Appointment,Remuneration, Rights and Duties of an Auditor

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Appointment,Remuneration, Rights and Duties of an Auditor

अंकेक्षक की नियुक्ति, पारिश्रमिक, अधिकार एवं कर्त्तव्य

कम्पनी अंकेक्षक की नियुक्ति के सम्बन्ध में निम्नलिखित दो अधिनियम महत्वपूर्ण है।

(I) कम्पनी अधिनियम, 1956 (संशोधित 1965)

(II) चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट्स अधिनियम, 1949 (संशोधित 1959)।

(I) कम्पनी अधिनियम, 1956 (संशोधित 1965) के अनुसार नियुक्ति

(1) संचालक मण्डल द्वारा प्रथम अंकेक्षक की नियुक्ति कम्पनी के पंजीयन के एक माह के अन्दर कम्पनी के प्रथम अंकेक्षक की नियुक्ति कम्पनी के संचालक मण्डल द्वारा की जाती है । इस प्रकार नियुक्त किए गए अंकेक्षक प्रथम वार्षिक साधारण सभा के अन्तिम दिन तक अपने पद पर कार्य करते हैं। किन्तु यदि इस प्रकार से नियुक्ति अंकेक्षक का पद आकस्मिक रूप से रिक्त हो जाता है, तो संचालक मण्डल उसके स्थान पर किसी अन्य अंकेक्षक को नियुक्त कर सकती है। यह भी उल्लेखनीय है कि यदि वह स्थान अंकेक्षक के त्याग-पत्र देने से रिक्त हुआ है, तो ऐसी रिक्तता की पूर्ति संचालक मण्डल नहीं कर सकता, वरन् साधारण सभा ही करेगी।

(2) साधारण सभा द्वारा नियुक्ति--यदि संचालक मण्डल कम्पनी के प्रथम अंकेक्षक की नियुक्ति नहीं करते हैं, तो कम्पनी अपनी साधारण सभा में प्रथम अंकेक्षक की नियुक्ति कर सकती है।

कम्पनी अपनी प्रत्येक वार्षिक सभा में अंकेक्षक की नियुक्ति करेगी और ऐसे नियुक्त किए गए अंकेक्षक उस सभा के अन्त तक कम्पनी के अंकेक्षक होंगे । कम्पनी, अंकेक्षक की नियुक्ति के 7 दिन के भीतर, उसकी सूचना प्रत्येक अंकेक्षक को देगी, अवकाश प्राप्त करने वाले अंकेक्षक के लिए ऐसी सूचना देने की आवश्यकता नहीं है। इसके अतिरिक्त इस प्रकार नियुक्त अंकेक्षक, कम्पनी से नियुक्ति की सूचना प्राप्त करने से 30 दिन के भीतर ऐसी नियुक्ति को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने की लिखित सूचना रजिस्ट्रार को देगा।

(3) केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्ति-यदि कोई कम्पनी अपनी वार्षिक साधारण सभा में किसी अंकेक्षक की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति नहीं कर पाती है, तो उसे इस तथ्य की सूचना 7 दिन के भीतर केन्द्रीय सरकार को दे देनी चाहिए, और तत्पश्चात् अंकेक्षक की नियुक्ति का अधिकार केन्द्रीय सरकार के पास चला जाता है और वह अंकेक्षक की नियुक्ति कर सकती है।

(4) विशेष प्रस्ताव द्वारा नियुक्ति-यदि किसी कम्पनी की अभिदत्त पूँजी का कम से कुम 25% भाग केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, सार्वजनिक वित्तीय संस्था अथवा राष्ट्रीयकृत बैंक या बीमा कम्पनी के पास हो, तो अंकेक्षक की नियुक्ति, पुनर्नियुक्ति विशेष प्रस्ताव द्वारा की जाएगी। यदि विशेष प्रस्ताव पारित नहीं होता है, तो नियुक्ति का अधिकार केन्द्रीय सरकार के पास चला जाएगा।

(5) सरकारी कम्पनियों के लिए नियुक्ति कम्पनी अधिनियम की धारा 619 के प्रावधानानुसार सरकारी कम्पनियों के अंकेक्षक की नियुक्ति के लिए यह व्यवस्था है कि केन्द्रीय सरकार नियंत्रक एवं महालेखा निरीक्षक (Comptroller and Auditor General of India) के परामर्श से नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति कर सकती है। कम्पट्रोलर एण्ड ऑडिटर जनरल को अंकेक्षण की विधि के विषय में निर्देश देने का पूर्ण अधिकार है

(II) चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट्स एक्ट, 1949 के अनुसार अंकेक्षक की नियुक्ति

सम्बन्धी नियम

(According to Indian Chartered Accountants Act, 1949)

चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट्स एक्ट, 1949 के अनुसार, अंकेक्षकों की नियुक्ति के संबंध में अग्रलिखित आदेश महत्वपूर्ण है-

(1) बिना लिखित सूचना दिये पद ग्रहण करना–यदि कोई अंकेक्षक, किसी ऐसे पद को, जिसे कोई अन्य चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट ग्रहण किये हुए था, बिना उसे लिखित सूचना दिये हुए स्वीकार करता है तो वह व्यावसायिक दुराचरण का दोषी माना जाता है। अतः अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वह अपनी नियुक्ति की सूचना पहले अंकेक्षक को अवश्य दे ।

(2) नियुक्ति के सम्बन्ध में धाराओं का पालन-यदि कोई अंकेक्षक इस बात का पता लगाये बिना अंकेक्षक के पद को स्वीकार कर लेता है, कि उसकी नियुक्ति के सम्बन्ध में कम्पनी अधिनियम की धाराओं का पूर्ण रूप से पालन किया गया है अथवा नहीं, तो वह व्यावसायिक दुराचरण का दोषी माना जाता है।

(3) प्रतिस्पर्धा बढ़ना-यदि कोई अंकेक्षक किसी अन्य चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट द्वारा अधिकृत पद की उन शर्तों को स्वीकार कर लेता है, जिनसे प्रतिस्पर्धा में वृद्धि होती हो, तो भी वह व्यावसायिक दुराचरण का दोषी माना जाता है।

(4) अपनी नियुक्ति कराने के लिए सिफारिश आदि न कराना-अंकेक्षक को अपनी नियुक्ति हेतु प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सिफारिश नहीं करानी चाहिए। यदि कोई अंकेक्षक अपनी नियुक्ति कराने के लिए प्रयास करता है, तो वह व्यावसायिक दुराचरण का दोषी होगा।

अंकेक्षक को हटाया जाना

(Removal of an Auditor)

सामान्यतः जिस व्यक्ति को अंकेक्षक पद पर कार्य करने के लिए नियुक्त किया जाता है उसे उसकी पूर्ण अवधि से पहले नहीं हटाया जाता, परन्तु विशेष परिस्थितियों में कार्यकाल की अवधि समाप्त होने से पूर्व भी उसे हटाया जा सकता है। ऐसी स्थितियाँ निम्नलिखित हैं-

1. कम्पनी के प्रथम अंकेक्षक जिनकी नियुक्ति संचालकों द्वारा कम्पनी की रजिस्ट्री से एक माह के अन्दर की गई है तो वह कम्पनी की प्रथम वार्षिक साधारण सभा की समाप्ति तक अंकेक्षक रहते हैं। परन्तु इन्हें कार्यकाल की अवधि समाप्त होने से पूर्व भी हटाया जा सकता है तथा कम्पनी अपनी वार्षिक सभा में अन्य अंकेक्षक की नियुक्ति कर सकती है जिसकी नियुक्ति के लिए किसी सदस्य ने कम्पनी की बैठक की तारीख से कम से कम 14 दिन पूर्व विशेष नोटिस दें दिया हो।

2. कम्पनी विशेष परिस्थितियों में अपनी साधारण सभा में प्रस्ताव पारित करके अंकेक्षक को उसका समय पूरा होने से पूर्व केन्द्रीय सरकार से स्वीकृति प्राप्त करने के पश्चात हटा सकती है।

अंकेक्षक का पारिश्रमिक

(Remuneration of an Auditor)

कम्पनी के अंकेक्षक के पारिश्रमिक के निर्धारण का सामान्य नियम यह है कि अंकेक्षक को नियुक्त करने वाला व्यक्ति ही पारिश्रमिक का निर्धारण करेगा किन्त किसी भी स्थिति में यह लाभ के प्रतिशत के रूप में नहीं हो सकता। अधिनियम की धारा 224 (8) में पारिश्रमिक के सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रावधान किये गये हैं-

(i) यदि अंकेक्षक की नियुक्ति संचालकों द्वारा या केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाती है तो पारिश्रमिक का निर्धारण भी इन्हीं के द्वारा किया जायेगा।

(ii) अन्य परिस्थितियों में अंकेक्षक का पारिश्रमिक साधारण सभा से या सभा में, जैसा कम्पनी निश्चित करे, उसके अनुसार निर्धारित किया जाता है।

(iii) यदि कम्पनी ने अंकेक्षक के खर्चों के लिए कुछ भुगतान किया हो तो यह राशि भी पारिश्रमिक में शामिल कर ली जायेगी

(iv) यदि अंकेक्षक को उसकी अवधि पूरी होने के पूर्व ही हटा दिया जाता है तो पूरी अवधि का पारिमिक मिलेगा।

(v) यदि कम्पनी की वार्षिक साधारण सभा कोई प्रस्ताव नहीं पास करती है और किसी अवकाश प्राप्त अंकेक्षक की अनिवार्य नियुक्ति हो जाती है तो वह वही

पारिश्रमिक पाने का हकदार होगा जो सेवानिवृत्त होने के पूर्व पाता था।

(vi) प्रत्येक अंकेक्षक अतिरिक्त कार्य के लिए अतिरिक्त पारिश्रमिक पाने का हकदार होता है।

(vi) अंकेक्षक की नियुक्ति चाहे जिस प्रकार से हुई हो, वह अपना पारिश्रमिक कम्पनी से ही प्राप्त करेगा।

(vii) अंकेक्षक अपना पारिश्रमिक वसूल करने के लिए कम्पनी पर मुकदमा भी दायर कर सकता है

अंकेक्षक की योग्यताएँ

(Qualifications of an Auditor)

कम्पनी अधिनियम की धारा 226 के अनुसार कम्पनी अंकेक्षक के पास नीचे लिखी हुई दो योग्यताओं में से एक योग्यता अवश्य होनी चाहिए

(1) वह चार्टर्ड एकाउण्टेट्स एक्ट, 1949 के अनुसार चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट हो। इस एक्ट की धारा 4 के अनुसार केन्द्रीय सरकार या काउन्सिल (council) विदेशी योग्यता प्राप्त किसी व्यक्ति को इन्स्टीट्यूट का सदस्य होने की स्वीकृति दे सकती है । इन्स्टीट्यूट का एक सदस्य चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट होता है। यदि किसी साझेदारी संस्था के सब साझेदार उपर्युक्त योग्यता के अनुसार अंकेक्षक नियुक्त होने के योग्य हों, तो वे संस्था के नाम से अंकेक्षक नियुक्त किये जा सकते हैं और उस संस्था का प्रत्येक साझेदार संस्था के नाम से अंकेक्षण-कार्य कर सकता है, अथवा

(2) ‘ब’ श्रेणी के भारतीय राज्यों में ‘ब’ श्रेणी राज्य अधिनियम, 1951 के लागू होने से पूर्व प्रमाण-पत्र प्राप्त अंकेक्षक को भी उस राज्य में रजिस्टर्ड कम्पनियों के लिए अंकेक्षक नियुक्त किया जा सकता है। ऐसे अंकेक्षक ‘प्रमाणित अंकेक्षक’ (certified auditors) कहलाते हैं और केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाये गये नियमों के अन्तर्गत कार्य करते हैं। प्रमाणित अंकेक्षकों के प्रमाण-पत्रों के नवीनीकरण, उनके रद्द करने तथा स्थगित करने सम्बन्धी नियम बनाने का पूर्ण अधिकार केन्द्रीय सरकार को प्राप्त है।

अंकेक्षक की अयोग्यताएँ

(Disqualifications of an Auditor)

धारा 226 (3) के अनुसार आगे लिखे हुए व्यक्ति कम्पनी अंकेक्षक नियुक्त नहीं किये जा सकते हैं-

(1) कोई कम्पनी या अन्य समामेलित संस्था (body corporate);

(2) कम्पनी का कोई अधिकारी या कर्मचारी;

(3) कम्पनी के अधिकारी या कर्मचारी का कोई साझेदार या नौकर;या

(4) ऐसा व्यक्ति जो एक हजार रुपये से अधिक के लिए कम्पनी का ऋणी है, जिसने कम्पनी के किसी अन्य ऋणों के लिए एक हजार रुपये से अधिक की गारण्टी (guarantee) दी हैं;

(5) ऐसा व्यक्ति जो कम्पनी (संशोधित) अधिनियम, 2000 के प्रारम्भ होने के एक वर्ष की अवधि के पश्चात् कम्पनी की किसी प्रतिभूति का अधिकारी हो।

(6) ऐसा व्यक्ति जो समामेलित संस्था की प्रार्थित पूँजी के अंकित मूल्य में 5% से अधिक अंशों का स्वामी है।

(7) ऐसा व्यक्ति भी किसी कम्पनी का अंकेक्षक नियुक्त नहीं किया जा सकता है जो उपर्युक्त नियमों में से किसी एक नियम के अनुसार ऐसी अन्य समामेलित संस्था (body corporate) का जो उस कम्पनी की सहायक (subsidiary) या सूत्रधारी (holding) या उस कम्पनी की सूत्रधारी कम्पनी की सहायक कम्पनी हो, अथवा किसी कम्पनी का अंकेक्षक नियुक्त न किया जा सकता हो।

(8) यदि नियुक्ति के पश्चात् कोई अंकेक्षक इन नियमों के अनुसार अंकेक्षक बनने के योग्य न रहे तो उसका स्थान खाली समझा जाएगा।

कम्पनी अंकेक्षक के वैधानिक अधिकार

(Statutory Rights of Company’s Auditor)

कम्पनी अधिनयम के अधीन अंकेक्षक को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं-

1. कम्पनी की पुस्तकों, लेखों तथा प्रमाणकों का निरीक्षण करने का अधिकार-कम्पनी के प्रत्येक अंकेक्षक को कम्पनी की पुस्तकों, लेखों व प्रमाणकों का निरीक्षण किसी भी समय करने का पूर्ण अधिकार है तथा कम्पनी के अधिकारियों से ऐसी सूचनाएँ व स्पष्टीकरण मांगने का अधिकार है जिनको अंकेक्षक अपने कर्तव्यों का पालन करने के लिए आवश्यक समझे।

2. बिना सूचना दिए हुए अंकेक्षण प्रारम्भ करने का अधिकार-वैधानिक रूप से अंकेक्षक को यह अधिकार है कि नियुक्त हो जाने के बाद बिना सूचना दिए हुए किसी भी तिथि से अंकेक्षण का कार्य आरम्भ कर सकता है। परन्तु व्यवहार में अंकेक्षण करने के लिए एक तिथि संचालकों से निश्चित कर ली जाती है। यदि वह किसी अन्य तिथि को आना चाहे तो उचित सूचना देने की प्रथा है।

3. शाखा पुस्तकें देखने का अधिकार-यदि कम्पनी की शाखा का अंकेक्षण कम्पनी अंकेक्षक द्वारा नहीं कराया जाता है तो कम्पनी अंकेक्षक को शाखा कार्यालय पर रखे हुए हिसाब की पुस्तकों तथा प्रमाणकों तक हर समय पहुँच रखने का अधिकार होता है।

4. साधारण सभाओं से सम्बन्धित सूचनायें प्राप्त करने का अधिकार-कम्पनी अंकेक्षक को कम्पनी की वार्षिक साधारण सभाओं से सम्बन्धित सूचनाओं को प्राप्त करने का अधिकार होता है।

5. साधारण सभा में भाग लेने का अधिकार-अंकेक्षक को यह अधिकार प्राप्त है कि वह कम्पनी की साधारण सभा में भाग ले सकता है, परन्तु उसे अपने सम्बन्धित कार्यों को छोड़कर किसी अन्य विषय पर बोलने का अधिकार नहीं होता।

6. वैधानिक प्रलेखों को देखने का अधिकार-अंकेक्षक को कम्पनी के पार्षद सीमानियम, अन्तर्नियम व प्रविवरण पत्र को देखने का अधिकार है ।

7. तकनीकी एवं वैधानिक सलाह लेने का अधिकार-अंकेक्षक स्वयं प्रत्येक विषय का विशेषज्ञ नहीं होता है। अत: यदि वह आवश्यक समझे तो वह किसी भी मामले पर विशेषज्ञ की कानूनी राय ले सकता है ।

8. पारिश्रमिक प्राप्त करने का अधिकार-यदि अंकेक्षक ने अपना कार्य समाप्त कर लिया है, तो उसे अपना पारिश्रमिक पाने का अधिकार है, परन्तु यदि अंकेक्षक की नियुक्ति वार्षिक शुल्क पर की गई है परन्तु उसे उस वर्ष की समाप्ति से पूर्व ही हटा दिया गया है तो उसे पूरे वर्ष का पारिश्रमिक पाने का अधिकार है, जैसे कि होमर बनाम निकलटर, के मामले में 1908 में निर्णय दिया गया था ।

9. क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार किसी कम्पनी द्वारा अंकेक्षक के विरुद्ध कोई अभियोग लगाया गया है और अंकेक्षक को आत्मरक्षा के लिए उस मुकदमे पर व्यय करना पड़ा है तो यदि उस मुकदमे का निर्णय अंकेक्षक के पक्ष में होता है तब अंकेक्षक को उस मुकदमे पर व्यय की गई राशि की क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार है ।

कम्पनी के अंकेक्षक के कर्त्तव्य

(Duties of Company’s Auditor)

कम्पनी अंकेक्षक के कर्तव्यों को अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से निम्नलिखित शीर्षकों में विभक्त किया गया है

  1. भारतीय कम्पनी अधिनियम के अनुसार कर्तव्य,

II. न्यायाधीशों के निर्णयानुसार कर्तव्य ।

I. भारतीय कम्पनी अधिनियम के अनुसार कर्त्तव्य

1. विशेष जाँच करना कम्पनी अधिनियम (संशोधित), 1965 के अनुसार कम्पनी अंकेक्षकों के कर्त्तव्यों में कुछ वृद्धि हो गई हैं, जिनका वर्णन अधिनियम की धारा 227 (1 अ) में किया गया है, जो निम्न प्रकार हैं

(i) क्या कम्पनी के द्वारा दिए गए ऋण और अग्रिम भुगतान (Loans and Advances) जो प्रतिभूति के आधार पर दिए गए हैं, वे उचित रूप से सुरक्षित हैं और जिन शर्तों पर ये दिए गए हैं, वे शर्ते कम्पनी और उसके सदस्यों के हितों के विरुद्ध तो नहीं हैं ?

(ii) क्या कम्पनी के लेनदेन जो पुस्तकों की प्रविष्टियों से प्रकट होते हैं, कम्पनी के हित के विरुद्ध तो नहीं हैं ?

(iii) यदि एक कम्पनी धारा 372 के अनुसार, विनियोजित कम्पनी है या एक बैंकिंग कम्पनी है, तो क्या इसकी सम्पत्तियों का वह भाग जो अंशों, ऋण-पत्रों या अन्य प्रतिभूतियों में है, इनके क्रय-मूल्य से कम में बेचा गया है ?

(iv) क्या कम्पनी द्वारा दिए गए ऋण और अग्रिम निक्षेपों (Deposits) की तरह दिखलाए गए हैं ?

(v) क्या व्यक्तिगत व्यय लाभगत खाते में ले जाए गए हैं ?

(vi) यदि अंशों का आबंटन (Allotment) नकद हुआ है, तो क्या ऐसे आबंटन के सम्बन्ध में ऐसी नकदी वास्तव में प्राप्त कर ली गई है और यदि कोई भी नकदी वास्तव में प्राप्त नहीं की गई है तो क्या जो स्थिति लेखा-पुस्तकों में व चिट्टे में दिखाई गई है वह ठीक, नियमित और विश्वसनीय है ?

2. रिपोर्ट में अन्तिम खातों की सत्यता की पूचना देना-अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने द्वारा अंकेक्षित खातों, चिट्ठे तथा लाभ-हानि खाते और ऐसे अन्य प्रपत्रों के सम्बन्ध में जो चिट्टे या लाभ-हानि खाते के साथ संलग्न किए जाते हैं, एक रिपोर्ट देगा और यह लिखेगा कि उनकी राय में और पूर्ण जानकारी में उसे जो स्पष्टीकरण दिए गए हैं, उसके अनुसार ये खाते कम्पनी की सच्ची तथा उचित स्थिति प्रकट करते हैं या नहीं।

3. रिपोर्ट में अन्य बातों का समावेश अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वह अपनी रिपोर्ट में निम्नलिखित बातों को प्रकट करे-(i) क्या उसे वह सूचनायें व स्पष्टीकरण जो अंकेक्षण कार्य को करने के लिए आवश्यक थीं प्राप्त हो गये हैं। (ii) संस्था के खाते कम्पनी अधिनियम के अनुसार रखे गए हैं या नहीं तथा कम्पनी की शाखाओं से जिसका उसने निरीक्षण नहीं किया है, समस्त सूचनायें प्राप्त कर ली गई हैं । कम्पनी का चिट्ठा तथा लाभ-हानि खाता पुस्तकों के अनुसार है।

4. रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करना-धारा 229 के अनुसार अंकेक्षक का कतव्य है कि वह अपने द्वारा दी हुई रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करे और यदि कोई फर्म किसी कम्पनी के लिए अंकेक्षक नियुक्त हो तो उनका कोई भी साझेदार रिपोर्ट पर हस्ताक्षर कर सकता है ।

5. प्रविवरण में दी गयी सूचना को प्रमाणित करना-धारा 56 (1) के अनुसार जब एक चालू कम्पनी प्रविवरण निर्गमित करती है तो अंकेक्षक को नीचे लिखी बातों के सम्बन्ध में अपनी रिपोर्ट देनी चाहिए

(क) कम्पनी के लाभ-हानि के सम्बन्ध में,

(ख) सम्पत्ति तथा दायित्व के लिए, और

(ग) पिछले पाँच वर्षों में से प्रत्येक वर्ष में कम्पनी द्वारा बाँटे गये लाभांश् के लिए।

6. ऐच्छिक समापन पर रिपोर्ट देना-धारा 488(2) के अनुसार जब कम्पनी स्वेच्छा से समाप्त (voluntary winding-up) होती है और उसके संचालक धारा 488 (1) के अनुसार कम्पनी की शोधन-क्षमता (solvency) के विषय में अपनी घोषणा करते हैं तो अंकेक्षक का कत्र्तव्य हो जाता है कि वह इस घोषणा के बारे में अपनी रिपोर्ट दे ।

7. कम्पनी अनुसंधान के समय सहायता करना-कम्पनी अधिनियम की धारा 240 के अनुसार जब कम्पनी का अनुसंधान होता है, तो अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वह निरीक्षक (Inspector) की आवश्यक सहायता करे तथा उसके पास जो कम्पनी से सम्बन्धित पुस्तकें व प्रपत्र हों उनको उसे दे।

II. न्यायाधीशों के निर्णयानुसार अंकेक्षक के कर्त्तव्य

न्यायालय द्वारा अंकेक्षक के सम्बन्ध में विभिन्न कार्यालय निर्णय दिये गये हैं, जिनके अनुसार अंकेक्षक के कर्त्तव्य निम्न प्रकार हैं

1. नियुक्ति से सम्बन्धित कम्पनी अधिनियम की व्यवस्थाओं के पालन का पता लगाना-बी० एल० मोहन बनाम के० एन० जे० सत्यवादी (10 March 1955) के विवाद में यह निर्णय दिया गया कि अंकेक्षक का यह प्रथम कर्तव्य है कि वह यह देखे कि उसकी नियुक्ति से सम्बन्धित नियमों का पालन हुआ है या नहीं।

2. इन्स्टीट्यूट का सदस्य बनना व प्रमाण-पत्र प्राप्त करना-केन्द्रीय सरकार के व्यापार व उद्योग उपमन्त्री बनाम ए० सी० कहर (21 Nov. 1954) के विवाद में निर्णय दिया गया है कि कोई भी व्यक्ति तब तक अंकेक्षण नहीं कर सकता जब तक कि वह इन्स्टीट्यूट का सदस्य न बन जाए और प्रमाण पत्र प्राप्त न कर ले ।

3. हस्तगत रोकड़ का स्वयं सत्यापन करना केन्द्रीय सरकार के वित्त व अर्थ-विभाग के उप-सचिव बनाम ए० एस० गुप्ता (1955) के विवाद में यह निर्णय दिया गया कि अंकेक्षक को हस्तगत रोकड़ का सत्यापन स्वयं करना चाहिए। यदि उसे खाते में कोई गड़बड़ी दिखाई दे तो उसकी सूचना स्पष्ट शब्दों में कम्पनी के अंशधारियों को देनी चाहिए।

4. ईमानदारी व सावधानी से कार्य करना लन्दन एवं जनरल बैंक लि० (1895) के विवाद में यह निर्णय दिया गया कि अंकेक्षक को सावधानी व ईमानदारी से कार्य करना चाहिए।

5. अंकेक्षक द्वारा अपना कार्य उचित योग्यता, सतर्कता व चतुराई से करना-किंग्सटन काटन मिल्स लि0 (1869) के विवाद में यह स्पष्ट किया गया है कि अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वह अपना कार्य उचित योग्यता,सतर्कता एवं चतुराई से करे

6. प्रतिभूतियों की विद्यमानता और सुरक्षा की जाँच करना-सी० टी० बिल फायर इन्श्योरेंस कम्पनी लि. के विवाद में यह निर्णय दिया गया कि अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य है कि वह स्वयं यह देखे कि कम्पनी की प्रतिभूति विद्यमान तथा सुरक्षित है ।

7. आर्थिक स्थिति की सत्यता एवं औचित्य की जाँच करना-लीड्स एस्टेट विल्डिंग एण्ड इन्वेस्टमेन्ट सोसायटी लिo बनाम शेफर्ड के मामले में यह निर्णय दिया गया कि अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य होता है कि वह आर्थिक चिट्ठे की केवल गणितीय शुद्धता की ही जाँच न करे बल्कि उसे यह भी देखना चाहिये कि आर्थिक चिट्ठा सही स्थिति को स्पष्ट करता है या नहीं।

8. अंशधारियों पर अपनी नियुक्ति के लिए दबाव न डालना-बी० जी० दफारिया बनाम एस० एम० कसवेकर (10 July, 1955) के विवाद में यह निर्णय दिया गया है कि अंशधारियों पर अंकेक्षक द्वारा अपनी नियुक्ति के लिए दबाव नहीं डालना चाहिए ।

9. ऋण-पत्रों की जाँच करना-डाबर एण्ड सन्स लिमिटेड बनाम एस० एम० कृष्णास्वामी (1951) के विवाद के निर्णय में यह कहा गया कि अंकेक्षक का यह कर्त्तव्य है कि यदि कम्पनी द्वारा ऋणपत्र निर्गमित किये गए हों तो वह यह देखे कि ऋणपत्र प्रन्यासी लेख में इस सम्बन्ध में क्या नियम दिये हुए हैं। उनके भुगतान करने के लिए सिंकिंग फण्ड की व्यवस्था हो तो उसका विनियोग किस प्रकार किया गया है।

10. सन्देहजनक परिस्थितियों की गहन जाँच-लन्दन आयल स्टोरेज क० बनाम सीयर हसलक एण्ड क० के विवाद में यह निर्णय दिया गया कि यदि अंकेक्षक को किसी तथ्य पर सन्देह हो तो उसे उसकी गहन जाँच करनी चाहिए और इसके पश्चात् ही अपनी रिपोर्ट देनी चाहिए।

अंकेक्षक एक रखवाली करने वाले कुत्ते के सदृश्य है, परन्तु रक्त-पिपासित शिकारी कुत्ता नहीं

(An Auditor is a watchdog, but not a blood-hound)

आशय-उपरोक्त कथन कि “अंकेक्षण एक रखवाली करने वाला कुत्ता है, परन्तु रक्त-पिपासित शिकारी कुत्ता नहीं”, किंग्सटन कॉटन मिल्स कम्पनी लिमिटेड, 1896 (Kingston Cotton Mills Company Ltd., 1896) वाले मामले के निर्णय का एक अंश है । इस कथन का स्पष्ट आशय यह है कि अंकेक्षक वास्तव में एक चौकीदार की भाँति होता है। यहाँ चौकीदार की उपमा ‘रखवाली करने वाले कुत्ते’ (watch dog) से दी गई है। जिस प्रकार से चौकीदार अपने मालिक के आदेशानुसार उसकी सम्पत्ति आदि की देखभाल करता रहता है एवं किसी भी दुर्घटना की दशा में भौंककर उसकी तुरन्त सूचना अपने मालिक को देता है, उसी प्रकार अंकेक्षक भी अपने नियोक्ता का स्वामिभक्त सेवक होता है। अंकेक्षण का कार्य करते समय उसके समक्ष जो भी त्रुटि अथवा छल-कपट आता है, उसकी सूचना वह अपने नियोक्ता को देता है। परन्तु इस वाक्यांश का दूसरा भाग अत्यन्त सारगर्भित है, जो अंकेक्षक के कर्तव्यों का बड़ी गहनता के साथ विवेचन करता है। इस वाक्यांश का अर्थ भली प्रकार समझने के लिए पहले यह जानना चाहिए कि (i) ‘रखवाली करने वाला कुत्ता’, एवं (ii) ‘रक्त-पिपासित शिकारी कुत्ता’ (blood-hound) कौन होते हैं ? तथा इन दोनों में अन्तर क्या है ?

(i) रखवाली करने वाले कुत्ते का आशय (Meaning of Watch Dog)-प्रायः यह सब लोग जानते हैं कि रखवाली करने वाले कुत्ते का काम यह देखना होता है कि कोई भी व्यक्ति उसके मालिक के घर में घुस कर धन अथवा माल की चोरी न करे तथा उसके मालिक को किसी प्रकार का नुकसान न पहुँचाए, और यदि कोई चोर या अनजान व्यक्ति घर में घुस रहा है एवं चीजों को चुराने की कोशिश कर रहा है तो चिल्ला कर उसकी सूचना अपने मालिक को दे। एक स्वामिभक्त कुत्ते को प्रायः इस बात का अनुमान रहता है कि वास्तव में कौन-सा व्यक्ति नुकसान पहुँचाने आया है और कौन-सा व्यक्ति यों ही आया है । यही कारण है कि वह हर एक व्यक्ति के आगमन पर नहीं भौंकता और न प्रत्येक व्यक्ति को डराने, काटने या कष्ट पहुँचाने की कोशिश ही करता है ।

(ii) रक्त पिपासु शिकारी कुत्ता (Blood hound) से आशय-एक रक्त पिपासु शिकारी कुत्ता (Blood hound) प्रत्येक आने वाले व्यक्ति पर भौंकता है। क्योंकि एक शिकारी कुत्ता जब शिकार के पीछे छोड़ा जाता है तो कुत्ता यह मानकर चलता है कि उसका शिकार सामने है। वह उसे अपना शत्रु समझता है और उस शिकार को पकड़कर ही दम लेता है। इस प्रकार शिकारी कुत्ता एक खतरनाक जानवर होता है क्योंकि वह प्रत्येक जीव को अपना शत्रु समझता है, प्रत्येक व्यक्ति पर भौंकता है और उसे शक की नजर से देखता है

अंकेक्षक रखवाली करने वाले कुत्ते के समान है अथवा शिकारी कुत्ते के समान ? उपरोक्त दोनों शब्दों में अन्तर के अध्ययन के उपरान्त इनके लक्षणों को अंकेक्षक पर चरितार्थ कीजिए। जब किसी संस्था के हिसाब-किताब के अंकेक्षण के लिए किसी अंकेक्षक की नियुक्ति की जाती है तो उसका यह कर्त्तव्य होता है कि वह यह देखे कि समस्त हिसाब-किताब ठीक है एवं संस्था की आर्थिक स्थिति भी वैसी ही है जैसे कि हिसाब-किताब में प्रतिबिंबित होती है। उसको यह भी देखना चाहिए कि लेखों में कोई कमी तो नहीं है तथा कहीं छल-कपट तो नहीं किए गए हैं। इस कर्त्तव्य का निष्पादन वह कुशलतापूर्वक उसी दशा में कर सकता है जब उसने प्रत्येक कार्य को चतुराई, विवेक एवं सावधानी के साथ किया हो। अंकेक्षण का कार्य प्रारम्भ करने के पूर्व, अंकेक्षक को ऐसी धारणा नहीं बना लेनी चाहिए कि संस्था के हिसाब-किताब में गड़बड़ी अवश्य है तथा उसके सभी कर्मचारी कपटी व बेईमान हैं। वास्तव में, उसको अपना काम सभी खातों को ठीक मान कर शुरू करना चाहिए ।

किसी भी संस्था में अंकेक्षण हेतु प्रवेश करने के बाद उसको मस्तिष्क में आशंकाओं के साथ नहीं घुसना चाहिए । व्यर्थ में किसी भी कर्मचारी पर शक नहीं करना चाहिए। बिना आधार किसी खाते को गलत नहीं समझना चाहिए। कार्य करते समय किसी भी व्यक्ति से कठोरता के साथ बातचीत भी नहीं करनी चाहिए। छोटी-छोटी बात को अनावश्यक रूप से महत्त्व भी नहीं देना चाहिए। उसे संस्था में कर्मचारियों के मध्य ऐसा वातावरण नहीं पैदा करना चाहिए जिससे कि लोग उसको ‘भूत’ समझने लगें, तथा उससे भयभीत हों। यदि वह ऐसा करता है, तो कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। इस प्रकार सामान्य परिस्थितियों में अंकेक्षक को रखवाली करने वाले कुत्ते की तरह कार्य करना चाहिए, परन्तु यदि उसे अनियमितता, गबन या कपट का आभास हो तो उसे शिकारी कुत्ते का रूप धारण कर लेना चाहिए और उसको तब तक आराम से नहीं बैठना चाहिए जब तक वह गहरी जाँच-पड़ताल न कर ले । न्यायाधीश एल० जे० लोप्स (L. J. Lopes) के स्वयं के शब्दों में-

“If there is anything calculated to excite suspicion he should prove it to bottom, but in the absence of anything of that kind, he is only bound to be reasonably cautious and careful.”

दी किंग्सटन कॉटन मिल्स कम्पनी लि. के विवाद में न्यायाधीशों ने अपना निर्णय देते हुए कहा था कि अंकेक्षक को अपने कर्तव्य का निष्पादन करते समय यदि कहीं पर किसी बात की शंका होती है, तो कम्पनी के उच्च अधिकारियों द्वारा उसका निवारण करवा लेना चाहिए। यदि कम्पनी के उच्च अधिकारियों द्वारा प्रदान किए हुए प्रमाण-पत्र को ठीक मान कर उसने काम किया है और इस पर वह किसी कपट या धोखेबाजी को प्रकट नहीं कर पाता है, तो वह इसके लिए उत्तरदायी न होगा। उसको अपना कार्य ईमानदारी, विवेक तथा चतुराई के साथ करना चाहिए। अंकेक्षक का कर्त्तव्य एक निश्चित सीमा के भीतर खोजबीन करना है। उसको रक्त-पिपासित शिकारी कुत्ते की भाँति भौंकते हुए इधर-उधर नहीं घूमना है। यदि उसको किसी भी स्थान पर कोई शंका हो जाती है, तो उसका निवारण कर लेना चाहिए और यदि शंका का समाधान न हो तो उसका उल्लेख अपनी रिपोर्ट में अवश्य कर देना चाहिए।

उपरोक्त कथन के आधार पर अंकेक्षक के कर्त्तव्य

(Duties of the Auditor on the Basis òf Above Statement)

उपरोक्त कथन की विवेचना के आधार पर अंकेक्षक के निम्नलिखित कर्त्तव्य स्पष्ट होते है।

1. अंकेक्षक को शंकालु नहीं होना चाहिए

2. अंकेक्षक को कर्मचारियों पर विश्वास करना चाहिए

3. अंकेक्षक को केवल गणितीय सम्बन्धी शुद्धता ही नहीं देखनी चाहिए

4. अंकेक्षक सत्यता की गारण्टी नहीं दे सकता

5. अंकेक्षक को ईमानदारी से कार्य करना चाहिए

6. अंकेक्षक को उचित सावधानी का प्रयोग करना चाहिए

7. अंकेक्षक जासूस नहीं है


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