Marginal Productivity Theory of Distribution

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Marginal Productivity Theory of Distribution

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प्रश्न 7-सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की आलोचनाएँ लिखिए। Write the Criticisms of the Marginal Productivity Theory.

अथवा वितरण के सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए। Critically examine the Marginal Productivity Theory of Distribution.

त्तर- सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त वितरण का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। यह सिद्धान्त इस बात की सामान्य व्याख्या करता है कि उत्पत्ति के विभिन्न साधनों का न्यायोचित पुरस्कार किस प्रकार निर्धारित हो। यह सिद्धान्त मूलत: प्रतिस्थापन सिद्धान्त (Law of Substitution) पर आधारित है। यह सिद्धान्त यह बताता है कि उत्पादन के एक उपादान की कीमत उसकी सीमान्त उत्पादकता के आधार पर निर्धारित होती है। इस सिद्धान्त की प्रारम्भिक व्याख्या 19वीं शताब्दी के अन्त में प्रो० जे०बी० क्लार्क (J.B. Clark), विक्सटीड (Wickstead), वालरस (Walras) आदि अर्थशास्त्रियों ने की, तत्पश्चात् इसके विकास में श्रीमती जोन रोबिन्सन (Mrs. Joan Robbinson) तथा जे०आर० हिक्स जैसे अर्थशास्त्रियों ने उल्लेखनीय योगदान दिया है।

सरल शब्दों में, इस सिद्धान्त का सार यह है कि जिस प्रकार दीर्घकाल में वस्तुओं तथा सेवाओं का मूल्य उनकी सीमान्त उपयोगिता द्वारा निर्धारित होता है ठीक उसी प्रकार उत्पत्ति के विभिन्न साधनों का प्रतिफल भी उनकी सीमान्त उत्पादकता के द्वारा निर्धारित होता है। इस प्रकार यह सिद्धान्त यह बताता है कि राष्ट्रीय आय में से उत्पादन के प्रत्येक साधन को (साहसी के अतिरिक्त) जो प्रतिफल मिलता है वह उस साधन विशेष की सीमान्त उत्पत्ति के बराबर होता है। हाँ, किसी अवधि में (अथवा अल्पकाल में) किसी साधन को मिलने वाला प्रतिफल उस सीमान्त उत्पादकता से कम या अधिक हो सकता है, परन्तु दीर्घकाल में अथवा साम्य की दशा में साधन को मिलने वाला प्रतिफल उसकी सीमान्त उत्पत्ति (उत्पादकता) के बराबर ही होगा।

उपर्युक्त व्याख्या के अनुसार इस सिद्धान्त की दो प्रमुख बातें निम्नवत् हैं-

(1) साधन की कीमत उसकी उत्पादकता पर निर्भर करती है।

(2) साधन की कीमत उसकी सीमान्त उत्पादकता (Marginal Productivity) द्वारा निर्धारित होती है।

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की परिभाषाएँ (Definitions of Marginal Productivity Theory)

(1) प्रो० साइमन्स (Prof. Simons) के शब्दों में—“पूर्ण प्रतियोगिता और उत्पत्ति के साधनों की पूर्ण गतिशीलता की दशाओं में श्रमिक को सीमान्त उत्पादन में कार्य पर लगाने से हुई उत्पत्ति के बराबर ही मजदूरी मिलती है।”

(2) प्रो० हिक्स (Prof. Hicks) के शब्दों में-“सीमान्त उत्पादकता उत्पत्ति के साधनों के पुरस्कार की माप है जो सन्तुलन की अवस्था में उसे प्राप्त होता है, अर्थात् उद्योग के शेष

संगठन को पूर्ववत् बनाए रखते हुए फर्म की उत्पत्ति में वह वृद्धि जो उस साधन की पूर्ति में एक छोटी इकाई जोड़कर फर्म को प्राप्त होती है।”

सीमान्त उत्पादकता की धारणा को स्पष्ट करने के लिए हम एक उदाहरण भी ले सकते हैं—मान लीजिए कि किसी कारखाने में उत्पादन के अन्य साधनों के साथ 24 श्रमिक कार्य करते हैं जिससे कारखाने की कुल आय rs 5000 प्राप्त होती है। अब यदि उत्पत्ति के अन्य साधनों को यथास्थिर रखकर केवल श्रमिकों की संख्या में एक की वृद्धि कर दें, अर्थात् श्रमिकों की संख्या 25 कर दें, तो कारखाने को rs 5100 की आय प्राप्त होती है। इस प्रकार एक श्रमिक की वृद्धि से rs 100 की आय बढ़ जाती है। यही rs 100 अन्तिम (सीमान्त) श्रमिक की सीमान्त उत्पत्ति कहलाएगी।

अतः श्रमिक की मजदूरी किसी भी दशा में rs 100 से अधिक नहीं होगी और शेष श्रमिक भी इसी दर से मजदूरी (Wages) प्राप्त करेंगे। इस प्रकार साधन की सीमान्त उत्पादकता उसकी अन्तिम इकाई की उत्पादकता का ही दूसरा नाम है।

(3) श्रीमती जोन रोबिन्सन के शब्दों में—“सीमान्तोत्पादन से अभिप्राय अन्य साधनों की निश्चित मात्रा के साथ किसी एक अतिरिक्त व्यक्ति के प्रयोग से उत्पादन में होने वाली वृद्धि से है।’ अन्य शब्दों में, यह श्रम की सीमान्त भौतिक उत्पादकता और उत्पादन इकाई की सीमान्त आय का गुणनफल है।

(4) प्रो० सैमुअल्सन (Samuelson) के शब्दों में, “किसी उत्पादनशील साधन की सीमान्त उत्पत्ति उस साधन की एक अतिरिक्त इकाई द्वारा उत्पादित की गई अतिरिक्त मात्रा होती है, जबकि अन्य साधन समान रहते हों।”

(5) प्रो० हैन्सन के शब्दों में, “किसी साधन की सीमान्त उत्पत्ति साहसी की कुल आय में वह वृद्धि है जो उस साधन की एक अतिरिक्त इकाई के कार्य में लगाने पर प्राप्त होती है।”

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की मान्यताएँ

(Assumptions of the Marginal Productivity Theory)

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है-

(1) उत्पादन की समस्त इकाइयाँ परस्पर समान हैं और वे एक-दूसरे की पूर्ण स्थानापन्न हैं।

(2) एक साधन की विभिन्न इकाइयाँ ही नहीं अपितु विभिन्न साधनों की विभिन्न इकाइयाँ भी पूर्ण स्थानापन्न हैं।

(3) साधन बाजार तथा साधनों द्वारा उत्पादित वस्तु के बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति पायी जाती है।

(4) केवल एक साधन परिवर्तनशील है तथा शेष साधन स्थिर रहते हैं। अन्य शब्दों में, परिवर्तनशील साधन की सीमान्त उत्पादकता (Marginal Productivity) को ज्ञात किया जा सकता है।

(5) प्रत्येक उत्पादक का लक्ष्य अधिकतम लाभ प्राप्त करना है।

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की मान्यताएँ (Assumptions of the Marginal Productivity Theory)

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है-

(1) उत्पादन की समस्त इकाइयाँ परस्पर समान हैं और वे एक-दूसरे की पूर्ण स्थानापन्न हैं।
(2) एक साधन की विभिन्न इकाइयाँ ही नहीं अपितु विभिन्न साधनों की विभिन्न इकाइयाँ भी पूर्ण स्थानापन्न हैं।
(3) साधन बाजार तथा साधनों द्वारा उत्पादित वस्तु के बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति पायी जाती है।
(4) केवल एक साधन परिवर्तनशील है तथा शेष साधन स्थिर रहते हैं। अन्य शब्दों में, परिवर्तनशील साधन की सीमान्त उत्पादकता (Marginal Productivity) को ज्ञात किया जा सकता है।
(5) प्रत्येक उत्पादक का लक्ष्य अधिकतम लाभ प्राप्त करना है।
(6) अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की स्थिति विद्यमान है।

(7) सिद्धान्त के अन्तर्गत परिवर्तनशील अनुपातों के नियम को क्रियाशील मान लिया गया है।
(8) सीमान्त उत्पादकता का यह सिद्धान्त केवल दीर्घकाल में लागू होता है, अर्थात् अल्पकाल में साधन को मिलने वाला पुरस्कार उसकी सीमान्त उत्पादकता से कम या अधिक हो सकता है।

 

सीमान्त उत्पादकता के प्रकार या माप (Kinds or Measurements of Marginal Productivity)

उत्पाद सीमान्त उत्पादकता को तीन प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है-

1.सीमान्त भौतिक उत्पाद (Marginal Physical Product)-किसी साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से कुल भौतिक उत्पाद (Total Physical Product) में जो वृद्धि होती है, उसे सीमान्त भौतिक उत्पाद कहते हैं, जबकि अन्य साधन स्थिर रखे जाते हैं।

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सीमान्त भौतिक उत्पाद वक्र सदैव U के उल्टे आकार का होता है जैसा कि रेखाचित्र-22 में दिखाया गया है
2. सीमान्त आगम उत्पाद (Marginal Revenue Product)-जब सीमान्त भौतिक उत्पाद की वृद्धि को द्रव्य के रूप में व्यक्त करते हैं तो इसको सीमान्त आगम उत्पाद (Marginal Revenue Product) कहते हैं। सूत्र रूप में,    MRP = MPP X MR

3. सीमान्त उत्पाद मूल्य (Value of Marginal Product)-यदि प्राप्त अतिरिक्त उत्पादन, अर्थात् भौतिक उत्पाद को वस्तु के मूल्य से गुणा कर दें तो सीमान्त उत्पाद का मूल्य प्राप्त हो जाता है, अर्थात्
                     VMP = MPP X P (or AR)

चूँकि पूर्ण प्रतियोगिता में      P = MR = AR होता है,

                    VMP = MPP X MR

                   या VMP = MRP

स्मरण रहे, पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में कीमत (P) और सीमान्त आय (आगम) (MR) एक-दूसरे के बराबर होती हैं, किन्तु अपूर्ण प्रतियोगिता की दशा में वस्तु का एकसमान … मूल्य नहीं होता, सीमान्त आय (आगम) (MR) कीमत से कम बनी रहती है, फलस्वरूप सीमान्त उपज का मूल्य (VMP) और सीमान्त आगम उत्पाद (MRP) एकसमान न होकर अलग-अलग होते हैं। दूसरे शब्दों में, पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में :

                   P = MR   or     AR = MR              VMP = MRP

अपूर्ण प्रतियोगिता की दशा में :

                    P #MR   ot      P >MR              VMP > MRP

उत्पादन साधनों का सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त के माध्यम से कीमत निर्धारण
(Factor Price Determination)

एक फर्म किसी साधन को उस सीमा तक प्रयोग करेगी, जहाँ पर कि उस साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग करने से कुल आय में वृद्धि होती है अर्थात् सीमान्त आगम उत्पाद (MRP) उस अतिरिक्त इकाई की लागत अर्थात् सीमान्त साधन लागत (MFC) के बराबर हो जाए। दूसरे शब्दों में, फर्म के साम्य के लिए निम्नलिखित दशा पूरी होनी चाहिए-

MRP = MFC

दूसरे शब्दों में, सीमान्त उत्पादकता का सिद्धान्त बताता है कि एक साधन की कीमत उसकी सीमान्त उत्पादकता, अर्थात् सीमान्त आगम उत्पादकता के बराबर निर्धारित होगी। अल्पकाल में फर्म को साधन की इकाइयों के प्रयोग करने से लाभ या हानि हो सकती है। लाभ की स्थिति को रेखाचित्र-23 में दिखाया गया है।

रेखाचित्र में P बिन्दु पर MRP = MFC है। इसलिए साधन की कीमत PQ होगी तथा साधन की मात्रा OQ प्रयोग में लायी जाएगी। रेखाचित्र-23 से स्पष्ट है कि फर्म को LPNM के बराबर लाभ प्राप्त होगा।

दीर्घकाल में फर्मों को साधन की इकाइयों के प्रयोग से केवल सामान्य लाभ प्राप्त होगा अर्थात्

   MFC = ANRP

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दूसरे शब्दों में, दीर्घकाल में फर्मों तथा उद्योग के साम्य के लिए निम्नलिखित दोहरी दशा पूरी होनी चाहिए-

(i) MRP = MFC

(ii) ANRP = AFC

रेखाचित्र-24 में P बिन्दु पर उपर्युक्त दोनों शर्ते पूरी होती हैं, अतः साधन की कीमत = PQ तथा साधन की OQ मात्रा प्रयोग की जाएगी और फर्म को केवल सामान्य लाभ प्राप्त होगा।

 

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की आलोचना (Criticism of the Marginal Productivity Theory)

इस सिद्धान्त की आलोचना निम्नवत् की गई है-

1. संयुक्त उत्पत्ति में से किसी विशेष साधन द्वारा होने वाली उत्पत्ति का पता लगाना अत्यन्त कठिन है (It is difficult to determine the contribution of any particular factor in joint production)-प्रो० टॉजिग (Taussig), डेवनपोर्ट (Devenport), कारवर (Carver) तथा एड्रोएन्स (Adroance) आदि अर्थशास्त्रियों का मत है कि किसी साधन-विशेष की सीमान्त उत्पादकता को ज्ञात करना अत्यन्त कठिन है क्योंकि-

(i) प्रत्येक वस्तु का उत्पादन विभिन्न उपादानों अर्थात् साधनों का संयुक्त परिणाम होता है, अत: किसी विशिष्ट साधन की उत्पादकता ज्ञात करना अत्यन्त कठिन है।

(ii) प्रो० हॉब्सन का मत है कि उत्पादन के साधनों के मिलने का अनुपात कुछ तकनीकी कारणों से स्थिर होता है और उसे सरलता से परिवर्तित नहीं किया जा सकता है।

(iii) यह सिद्धान्त यह मानकर चलता है कि साधनों को छोटे-छोटे अंशों में घटाया-बढ़ाया जा सकता है जबकि यह बात अनेक साधनों (विशेषकर बड़े तथा अविभाज्य साधनों) के सम्बन्ध में सत्य नहीं है, अत: यह सिद्धान्त सीमान्त उत्पादकता की गणना करने में असफल हो जाता है।

2. पूर्ण प्रतियोगिता की अवास्तविक मान्यता पर आधारित
(Based on the unreal assumption of perfect competition)- यह सिद्धान्त पूर्ण प्रतियोगिता की मान्यता पर आधारित है जबकि व्यावहारिक जगत में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति नहीं पायी जाती।

3. उत्पादक का लक्ष्य हमेशा अधिकतम लाभ प्राप्त करना नहीं होता (Maximum profit may not always be the aim of producer)-सिद्धान्त की यह मान्यता भी सदैव सत्य नहीं होती कि उत्पादक का लक्ष्य सदैव ही अधिकतम लाभ प्राप्त करना होता है। व्यावहारिक जीवन में उत्पादन नीति अनेक गैर-आर्थिक तत्त्वों (सामाजिक, राजनीतिक आदि) से भी प्रभावित होती है।

4. साधनों में पूर्ण गतिशीलता नहीं पायी जाती (Factors may not have. perfect mobility)-सिद्धान्त की यह मान्यता भी गलत है कि उत्पादन के साधनों में पूर्ण गतिशीलता पायी जाती है।

5. पूर्ण रोजगार का अभाव (Absence of full employment)-इस सिद्धान्त की यह मान्यता सत्य नहीं है कि सामान्यत: अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की स्थिति पायी जाती है और बेरोजगारी एक असामान्य स्थिति है।

6. आर्थिक विषमताओं का का समर्थन (Supporter of of economic disparities)-यह सिद्धान्त आर्थिक स्थिति की विषमताओं का समर्थन करता है, सामाजिक न्याय की दृष्टि से इस सिद्धान्त को उचित नहीं माना जा सकता। कुल योग उत्पत्ति से अधिक अथवा अत:

7. समस्त साधनों की शुद्ध सीमान्त उत्पत्ति का कम होता है
(The sum total of marginal net produce is either more or less than total produce)-यदि प्रत्येक साधन को उसकी सीमान्त उत्पादकता के अनुसार भुगतान किया जाए तो या तो कुछ उत्पादन बचा रहता है अथवा पूरा-पूरा भुगतान नहीं हो पाता।

8. दीर्घकालीन सिद्धान्त (A long-term theory)-यह सिद्धान्त दीर्घकाल में लागू होता है जबकि हमारी अधिकांश आर्थिक समस्याएँ अल्पकालीन होती हैं।

9. कुछ अन्य आलोचनाएँ–(i) प्रो० फ्रीडमैन,प्रो० सैमुअल्सन, मौरिस डॉब आदि प्रख्यात अर्थशास्त्री इस सिद्धान्त को अधूरा एवं एकपक्षीय (Incomplete and one sided) मानते हैं क्योंकि इस सिद्धान्त के प्रतिपादन में पूर्ति पक्ष की उपेक्षा की गई है। [स्मरण रहे कि सिद्धान्त साधनों की पूर्ति को स्थिर व निश्चित मानकर चलता है।]

(ii) श्रीमती जोन रोबिन्सन, प्रो० जे०आर० हिक्स और प्रो० पीगू आदि की धारणा है कि यदि उद्योग में क्रमागत उत्पत्ति वृद्धि नियम (लागत ह्रास नियम) कार्यशील होता है तो सीमान्त उत्पत्ति का मापन एक बहुत कठिन कार्य हो जाता है।

(iii) प्रो० वीजर व हॉब्सन का विचार है कि किसी साधन की सीमान्त उत्पादकता से हम उस साधन से प्राप्त सेवाओं का सही-सही मूल्यांकन नहीं कर पाते, अत: हमारा सिद्धान्त अपने लक्ष्य में सफल नहीं होता।

(iv) प्रो० बेन्हम के अनुसार यह सिद्धान्त अधूरा है क्योंकि वह व्यष्टि-मूलक आर्थिक सिद्धान्त (Micro-economic Theory) है। इसको प्रो० कीन्स के रोजगार सिद्धान्त से समन्वित करना अत्यन्त आवश्यक है।

(v) कुछ अर्थशास्त्री इस सिद्धान्त को कोरी कल्पना मानते हैं क्योंकि इस सिद्धान्त का विवेचन जिन आधारभूत मान्यताओं पर हुआ है, वे मान्यताएँ सामान्य जीवन में नहीं पायी जातीं।


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