(iv) जनता,

(v) माका

जैसे—विज्ञापन, रेडियो, टी०वी०, पत्रिकाएँ एवं सलाहकार इत्यादि।

2. व्यवसाय का समष्टि परिवेश (Macro Environment)

अन्तर्गत उन घटकों को शामिल किया जाता है जो एक व्यवसायी के नियंत्रण घटक दो प्रकार के होते हैं

(i) जनता,

(ii) मार्केटिंग चैनल;

vironment)-समष्टि परिवेश के व्यवसायी के नियंत्रण में नहीं होते हैं। ये

(क) आर्थिक घटक (Economic Factors),

(ख) अनार्थिक घटक (Non-economic Factors)।

आर्थिक घटक के अन्तर्गत निम्नलिखित कारकों को शामिल किया जाता है

(i) जनसंख्या सम्बन्धित परिवेश,

(ii) आर्थिक परिवेश,

(iii) तकनीकी परिवेश,

(iv) अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश इत्यादि।

अनार्थिक घटक के अन्तर्गत निम्नलिखित कारकों को शामिल किया जाता है

(i) सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश,

(ii) राजनीतिक परिवेश,

(iii) भौतिक परिवेश

(a) प्राकृतिक संसाधन-भूमि, खनिज, जल इत्यादि,

(b) जलवायु, वर्षा, ठण्डक, नमी आदि,

(c) प्राकृतिक संरचना-विद्युत, सड़क मार्ग, रेल मार्ग, अन्य यातायात इत्यादि,

(iv) शैक्षिक वातावरण। mom

विश्व व्यापार संगठन और भारत

World Trade Organization and India

भारत 1947 में स्थापित गैट तथा 1995 में स्थापित विश्व व्यापार संगठन का संस्थापक सदस्य रहा है। विश्व व्यापार संगठन में भारत की भूमिका अत्यधिक सक्रिय एवं प्रभावी सदस्य राष्ट्र की रही है। विश्व व्यापार संगठन ने अपनी स्थापना के पश्चात् सर्वप्रथम भारत की व्यापार नीति का पुनर्निरीक्षण अप्रैल 1998 में करवाया, जिसमें भारत की अत्यधिक प्रशंसा की गई थी।

भारत को विश्व व्यापार संगठन से सम्भावित लाभ

Advantages to India from WTO

1. विवादों का निपटारा (Settlement of Disputes)–

विश्व व्यापार संगठन के सदस्य के नाते भारत वस्तुओं तथा सेवा के व्यापार तथा इनसे सम्बन्धित विवादों के निपटारे हेतु संगठन में शिकायत दर्ज करवा सकता है और वहाँ अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखकर उनका उपयुक्त समाधान निकलवा सकता है।

2. निर्यातों में वृद्धि (Increase in Exports)-

विश्व व्यापार संगठन के सदस्य होने के कारण भारत के निर्यातों में प्रतिवर्ष 150 से 200 करोड़ डॉलर के समकक्ष वृद्धि होने की आशा है। अमेरिका तथा यूरोपीय समुदाय के देशों में वस्त्रों तथा पोशाकों का निर्यात किए जाने से देश की निर्यात आय में तेजी से वृद्धि होगी।

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