Bcom 1st Year business Economics notes pdf

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Bcom 1st Year business Economics pdf

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Bcom 1st Year business Economics notes pdf
Bcom 1st Year business Economics notes pdf

CHAPTER WISE

  1. meaning of business economics
  2. Assumptions of the Law of Diminishing Returns
  3. Bcom 1st Year Meaning to Scale
  4. Meaning and Definitions of Elasticity of Demand
  5. Bcom 1st Year Marginal Cost Notes
  6. The Modern Theory of Distribution
  7. Definition of Marginal Productivity Theory
  8. Meaning and Definitions of Isoproduct Curves
  9. The Modern Theory of Intrest
  10. Modern Theory of Rent
  11. Difference Between Perfect and Imperfect Market
  12. Modern Theory of Wage Determination
  13. Meaning of Monopolistic Competition
  14. Monopoly and Monopolistic Competition Notes
  15. Meaning of Imperfect Competition
  16. Meaning and Definitions of Monopoly
  17. Corn is not high because rent is paid, but high rent is paid because corn is high

meaning of business economics

व्यावसायिक अर्थशास्त्र का अर्थ एवं परिभाषा 

(Meaning and Definition of Business Economics)

व्यावसायिक अर्थशास्त्र परम्परागत अर्थशास्त्र का ही एक सुविकसित स्वरूप है, जिसकी सहायता से एक प्रबन्धक अपनी फर्म से सम्बन्धित आर्थिक समस्याएं सुलझाकर यह निर्णय लेने में सक्षम होता है कि उपलब्ध साधनों का सर्वोत्तम ढंग से उपयोग किस प्रकार किया जाए। वर्तमान समय में व्यावसायिक अर्थशास्त्र ने व्यावसायिक क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है, क्योंकि इसके अन्तर्गत फर्म से सम्बन्धित विभिन्न व्यावहारिक समस्याओं; जैसे—पूँजी बजटिंग, मूल्य नीतियाँ, लागत विश्लेषण, माँग पूर्वानुमान, लाभ नियोजन आदि का गहन विश्लेषण करके फर्म की व्यक्तिगत. परिस्थितियों के अनुसार सर्वश्रेष्ठ समाधान की खोज की जाती है, जबकि परम्परागत अर्थशास्त्र में इस प्रकार की समस्याओं की ओर विशेष ध्यान न देकर, सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था का अध्ययन करके आर्थिक सिद्धान्तों की रचना की जाती है। परन्तु इससे परम्परागत अर्थशास्त्र का महत्त्व कम नहीं होता, क्योंकि इसके द्वारा प्रतिपादित सामान्य आर्थिक सिद्धान्तों के ज्ञान के अभाव में व्यावसायिक अर्थशास्त्री एक ऐसे चिकित्सक के समान होगा, जो कि चिकित्साशास्त्र के अधूरे ज्ञान के साथ मरीजों का इलाज करके उनके जीवन को जोखिम में डाल देता है। वास्तविकता तो यह है कि व्यावसायिक अर्थशास्त्र का जन्म ही परम्परागत अर्थशास्त्र के गर्भ से हुआ है तथा इसके द्वारा खोजे गए अनेक सामान्य आर्थिक सिद्धान्तों का प्रयोग व्यावसायिक फर्म की समस्याओं के समाधान के लिए व्यक्तिगत स्तर पर किया जाता है। 

व्यावसायिक अर्थशास्त्र के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने परिभाषाएँ दी हैं, जिनमें से मुख्य परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

हेन्स, मोट एवं पॉल के शब्दों में—

“व्यावसायिक अर्थशास्त्र निर्णय लेने में प्रयुक्त किया जाने वाला अर्थशास्त्र है। यह अर्थशास्त्र की वह विशिष्ट शाखा है जो निरपेक्ष सिद्धान्त एवं प्रबन्धकीय व्यवहार के बीच खाई पाटने का कार्य करती है।” 

स्पेन्सर एवं सीगलमैन के शब्दों में-

“व्यावसायिक अर्थशास्त्र व्यावसायिक व्यवहारा के साथ एकीकरण है, जिससे प्रबन्ध को निर्णय लेने तथा भावी नियोजन में सुविधा होती हैं। 

मैक्नायर एवं मेरियम के शब्दों में—

“व्यावसायिक अर्थशास्त्र में व्यावसायिक स्थितियों के विश्लेषण के लिए आर्थिक सिद्धान्तों का प्रयोग सम्मिलित होता है।” 

नॉरमन एफ० दफ्ती के शब्दों में—

“व्यावसायिक अर्थशास्त्र में अर्थशास्त्र के उस भाग का समावेश होता है, जिसे फर्म का सिद्धान्त कहते हैं तथा जो व्यवसायी को निर्णय लेने में पर्याप्त सहायक हो सकता है।” 

उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन एवं विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है कि व्यावसायिक अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र का वह भाग है जिसका सम्बन्ध संस्था अथवा फमा की समस्याओं का विश्लेषण करके उनका व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने से है, जिससे उपलब्ध मानवीय एवं भौतिक साधनों का सर्वश्रेष्ठ ढंग से विदोहन किया जा सका अन्य शब्दों में कहा जा सकता है कि व्यावसायिक अर्थशास्त्र एक ऐसा शास्त्र है जो कि व्यावसायिक प्रबन्ध में आर्थिक सिद्धान्तों के प्रयोग से सम्बन्धित है अथवा प्रबन्ध-निर्णय लेने और भावी नियोजन में सुविधा प्रदान करने के लिए आर्थिक सिद्धान्तों का व्यावसायिक व्यवहार के साथ एकीकरण ही व्यावसायिक अर्थशास्त्र है। 

व्यावसायिक अर्थशास्त्र की प्रकृति 

(Nature of Business Economics)

व्यावसायिक अर्थशास्त्र की प्रकृति इस बात का ज्ञान कराती है कि यह शास्त्र विज्ञान की श्रेणी में आता है अथवा कला की अथवा विज्ञान एवं कला दोनों की। केवल यही नहीं, इसके सम्बन्ध में यह भी पता चलता है कि यदि वह विज्ञान है, तो इसे आदर्श विज्ञान की श्रेणी में रखा जाना उपयुक्त रहेगा अथवा यह वास्तविक विज्ञान है अथवा दोनों प्रकार का विज्ञान।

व्यावसायिक अर्थशास्त्र-एक विज्ञान के रूप में

(Business Economics : In the form of Science) 

व्यावसायिक अर्थशास्त्र को एक विज्ञान के रूप में देखने के लिए विज्ञान का अर्थ समझना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है, जिससे व्यावसायिक अर्थशास्त्र के अन्दर उन विशेषताओं को खोजा जा सके, जो कि एक विज्ञान में पायी जाती हैं। 

विज्ञान ज्ञान की एक क्रमबद्ध शाखा है। इसके कुछ निश्चित सिद्धान्त होते हैं जो प्रत्येक स्थान एवं परिस्थिति में खरे उतरते हैं। विज्ञान को दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है-प्रथम, वास्तविक विज्ञान एवं द्वितीय, आदर्श विज्ञान। वास्तविक विज्ञान (Real Science) के अन्तर्गत कारण एवं परिणाम के बीच सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। अन्य शब्दों में, वास्तविक विज्ञान क्या है?’ का उत्तर आसानी के साथ देने में समर्थ होता है तथा इसका इस बात से कोई सरोकार नहीं होता कि किसी समस्या के समाधान के लिए क्या किया जाना चाहिए। इसके विपरीत, आदर्श विज्ञान (Normative Science) ‘क्या होना अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या व्यावसायिक अर्थशास्त्र एक विज्ञान है? इस सन्दर्भ में स्पष्ट है कि इसमें फर्म की विभिन्न आर्थिक क्रियाओं की वर्तमान में क्या स्थिति है और भविष्य में वांछित परिणामों की प्राप्ति के लिए क्या किया जाना चाहिए, इन दोनों प्रश्नों का सुस्पष्ट उत्तर प्राप्त होता है। अन्य शब्दों में, व्यावसायिक अर्थशास्त्र के अन्तर्गत फर्म की सम्पूर्ण आर्थिक क्रियाआ का सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दोनों ही दृष्टिकोणों से अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है; जैसे वर्तमान समय में फर्म कितनी मात्रा में उत्पादन कर रही है तथा भविष्य में उत्पादन क्षमता का स्तर क्या होना चाहिए, जिससे बढ़ती हुई माँग को पूरा किया जा सके। इसी प्रकार, फर्म की वर्तमान लाभार्जन क्षमता क्या है तथा इसे बढ़ाने के लिए क्या किया जाना चाहिए आदि। इस प्रकार व्यावसायिक अर्थशास्त्र वास्तविक तथा आदर्श दोनों ही प्रकार का विज्ञान है, परन्तु इसे आदर्श विज्ञान की श्रेणी में रखना अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि इसमें प्रश्न ‘क्या है?’ की अपेक्षा ‘क्या होना चाहिए?’ अधिक महत्त्व रखता है।

व्यावसायिक अर्थशास्त्र—एक कला के रूप में

(Business Economics : In the form of an Art) 

व्यावसायिक अर्थशास्त्र कला है अथवा नहीं, यह जानने से पूर्व कला का अर्थ सुस्पष्ट होना आवश्यक है, जिससे यह निश्चित किया जा सके कि व्यावसायिक अर्थशास्त्र कला की कसौटी पर किस सीमा तक खरा उतरता है तथा इसे कला की श्रेणी में रखना कहाँ तक उपयुक्त है। कला कार्य करने की एक ऐसी सुव्यवस्थित एवं सुनियोजित विधि है जिसके द्वारा पर्व-निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति प्रभावी रूप में की जानी सम्भव होती है। अन्य शब्दों में. पूर्व-निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए फर्म के पास उपलब्ध मानवीय एवं भौतिक साधनों के सर्वश्रेष्ठ ढंग से प्रयोग करने की विधि ही कला कहलाती है। प्रो० ल्यूइगी के विचारानसार. “कला हमें निर्देशित करती है, काम करना बताती है तथा नियम प्रस्तावित करती है। प्रश्न ‘कैसे?’ का उत्तर केवल कला ही दे सकती है क्योंकि यह बताती है कि किसी कार्य को प्रभावपूर्ण ढंग से किस प्रकार सम्पन्न किया जा सकता है।” व्यावसायिक अर्थशास्त्र को कला के परिप्रेक्ष्य में देखने पर स्पष्ट होता है कि यह एक उच्च श्रेणी की कला है क्योंकि इसके अन्तर्गत फर्म की अनेक आर्थिक समस्याओं के समाधान की विधियों की निरन्तर खोज की जाती है तथा उपलब्ध साधनों के सर्वोत्तम प्रयोग की विधिका वर्णन किया जाता है, जिससे संस्था के उद्देश्य प्रभावी ढंग से प्राप्त किए जा सकें। 

व्यावसायिक अर्थशास्त्र को विज्ञान एवं कला के रूप में देखने पर स्पष्ट होता है कि यह नोवल विज्ञान अथवा कला है

व्यावसायिक अर्थशास्त्र का क्षेत्र 

(Scope of Business Economics)

यद्यपि व्यावसायिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र के विषय में विभिन्न विद्वानों की विचारधारा में पर्याप्त मतभेद पाया जाता है, फिर भी अधिकतर विद्वान इसके क्षेत्र के अन्तर्गत निम्नलिखित पहलुओं को सम्मिलित करने के पक्ष में हैं 

1. फम का सिद्धान्त

(Theory of Firm)-

फर्म के सिद्धान्त के अन्तर्गत फर्म का मॉडल बनाया जाता है, उसके उद्देश्य निर्धारित किए जाते हैं तथा फर्म के सिद्धान्त एवं , कार्य-प्रणाली का गहन अध्ययन किया जाता है। .. 

2. माँग विश्लेषण एवं पूर्वानुमान

(Demand Analysis and Forecasting)

व्यावसायिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में माँग विश्लेषण एवं पूर्वानुमान को भी सम्मिलित किया जाता है। – इसके अन्तर्गत माँग का नियम, माँग सारणी, माँग वक्र, माँग की लोच, माँग के भेद, माँग के निर्धारक तत्त्व एवं मांग पूर्वानुमान के विभिन्न तरीकों का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है।

3. लागत एवं उत्पादन विश्लेषण

(Cost and Output Analysis)-

उत्पादन का लागत पर प्रभावपूर्ण नियन्त्रण स्थापित करने, लाभों का नियोजन करने तथा कुशल प्रबन्ध व्यवहार के लिए लागत विश्लेषण का अपना विशेष महत्त्व है। इसके द्वारा उन तत्त्वों का ज्ञान होता है जिनके कारण उत्पादन की भी अनुमानित लागत में परिवर्तन आता है। उत्पादन विश्लेषण के अन्तर्गत लागत अवधारणाओं, लागत वक्रों, लागत वर्गीकरण, सीमान्त लागत विश्लेषण, लागत-उत्पादन सम्बन्ध, उत्पत्ति का पैमाना, रेखीय कार्यक्रम आदि की विस्तृत विवेचना की जाती है। 

4. प्रतिस्पर्द्धा विश्लेषण

(Analysing Competition)-

बाजार में व्याप्त विभिन्न प्रतियोगी परिस्थितियों का विश्लेषण करना भी व्यावसायिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र की विषय-वस्तु है। इस अध्ययन से प्रतियोगी फर्मों द्वारा अपनायी जाने वाली नीतियों का पता चलता है तथा उसी के अनुसार प्रबन्धकों को अपनी फर्म की नीतियाँ बनाने में सहायता मिलती है। bcom 1st year economics notes in hindi

5. मूल्य-प्रणालियाँ एवं नीतियाँ

(Pricing-practices and Policies)-

मूल्य प्रणालियाँ एवं नीतियाँ व्यावसायिक अर्थशास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रतियोगी परिस्थितियों में मूल्य-निर्धारण, मूल्य निर्धारण की विभिन्न वैकल्पिक पद्धतियाँ, मूल्य विभेद नीतियाँ, उत्पाद श्रेणी का मूल्य निर्धारण आदि को सम्मिलित किया जाता है। 

व्यावसायिक अर्थशास्त्र एवं परम्परागत अर्थशास्त्र में अन्तर

(Differences between Business Economics and Traditional Economics)

1-प्रकृति (Nature)-

व्यावसायिक अर्थशास्त्र एक आदर्श विज्ञान एवं कल है। इसके अन्तर्गत न केवल समस्या के सैद्धान्तिक अपितु व्यावहारिक पहलू पर भी। केन्द्रित किया जाता है तथा किसी कार्य को करने के सर्वश्रेष्ठ ढंग की विवेचना की इसके विपरीत, परम्परागत अर्थशास्त्र वर्णनात्मक प्रकृति का होता है तथा इसमें आर्थिक सिद्धान्तों की ही विवेचना की जाती है।

2. क्षेत्र (Scope)-

व्यावसायिक अर्थशास्त्र का क्षेत्र फर्म की क्रियाओं तक रहता है अर्थात् इसके अन्तर्गत किसी फर्म-विशेष की विभिन्न समस्याओं के गहन अभी विश्लेषण के द्वारा, उनके समाधान के वैकल्पिक तरीकों की खोज की जाती है परम्परागत अर्थशास्त्र सम्पूर्ण आर्थिक तन्त्र को अपने में समाए हुए है। इस प्रकार व्यावसायिक अर्थशास्त्र का क्षेत्र परम्परागत अर्थशास्त्र के क्षेत्र की अपेक्षा अत्यन्त सीमित रह जाता है। 

3. मान्यताओं का आधार (Criteria of Assumption)—

5. सिद्धान्तों की प्रमुखता (Priority of Principles)-

व्यावसायिक अर्थशास्त्र में लाभ-सिद्धान्त को प्राथमिकता प्रदान की जाती है, तथा इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अन्य सिद्धान्तों; जैसे-लागत सिद्धान्त, माँग एवं पूर्ति का सिद्धान्त, मूल्य निर्धारण का सिद्धान्त आदि का प्रयोग किया जाता है, जबकि परम्परागत अर्थशास्त्र के अन्तर्गत लाभ, लगान, मजदूरी, जनसंख्या, लागत, मूल्य-निर्धारण आदि सिद्धान्तों की विवेचना समान महत्त्व के साथ की जाती है। 

व्यावसायिक अर्थशारण के सिद्धान्तों की अधिकांश मान्यताएँ स्वयं ही समाप्त हो जाती हैं, क्योंकि व्यावहारिक समस्याओं का समाधान मान्यताओं के आधार पर किया जाना सम्भव नहीं होता. जब परम्परागत अर्थशास्त्र के अधिकतर सिद्धान्त मान्यताओं पर ही आधारित होते हैं। 

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4. आर्थिक एवं अनार्थिक पहलू (Economic and Uneconomic Aspects)

व्यावसायिक अर्थशास्त्र में समस्या के न केवल आर्थिक पहलुओं पर, अपितु विभिन्न अनार्थिक पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाता है, जबकि परम्परागत अर्थशास्त्र शुद्ध रूप से आर्थिक क्रियाओं तक ही अपना कार्यक्षेत्र सीमित रखता है। 

6. निर्णयन कार्य (Decision Making)-

व्यावसायिक अर्थशास्त्र में समस्या की न केवल वर्तमान स्थिति का ही अध्ययन किया जाता है अपितु उसके समाधान के सम्बन्ध में भी महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं, जबकि परम्परागत अर्थशास्त्र केवल ‘क्या है?’ प्रश्न के ही उत्तर तक अपने क्रियाकलापों को सीमित रखता है। इसका सम्बन्ध ‘क्या होना चाहिए?’ तथा ‘किस प्रकार होना चाहिए?’ से नहीं है। 

7. व्यावसायिक कुशलता की आवश्यकता (Need of Business Efficiency)

व्यावसायिक अर्थशास्त्र प्रत्यक्ष रूप से व्यावसायिक फर्म से सम्बन्धित होता है। अतः इसम व्यावसायिक कुशलता की अत्यन्त आवश्यकता होती है, जिससे विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए जा सकें, जबकि परम्परागत अर्थशास्त्र में इस प्रकार कुशलता का प्रत्यक्षतः कोई सम्बन्ध नहीं होता है। उपर्युक्त अन्तरों के विवेचन से स्पष्ट है कि व्यावसायिक अर्थशास्त्र का क्षेत्र सकुाच होता है, परन्तु इसके अन्तर्गत फर्म की व्यावहारिक समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित किया जाता दूसरी ओर, यद्यपि परम्परागत अर्थशास्त्र का प्रत्यक्ष रूप से कोई व्यावहारिक प्रयोग नहा है, परन्तु व्यावसायिक अर्थशास्त्र की समस्त रूपरेखा की नींव में परम्परागत अर्थशास्त्र द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त ही समाए हुए हैं

Bcom 1st Year Assumptions of the Law of Diminishing Returns notes

उत्पत्ति हास नियम की मान्यताएँ

अन्य आर्थिक नियमों की भाँति यह नियम भी कुछ मान्यताओं पर आधारित है। इस नियम की मान्यताएँ निम्नवत् हैं –

(1) उत्पादन के साधनों के मिलने के अनुपात में इच्छानुसार परिवर्तन किया जा सकता है। 

(2) इस नियम की क्रियाशीलता के लिए आवश्यक है कि यदि अन्य साधन परिवर्तनशील रहें तो एक साधन अवश्य ही स्थिर रहे अथवा यदि एक साधन परिवर्तनशील हो तो अन्य साधन स्थिर रहें। 

(3) परिवर्तनशील साधन की सब इकाइयाँ समरूप होनी चाहिए। 

(4) यह नियम तभी क्रियाशील होगा जबकि परिवर्तनशील साधन की पर्याप्त इकाइयों का प्रयोग हो चुका हो। 

(5) यह मान लिया जाता है कि नियम की क्रियाशीलता की अवधि में उत्पादन की विधि, कला तथा प्रविधि (टेक्नोलॉजी) में कोई परिवर्तन नहीं होता। 

(6) इस नियम का सम्बन्ध वस्तु की भौतिक मात्रा से होता है, उसके मूल्य से नहीं। 

(7) यदि लागत की दृष्टि से इस नियम की सत्यता पर विचार करना हो तो इस नियम अर्थात् लागत वृद्धि नियम के क्रियाशील होने के लिए आवश्यक है कि सभी साधनों (स्थिर तथा परिवर्तनशील) तथा उत्पादनों की कीमतें दी हुई हों। 

Bcom 1st Year Assumptions of the Law of Diminishing Returns notes

उत्पत्ति ह्रास नियम की क्रियाशीलता के कारण

(Causes for the Application of the Law of Diminishing Returns)

इस नियम के क्रियाशील होने के लिए मुख्य रूप से अग्रलिखित कारण उत्तरदाया है- 

1. एक अथवा कुछ साधनों का स्थिर होना (One or more factors being Hotic-

जब एक अथवा कुछ साधनों को स्थिर और शेष साधनों को परिवर्तनशील रखा जाता है तो परिवर्तनशील साधनों की पूर्ण क्षमता का उपयोग नहीं हो पाता, परिणामतः उत्पादन शक्ति में ह्रास हो जाता है। अन्य शब्दों में-(i) उत्पादन के विभिन्न साधन सदा सीमित मात्रा में उपलब्ध होते हैं, किसी भी साधन की पूर्ति में असीमित वृद्धि नहीं की जा सकती तथा विभिन्न साधन एक निश्चित बिन्दु पर अनुकूलतम संयोग की दशा में होते हैं, लेकिन जब कछ साधनों की मात्रा को स्थिर रखा जाता है तो अनुकूलतम संयोग की स्थिति समाप्त हो . जाती है और उत्पादन शक्ति में ह्रास होने लगता है। 

अन्य शब्दों में, उत्पत्ति के साधनों पर मानव का पूर्ण अधिकार नहीं होता, अत: साधनों को आदर्श अनुपात में बनाए रखना सम्भव नहीं होता। इसके अतिरिक्त, साधनों की . अविभाज्यता भी उनके सर्वोत्तम उपयोग में बाधक सिद्ध होती है। 

2. उत्पादन के साधन एक-दूसरे के पूर्ण स्थानापन्न नहीं होते (Factors production not fully substituted)-

उत्पादन के एक साधन को किसी दूसरे साधन के स्थान पर एक सीमा तक ही प्रयोग किया जा सकता है। यदि विभिन्न साधनों को पूर्णतः प्रतिस्थापित किया जा सकता तब न तो किसी साधन की परिमितता का प्रश्न उठता और न ही उत्पत्ति ह्रास नियम क्रियाशील होता। श्रीमती जोन रोबिन्सन के शब्दों में—“एक साधन को दसरे के स्थान पर केवल एक सीमा तक ही प्रतिस्थापित किया जा सकता है…….” 

नियम का क्षेत्र 

(Scope of the Law)

प्रो० मार्शल ने इस नियम की क्रियाशीलता के क्षेत्र को केवल कृषि एवं भूमि से सम्बद्ध कुछ अन्य व्यवसायों (जैसे—मछली उद्योग, खनन आदि) तक ही सीमित माना था, परन्तु यह सत्य नहीं है। आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह नियम उत्पादन के सभी क्षेत्रों में क्रियाशील होता है। शर्त केवल यही है कि उत्पादन प्रक्रिया दीर्घकाल तक चलती रहे। प्रो० विक्सटीड के शब्दों में—“इस नियम की क्रियाशीलता सर्वव्यापी है।” (This law is as universal as the law of life itself.)

आधुनिक विचारकों की धारणा है कि यह नियम उत्पादन के सभी क्षेत्रों में लागू होता है और उत्पत्ति वृद्धि नियम तथा उत्पत्ति समता नियम, उत्पत्ति ह्रास नियम की ही अपनी अवस्थाएँ हैं। प्रो० सैलिगमैन के शब्दों में-“क्रमागत उत्पत्ति ह्रास नियम ही उत्पत्ति का सामान्य नियम है एवं क्रमागत उत्पत्ति वृद्धि तथा उत्पत्ति समता नियम ह्रास नियम के ही अस्थायी रूप हैं।” श्रीमती जोन रोबिन्सन के शब्दों में—“उत्पत्ति ह्रास नियम एक तार्किक अनिवार्यता (Logical necessity) है और उत्पत्ति वृद्धि नियम एक अनुभवसिद्ध तथ्य (Empirical fact) है।” 

उत्पत्ति हास नियम का महत्त्व

(Significance of the Law of Diminishing Returns)

 उत्पत्ति ह्रास नियम अर्थशास्त्र का एक आधारभूत नियम है, अत: इसका अर्थशास्त्र के प्रत्येक क्षेत्र में व्यापक महत्त्व है। यह नियम मूल्य-निर्धारण, उत्पादन की मात्रा-निर्धारण, जनसख्या-नियन्त्रण, लगान तथा भूमि की समस्याओं के समाधान आदि में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, जैसा कि निम्नलिखित विवरण से स्पष्ट है 

(1) माल्थस का जनसंख्या सिद्धान्त इसी नियम पर आधारित है। इसके अतिरिक्त. जनसंख्या का एक देश से दूसरे देश को होने वाला प्रवास भी इसी नियम से प्रभावित होता है। 

(2) रिकार्डो का लगान सिद्धान्त भी इसी नियम पर आधारित है।

(3) सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की रचना भी इसी सिद्धान्त के आधार पर की गई है। 

(4) यह नियम जीवन-स्तर के निर्धारण को भी प्रभावित करता है।

(5) यह नियम नित्य नए होने वाले आविष्कारों के लिए भी उत्तरदायी है। 
(6) यह नियम उत्पादन के प्रत्येक क्षेत्र (यथा-कृषि, मछली पकड़ना, खनन, भवन निर्माण आदि) पर लागू होता है। 

प्रो० केयरनीज (Cairnes) ने इस नियम के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए लिखा है “यदि उत्पत्ति ह्रास नियम न होता तो राजनीतिक अर्थशास्त्र का रूप इतनी पूर्णता से बदल जाता जैसे मानव-प्रकृति ही परिवर्तित हो गई हो।” Bcom 1st Year Assumptions of the Law of Diminishing Returns notes

क्या नियम की क्रियाशीलता को स्थगित किया जा सकता है 

(Whether the Applicability of Law be Postponed)

प्रो० मार्शल का कथन है—“उत्पादन क्रिया में प्रकृति उत्पत्ति ह्रास नियम के अनुकूल दिशा में कार्य करती है, जबकि मनुष्य का प्रयत्न उत्पत्ति वृद्धि नियम को प्राप्त करने की दिशा में होता है।” इस प्रकार स्पष्ट है कि मनुष्य के प्रयत्न उत्पत्ति ह्रास नियम की क्रियाशीलता में बाधा डालते हैं। 

अत: कृषि, खनन उद्योग आदि के क्षेत्रों में वैज्ञानिक आविष्कारों के प्रयोग, कृषि विधि में सुधार, यातायात व संचार के साधनों में विस्तार आदि के द्वारा इस नियम की क्रियाशीलता का कुछ समय के लिए अवश्य ही स्थगित किया जा सकता है। विकसित देशों में इस दिशा में पर्याप्त सफलता भी प्राप्त की गई है। इस प्रकार मानवीय प्रयासों से इस नियम की क्रियाशाला को स्थगित अवश्य किया जा सकता है, परन्तु अन्तत: यह नियम अवश्य क्रियाशाल विक्सटीड के शब्दों में— “इसकी क्रियाशीलता विश्वव्यापी है।” 

Bcom 1st Year Meaning to Scale notes

पैमाने से अभिप्राय 

(Meaning to Scale)

पैमाने को निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है … “जितना गुना सभी अनुपातों को दोहराया जाता है, अर्थात् जितना गुना स्थिर और परिवर्तनशील साधनों को बढ़ाया जाता है तो वह फर्म के पैमाने को स्थापित करता है।” .. – सरल शब्दों में, पैमाने में वृद्धि का अर्थ है सभी साधनों को एक ही अनुपात में बढ़ाना, अर्थात् साधन अनुपातों को स्थिर रखते हुए सभी साधनों को बढ़ाया जाता है। पैमाने का यह . विचार दीर्घकाल से सम्बन्ध रखता है क्योंकि इसमें स्थिर साधनों को परिवर्तित करके फर्म के आकार को बढ़ाया जाता है। 

Bcom 1st Year Meaning to Scale notes

पैमाने के प्रतिफल का विचार 

(Meaning of Returns to Scale)

पैमाने के प्रतिफल का विचार इस बात का अध्ययन करता है कि यदि सब उपादानों में आनुपातिक परिवर्तन कर दिया जाए, ताकि साधनों के मिलने के अनुपातों में कोई परिवर्तन न हो तो उत्पादन में किस प्रकार से परिवर्तन होगा। 

पैमाने के प्रतिफल के विश्लेषण के अन्तर्गत साधनों या उपादानों के आपसी अनुपात को नहीं बदला जाता बल्कि सभी साधनों को एक ही अनुपात में बढ़ाया जाता है। जब साधनों की मात्रा को एक ही अनुपात में बढ़ाया जाता है तो प्राप्त होने वाले उत्पादन की मात्रा या प्रतिफल की निम्नलिखित अवस्थाएँ होती हैं-

1. पैमाने के बढ़ते प्रतिफल की अवस्था, 

2. पैमाने के स्थिर प्रतिफल की अवस्था, 

3. पैमाने के घटते प्रतिफल की अवस्था।

1. पैमाने के बढ़ते प्रतिफल की अवस्था

(Stage of Increasing Returns to Scale)

“जब सभी साधनों को एक ही अनुपात में बढ़ाया जाता है और इस प्रकार उत्पादन के पैमाने में वृद्धि हो जाती है तथा इसके परिणामस्वरूप यदि उत्पादन में अधिक अनुपात में वृद्धि होती है तो यह कहा जाता है कि उत्पादन प्रक्रिया में पैमाने के बढ़ते प्रतिफल लाग हैं।” उदाहरणार्थ-यदि सभी साधनों को 10% से बढ़ाया जाता है और उत्पादन 14% बढ़ जाता है तो ऐसी अवस्था पैमाने के बढ़ते प्रतिफल की अवस्था कही जाएगी। संक्षेप में, इस अवस्था में साधनों की वृद्धि की तुलना में उत्पादन में अधिक अनुपात में वृद्धि होती है। प्रो० चैम्बरलिन ने पैमाने के बढ़ते प्रतिफल की अवस्था के दो कारण बताए हैं –

(i) पैमाने के बढ़ जाने पर श्रमिकों में अधिक विशिष्टीकरण या श्रम विभाजन किया जा सकता है जिससे श्रम की उत्पादकता बढ़ जाती है। 

(ii) उत्पादन के बढ़े पैमाने के अन्तर्गत उन्नत तकनीक एवं उन्नत मशीनों का प्रयोग या जा सकता है जिससे उत्पादन बहुत तेजी से बढ़ता है। रेखाचित्र-11 में पैमाने के बढ़ते प्रतिफल को दिखाया गया है। रेखाचित्र में IP2, IPO, समात्पाद वक्र हैं जो क्रमश: 50, 100, 150, 200 इकाइयों के बराबर उत्पादन P3 तथा IP समोत्पाद वक्र को बताते हैं। ये समोत्पाद रेखाएँ उत्पादन में एकसमान वृद्धि (50 इकाइयों के बराबर वृद्धि) को बताती हैं। ये रेखाएँ पैमाना रेखा OE को टुकड़ों (जैसे-AB, BC, CD) में बाँट देती है। पैमाना रेखा OE का प्रत्येक टुकड़ा दोनों साधनों X तथा Y की एक निश्चित मात्रा को बताता है। रेखाचित्र में प्रत्येक टुकड़े की लम्बाई कम होती जाती है, अर्थात् CD <BC KARI इसका अर्थ है कि दो साधनों X तथा Y की क्रमशः कम मात्राओं के प्रयोग से उत्पादन में एकसमान वृद्धि प्राप्त होती है। ऐसी स्थिति को पैमाने के बढ़ते प्रतिफल की अवस्था कहते हैं। 

2. पैमाने के स्थिर प्रतिफल की अवस्था

(Stage of Constant Returns to Scale)

जब सभी साधनों को एक ही अनुपात में बढ़ाया जाता है और इस प्रकार उत्पादन के पैमाने में वृद्धि हो जाती है तथा इसके परिणामस्वरूप यदि उत्पादन में भी उसी अनुपात में वद्धि होती है तो यह कहा जाता है कि उत्पादन प्रक्रिया में पैमाने के स्थिर प्रतिफल लागू होते हैं। दसरे शब्दों में, पैमाने के स्थिर प्रतिफल के अन्तर्गत उत्पादन में एकसमान वृद्धि प्राप्त करने के लिए साधनों की मात्राओं में क्रमश: एकसमान वृद्धि की ही आवश्यकता पड़ती है। रेखाचित्र-12 में पैमाने के स्थिर प्रतिफल को दिखाया गया है। रेखाचित्र में समोत्पाद रेखाएँ पैमाना रेखा OE को AB, BC तथा CD टुकड़ों में बाँट देती हैं। प्रत्येक टुकड़ा X और Y की एक निश्चित मात्रा को बताता है। रेखाचित्र में प्रत्येक टुकड़े की लम्बाई बराबर है

इसका अर्थ है कि दो साधनों x तथा Y की क्रमश: बराबर मात्राओं के प्रयोग से उत्पादन में एकसमान वृद्धि होती है। ऐसी स्थिति को पैमाने के स्थिर प्रतिफल की अवस्था कहते हैं। 

3. पैमाने के घटते हुए प्रतिफल की अवस्था

(Stage of Decreasing Return to Scale)

जब सभी साधनों को एक ही अनुपात में बढ़ाया जाता है और इस प्रकार उत्ता के पैमाने में वृद्धि हो जाती है तथा इसके परिणामस्वरूप यदि उत्पादन में कम अनुपात में तो यह कहा जाता है कि उत्पादन प्रक्रिया माने के घटते प्रतिफल लागू होते है। रणार्थ-यदि सभी साधनों को 10% से | जाता है और उत्पादन 10% से कम बढ़ता | ॥p तो ऐसी स्थिति पैमाने के घटते प्रतिफल की वस्था कही जाएगी। दूसरे शब्दों में, पैमाने के घटते प्रतिफल के अन्तर्गत उत्पादन में एकसमान 200 नदि प्राप्त करने के लिए साधनों की मात्राओं में क्रमशः अधिकाधिक वृद्धि की आवश्यकता पड़ती है। रेखाचित्र-13 में समोत्पाद रेखाएँ IP, IP), XXXX X IP तथा IP पैमाना रेखा OE को AB, BC साधन X तथा CD टुकड़ों में विभाजित करती हैं। पैमाना रेखाचित्र-13 OE का प्रत्येक टुकड़ा दोनों साधनों X और Y की एक निश्चित मात्रा को बताता है। इसमें प्रत्येक टुकड़े की लम्बाई बढ़ती जाती है, अर्थात् CD > BC >AB – इसका अर्थ है कि दो साधनों x तथा Y की क्रमशः अधिक मात्राओं के प्रयोग से उत्पादन में एकसमान वृद्धि की जाती है। 

पैमाने के बदलते प्रतिफल (Varying Returns to Scale)- उपर्युक्त विवेचन से यह नहीं समझ लेना चाहिए कि हमेशा अलग-अलग उत्पादन फलन विभिन्न प्रकार के पैमाने को व्यक्त करते हैं। प्रायः एक ही उत्पादन फलन में । पैमाने की तीनों अवस्थाएँ–बढ़ते, स्थिर या घटते प्रतिफल होती हैं। उत्पादक यह जानता है कि जब 500 उत्पादन का पैमाना बढ़ाया जाता है तो श्रम में । अधिक विशिष्टीकरण तथा अधिक उन्नत एवं 50 विशिष्ट प्रकार की मशीनों एवं तकनीक के प्रयोग से | उत्पादन बढ़ाया जाता है, परन्तु स्थिति सदैव यही नहीं रहती। एक समय के बाद स्थिर प्रतिफल प्राप्त होने लगता है। इस स्थिति में उत्पादन उसी अनुपात / साधन X→ में बढ़ता है जिस अनुपात में साधनों की मात्राओं को बढ़ाया जाता है। यदि उसके पश्चात् भी उत्पादन का पमाना बढ़ाया जाता है, तो उससे घटते प्रतिफल प्राप्त होंगे। इसका कारण प्रबन्ध, समन्वय तथा नियन्त्रण सम्बन्धी कठिनाइयों का बढ़ जाना है। धीरे-धीरे ये कठिनाइयाँ इतनी अधिक बढ़ जाता है कि श्रम विभाजन व विशिष्टीकरण के सभी लाभ समाप्त हो जाते हैं। रेखाचित्र-14 में इन तीनों अवस्थाओं को दिखाया गया है। 

माँग की लोच का अर्थ एवं परिभाषा 

(Meaning and Definitions of Elasticity of Demand)

माँग का नियम केवल एक गुणात्मक कथन है। वह वस्तु की कीमत एवं माँग मात्रा के बीच किसी परिमाणात्मक सम्बन्ध को व्यक्त नहीं करता। यह तो केवल इतना बताता है कि कीमत बढ़ने से माँग घटती है और कीमत में कमी होने से माँग बढ़ती है। इस प्रकार यह नियम | कीमत में परिवर्तन होने के परिणामस्वरूप माँग के परिवर्तन की केवल दिशा बताता है, लेकिन । यह नहीं बताता है कि माँग में कितना परिवर्तन होता है। इस परिवर्तन की माप माँग की लोच । करती है। – प्रो० मार्शल-“बाजार में किसी वस्तु की माँग का अधिक या कम लोचदार होना इस | बात पर निर्भर करता है कि एक निश्चित मात्रा में मूल्य के घट जाने पर माँग की मात्रा में अधिक वृद्धि होती है अथवा कम तथा एक निश्चित मात्रा में मूल्य के बढ़ जाने पर माँग की मात्रा में | अधिक कमी होती है या कम।” 

प्रो० बेन्हम-“माँग की लोच का विचार, मूल्य में थोड़ा-सा परिवर्तन होने से माँग की | मात्रा पर जो प्रभाव पड़ता है, उससे सम्बन्धित है।” 

प्रो० मेयर्स—“किसी दिए हुए माँग वक्र पर मूल्य में होने वाले सापेक्षिक परिवर्तनों के | फलस्वरूप क्रय की हुई मात्रा में परिवर्तन की माप को माँग की लोच कहते हैं।” प्रो० केयरनक्रॉस-“किसी वस्तु की माँग की लोच वह दर है जिसके अनुसार माग की मात्रा परिवर्तनों के फलस्वरूप बदल जाती है।” 

प्रो० बोल्डिंग-“किसी वस्तु की कीमत में एक प्रतिशत परिवर्तन होने से वस्तु का मा में जो परिवर्तन होता है, उसे माँग की लोच कहते हैं।”

प्रो० सैमुअल्सन-“माँग की लोच का विचार कीमत के परिवर्तन के उत्तर में माग मात्रा में परिवर्तन का अंश अर्थात् माँग में प्रतिक्रियात्मक अंशों को बताता है। यह पुल परिवर्तनों पर निर्भर करता है और कीमत तथा वस्तु की मात्रा को नापने में प्रयोग की जाने वाली इकाइयों से स्वतन्त्र होता है।” 

श्रीमती जोन रोबिन्सन-“माँग की लोच को किसी कीमत अथवा किसी उपज पर कीमत में मामूली परिवर्तन के परिणामस्वरूप खरीदी जाने वाली मात्रा में होने वाले सापेक्षिक परिवर्तन की कीमत के आनुपातिक परिवर्तन से भाग देकर निकाला जा सकता है।” इस परिभाषा को सूत्र के रूप में निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है 

माँग की लोच ( मांग में आनुपातिक परिवर्तन) 

कीमत में आनुपातिक परिवर्तन संक्षेप में, माँग की लोच केवल यह बताती है कि मूल्य में परिवर्तन के कारण माँग में । कितना परिवर्तन होता है। मूल्य परिवर्तन का प्रभाव सभी वस्तुओं एवं सेवाओं पर एकसमान नहीं होता वरन् भिन्न-भिन्न होता है। अन्य शब्दों में, माँग की लोच वस्तु के मूल्य और उसके । पारस्परिक सम्बन्ध की माप है। 

माँग का नियम और माँग की लोच में अन्तर

(Distinction between Law of Demand and Elasticity of Demand)

माँग का नियम कीमत तथा माँग के सम्बन्ध का एक गुणात्मक कथन है जो हमें कीमत में होने वाले परिवर्तनों के परिणामस्वरूप माँग में होने वाले परिवर्तनों की दिशा के बारे में बताता है। यह हमें कीमत, परिवर्तनों के परिणामस्वरूप माँग में होने वाले परिवर्तनों की मात्रा या दर के बारे में कुछ नहीं बताता। दूसरे शब्दों में, यह नियम वस्तु की कीमत तथा माँग मात्रा के बीच किसी मात्रात्मक सम्बन्ध की व्याख्या नहीं कर पाता। माँग के नियम की इस कमी को माँग की लोच की धारणा पूरी करती है। 

माँग की लोच के रूप 

(Forms of Elasticity of Demand)

आधुनिक अर्थशास्त्री माँग की लोच का व्यापक रूप से प्रयोग करते हैं। इन अर्थशास्त्रियों के अनुसार माँग की मूल्य सापेक्षता (लोच) के तीन प्रमुख रूप हैं –

1. माँग की कीमत लोच (Price Elasticity of Demand)-

माँग की कीमत लोच किसी वस्तु की कीमत में दिए हुए प्रतिशत परिवर्तन एवं उसकी माँग मात्रा में हुए प्रतिशत परिवर्तन का अनुपात होती है। आय स्तर में परिवर्तन होने से उसकी माँ लोच कहलाती है। माँग की आय लोच की की आय लोच की निम्नलिखित सूत्र द्वारा गणना की जा सकती है… 

2. माँग की आड़ी लोच (Cross Elasticity of Demand)-

जब दो वस्तुएँ एक-दूसरे की पूरक होती हैं तो उनमें से एक वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने पर दूसरी वस्त की माँगी जाने वाली मात्रा भी परिवर्तित हो जाती है। यही माँग की आड़ी लोच कहलाती है। मांग की आड़ी लोच को ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है

माँग की लोच की श्रेणियाँ 

(Degrees of Elasticity of Demand) –

सब वस्तुओं की माँग की लोच एकसमान नहीं होती अर्थात् कुछ वस्तुओं की मांग की लोच कम होती है और कुछ वस्तुओं की अधिक। सैद्धान्तिक दृष्टि से माँग की लोच को निम्नलिखित पाँच श्रेणियों में विभाजित करने की परम्परा है –

1. पूर्णतः लोचदार माँग (Perfectly Elastic Demand),

2. अत्यधिक लोचदार माँग (Highly Elastic Demand),

3. लोचदार माँग (Elastic Demand),

4. बेलोचदार माँग (Inelastic Demand),

5. पूर्णतः बेलोचदार माँग (Perfectly Inelastic Demand)। . 

1. पूर्णतः लोचदार माँग (Perfectly Elastic Demand)-

जब किसी वस्तु के मूल्य में कोई परिवर्तन न होने पर भी (अथवा नाममात्र का परिवर्तन होने पर) माँग में बहुत अधिक परिवर्तन (माँग में बहुत अधिक कमी अथवा बहुत अधिक वृद्धि) हो जाए तो वस्तु की माँग पूर्णतः लोचदार कही जाती हैं। यह स्थिति पूर्णत: काल्पनिक है तथा व्यावहारिक जीवन में नहीं पायी जाती। इस प्रकार की माँग का वक्र सदैव समतल होता है, जैसा कि रेखाचित्र-15 में प्रदर्शित है। रेखाचित्र-15 में OX रेखा पर वस्तु की माँगी जाने वाली मात्रा तथा OY रेखा पर कीमत को प्रदर्शित किया गया है। PD माँग रेखा है जो Ox के पूर्णत: समान्तर है, यह प्रदान कर रही है कि वस्तु के मूल्य में कोई परिवर्तन न होने पर भी वस्तु की माँग परिवर्तित हुई अन्य शब्दों में, वस्तु का मूल्य अपरिवर्तित होने पर भी माँग OX1 से OX, अथवा OX3 हो गई है। इस प्रकार DD माँग रेखा पूर्णतः लोचदार माँग की स्थिति को प्रदर्शित कर रही है। 

2. अत्यधिक लोचदार माँग (Highly Elastic Demand)

जब किसी वस्तु की माँग में परिवर्तन वस्तु के मूल्य में होने वाले परिवर्तन की तुलना में अनुपात से अधिक होता है तो उसे अत्यधिक लोचदार माँग कहा जाता है। रेखाचित्र-16 में OP कीमत पर OM वस्तु की मूल माँग है। अब यदि मूल्य बढ़कर OP हो जाता है और माँगी जाने वाली मात्रा कम होकर केवल OM1 रह जाती है तो यह अत्यधिक लोचदार माँग की स्थिति होगी क्योंकि मूल्य में परिवर्तन की तुलना में माँग में कहीं अधिक परिवर्तन हुआ है। इसी प्रकार, यदि मूल्य कम होकर OP, रह जाता है और वस्तु की माँग बढ़कर OM2 हो जाती है तो यह भी अत्यधिक लोचदार माँग की दशा होगी। इस प्रकार DD माँग रेखा का निर्माण हुआ है। यह रेखा अधलेटी (Semihorizontal) सी होती है, जैसा कि रेखाचित्र-16 से स्पष्ट है। 

3. लोचदार माँग (Elastic Demand)-

जब किसी वस्तु की माँग में ठीक उसी अनुपात में परिवर्तन होता है जिस अनुपात में वस्तु की कीमत में परिवर्तन हुआ है तो उसे लोचदार माँग कहा जाता है। यदि किसी वस्तु की कीमत में 25% की वृद्धि (अथवा कमी) हो जाए और उसकी माँग में भी 25% की कमी (अथवा वृद्धि) हो जाए तो उसे लोचदार माँग कहा जाएगा। रेखाचित्र-17 में लोचदार माँग की स्थिति को प्रदर्शित किया गया है। रेखाचित्र-17 में OP मौलिक मूल्य तथा OM माँगी जाने वाली मूल मात्रा है। अब यदि मूल्य बढ़कर OPA हो जाता है तो माँग में कमी आ जाती है और माँगी जाने वाली मात्रा घटकर OM रह जाती है। अब यदि इसके विपरीत मूल्य कम होकर OPA रह जाता है तो माँगी जाने वाली मात्रा बढ़कर OM2 हो जाती है। इस स्थिति में मूल्य में जितना परिवर्तन होता है उतनी ही माँगी जाने वाली मात्रा भी परिवर्तित होती है, अतः यह स्थिति लोचदार माँग की स्थिति अथवा माँग की लोच इकाइ के बराबर कहलाती है। इस स्थिति में माँग रेखा 45° का कोण बनाती है।

4. बेलोचदार माँग (Inelastic Demand)

जब किसी वस्तु की माँग में परिवर्तन उस वस्तु के मूल्य में होने वाले परिवर्तन से बहुत कम अनुपात में होता है तो उस वस्तु की माँग को बेलोचदार कहा जाता है। बेलोचदार माँग की दशा को रेखाचित्र-18 द्वारा प्रदर्शित किया गया है। रेखाचित्र-18 में OP मूल मूल्य तथा OM मूल रूप से वस्तु की माँगी जाने वाली मात्रा है। अब यदि मूल्य बढ़कर OP हो जाता है और माँगी जाने वाली मात्रा OM1 रह जाती है अथवा मूल्य कम होकर OP, रह जाता है और माँगी जाने वाली मात्रा बढ़कर OMA हो जाती है तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि माँग में होने वाला परिवर्तन मूल्य में हए परिवर्तन की तुलना में बहुत कम है। यही बेलोचदार माँग की स्थिति है।

5. पूर्णतः बेलोचदार माँग (Perfectly Inelastic Demand)-

जब किसी वस्त के मूल्य में व्यापक या उल्लेखनीय परिवर्तन होने के पूर्णतः बेलोचदार माँग बावजूद माँगी जाने वाली मात्रा में कोई परिवर्तन न हो तो वह दशा पूर्णतः बेलोचदार माँग की स्थिति कहलाती ” है। रेखाचित्र-19 में पूर्णत: बेलोचदार माँग की स्थिति को प्रदर्शित किया गया है। रेखाचित्र से स्पष्ट है कि वस्तु के मूल्य में व्यापक परिवर्तन होने के बावजूद (अर्थात् मूल्य के OP से बढ़कर OP. या कम होकर OP1 होने के बावजूद) वस्तु की माँगी जाने वाली मात्रा अपरिवर्तित (OM) ही रहती है, अत: DD माँग रेखा पूर्णतः वस्तु की मात्रा → बेलोचदार माँग की स्थिति को प्रदर्शित कर रही है। 

माँग की लोच को प्रभावित करने वाले तत्त्व 

(Factors affecting Elasticity of Demand)

माँग की लोच को प्रभावित करने वाले तत्त्व अग्र प्रकार हैं – 

1.वस्त की प्रकृति (Nature of Commodity)-

सामान्यतः अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली वस्तुओं की माँग बेलोचदार होती है क्योंकि इन आवश्यकताओं को अधिक समय तक सन्तुष्ट नहीं रखा जा सकता। इसके विपरीत, आरामदायक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली वस्तुओं की माँग औसत लोचदार तथा विलासिता की वस्तुओं की माँग अधिक या अत्यधिक लोचदार होती है। 

2. वस्तु की कीमत (Price of a Commodity)-

प्रायः जिन वस्तुओं की कीमत ऊँची होती है उनकी माँग अधिक लोचदार होती है। जिन वस्तुओं की कीमत मध्यम श्रेणी की होती है उनकी माँग की लोच सामान्य होती है, जबकि बहुत सस्ती या बहुत कम मूल्य वाली वस्तुओं की माँग बहत कम लोचदार या बेलोचदार होती है। 

3. स्थानापन्न वस्तुओं की उपलब्धि (Availability of Substitutes)-

यदि किसी वस्तु की अनेक स्थानापन्न वस्तुएँ उपलब्ध हों तो उसकी माँग अधिक लोचदार होगी। क्योंकि वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर अन्य स्थानापन्न वस्तुओं का प्रयोग किया जाने लगेगा। इस प्रकार स्थानापन्न वस्तुओं की कीमतें भी माँग की लोच को प्रभावित करती हैं। 

4. वस्तु के वैकल्पिक प्रयोग (Alternative Uses of a Commodity)-

प्रायः जिन वस्तुओं के वैकल्पिक उपयोग सम्भव होते हैं, उनकी माँग अधिक लोचदार होती है, जैसे विद्युत की माँग अधिक लोचदार होती है। 

5. प्रयोग का स्थान (Place of Use)-

यदि वस्तु ऐसी है जिसके प्रयोग को सरलता से भविष्य के लिए स्थगित किया जा सकता है तो उसकी माँग अधिक लोचदारं होगी। लेकिन यदि वस्तु के प्रयोग को स्थगित नहीं किया जा सकता (अर्थात् यदि वस्तु का क्रय करना अत्यन्त आवश्यक है) तो वस्तु की माँग बेलोचदार होगी। 

6. मल्य स्तर (Price Level)-

मूल्य स्तर भी माँग की लोच को एक बड़ी सीमा तक प्रभावित करता है। प्रो० मार्शल के शब्दों में, “माँग की लोच ऊँची कीमतों के लिए पर्याप्त होती है और जैसे-जैसे कीमतें घटती जाती हैं वैसे-वैसे लोच भी घटती जाती है और यदि कीमतें इतनी गिर जाती हैं कि तृप्ति की सीमा आ जाती है तो लोच धीरे-धीरे विलीन हो जाती है।” 

7. आय समूह (Income Group)-

माँग की लोच इस बात पर निर्भर करती है कि क्रेता आय के किस समूह अथवा वर्ग में आता है। प्राय: समृद्ध वर्ग (धनी लोगों) के लिए वस्तु की माँग बेलोचदार होती है, जबकि निर्धन वर्ग के लिए वस्तुओं की माँग अधिक लोचदार होती है क्योंकि मूल्य में होने वाला थोड़ा-सा परिवर्तन भी निर्धन वर्ग के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है।

8. धन के वितरण का प्रभाव (Effect of Distribution of Wealth)

प्रो० टॉजिग का कथन है कि “सामान्यतः समाज में धन का असमान वितरण होने पर माँग की लोच बेलोचदार होती है और धन के समान वितरण के साथ लोचदार हो जाती है।” इसका कारण यह है कि जब समाज में धन का विषम वितरण होता है तो मध्यम वर्ग के लोगों की सख्या कम होती है। अधिकांश लोग या तो बहुत धनी होते हैं या निर्धन। निर्धन वर्ग के लोग केवल जीवन की अनिवार्यताओं को ही सन्तष्ट कर पाते हैं, जबाक घना लागावलासिता की वस्तुओं का खुलकर उपयोग करते हैं। अन्य शब्दों में, धनी वर्ग के ती वर्ग के लोगों की मांग की लोक बलोचदार हआ करती है। इसके विपरीत. धन के सम वितरण की दशा में, जब मध्य वर्ग का बड़ी संख्या होती है. माँग का लोचदार होना स्वाभाविक ही है। 

9. आय का व्यय किया जाने वाला अंश (Proportion of Expenditurate Income)-

उपभोक्ता जिन वस्तुओं पर अपनी आय का एक छोटा-सा अंश व्यय कर उन वस्तुओं की माँग बेलोचदार हुआ करती है। इसके विपरीत, जिन वस्तुओं/सेवा उपभोक्ता अपनी आय का एक बड़ा अंश व्यय करता है उनकी माँग अधिक बेलोचदार होती 

10. संयुक्त माँग (Joint Demand)-

जिन वस्तुओं की संयुक्त माँग होती है पैन तथा स्याही की माँग, उनकी माँग प्राय: एक ही दिशा में परिवर्तित होती हैं अन्य शब्दों में यदि पैन की माँग स्थिर (बेलोचदार) है तो स्याही की माँग भी बेलोचदार ही होगी। 

11. समय का प्रभाव (Effect of Time)-

साधारणत: समय जितना कम होता है वस्तुओं की माँग उतनी ही कम लोचदार होती है और समय जितना अधिक होता है माँग की लोच उतनी ही अधिक लोचदार होती है। प्रो० मार्शल के शब्दों में- “माँग की लोच कुछ समय बीतने पर ही जानी जा सकती है। अल्पकाल के मूल्यों के परिवर्तन का वस्तु की माँग पर लगभग कोई प्रभाव नहीं पड़ता, परन्तु दीर्घकाल में उसकी प्रतिस्थापन प्रभाव की सम्भावना बढ़ जाती है और ऐसी दशा में माँग में तेजी से परिवर्तन हो सकते हैं।” 

12. स्वभाव तथा आदत (Nature and Habit)-

उपभोक्ता के स्वभाव एवं आदत का भी माँग की लोच पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। जिन वस्तुओं के प्रयोग की आदत पर जाती है उनकी माँग प्राय: बेलोचदार होती है। 

13. राजकीय नियन्त्रण (State Control)-

कभी-कभी सरकार मूल्य नियन्त्रण आदि के द्वारा आर्थिक गतिविधियों में हस्तक्षेप करती है। ऐसी दशा में बहुधा माँग बेलोचदार हो जाती है। 

14. मूल्यों के भावी अनुमान (Estimates of Future Prices)

सामान्यत: जिन वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि की सम्भावना होती है उनकी माँग अधिक लोचदार होती है, जबकि मूल्यों में गिरावट की सम्भावना होने पर माँग बेलोचदार होती है। 

माँग की लोच का महत्त्व 

(Importance of the Elasticity of Demand)

अर्थशास्त्र में माँग की लोच का सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दोनों ही दृष्टिकोणों से अत्यधिक महत्त्व है। इसके महत्त्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है- 

1. सैद्धान्तिक महत्त्व (Theoretical Importance)-

माँग की कीमत लोच का विचार मूल्य निर्धारण, कर निर्धारण व विरोधाभासी स्थिति-सम्पन्नता के मध्य निर्धनता के विचारों को समझने में अत्यन्त सहायक है। इसकी सहायता से यह जाना जा सकता है कि मूल वृद्धि पर उपभोग का क्या प्रभाव पड़ता है। 

2.व्यावहारिक महत्त्व (Practical Importance)-

माँग की लोच के व्यावहारिक को स्पष्ट करते हुए लॉर्ड कीन्स ने लिखा है– “मार्शल की सबसे बड़ी देन माँग की का सिद्धान्त है जिसके बिना मूल्य तथा वितरण के सिद्धान्तों की विवेचना करना कभी भी नहीं हो पाता।” माँग की लोच के व्यावहारिक महत्त्व को निम्न प्रकार स्पष्ट किया ज’ सकता है

(i) मूल्य निर्धारण में महत्त्व (Importance in Price Determination)

मूल्य निर्धारण के क्षेत्र में माँग की लोच का अत्यन्त व्यापक महत्त्व है; जैसे- 

(a) फर्म के साम्य के निर्धारण में-फर्म केवल उस समय साम्य की दशा में होती है जब सीमान्त आगम सीमान्त लागत के बराबर होता है (अर्थात् MC = MR), परन्तु सीमान्त आगम मुख्यत: माँग की लोच पर निर्भर करता है। 

(b) एकाधिकार के अन्तर्गत-(अ) एकाधिकारी उत्पादक/विक्रेता अपने लाभ को अधिकतम करने के उद्देश्य से अपनी वस्तु का जो मूल्य निर्धारित करता है वह मूल्य माँग की लोच से प्रभावित होता है। सामान्यत: यदि एकाधिकारी की वस्तु की माँग लोचदार है तो एकाधिकारी वस्तु का कम मूल्य रखेगा जिससे वह वस्तु की अधिकतम मात्रा का विक्रय करके अपने लाभ को अधिकतम कर सके। लेकिन यदि वस्तु की माँग बेलोचदार है तो वह (एकाधिकारी) वस्तु का ऊँचा मूल्य निर्धारित करके लाभान्वित होगा। 

(ब) एकाधिकारी उत्पादक अपने लाभ को अधिकतम करने के उद्देश्य से मूल्य विभेद की नीति को अपनाते हैं। इस दशा में उत्पादक ‘माँग की लोच’ से ही निर्देशित होता है। 

 (स) राशिपातन (Dumping) को अपनाते समय भी एकाधिकारी विभिन्न बाजारों क माँग की लोच से प्रभावित होता है। 

(c) संयुक्त पूर्ति (Joint Supply)-संयुक्त पूर्ति की वस्तुओं के मूल्य निर्धारण मे भी माँग की लोच का विचार एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। सामान्यतः लोचदार वस्तु का कम और बेलोचदार वस्तु का मूल्य अधिक निर्धारित होता है। 

(ii) वितरण के क्षेत्र में महत्त्व

(Importance in Distribution)-

उत्पादन उत्पत्ति के साधनों का सामूहिक परिणाम होता है, अत: उत्पत्ति के विभिन्न साधनों को उनकी … सेवाओं का पुरस्कार देना एक अनिवार्यता है और यह पुरस्कार माँग की लोच से प्रभावित होता है। प्रायः उत्पादक बेलोचदार माँग वाले साधनों को अधिक और लोचदार माँग वाले … साधनों को कम पुरस्कार देता है। 

(iii) सरकार के लिए महत्त्व

(Importance for the Government)-

वर्तमान समय में सरकार विभिन्न आर्थिक क्रिया-कलापों को सम्पन्न किया करती है, अत: माँग की लोच का सरकार के लिए भी विशेष महत्त्व है। –

(a) कर लगाते समय वित्तमंत्री माँग की लोच को ध्यान में रखता है क्योंकि बेलोचदार मॉग वाली वस्तुओं पर कर लगाकर आय में वृद्धि करना सरल होता है। 

(b) प्रत्येक सरकार समाज के विभिन्न वर्गों पर इस प्रकार कर लगाना चाहती सभी पर समान रूप से न्यायोचित करभार पड़े, अत: करभार के लिए सरकार माँग की विचार की सहायता लेती है। (c) प्राय: सरकार उन उद्योगों को, जिनकी वस्तुओं की माँग बेलोचदार होती। सार्वजनिक सेवाएँ (Public Utility Services) घोषित करके स्वामित्व और प्रबन्ध व ग्रहण कर लेती है। इस प्रकार व्यावहारिक आर्थिक नीति के निर्धारण में माँग की लोच विचार अत्यन्त उपयोगी है।

(d) माँग की लोच उचित विनिमय दर (Exchange Rate) निर्धारण में भी उपयोगी सिद्ध होती है। 

 (iv) भाड़ा निश्चित करने में सहायक (Helpful for determing Freight) ‘माँग की लोच यातायात की भाड़े की दर निश्चित करने में भी सहायक होती है।

(v) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में (Helpful for Foreign Business)-माँग की लोच का विचार अत्यन्त उपयोगी है क्योंकि दो देशों के मध्य व्यापार की शर्ते आयात एवं निर्यात (Import and Export) पदार्थों की माँग की लोच से प्रभावित होती हैं। 

Bcom 1st Year Marginal Cost

सीमान्त लागत 

सरल शब्दों में, किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के उत्पादन से कुल लागत में जो वृद्धि होती है उसे सीमान्त लागत कहते हैं। अन्य शब्दों में, सीमान्त इकाई की लागत को सीमान्त लागत (Marginal Cost) कहा जाता है। एक उदाहरण से इस बात को और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है-माना कि कोई उत्पादन इकाई किसी वस्तु की 20 इकाइयाँ ₹400 लागत पर उत्पन्न करती है। अब यदि वह उत्पादन इकाई 20 इकाइयों के स्थान पर 21 इकाइयों का उत्पादन करे और कुल उत्पादन व्यय ₹ 425 आए तो 21वीं इकाई को उत्पादन लागत ₹ 25 होगी। इस दशा में इक्कीसवीं इकाई सीमान्त इकाई तथा ₹ 25 सीमान्त लागत होगी। सीमान्त लागत को अल्पकाल में कुल परिवर्तनशील लागत (TVC) द्वारा भी ज्ञात किया जा सकता है। अल्पकाल में एक अतिरिक्त इकाई के उत्पादन से कुल परिवर्तन लागत में वृद्धि होती है, उसे सीमान्त लागत कहते हैं। यह प्रारम्भ में गिरती है फिर न्यूनतम बिन्दु पर पहुँचती है और अन्त में बढ़ती है। सीमान्त लागत (MC) के सम्बन्ध में निम्नलिखित दो बातें ध्यान में रखनी चाहिए 

(i) MC रेखा AVC तथा ATC की अपेक्षा उत्पादन की कम मात्रा पर ही अपने निम्नतम बिन्दु पर पहुँच जाती है। 

(ii) MC रेखा AVC तथा ATC रेखाओं को नीचे से उनके निम्नतम बिन्दुओं पर काटती हुई गुजरती है। 

औसत लागत (Average Cost) कुल लागत को कुल उत्पादन से भाग देने पर जो लागत प्राप्त होती है, वही औसत लागत कहलाती है। अन्य शब्दों में औसत लागत – १० लाना कुल उत्पादन (इकाइयाँ) यदि 10 इकाइयों की कुल लागत र 70 है तो एक वस्तु की औसत लागत 70/10 = ₹ 7 होगी। 

उत्पत्ति के नियमों का औसत लागत पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। जब उत्पत्ति वृद्धि नियम लागू होता है तो उत्पादन वृद्धि के साथ-साथ औसत लागत कम होती जाती है। जब उत्पत्ति समता नियम लागू होता है तो औसत उत्पादन लागत उत्पादन वृद्धि के साथ-साथ बढ़ती चली जाती है। 

कुल लागत (Total Cost) कुल उत्पादन पर जो कुछ धन व्यय होता है, उसे कुल लागत कहा जाता है। कुल लागत में उत्पादन पर हुए सभी प्रकार के मौद्रिक व्यय शामिल होते हैं। 

कुल लागत, कुल स्थिर लागत तथा कुल परिवर्तनशील लागत के योग के बराबर होती है, अत: कुल औसत लागत, औसत स्थिर लागत व औसत परिवर्तनशील लागत का योग होता है। 

कुल लागत की मात्रा उत्पादन वृद्धि के साथ सदैव ही घटती है चाहे उत्पत्ति का कोई भी नियम क्रियाशील क्यों न हो। आसत लागत तथा सीमान्त लागत की अवधारणाओं को विभिन्न उत्पत्ति के त एक सरल उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है।

निम्नांकित तालिकाओं पर दृष्टि डालने से यह स्पष्ट होता है कि उत्पत्ति वृद्धि नियम अथवा लागत ह्रास नियम के लागू होने पर सीमान्त न निरन्तर गिरती (कम होती) चली जाती है, औसत लागत भी घटती है, परन्तु सीमान्त लागत तुलना में कम तीव्र गति से। लेकिन कुल लागत में निरन्तर वृद्धि होती चली जाती है। 

उत्पत्ति समता नियम के अन्तर्गत सीमान्त लागत तथा औसत लागत में किसी प्रकार कोई परिवर्तन नहीं आता। केवल कुल लागत में आनुपातिक वृद्धि होती है 

उत्पादन की इकाइयाँ कुल लागत औसत लागत सीमान्त लागत

(Units of Product) (Total Cost) (Average Cost) (Marginal Cost) 

उत्पत्ति ह्रास नियम लागत वृद्धि नियम के अन्तर्गत उत्पादन वृद्धि के साथ-साथ तीनों लागतों में वृद्धि होती है। सीमान्त व्यय तथा औसत व्यय में निरन्तर वृद्धि होती है। उल्लेखनीय बात यह है कि सीमान्त लागत में औसत लागत की अपेक्षा अधिक तीव्र गति से वृद्धि होती है।

सीमान्त लागत तथा औसत लागत में सम्बन्ध (Relation between Marginal Cost and Average Cost) उपर्युक्त विवेचन तथा तालिकाओं से स्पष्ट है कि सीमान्त लागत (Marginal Cost) और औसत लागत (Average Cost) में घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध को . रेखाचित्र-20 (A) द्वारा भी प्रदर्शित किया जा सकता है। 

रेखाचित्र-20(A) से स्पष्ट है कि जब औसत लागत (AC) कम होती है तो सीमान्त लागत और भी तेजी से कम होती है। रेखाचित्र में औसत लागत A बिन्दु से B बिन्दु तक । निरन्तर गिर रही है। जब औसत लागत में वृद्धि होती है तो सीमान्त लागत में भी वृद्धि होने लगती है, परिणामतः दोनों वक्र रेखाएँ U आकार की हो जाती हैं। इन वक्र रेखाओं का U आकार होने का मूल कारण यह है कि जब उत्पादन प्रारम्भ किया जाता है तो उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ उपादानों का अनुकूलतम संयोग निकट आने लगता है जिससे औसत तथा सीमान्त दोनों ही लागतें गिरने लगती हैं। कुछ समय उपरान्त यह अनुकूलतम संयोग भंग हो जाता है क्योंकि उत्पादन के स्थिर उपादानों में तो कोई परिवर्तन नहीं होता, परन्तु परिवर्तनशील उपादानों की मात्रा में वृद्धि हो जाती है, परिणामतः कुल उत्पादन तो बढ़ता है, परन्तु सीमान्त उत्पादन की मात्रा निरन्तर कम होती चली जाती है जिससे सीमान्त तथा औसत लागत में वृद्धि होती है। B से C तक औसत लागत में भी वृद्धि होती है। औसत उत्पादन लागत में वृद्धि के साथ-साथ सीमान्त लागत में भी वृद्धि होती है। यही कारण है कि सीमान्त लागत (MC) औसत लागत (AC) से ऊपर पहुँच जाती है। 

उत्पादन मात्रा रेखाचित्र-20 (B) वितरण के आधुनिक

आधुनिक अर्थशास्त्री वितरण के सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त कोस्वीकार करते वरन् उन्होंने इसके स्थान पर माँग व पूर्ति के आधार पर एक नए सिद्धान्त का प्रतिया किया है। माँग व पूर्ति का यह सिद्धान्त कीमत सिद्धान्त (Theory of Value) से बहुत कर मिलता-जुलता है। इस सिद्धान्त की आधारभूत मान्यता यह है कि जिस प्रकार वस्तु की कीमत का निर्धारण वस्तु की माँग व पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है, उत्पादन के उपादानों का प्रतिफल भी उनकी माँग व पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है।

सिद्धान्त की मान्यताएँ (Assumptions) 

वितरण का आधुनिक सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है-

(1) बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति विद्यमान है।

(2) उत्पत्ति ह्रास नियम अथवा परिवर्तनशील अनुपातों का नियम लागू होता है।

(3) साधन की सभी इकाइयाँ समरूप हैं। अतः वे एक-दूसरे की पूर्ण स्थानापन्न हैं।

(4) प्रत्येक साधन छोटी-छोटी इकाइयों में पूर्णतः विभाज्य है।

(5) उत्पत्ति के सभी साधन पूर्णतया गतिशील हैं। 

(6) साधन की सीमान्त उत्पादकता को मापा जा सकता है और उसकी अवसर लागत दी हुई है। 

उत्पत्ति के उपादान की माँग (Demand of Factors of Production)-

उत्पादन के विभिन्न उपादानों (साधनों) की मांग प्रत्यक्ष माग (Direct Demand) नहीं होती वरन व्युत्पन्न माँग (Derived Demand) होती है और साधन की माँग उसकी सीमान्त उत्पादकता (Productivity) पर निर्भर करती है। इसका अभिप्राय यह है कि यदि किसी वस्त की माँग में वृद्धि होती है, तो उस वस्तु के उत्पादन में प्रयुक्त होने वाले साधनों की मांग में भी दि हो जाती है। उत्पादकों के द्वारा किसी भी साधन की मागी जाने वाली मात्रा उस पानी आगम उत्पादकता (Marginal Revenue Productivity) पर निर्भर करती है। अतः उत्पादक किसी भी साधन का उसकी आय उत्पादकता से अधिक प्रतिफल नहीं कर अतिरिक्त, जैसे-जैसे किसी साधन की अतिरिक्त इकाइयों का प्रयोग किया जा उत्पत्ति हास नियम के क्रियाशील होने के कारण उत्पादकता कम होती चली जाएगी। यही कारण है कि साधन की माँग का वक्र बाएँ से दाएँ नीचे की ओर झुकता है। 

उत्पत्ति के उपादान की पूर्ति (Supply of Factors of Production)

-जिस प्रकार किसी वस्तु की पूर्ति वस्तु की लागत से प्रभावित होती है, ठीक उसी प्रकार उत्पत्ति के उपादान (साधन) की पूर्ति उसकी अवसर लागत (Opportunity Cost) से निर्धारित होता है। “अवसर लागत द्रव्य की वह मात्रा है जो किसी साधन को किसी अन्य सर्वश्रेष्ठ वैकल्पिक उपयोग में मिल सकती है। अतः साधन को वर्तमान उद्योग में इतना प्रतिफल अवश्य मिलना चाहिए जितना कि उसे किसी अन्य वैकल्पिक उद्योग में प्राप्त हो सकता है अन्यथा साधन अपने वर्तमान उद्योग को त्याग कर उस उद्योग-विशेष में चला जाएगा। इस प्रकार साधन का पति मुल्य उसकी अवसर लागत से निर्धारित होता है। का साधन की पर्ति कीमत जितनी अधिक होगी साधन की पर्ति भी उतनी ही अधिक होगा। अतः पूर्ति वक़ बाएँ से दाएँ की ओर ऊपर को उठेगा। इसके अतिरिक्त, साधन विशेष की पूर्ति कई कारकों से प्रभावित होती है। जैसे श्रम की पूर्ति शिक्षा तथा प्रशिक्षण की लागत’, कार्य करने की दशाओं आदि से प्रभावित होती है। इसके अलावा साधनों की पूर्ति पर आर्थिक घटकों के साथ अनार्थिक घटकों का भी व्यापक प्रभाव पड़ता है।

साधन के प्रतिफल का निर्धारण (Determination of Factor Pricing) 

साधन या उपादान का प्रतिफल उस बिन्दु के द्वारा निर्धारित होगा, जिस बिन्दु पर साधन की मांग उसकी पूर्ति के ठीक बराबर होगी। रेखाचित्र-21 में साधन की माँग रेखा DD तथा | पति रेखा SS है. जो एक-दूसरे को P बिन्दु पर काट रही हैं। इस प्रकार साधन की माँग व पूर्ति । OM मात्रा होगी और OS प्रतिफल निर्धारित होगा। यहाँ एक प्रश्न यह उठता है कि प्रतिफल P बिन्दु से OS ही क्यों निर्धारित हुआ OS, अथवा OS, प्रतिफल क्यों नहीं निर्धारित होता? इसका कारण यह है कि OS, बिन्दु पर माँग की मात्रा SA है जबकि पूर्ति की मात्रा S, B है। में हैं। 

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त वितरण का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मिल यह सिद्धान्त इस बात की सामान्य व्याख्या करता है कि उत्पत्ति के विभिन्न सा न्यायोचित पुरस्कार किस प्रकार निर्धारित हो। यह सिद्धान्त मूलतः प्रतिस्थापन सिद्धान्त of Substitution) पर आधारित है। यह सिद्धान्त यह बताता है कि उत्पादन के एक उपाय की कीमत उसकी सीमान्त उत्पादकता के आधार पर निर्धारित होती है। इस सिद्धान्त प्रारम्भिक व्याख्या 19वीं शताब्दी के अन्त में प्रो० जे०बी० क्लार्क (J.B. Clans विक्सटीड (Wickstead), वालरस (Walras) आदि अर्थशास्त्रियों ने की, तत्पश्चात दा विकास में श्रीमती जोन रोबिन्सन (Mrs. Joan Robbinson) तथा जे०आर० हिक्स जैसे अर्थशास्त्रियों ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। 

सरल शब्दों में, इस सिद्धान्त का सार यह है कि जिस प्रकार दीर्घकाल में वस्तओं तथा सेवाओं का मूल्य उनकी सीमान्त उपयोगिता द्वारा निर्धारित होता है ठीक उसी प्रकार उत्पत्ति के विभिन्न साधनों का प्रतिफल भी उनकी सीमान्त उत्पादकता के द्वारा निर्धारित होता है। इस प्रकार यह सिद्धान्त यह बताता है कि राष्ट्रीय आय में से उत्पादन के प्रत्येक साधन को (साहसी के अतिरिक्त) जो प्रतिफल मिलता है वह उस साधन विशेष की सीमान्त उत्पत्ति के बराबर होता है। हाँ, किसी अवधि में (अथवा अल्पकाल में) किसी साधन को मिलने वाला प्रतिफल उस सीमान्त उत्पादकता से कम या अधिक हो सकता है, परन्तु दीर्घकाल में अथवा साम्य की दशा में साधन को मिलने वाला प्रतिफल उसकी सीमान्त उत्पत्ति (उत्पादकता) के बराबर ही होगा। 

उपर्युक्त व्याख्या के अनुसार इस सिद्धान्त की दो प्रमुख बातें निम्नवत् हैं –

(1) साधन की कीमत उसकी उत्पादकता पर निर्भर करती है। 

(2) साधन की कीमत उसकी सीमान्त उत्पादकता (Marginal Productivity) द्वारा निर्धारित होती है। 

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की परिभाषाएँ 

(Definitions of Marginal Productivity Theory)

(1) प्रो० साइमन्स (Prof. Simons) के शब्दों में— “पूर्ण प्रतियोगिता और उत्पत्ति के साधनों की पूर्ण गतिशीलता की दशाओं में श्रमिक को सीमान्त उत्पादन में कार्य पर लगाने से हुई उत्पत्ति के बराबर ही मजदूरी मिलती है।”

2) प्रो० हिक्स (Prof. Hicks) के शब्दों में- “सीमान्त उत्पादकता उत्पत्ति के साधनों के पुरस्कार की माप है जो सन्तुलन की अवस्था में उसे प्राप्त होता है, अर्थात उद्योग के शेष संगठन को पूर्ववत् बनाए रखते हुए फर्म की उत्पत्ति में वह वृद्धि जो उस साधन की पूर्ति में एक छोटी इकाई जोड़कर फर्म को प्राप्त होती है।” 

सीमान्त उत्पादकता की धारणा को स्पष्ट करने के लिए हम एक उदाहरण भी ले सकते हैं मान लीजिए कि किसी कारखाने में उत्पादन के अन्य साधनों के साथ 24 श्रमिक कार्य करते हैं जिससे कारखाने की कुल आय ₹ 5000 प्राप्त होती है। अब यदि उत्पत्ति के अन्य साधनों को यथास्थिर रखकर केवल श्रमिकों की संख्या में एक की वृद्धि कर दें, अर्थात् श्रमिकों का सख्या 25 कर दें, तो कारखाने को ₹ 5100 की आय प्राप्त होती है। इस प्रकार एक श्रमिक को वृद्धि से ₹ 100 की आय बढ़ जाती है। यही ₹ 100 अन्तिम (सीमान्त) श्रमिक की सीमान्त उत्पत्ति कहलाएगी। 

अतः श्रमिक की मजदूरी किसी भी दशा में ₹ 100 से अधिक नहीं होगी और शेष श्रमिक भी इसी दर से मजदूरी (Wages) प्राप्त करेंगे। इस प्रकार साधन की सीमान्त उत्पादकता’ उसकी अन्तिम इकाई की उत्पादकता का ही दूसरा नाम है। . 

(3) श्रीमती जोन रोबिन्सन के शब्दों में—“सीमान्तोत्पादन से अभिप्राय अन्य साधनों की निश्चित मात्रा के साथ किसी एक अतिरिक्त व्यक्ति के प्रयोग से उत्पादन में होने वाली वृद्धि से है।” अन्य शब्दों में, यह श्रम की सीमान्त भौतिक उत्पादकता और उत्पादन इकाई की सीमान्त आय का गुणनफल है। 

(4) प्रो० सैमुअल्सन (Samuelson) के शब्दों में, “किसी उत्पादनशील साधन की सीमान्त उत्पत्ति उस साधन की एक अतिरिक्त इकाई द्वारा उत्पादित की गई अतिरिक्त मात्रा होती है, जबकि अन्य साधन समान रहते हों।” 

(5) प्रो० हैन्सन के शब्दों में, “किसी साधन की सीमान्त उत्पत्ति साहसी की कुल आय में वह वृद्धि है जो उस साधन की एक अतिरिक्त इकाई के कार्य में लगाने पर प्राप्त होती है।” 

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की मान्यताएँ

(Assumptions of the Marginal Productivity Theory)

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है –

(1) उत्पादन की समस्त इकाइयाँ परस्पर समान हैं और वे एक-दूसरे की पूर्ण स्थानापन्न हैं। 

 (2) एक साधन की विभिन्न इकाइयाँ ही नहीं अपितु विभिन्न साधनों की विभिन्न इकाइयाँ भी पूर्ण स्थानापन्न हैं। 

(3) साधन बाजार तथा साधनों द्वारा उत्पादित वस्तु के बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति पायी जाती है। 

(4) केवल एक साधन परिवर्तनशील है तथा शेष साधन स्थिर रहते हैं। अन्य शब्दों में, 

शाल साधन की सीमान्त उत्पादकता (Marginal Productivity) को ज्ञात किया जा सकता है। 

(5) प्रत्येक उत्पादक का लक्ष्य अधिकतम लाभ प्राप्त करना है। 

(6) अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार की स्थिति विद्यमान है। 

(7) सिद्धान्त के अन्तर्गत परिवर्तनशील अनुपातों के नियम को क्रियाशील मान लि गया है। 

(8) सीमान्त उत्पादकता का यह सिद्धान्त केवल दीर्घकाल में लागू होता है, अशी अल्पकाल में साधन को मिलने वाला परस्कार उसकी सीमान्त उत्पादकता स कम या अधिक को सकता है। 

सीमान्त उत्पादकता के प्रकार या माप (Kinds or Measurements of Marginal Productivity) 

सीमान्त उत्पादकता को तीन प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है 

1. सीमान्त भौतिक उत्पाद (Marginal Physical Product)-

किसी साधन की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से कुल भौतिक उत्पाद | (Total Physical Product) में जो वृद्धि । होती है, उसे सीमान्त भौतिक उत्पाद कहते हैं,जबकि अन्य साधन स्थिर रखे जाते हैं। सीमान्त भौतिक उत्पाद वक्र सदैव U के उल्टे आकार का होता है जैसा कि रेखाचित्र-22 में दिखाया गया है 

2. सीमान्त आगम उत्पाद (Marginal Revenue Product)-

जब सीमान्त भौतिक 0 उत्पाद की वृद्धि को द्रव्य के रूप में व्यक्त  करते हैं तो इसको सीमान्त आगम उत्पाद (Marginal Revenue Product) कहते हैं। 

3. सीमान्त उत्पाद मूल्य (Value of Marginal Product

यदि प्राप्त अतिरिक्त उत्पादन, अर्थात् भौतिक उत्पाद को वस्तु के मूल्य से गुणा कर दें तो सीमान्त उत्पाद का मूल्य प्राप्त हो जाता है, स्मरण रहे, पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में कीमतं (P) और सीमान्त आय (आगम) (MR) एक-दूसरे के बराबर होती हैं, किन्तु अपूर्ण प्रतियोगिता की दशा में वस्तु का एकसमान सीमान्त भौतिक उत्पाद का उपज का मूल्य mm सीमान्त आय (आगम) (MR) कीमत से कम बनी रहती है, फलस्वरूप का मल्य (MP) और सीमान्त आगम उत्पाद (MRP) एकसमान न होकर अलग होते हैं।

सीमान्त उत्पादकता सिद्धान्त की आलोचना 

(Criticism of the Marginal Productivity Theory)

इस सिद्धान्त की आलोचना निम्नवत् की गई है 

1.संयुक्त उत्पत्ति में से किसी विशेष साधन द्वारा होने वाली उत्पत्ति का पता लगाना अत्यन्त कठिन है (It is difficult to determine the contribution of any particular factor in joint production)-प्रो० टॉजिग (Taussig), डेवनपोर्ट (Devenport), कारवर (Carver) तथा एड्रोएन्स (Adroance) आदि अर्थशास्त्रियों का मत है कि किसी साधन-विशेष की सीमान्त उत्पादकता को ज्ञात करना अत्यन्त कठिन है क्योंकि 

(i) प्रत्येक वस्तु का उत्पादन विभिन्न उपादानों अर्थात् साधनों का संयुक्त परिणाम होता है, अत: किसी विशिष्ट साधन की उत्पादकता ज्ञात करना अत्यन्त कठिन है। 

(ii) प्रो० हॉब्सन का मत है कि उत्पादन के साधनों के मिलने का अनुपात कुछ तकनीकी कारणों से स्थिर होता है और उसे सरलता से परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। 

 

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