Depreciation and Reserve meaning in hindi

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Depreciation and Reserve meaning in hindi

ह्रास एवं संचय

(Meaning of Depreciation)

किसी सम्पत्ति के मूल्य में उसके अप्रचलित अथवा निरन्तर प्रयोग के कारण होने वाली कमी को ह्रास कहते हैं। व्यापक अर्थ में, सम्पत्ति के मूल्य में क्रमिक एवं स्थायी गिरावट को ह्रास कहते हैं।

ह्रास के आयोजन की आवश्यकता

(Need of Provision for Depreciation)

कोई भी व्यवसायी अपने व्यवसाय के खातों का अंकेक्षण कराकर अपने व्यवसाय की सही स्थिति जानना चाहता है। व्यवसाय की सही स्थिति तभी प्रदर्शित हो सकती है जब हास का पर्याप्त आयोजन किया जाये।

संक्षेप में, ह्रास के आयोजन की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से होती है-

1. सही/ठीक उत्पादन लागत ज्ञात करने के लिए (To Ascertain the Accurate Cost)-अन्य व्ययों की भाँति हास भी एक व्यापारिक व्यय है। यदि सम्पत्तियों पर हास नहीं लगाया जायेगा तो उत्पादित की गई वस्तुओं की लागत कम प्रदर्शित होगी। अतः सही लागत ज्ञात करने के लिए हास का लगाया जाना आवश्यक है।

2. सही लाभ या हानि ज्ञात करने के लिए (To Ascertain thc Accurate Profit or Loss)-मूल्य-हास के लिए आयोजन करने का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य लाभ-हानि खाते में सही लाभ दर्शाना है। अन्य व्ययों की भाँति ह्रास भी एक व्यापारिक व्यय है, अतः यदि इसे लाभ-हानि खाते में नहीं लिखा जाता है तो लाभ-हानि खाता सही लाभ या हानि प्रदर्शित नहीं करेगा। अतः सही लाभ या हानि ज्ञात करने के लिए ह्रास का आयोजन करना आवश्यक है।

3. चिट्टे द्वारा सही आर्थिक स्थिति का दिखाया जाना—यदि सम्पत्ति पर ह्रास न लगाया जाए तो चिट्टा संस्था की सही एवं उचित (True and fair) आर्थिक स्थिति को प्रकट नहीं करेगा, क्योंकि सम्पत्ति तो पुस्तक मूल्य पर ही दिखाई जाएगी जबकि उसका प्रयोग होने के कारण उसका वास्तविक मूल्य कम होगा।

4. सम्पत्तियों के प्रतिस्थापन की व्यवस्था करने हेतु (To Replace the Fixed Assets)-सम्पत्तियों के मूल्य में प्रतिवर्ष निरन्तर कमी होते-होते एक समय ऐसा आता है, कि वे बिलकुल बेकार हो जाती हैं, और उनके स्थान पर नयी सम्पत्ति क्रय करने की आवश्यकता पड़ती है। यदि हास की व्यवस्था न की जाये, तो नयी सम्पत्ति को क्रय करने के लिए अतिरिक्त पूँजी की आवश्यकता होगी, जिसे प्राप्त करना काफी कठिन होता है। यदि प्रतिवर्ष थोड़ा-थोड़ा ह्रास का आयोजन किया जाये, तो इतनी राशि एकत्र हो सकती है, कि उससे नयी सम्पत्ति क्रय की जा सकती है। इस प्रकार वर्तमान पूँजी को नष्ट होने से बचाया जा सकता है ।

5. लाभांश के रूप में पूँजी का वितरण रोकने हेतु (Distribution of Profit out of Capital) यदि प्रतिवर्ष ह्रास की रकम को लाभ-हानि खाते में से बिना अपलिखित किये लाभांश का वितरण किया जाता है, तो लाभांश का वितरण पूँजी में से किया जाता है। यदि पूँजी में से लाभांश का वितरण अनेक वर्षों तक हो तो पूँजी का एक बड़ा भाग लाभांश के रूप में वितरित हो जायेगा।

6. कर-भार में वृद्धि (Increase in Tax Liability) हास का प्रावधान नहीं करने से लाभ की मात्रा अनावश्यक रूप में बढ़ जाती है, फलतः संस्था को अधिक कर (Tax) चुकाना पड़ता है। अतः कर भार को नियन्त्रित रखना ह्रास का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।

7. वैधानिक आवश्यकता का अनुशीलन (To Fulfil Legal Requirements) कम्पनी अधिनियम की धाराओं 205 तथा 350 एवं कम्पनी अधिनियम की अनुसूची VI के अनुभाग II की मान्यताओं के अनुरूप स्थायी सम्पत्तियों पर ह्रास की व्यवस्था खातों में अनिवार्यतः की जाती है। अत: वैधानिक आवश्यकता को पूरा करने के लिए भी हास का आयोजन करना आवश्यक है।

ह्रास की रकम का निर्धारण

(Determining Amount of Depreciation)

वास्तव में किसी सम्पत्ति पर प्रतिवर्ष कितना हास हुआ है, यह मापना अत्यन्त कठिन ही नहीं वरन् असम्भव है। फिर भी किसी सम्पत्ति पर ह्रास निर्धारित करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए-

1. सम्पत्ति का लागत मूल्य (Cost Pricc of Ascl)-इसमें सम्पत्ति की वास्तविक लागत के अलावा उन पूँजीगत खर्चों को भी जोड़ा जाता है जो सम्पत्ति को चालू करने सक किए गए हैं

2. सम्पत्ति का जीवन-काल (Lifc of the Asscts)-हास की गणना के सम्बन्ध में सम्पत्ति के जीवनकाल की जानकारी का होना आवश्यक होता है। प्रत्येक सम्पत्ति का जीवनकाल काफी सीमा तक उसकी प्रकृति एवं उसके सुरक्षित रखने की व्यवस्था पर निर्भर करता है।

3. सम्पत्ति का अवशिष्ट मूल्य (Residual Value of Assets)-सम्पत्ति का उपयोगी जीवनकाल समाप्त होने पर सम्पत्ति को बेचने से जो प्राप्त होता है, यही सम्पत्ति का अवशिष्ट मूल्य होता है। ह्रास की गणना करते समय इसे सम्पत्ति की लागत में से घटा दिया जाता है, तत्पश्चात् ही ह्रास की गणना की जाती है।

उदाहरण यदि किसी मशीन को 10,100 रुपये में खरीदा गया और 100 रुपये उसको लगाने में खर्च हुए हैं तथा विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार मशीन 10 वर्ष चलेगी तथा तब उसका अवशिष्ट मूल्य 200 रुपये रहेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि उस मशीन का 10 वर्ष में (10,100 + 100 – 200) = 10,000 रुपये ह्रास अपलिखित किया जाएगा।

4. सम्पत्ति की मरम्मत का प्रबन्ध (Repair of Asset) यदि सम्पत्ति की मरम्मत का उचित प्रबन्ध है तो उससे सम्पत्ति का जीवन-काल बढ़ जाता है तथा ह्रास की रकम कम हो जाती है।

5. नवीन आविष्कारों का अनुमान करना-हास की राशि को निर्धारित करते समय भविष्य में होने वाले नवीन आविष्कारों के सम्बन्ध में, जिसके परिणामस्वरूप वह सम्पत्ति बेकार हो सकती है, विचार कर लेना चाहिए। वैसे तो इन आविष्कारों के सम्बन्ध में कुछ निश्चित अनुमान लगाना कठिन होता है।

6. सम्पत्ति का विस्तार (Expansion of the Assets)-यदि सम्पत्ति के विस्तार पर पूँजीगत व्यय किया गया हो तो ह्रास का निर्धारण करते समय इसे भी ध्यान में रखा जाना आवश्यक होता है।

7. वैधानिक नियम (Statutory Laws) ह्रास के सम्बन्ध में कम्पनी अधिनियम की धारा 205, 300 तथा 350 को ध्यान में रखा जाना चाहिए। यदि अन्य कोई नियम हों तो उन्हें भी ध्यान में रखना चाहिए।

ह्रास के कारण

(Causes of Depreciation)

1. सम्पत्ति का लगातार प्रयोग (Continuous Use of Asset)-व्यवसाय में स्थायी सम्पत्तियों का निरन्तर प्रयोग करने से उनमें जो घिसावट तथा क्षय होता है, उसके फलस्वरूप उनके मूल्य व कार्यक्षमता में गिरावट आती है। यह गिरावट मरम्मत (Repair) द्वारा रोकी जा सकती है, लेकिन ज्यादा लम्बे समय तक मूल्य में गिरावट नहीं रोकी जा सकती।

2. अप्रचलन द्वारा (By Obsolescence)-कभी-कभी मशीनें प्रयोग से इसलिए हटानी पड़ती हैं क्योंकि नए-नए आविष्कार होने से नई मशीनें चलन में आ जाती हैं जिनके द्वारा उत्पादन करने पर वस्तु की लागत बहुत कम हो पुरानी मशीनों को चलन से बाहर कर देती हैं। जिससे पुरानी मशीनों के मूल्य में गिरावट आ जाती है। इस प्रकार से होने वाली हानि अप्रचलन (Obsolescence) द्वारा मूल्य हास का उदाहरण है।

3. रिक्तता (Depletion)-कुछ सम्पत्तियाँ इस प्रकार की होती हैं जिनका एक सीमित भण्डार होता हैऔर जैसे-जैसे इस भण्डार में से सामग्री का निकास होता जाता है वैसे-वैसे इस भंडार में रिक्तता आती जाती है और एक ऐसी स्थिति आ जाती है जब इन सम्पत्तियों से कच्चा माल सामग्री निकालना अलाभकारी हो जाता है। जैसे-खान, मिट्टी के तेल के कुएँ आदि।

4. समय की समाप्ति (Emluion of Time)-पट्टे पर ली गई सम्पत्तियों तथा पेटेण्ट आदि का समय जीवनकाल निश्चित होता है और समय व्यतीत होने के साथ-साथ इन सम्पत्तियों के मूल्य में हास होता है।

5. दुर्घटना (Accident)-कभी-कभी दुर्घटनाओं के कारण कुछ सम्पत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं (जैसे-आग, बाह द्वारा सम्पत्ति का नष्ट होना) तो इनका मूल्य बहुत कम हो जाता है। यह दुर्घटना द्वारा मूल्य ह्रास कहलाता है।

6. बाजार मूल्य में स्थायी कमी हो जाने पर (Permanent fall in the Market Price) बाजार में प्रायः स्थायी सम्पत्तियों के मूल्य में उतार-चढ़ाव होते रहते हैं जिन पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता क्योंकि ये सम्पत्तियाँ पुनः बिक्री के लिए नहीं होती हैं । परन्तु यदि इस प्रकार की सम्पत्तियों के मूल्य में स्थायी कमी आ जाती है तो पुस्तकीय मूल्य (Book Value} और बाजार मूल्य (Market Price) के अन्तर को ह्रास मान लिया जाता है।

ह्रास की विशेषताएँ

(Characteristics of Depreciation)

1. हास की व्यवस्था केवल स्थायी सम्पत्तियों के सम्बन्ध में की जाती है

2. हृास से आशय सम्पत्ति के पुस्तक मूल्य में कमी से है न कि बाजार मूल्य से ।

3. सम्पत्ति के मूल्य में होने वाली यह कमी धीरे-धीरे एवं स्थायी होती है।

4. हाम किसी भी कारण से सकता है।

हास की विधियाँ

(Methods of Depreciation)

हास की व्यवस्था करने के लिए व्यवहार में अनेक विधियाँ प्रचलित हैं। उनमें से कुछ प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित है-

1, स्थाई किस्त पद्धति या मूल-लागत पद्धति (Fixed Instalment_Method or Original Cost Method)-इस विधि के अन्तर्गत सम्पत्ति के सम्बन्ध में एक निश्चित राशि प्रतिवर्ष हास के रूप में अपलिखित (Write off) की जाती है। यह राशि इतनी होती है कि सम्पत्ति के उपयोगी जीवन के समाप्त होने पर, सम्पत्ति खाते में उसके अवशिष्ट मूल्य के बराबर राशि शेष रह जाए। इस विधि में हास की राशि प्रति वर्ष समान रहती है। यही कारण है कि इसे ह्रास की सरल रेखा विधि (Straight Line Method) भी कहते हैं। इसके अन्तर्गत हास की गणना के लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जा सकता है.

Depreciation per Year

Cost Price – Scrap Value

Number of Years

उन सम्पत्तियों पर ह्रास-व्यवस्था की यह प्रणाली अत्यन्त उपयुक्त सिद्ध होती है, जिनके जीवनकाल का अनुमान ठीक रीति से लगाया जा सकता है, यथा-पेटेण्ट तथा पट्टे पर ली गयी भूमि अथवा भवन आदि ।

2. क्रमागत ह्रास पद्धति (Diminishing Balance Method) इस पद्धति के अन्तर्गत ह्रास की दर प्रतिवर्ष समान रहती है, परन्तु इसकी राशि प्रतिवर्ष सम्पत्ति के ह्रासित मूल्य पर निकाली जाती है। जैसे-जैसे सम्पत्ति की आयु समाप्त (कम) होती जाती है, वैसे-वैसे ह्रास की राशि भी प्रतिवर्ष कम होती जाती है । इस विधि के अन्तर्गत सम्पत्ति का मूल्य कभी भी शून्य नहीं होता। ह्रास-व्यवस्था की पद्धति को मुख्यतः उन सम्पत्तियों के लिए प्रयोग किया जाता है, जो दीर्घकालीन होती हैं तथा जिनकी आयु का अनुमान सरलतापूर्वक नहीं लगाया जा सकता है, यथा-संयंत्र एवं मशीनरी, फर्नीचर तथा भवन आदि।

3. वार्षिक वृत्ति पद्धति (Annuity Method)-इस पद्धति के अन्तर्गत ह्रास का आयोजन करते समय सम्पत्ति में विनियोजित पूँजी पर ब्याज की व्यवस्था भी की जाती है, जो संस्था को अन्य कहीं विनियोग करने पर प्राप्त हो सकता था। सम्पत्ति की आयु तथा ब्याज की निश्चित दर के अनुसार वार्षिक वृत्ति तालिका (Annuity Table) से ऐसी रकम ज्ञात कर लेते हैं जो प्रतिवर्ष समान रूप से लाभ-हानि खाते में हास के रूप में लिख दी जाती है।

इस पद्धति के अन्तर्गत ह्रास की राशि वर्ष-प्रतिवर्ष बराबर रहती है तथा ब्याज की रकम घटती जाती है।

मुख्य रूप से इस पद्धति का प्रयोग उन सम्पत्तियों के लिए किया जाता है जो लम्बे पट्टे पर ली जाती हैं और जिनका मूल्य अधिक होता है।

4. ह्रास कोष विधि (Depreciation Fund Method)- इस विधि में प्रतिवर्ष एक निश्चित रकम सम्पत्ति के ह्रास के रूप में लाभ-हानि खाते से हास कोष खाते (Depreciation Fund Account) में क्रेडिट कर दी जाती है तथा इस राशि को व्यवसाय के बाहर विनियोग कर दिया जाता है। साधारणतः यह विनियोग सरकारी प्रतिभूतियों (Govt. Securities) या आसानी से बिक्री योग्य प्रतिभूतियों में किया जाता है। विनियोग से प्राप्त होने वाला ब्याज भी ह्रास कोष खाते में ही क्रेडिट कर दिया जाता है तथा इसका भी विनियोग कर दिया जाता है। जब सम्पत्ति बेकार हो जाती है तो विनियोग को अर्थात् प्रतिभूतियों को बेच दिया जाता है और इनकी बिक्री से प्राप्त धनराशि से नई सम्पत्ति क्रय कर ली जाती है। ह्रास कोष खाते के शेष को पुरानी सम्पत्ति खाते में हस्तांतरित कर बन्द कर देते हैं।

इस विधि से सम्पत्ति खाते में से हास की रकम प्रतिवर्ष घटाकर नहीं दिखाई जाती बल्कि सम्पत्ति खाता लागत मूल्य पर ही दिखाया जाता है और जब सम्पत्ति की आयु समाप्त हो जाती है तो हास कोष खाते का शेष इस सम्पत्ति खाते में हस्तांतरण कर दोनों खातों को बन्द कर दिया जाता है। इस पद्धति का प्रयोग उन सम्पत्तियों के लिए किया जाता है जिनके बेकार होने के समय नई सम्पत्ति को क्रय करने की आवश्यकता होती है।

5. बीमा पॉलिसी विधि (Insurance Policy Method)-यह विधि कोई नई पद्धति नहीं है बल्कि हास कोष विधि का ही एक संशोधित रूप है। इस पद्धति के अन्तर्गत अंकेक्षण रुपया प्रतिभूतियों में विनियोजित नहीं किया जाता बल्कि प्रीमियम के रूप में बीमा कम्पनी को दिया जाता है। ह्रास कोष विधि का एक दोष यह है कि प्रतिभूतियों का मूल्य घट जाने पर हानि की सम्भावना रहती है परन्तु बीमा पॉलिसी विधि में पूर्ण सुरक्षा रहती है। इसके अन्तर्गत ह्रास की एक निश्चित राशि प्रत्येक वर्ष के अन्त में ह्रास कोष खाते (Depreciation Fund Account) में हस्तांतरित कर दी जाती है तथा इस ह्रास की रकम से बीमा पॉलिसी के प्रीमियम का भुगतान कर दिया जाता है। इस विधि में सम्पत्ति की आयु (Life) अनुमान लगाकर उतने वर्षों की एक बन्दोबस्ती बीमा पॉलिसी (E vment Policy) खरीद ली जाती है तथा ह्रास की रकम से प्रीमियम का भुगतान कर दिया जाता है। पॉलिसी की अवधि समाप्त होने पर (On Maturity) बीमा कम्पनी से आवश्यक रोकड़ प्राप्त हो जाती है जिससे नई सम्पत्ति का क्रय कर लिया जाता है ।

6. पुनर्मूल्यांकन पद्धति (Revaluation Method)-इस पद्धति में चिट्ठे के दिन सम्पत्ति का पुनर्मूल्यांकन किया जाता है और सम्पत्ति का पुनः मूल्यांकित मूल्य पुस्तक मूल्य से जितना कम होगा, उतना मूल्य ह्रास अपलिखित कर दिया जाएगा। यदि पुनर्मूल्यांकित मूल्य पुस्तक मूल्य से अधिक है तो इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। जिन सम्पत्तियों के मूल्य में वर्ष के बीच अनिश्चित परिवर्तन होते हैं, उन पर ह्रास आयोजन के लिए यह पद्धति उपयुक्त है। जैसे पशु तथा फुटकर औजार आदि ।

7. रिक्त इकाई विधि (Depletion Unit Method) यह विधि क्षयशील सम्पत्तियों जैसे-खान, मिट्टी के तेल के कुएँ आदि पर ह्रास काटने के लिए प्रयोग की जाती है। खानों में से होने वाले कुल उत्पादन का अनुमान लगाया जाता है और सम्पत्ति के मूल्य को उससे (अनुमानित उत्पादन से) भाग देने पर प्रति इकाई ह्रास ज्ञात कर लिया जाता है उदाहरण के लिए माना कि किसी खान का मूल्य 10,00,000 रुपये है और उससे कुल 20,00,000 टन कोयला निकलने का अनुमान है तो प्रति टन हास की दर 10,00,000/ 20,00,000 या 50 पैसे प्रति टन हुई ।अब यदि एक वर्ष में 1,00,000 टन कोयला निकाला जाता है तो हास 50,000 रुपये काटा जाएगा।

8. मशीन घंटा दर पद्धति (Machine Hour Rate Method)-यह विधि उन सम्पत्तियों पर ह्रास काटने के लिए प्रयुक्त होती है जिनकी कार्य-अवधि घंटों में मापी जाती है। मशीन इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। इस विधि के अन्तर्गत यह अनुमान लगाया जाता है कि मशीन अपनी कुल आयु (Life) में कितने घंटे (Hours) चलेगी। मशीन के मूल्य को कुल कार्यशील घंटों से भाग देकर प्रति घंटा ह्रास की दर ज्ञात कर ली जाती है। अब इस बात का हिसाब रखा जाता है कि मशीन वर्ष भर में कुल कितने घंटे चली तथा एक वर्ष के कुल घंटों को ह्रास की दर से गुणा कर देने पर वार्षिक ह्रास की दर ज्ञात हो जाती है। यह विधि उन उद्योगों के लिए उपयुक्त है जहाँ प्रायः मूल्यवान मशीनें प्रयोग में लाई जाती हैं। जैसे-माना कि एक मशीन की लागत 2,00,000 रुपये है और वह मशीन अपने जीवन में अनुमानतः 10,00,000 घंटे चलेगी तो ह्रास की दर 2,00,000/10,00,000 प्रति घंटा हुई, अत: यदि मशीनरी वर्ष में 2,000 घंटे चलती है तो ह्रास की रकम 400 रुपये अपलिखित की जाएगी। 20 पैसे

9. सामूहिक विधि (Global Method)-इस पद्धति में सभी सम्पत्तियों के लिए ह्रास की एक निश्चित राशि (Flat Rate of Depreciation) प्रतिवर्ष चार्ज की जाती है। यह विधि अधिक प्रयोग में नहीं आती है। कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत इस पद्धति के प्रयोग पर प्रतिबन्ध है।

ह्रास के सम्बन्ध में अंकेक्षक के कर्त्तव्य

(Duties of Auditor in Connection with Depreciation)

ह्रास के सम्बन्ध में अंकेक्षक के निम्नलिखित कर्तव्य हैं-

1. ह्रास की पर्याप्तता की जाँच करना

2. ह्रास की विधि के औचित्य पर विचार करना

3. ह्रास की पद्धति में परिवर्तन की जाँच करना

4. ह्रास की दर में परिवर्तन की जाँच करना

5. प्रबन्धकों के हास सम्बन्धी कर्तव्यों की जाँच करना

6. प्लाण्ट रजिस्टर की जाँच करना

7. कम्पनी के अन्तर्नियमों का पालन

8. कम्पनी अधिनियम की व्यवस्थाओं के पालन की जाँच करना

9. न्यायाधीशों के निर्णयों का अध्ययन

तीन कम्पनियों में उनके भिन्न-भिन्न संचालक मशीन पर हास की व्यवस्था की आवश्यकता बताते भी निम्नलिखित आधार पर आपत्ति प्रकट करते हैं-(क) मशीन की लागत में वृद्धि होने से मशीन अधिक मूल्यवान हो गयी है, अत: ह्रास की व्यवस्था उचित नहीं है । (ख) मरम्मत से मशीन नई के समान रखी जा रही है। (ग) अन्य वर्षों की तरह ह्रास की व्यवस्था करने से लाभांश की दर कम हो जायेगी, इसके कारण अंशधारियों में असन्तोष होगा और अंशों के मूल्य में गिरावट होगी। इन विवरणों की समालोचना कीजिए तथा ह्रास के सम्बन्ध में अंकेक्षक के कर्त्तव्य बताइए।

प्रदत्त तर्कों को निम्नलिखित आधार पर रद्द किया जा सकता है तथा हास का आयोजन अवश्य किया जाना चाहिए

(क) मशीन को बाजार में बेचने के लिए नहीं खरीदा गया है, बल्कि व्यापार में प्रयोग करते हुए लाभ कमाने के उद्देश्य से खरीदा गया है। चूंकि इस वर्ष लाभ कमाने में इसका योगदान रहा है, अतः बाजार मूल्य पर ध्यान दिये बिना ह्रास का आयोजन अवश्य किया जाना चाहिए।

(ख) मरम्मत व्यय करने से मशीन नई के समान नहीं हो सकती। हाँ, अच्छी हालत में अवश्य रखी जा सकती है। मशीन प्रयोग में आने से ह्रास अवश्य होता है इसके अतिरिक्त मरम्मत व्यय आयगत प्रकृति के होते हैं न कि पूँजीगत प्रकृति के। अतः ह्रास का आयोजन अवश्य किया जाना चाहिए ।

(ग) ह्रास लाभ-हानि खाते पर एक प्रभार है न कि लाभ में से कोई आयोजन (Depreciation is a charge against profits and not an appropriation of profits) । अतः चाहे लाभ कम हो या अधिक, लाभांश बाँटा जाये या नहीं, अंशधारी प्रसन्न हों या न हों, ह्रास का आयोजन अत्यन्त आवश्यक है। हर हालत में ह्रास की व्यवस्था करनी चाहिए। किसी वर्ष में हानि होने की स्थिति में भी ह्रास का आयोजन आवश्यक है।

संचय (Reserve) का अर्थ

लाभ का वह भाग जिसे अंशधारियों में वितरित नहीं किया गया है तथा संस्था की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने तथा कार्यशील पूँजी को बढ़ाने के उद्देश्य से संस्था में रोककर रखा गया है, संचय है। इसका आयोजन किसी अधिनियम के तहत अनिवार्य नहीं है वरन् यह पूर्णतया ऐच्छिक होता है।

संचय की विशेषताएँ

(Characteristics of Reserve)

  • यह सामान्य उद्देश्य के लिए बनाया जाता है।
  • इसका निर्माण भूत या वर्तमान लाभों में से ही किया जाता है। (iv) यह लाभों का नियोजन (Appropriation) होता है।
  • यह व्यय अथवा हानि के रूप में नहीं होता है।
  •  यह लाभों का नियोजन (Appropriation) होता है।
  • इसका प्रयोग संकटकालीन परिस्थिति में लाभांश के वितरण में भी किया जा सकता है।

इससे व्यवसाय की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है, साथ ही कार्यशील पूँजो भी बढ़ती है।

(vii) इसका निर्माण वैधानिकतः अनिवार्य नहीं है.।

आयोजन (Provision) का अर्थ

(i) आयोजन निश्चित तौर पर किया जाता है अर्थात् संस्था में लाभ हो या हानि, आयोजन वे रकमें हैं जो लाभ अथवा आगम खाता (Revenue Account) में से निकालकर. निश्चित और विशिष्ट आवश्यकताओं या सम्भाव्य हानियों को पूरा करने के लिए सुरक्षित रखी जाती हैं। स्थायी सम्पत्तियों के मूल्यों में कमी की हानि या ह्रास के लिए व्यवस्था, अप्राप्य एवं संदिग्ध ऋणों के लिए आयोजन, संदिग्ध दायित्वों की पूर्ति के लिए व्यवस्था इसके उदाहरण हैं। आयोजन की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं-

(ii) इसका निर्माण किसी विशेष उद्देश्य से किया जाता है तथा प्रयोग भी उसी के लिये किया जाता है।

आयोजन एवं संचय में अन्तर

(Difference between Provision and Reserve)

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गुप्त संचय (Secret Reserve) का अर्थ

गुप्त संचय से आशय ऐसे संचय से है जो संस्था में विद्यमान रहते हुए भी प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक चिट्टे में नहीं दिखाया जाता। जिस संस्था में गुप्त संचय विद्यमान रहता है उसकी आर्थिक स्थिति चिट्ठे में दिखाई गई आर्थिक स्थिति की तुलना में कहीं अधिक अच्छी होती है। गुप्त संचय की स्थिति में व्यवसाय की सम्पत्तियों को वास्तविक मूल्य से कम मूल्य पर तथा दायित्वों को वास्तविक मूल्य से अधिक मूल्य पर दिखाया जाता है ।

डी पॉला के अनुसार, “गुप्त संचय वह है जिसे चिढे में नहीं दर्शाया जाता है जिसके फलस्वरूप चिट्ठे में जो आर्थिक स्थिति दर्शायी जाती है, वह वास्तविक स्थिति की अपेक्षा कहीं अधिक अच्छी होती है।”

गुप्त संचय के लाभ

(1) गुप्त संचय के माध्यम से संस्था की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है ।

(2) गुप्त संचय से संस्था में कार्यशील पूँजी में वृद्धि हो जाती है ।

(3) इससे संस्था के प्रतियोगियों को वास्तविक लाभ की जानकारी नहीं हो पाती जिससे अनावश्यक प्रतियोगिता में कमी आती है।

(4) गुप्त संचय के माध्यम से आर्थिक संकटों को आसानी से झेला जा सकता है ।

(5) इससे लाभों की दर को स्थिर बनाए रखा जा सकता है जिससे संस्था में जनता का विश्वास बढ़ता है।

(6) गुप्त संचय के माध्यम से प्रबन्धहीनता के कारण होने वाली नीतियों को दबाया जा सकता है।

गुप्त संचय के दोष

(1) गुप्त संचय के निर्माण से लाभ-हानि खाता संस्था का सही लाभ नहीं दर्शाता है।

(2) इससे संस्था की सम्पत्तियों का गबन आसानी से किया जा सकता है ।

(3) गुप्त संचय के कारण चिट्ठा संस्था की सही आर्थिक स्थिति को प्रदर्शित नहीं करता।

(4) गुप्त संचय के द्वारा प्रबन्धकीय अकुशलता को आसानी से छिपाया जा सकता

(5) गुप्त संचय के निर्माण से लाभ की मात्रा घट जाती है जिससे अंशों का बाजार मूल्य गिरने लगता है तथा संस्था की ख्याति धूमिल होती है ।

(6) गुप्त संचय की नीति के कारण चिट्टे में सम्पत्तियाँ कम मूल्य पर दिखाई जाती हैं जिससे बीमा कम्पनियों से बीमे की राशि कम प्राप्त होती है


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