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Bcom 2nd year Principle of Business Management

Bcom 2nd year Principle of Business Management

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CHAPTER 1Introduction of Mangement and Managerial Roles
CHAPTER 2Development of Management Thought and Contigency Approach
CHAPTER 3Planning and Corporate Planning
CHAPTER 4Decision and Management by Objectives
CHAPTER 5Organization Structure and Contingency Factors
CHAPTER 6Authority & Resposibility and Centrialization
CHAPTER 7Motivaton Concept & Theories (Moslow, Herzberg, Megregor and Ouchi)
CHAPTER 8Leadership-Concept, styles and Theories
CHAPTER 9Communication- Nature, process, Network
CHAPTER 10Bcom 2nd year Concept, Process and Techniques of Managerial control
CHAPTER 11Bcom 2nd mangement and resistance of Change
Bcom 2nd year Principles of Business Management

Introduction of Mangement and Managerial Roles

प्रबन्ध से आशय 

साधारण बोलचाल की भाषा में प्रबन्ध से आशय किसी कार्य को व्यवस्थित ढंग से करने की पद्धति से हैं। आधुनिकव्यवसाय के कुशल संचालन के सन्दर्भ में प्रबन्ध शब्द का प्रयोग दो शब्दों में किया जाता है।

इस प्रकार व्यवसाय में निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विभिन्न व्यक्तियों की क्रियाओं को नियन्त्रित एवं समन्वित करना ही प्रबन्ध कहलाता है। 

परिभाषाएँ-प्रबन्ध की प्रमुख परिभाषाएँ निम्न प्रकार हैं: हेनरी फेयोल के अनुसार, प्रबन्ध का अर्थ पूर्वानुमान, नियोजन, संगठन, निर्देशन, समन्वय और नियन्त्रण करना है।” 

अमेरिकी प्रबन्ध समिति के अनुसार, “प्रबन्ध मानवीय तथा भौतिक साधनों को क्रियाशील संगठनों की इकाइयों में लगाता है, जिसका उद्देश्य व्यक्तियों द्वारा कार्य को सम्पादित कराना होता है।” 

कूण्ट्स एवं ओ’ डोनेल के अनुसार, “ प्रबन्ध से अधिक महत्वपूर्ण मानवीय क्रिया का अन्य कोई क्षेत्र नहीं है, क्योंकि इसका कार्य अन्य व्यक्तियों द्वारा कार्य को सम्पादित कराना होता है।”

इस प्रकार निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि प्रबन्ध एक सुनियोजित एवं सतत प्रक्रिया है, जिसमें पूर्व निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए नियोजन, संगठन निर्देशन और  नियन्त्रण के द्वारा संगठन के मानवीय और भौतिक संसाधनों के मध्य प्रभावशाली समन्वय स्थापित करके, उत्पादकता में वृद्धि किस्म में सुधार, उत्पादन लागत में कमी तथा कर्मचारियों के साथ मधुर सम्बन्ध एवं संस्था के सामान्य उद्देश्य प्राप्त किये जा सकते हैं। 

प्रबन्ध के कार्य 

(Functions of Management)

(1) प्रमुख कार्य, (II) सहायक कार्य,

(I) प्रमुख कार्य–प्रबन्ध के मुख्य कार्यों में निम्न शामिल हैं 

(1) नियोजन–

नियोजन प्रबन्ध का प्रथम कार्य माना जाता है, जो किसी भी उपक्रम म संतोषप्रद परिणाम प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। नियोजन एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा प्रबन्धक भविष्य के बारे में सोचता है तथा उपक्रम के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अनुकूलतम मार्ग का चुनाव करता है । वास्तव में योजना बनाते समय जब प्रबन्धक भावी कार्यक्रम क बार में गहराई से सोचता है, तो उसे भविष्य में उत्पन्न हो सकने वाले विभिन्न खतरों का आभास हाता है, या योजना के अभाव में शायद ही होता और इस प्रकार प्रबन्धक उन खतरों व कठिनाइयों से बचने के लिए आवश्यक कदम उठाने में समर्थ होता है। 

(2) संगठन-

प्रबन्ध प्रक्रिया में नियोजन के पश्चात् संगठन का स्थान है,क्योंकि नियोजन के अन्तर्गत निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए श्रम, पूँजी, मशीन, कच्चा माल आदि जुटाने होते हैं। इनका प्रभावपूर्ण उपयोग एक अच्छे संगठन या तन्त्र द्वारा ही सम्भव है। किसी भी उपक्रम में सफलता बहुत कुछ इसी तथ्य पर निर्भर करेगी कि उस उपक्रम की संगठन संरचना योजना लक्ष्यों के अनुरुप की गयी है या नहीं। 

(3) नियुक्तियाँ-

एक उपक्रम में संगठन संरचना का निर्धारण हो जाने के बाद आवश्यकता होती है, उस संगठन में सृजित विभिन्न पदों (प्रबन्ध संचालक से लेकर सुपरवाइजरों तक) पर योग्य व्यक्तियों की नियुक्तियाँ हों । नियुक्तियों का यह कार्य भी प्रबन्धकीय कार्य है और इसी प्रक्रिया का एक भाग है। 

(4) निर्देशन-

एक उपक्रम में लक्ष्यों के अनुरूप संगठन, संरचना व आवश्यक नियुक्तियाँ कर लेने के बाद आवश्यकता होती है, कर्मचारियों को दिशा-निर्देश प्रदान करने की, ताकि वे लक्ष्य की ओर बढ़ सके। इस प्रकार निर्देशन प्रबन्धकीय प्रक्रिया के महत्वपूर्ण चरण के रूप में प्रवन्ध का एक प्रमुख कार्य है। 

निर्देशन में नेतृत्व भी शामिल है। उच्च प्रबन्ध के अन्तर्गत नेतृत्व क्षमता भी होनी चाहिए, जिसके द्वारा वह अन्य कर्मचारियों का सहयोग प्राप्त कर सकता है। अच्छा नेतृत्व अपने अधीनस्थों में वफादारी तथा हितों की भावना भर देता है और इस प्रकार उनसे कार्य में पूर्ण सहयोग प्राप्त करता है तथा उद्देश्य प्राप्त करने में सफल होता है ! 

(5) अभिप्रेरणा-

अभिप्रेरणा प्रबन्ध का एक प्रमुख कार्य है। यद्यपि आभप्रेरणा का कार्य निर्देशन या नेतृत्व का ही एक भाग है, परन्तु अधिकांश प्रबन्धशास्त्री आधुनिक समय में 

अभिप्रेरणा के महत्व को स्वीकारते हुए इसको प्रबन्ध पृथक् कार्य के रूप में ही प्रदर्शित करते 

प्रत्येक उपक्रम में उत्पादन प्रक्रिया में भौतिक (कच्चा माल, मशीन आदि) तथा मानवीय संसाधनों (श्रम) का उपयोग किया जाता है, परन्तु इन दोनों में भी मानवीय संसाधन ही अधिक हित्वपूर्ण है, जो वास्तव में भौतिक संसाधनों का प्रयोग सम्भव बनाते हैं। इसलिए श्रमिकों प्रबन्ध का परिचय तथा प्रबन्धकीय भूमिकाएँ एवं कर्मचारियों को कार्य के लिए अभिप्रेरित करना प्रबन्धकों की दृष्टि से महत्वपूर्ण कार्य बन जाता है। कुशल निर्देशन या नेतृत्व वही माना जाता है, जो अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के मनोबल को ऊँचा रखकर उन्हें उपक्रम के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अभिप्रेरित कर सक।

(6)सम्प्रेषण या संदेशवाहन–

प्रबन्धकीय प्रक्रिया में अभिप्रेरणा के बाद साप्रेषण का स्थान है और यह प्रबन्ध का महत्वपूर्ण कार्य है । साधारण बोलचाल की भाषा में सम्प्रेषण का आशय है विचारों व सूचनाओं का संवहन । वास्तव में अभिप्रेरणा और सम्प्रेषण एक-दूसरे से जुड़े हुए है । उचित सम्प्रेषण के अभाव में कर्मचारियों को अभिप्रेरित करने की प्रत्येक योजना निरर्थक ही सिद्ध होगी। यदि अभिप्रेरणा द्वारा योजनाओं को सफल बनाना है, तो यह आवश्यक है कि उच्च प्रबन्ध द्वारा बनायी गयी योजनाएँ व उनके विचार सही रूप में और शीघ्रता के साथ कर्मचारियों तक सम्प्रेषित हों और उनके सम्बन्ध में कर्मचारियों की प्रक्रिया तथा सुझाव उच्च प्रबन्धक तक पहुँचते रहें। 

(7) नियन्त्रण-

नियन्त्रण प्रबन्धकीय प्रक्रिया का अन्तिम चरण है। नियन्त्रण से आशय ऐसी प्रक्रिया से है, जिसमें यह सुनिश्चित किया जाता है कि कार्य योजनानुसार हो रहा है या नहीं। यदि परिणाम (Results) योजना लक्ष्यों से दूर हैं अर्थात् असन्तोषजनक हैं, तो सुधारात्मक कदम उठाना भी नियन्त्रण का भाग है। उदाहरण के लिए, यदि किसी कम्पनी में उत्पादन की लागत पूर्व निर्धारित लागत से अधिक आ रही है, तो प्रबन्धक का यह दायित्व है कि वह लागत अधिक आने के कारणों का पता लगाये और सुधारात्मक कदम उठाकर लागत को नियन्त्रित करें। 

(8) समन्वय-

कुछ प्रबन्धशास्त्री समन्वय को प्रबन्ध का कार्य मानते हैं, तो कुछ अन्य इसे प्रबन्ध का सार (Essence) मानते हैं, परन्तु इसे जो कुछ भी माना जाय, यह अवश्य है कि एक उपक्रम के कुशल संचालन के लिए उपक्रम के विभिन्न विभागों व उप-विभागों के मध्य समन्वय (Co-ordination) किया जाना आवश्यक है । अन्यथा परिणाम असन्तोषजनक होंगे और लक्ष्य प्राप्त कर पाना असम्भव होगा। 

(I)समन्वय से आशय सामूहिक प्रयासों की ऐसी अचूक व्यवस्था से है, जिसमें कार्य की एकजुटता रहती है तथा कार्य निर्बाध रूप से संचालित होता रहता है। इसीलिए समन्वय की समस्या अधिकांशतः वृहद् आकार के उपक्रमों में उत्पन्न होती है, जहाँ उपक्रम के विभाग, उपविभाग व शाखाएँ, बड़ी संख्या में पायी जाती हैं और उन सभी के कार्यों में समन्वय स्थापित करना एक जटिल कार्य होता है।

(II) सहायक कार्य-प्रबन्ध के द्वारा प्रमुख कार्यों के अतिरिक्त भी कुछ कार्य करने होते हैं, जिन्हें निम्न प्रकार से सहायक कार्य कहा जा सकता है-

(1) निर्णयन-

प्रबन्धक जो भी कार्य करता है, वह निर्णयन पर आधारित होता है। किसी भी कार्य को करने के लिए अनेक वैकल्पिक साधन हो सकते है, किन्तु उनमें से सर्वोत्तम साधन के चुनाव के लिए ही निर्णय लेना पड़ता है। निर्णय जितना अधिक सही होगा व्यवसाय उतनी ही अधिक प्रगति करेगा। अनुभव, विवेक और अन्तर्ज्ञान आदि निर्णय करने की परम्परागत विधियाँ हैं तथा क्रियात्मक अनुसन्धान, सांख्यिकीय प्रणालियाँ एवं मॉडल निर्माण निर्णय की आधुनिक विधियाँ हैं। 

(2) नवाचार या नव-प्रवर्तन-

इसका अर्थ उत्पादन के एक नये डिवीजन, एक नई उत्पादन पद्धति, नई विपणन तकनीक तथा नवीन कार्य से लगाया जाता है। व्यवसाय के विकास के लिये यह आवश्यक है कि परम्परागत तरीकों के बजाय सभी क्षेत्रों में नवीन पद्धतियों का प्रयोग किया जाये। आधुनिक प्रबन्ध ‘लकीर के फकीरों’ का न होकर ‘नयी पद्धति’ के लोगों का है। इस प्रकार नवाचार या नव-प्रवर्तन प्रबन्ध का महत्वपूर्ण कार्य है। 

(3) प्रतिनिधित्व-

वर्तमान में प्रबन्ध के इस कार्य को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है। इससे हमारा आशय व्यावसायिक संस्था का प्रतिनिधित्व करने से है । निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि प्रबन्ध के उपरोक्त कार्यों को अन्तिम नहीं कहा जा सकता है। प्रबन्ध एक गतिशील धारणा है, अतः प्रबन्ध के नित नये कार्यों का उदय हाना प्वाभाविक है। इस प्रकार प्रबन्ध की नये परिप्रेक्ष्य में नई कार्यप्रणाली का निर्धारण हो जाता 

अवधारणा से तात्पर्य किसी वस्तु, या व्यक्ति के सम्बन्ध में विचारधारा या आकृति से है, जो उस वस्तु, कार्य या व्यक्ति की विशेषताओं के आधार पर किसी व्यक्ति के अस्तिष्क में बनती है-

मानव सभ्यता के उदय के साथ ही प्रबन्ध शब्द का जन्म हुआ। उस समय प्रबन्ध का कार्य मानव संगठन के कुशल संचालन एवं राज्यों के प्रशासनिक कार्यों के लिए प्रशासन पम्बन्धी सिद्धान्तों का निर्माण करना था। सभ्यता के विकास के साथ-साथ प्रबन्ध की बधारणाएँ बदलती गयीं। प्रबन्ध को जिस व्यक्ति ने जिस रुप में देखा तथा उसकी जिन शेषताओं को महत्वपूर्ण माना, उसी के अनुरुप उसने प्रबन्ध की धारणा बना ली है। प्रबन्ध से अवधारणाओं को अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से निम्न दो वर्गों में विभक्त कर सकते है- 

(I) सामान्य अवधारणाएँ,

(II) नवीन अवधारणाएँ।

(I) प्रवन्ध की सामान्य अवधारणायें (General Concepts of Management) – 

प्रबन्ध का परिचय तथा प्रबन्धकीय भूमिकाएँ (मिण्टबर्ग)5 प्रबन्ध की सामान्य अवधारणायें निम्नलिखित हैं –

(1) प्रबन्ध अधिकार सत्ता की एक प्रणाली के रूप में प्रशासनिक विशेषज्ञ प्रबन्ध को अधिकार सत्ता की एक प्रणाली मानते हैं। प्रबन्धकों की यह सत्ता उनके पद स्तर अधिकारी, संविधान एवं ज्ञान पर आधारित होती है। एक संस्था में प्रत्येक स्तर पर प्रबन्धक होते हैं जो अपने-अपने स्तरों पर नीतियाँ योजनाएँ कार्य प्रणालियां एवं आपसी सम्बन्ध निर्धारित करते

(2) प्रबन्ध एक आर्थिक संसाधन के रुप में अर्थशास्त्री प्रबन्ध को भी उत्पादन का एक महत्वपूर्ण अंग मानते हैं। क्योंकि योग्य प्रबन्धकों पर ही फर्म की उत्पादकता एवं लाभदेयता निर्भर करती है। जिन उद्योगों में नवप्रवर्तनों का तेजी से प्रयोग किया जा रहा है उनमें पूँजी एवं श्रम के स्थान पर प्रबन्ध का महत्व बढ़ जाता है। गतिशील उद्योगों में प्रबन्धकीय विकास के द्वारा उत्पादन एवं लाभों में वृद्धि की जा रही है। 

(3) प्रबन्ध एक वर्ग एवं स्थिति के रूप में प्रबन्ध व्यक्तियों का समूह है, जो अपने प्रबन्धकीय ज्ञान एवं शिक्षा के आधार पर व्यवसाय का संचालन करना है। विशेषज्ञों का यह समूह अन्य व्यक्तियों से कार्य करवाने के लिये विभिन्न प्रबन्धकीय कार्य जैसे नियोजन, संगठन, निर्देशन तथा नियन्त्रण करता है । इस प्रकार प्रबन्ध अपने अधीनस्थों के कार्यों के लिए उत्तरदायी होते हैं। 

(4) प्रबन्ध एक विषय या ज्ञान की शाखा के रूप में कानून, चिकित्सा, अभियांत्रिकी, भौतिकी तथा अन्य विज्ञानों की भाँति प्रबन्ध भी वर्तमान में एक स्वतन्त्र ज्ञान एवं व्यवहार की शाखा के रुप में स्वीकार किया जाने लगा है। वर्तमान में प्रबन्ध एक विषय एवं संगठित ज्ञान समूह के रुप में विकसित हो चुका है, जिसका औपचारिक प्रशिक्षण किया जा सकता है। किन्तु मानव व्यवहार से सम्बन्धित होने के कारण प्रबन्ध एक जड़ विज्ञान नहीं बल्कि गत्यात्मक विधा 

(5) प्रबन्ध एक कौशल तथा कला-कुछ विद्वानों ने प्रबन्ध को दूसरों से कार्य करवाने की एक कला तथा मानवीय व्यवहार एवं प्रयासों को निर्देशित करने की नेतृत्व योग्यता एवं शैली माना है। 

(6) प्रबन्ध एक प्रक्रिया के रुप में-प्रबन्ध निश्चित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु संगठन के साधनों को समन्वित करने की प्रक्रिया है। प्रबन्ध मानवीय प्रयासों, कार्यों, तकनीक व अन्य संसाधनों को संयोजित करने एवं समन्वित करने की प्रक्रिया है ताकि संगठन के उद्देश्यों की पूर्ति की जा सके। 

(7) प्रबन्ध एक निर्वाह की शैली-प्रबन्ध को जीवन निर्वाह की शैली एवं ढंग के रुप में देखा जाता है। इस अर्थ में प्रबन्ध वह कार्य है, जिसमें दूसरों से कार्य करवाने की जिम्मेदारी उठायी जाती है। प्रबन्ध व्यवसायिक संगठन एवं प्रशासन सम्बन्धी परामर्श देने का एक पेशा 

(II) प्रबन्ध की नवीन अवधारणाएँ (New Concepts of Management)-

वर्तमान कम्प्यूटर के युग में प्रबन्ध की कुछ नवीन अवधारणाओं का जन्म हुआ है, जो निम्नलिखित हैं –

(1) वैज्ञानिक प्रबन्ध की अवधारणा-

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में प्रबन्ध ने एक नया रूप ग्रहण किया जिसे वैज्ञानिक प्रबन्ध कहा जाता है । टेलेर, थियो हैमन, एवं अन्य कुछ विद्वानों के अनुसार वैज्ञानिक अवधारणा आधुनिक प्रबन्ध की आधारशिला है। प्रबन्ध की वैज्ञानिक अवधारणा के अनुसार एक ऐसा विज्ञान है,जो नियोजन,संगठन, समन्वय,संचालन, अभिप्रेरणा तथा नियन्त्रण से सम्बन्धित सिद्धान्तों का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। प्रबन्ध के अन्तर्गत की जाने वाली प्रत्येक क्रिया का कुछ न कुछ वैज्ञानिक आधार होता है । इसीलिए प्रबन्ध को एक व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध विज्ञान कहते है । 

(2) सामूहिक प्रयास अवधारणा–

प्रबन्ध के आधुनिक दृष्टिकोण से एक व्यक्ति चाहे वह स्वयम कितना ही निपुण क्यों न हो,वह अधिक सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। अतः निर्धारित उद्देश्यों एवं लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये सामहिक प्रयासों अर्थात् नियोजन, संगठन, निर्देशन, समन्वय, अभिप्रेरणा तथा नियन्त्रण की आवश्यकता होती है और इसी का नाम प्रबन्ध है। 

(3) मानव प्रधान अवधारणा-

इस अवधारणा की मुख्य मान्यता यह है कि, प्रबन्ध का विषय मानव है तथा प्रबन्ध मलत: मनुष्यों का विकास है। संस्था अपने उद्देश्यों को तभा प्राप्त कर सकती है जबकि प्रबन्धक कर्मचारियों के व्यक्तित्व,कार्य,गुणों तथा कार्यकौशल का ठीक विकास करे। तभी न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन सम्भव है।

(4) नेतृत्वरूपी अवधारणा-

किसी भी उपक्रम की सफलता उनकी संगठन शक्ति द्वारा सम्भव है जो कुशल नेतृत्व से पायी जाती है। यही कारण है कि वर्तमान में यह अनुभव किया जाने लगा है कि कुशल नेतृत्व से ही संगठन में कुशलता व निरन्तरता बनायी जा सकती है और उत्पादन व उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है। 

(5) पेशेवर अवधारणा-

आधुनिक प्रबन्धक प्रबन्ध को एक पेशा मानते हैं और उसी रुप में आज इसका तेजी से विकास हो रहा है। 

(6) अन्य लोगों के साथ मिलकर कार्य करने की अवधारणा-प्रारम्भ में माना जाता था कि अन्य लोगों से कार्य लेना ही प्रबन्ध है चाहे यह कार्य किसी भी प्रकार से लिया जाये। यह प्रबन्ध का बड़ा संकीर्ण अर्थ था व उसमें तानाशाही प्रकृति की दुर्गन्ध आती है।

(7) सार्वभौमिकता की अवधारणा-

यह अवधारणा हेनरी फेयोल की देन है। उनके अनुसार, “प्रबन्ध एक सार्वभौमिक क्रिया है जो प्रत्येक संस्था में चाहे वह धार्मिक हो, राजनैतिक हो, सामाजिक हो अथवा व्यावसायिक एवं औद्योगिक हो समान रुप से सम्पन्न की जाती है।” 

(8) कार्यात्मक अवधारणा

कार्यात्मक अवधारणा प्रबन्ध को एक प्रक्रिया के रुप में मानती है। यदि देखा जाये तो आधुनिक प्रबन्ध अवधारणा का व्यावहारिक रुप प्रबन्ध की प्रक्रिया है। यही कारण है कि आधुनिक प्रबन्धशास्त्री प्रबन्ध को एक प्रक्रिया के रूप में ही परिभाषित करते हैं। – प्रबन्ध के सम्बन्ध में विभिन्न अवधारणाएँ इस बात की प्रतीक है कि प्रबन्ध का अध्ययन ‘अर्थ विज्ञान के जंगल में एक लम्बी यात्रा है, प्रबन्ध के स्वरुप व क्षेत्र में अनेक परिवर्तनों के कारण इसका अर्थ गतिशील रहा है।’ बेच के शब्दों में, “वास्तव में प्रबन्ध शब्द अर्थ सदैव स्पष्ट नहीं हो पाता और सदैव उस अर्थ को स्वीकार भी नहीं किया जा सकता है।” फिर भी अधिकांश विद्वानों ने प्रबन्ध का अर्थ एक प्रक्रिया एवं कार्य के रुप में ही लगाया है। 

प्रबन्ध की प्रकृति (Nature of Management)

एक दर्शन के रूप में प्रबन्ध एक निरन्तर परिवर्तनशील धारणा है । सामूहिक क्रियाओं में बदलते हुए स्वरूप के साथ-साथ इस शब्द ने नया परिवेश पाया है। यही कारण है कि प्रबन्ध की प्रकृति के सम्बन्ध में विभिन्न प्रबन्ध विद्वानों ने समय-समय पर विभिन्न विचार प्रकट किए हैं जिनको अध्ययन की सुविधा की दष्टि से हम निम्न वर्गों में रख सकते है 

प्रबन्ध कला अथवा विज्ञान के रूप में (Management an Art or a Science)-

प्रबन्ध कला है या विज्ञान अथवा दोनों ही हैं. इस तथ्य की सत्यता का पता लगाने के लिये यह आवश्यक है कि पहले हम कला व विज्ञान दोनों का अलग-अलग अध्ययन करें। 

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Development of Management Thought and Contigency Approach

प्रबन्धकीय विचारधाराओं का विकास एवं संयोगिक दृष्टिकोण

प्रबन्ध के क्षेत्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रतिपादकों में फ्रांस के प्रसिद्ध उद्योगपति श्री हेनरी फेयोल का नाम अत्यन्त सम्मान के साथ लिया जाता है क्योंकि उनके जीवन का अधिकांश समय कुशल प्रबंधक के रूप में व्यतीत हुआ। इनकी गाथा ही प्रबंध प्रेरणा का कार्य करती है। 19 वर्ष की आयु में खदान अभियन्ता की शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् फ्रांस की एक प्रसिद्ध कोयला खान कम्पनी में उनकी जूनियर इन्जीनियर के पद पर नियुक्त हुई। इसी संस्था में वह 6 वर्ष के पश्चात् कोयला खानों के प्रबंधक नियुक्त हो गये और 20 वर्ष तक इसी : ? र कार्य किया। किन्तु इसके उपरान्त संस्था को हानि होने लगी तथा उसकी आर्थिक स्थिति कम हो गयी तो पुनः 47 वर्ष की आयु में इन्हें संस्था का जनरल मैनेजर बना दिया गया। अपनी लगन व निष्ठा से इन्होंने संस्था के विकास को चरम सीमा तक पहुँचा दिया। सन् 1918 में इस कम्पनी को सेवा से निवृत्त हो गये परन्तु अपनी मृत्यु (1925) तक संस्था के संधा, बने रहे। इस अवधि में ही इन्होंने अपना अधिकांश समय प्रबन्ध के सिद्धान्तों ‘ को खोजने में लगाया। 

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Planning and Corporate Planning

नियोजन का आशय

नियोजन’ का शाब्दिक अर्थ है किसी वांछित उद्देश्य की पूर्ति के लिए पहले से ही कार्यक्रम की रूपरेखा बनाना। नियोजन एक बौद्धिक प्रक्रिया है। सामान्य, अ५ मा का ह, कस करना है, किसे करना, कब करना है ? इन सब बातों का पूर्व निर्धारण ही नियोजन कहलाता है। 

प्रबन्ध के सभी प्रमुख विचारकों ने नियोजन की निम्न परिभाषाएँ दी हैं . मेरी के० नाइल्स के अनुसार, “एक उद्देश्य की पर्ति के लिए कार्यपथ के चयन एवं विकास करने का सचेतन प्रयास ही नियोजन है। यह वह आधार है, जिससे प्रबन्ध के भावी कार्य निकलते हैं।

कूण्टज ओ डोनेल के अनुसार, “नियोजन एक बौद्धिक प्रक्रिया है; कार्य करने के मार्ग का सचेत निर्धारण है तथा निर्णयों को उद्देश्यों, तथ्यों तथा पूर्वनिर्धारित अनुमानों पर आधारित करना है।”

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Decision and Management by Objectives

निर्णयन का अर्थ 

साल शब्दों में, किसी कार्य को करने के लिए अनेक उपलब्ध विकल्पों में से एक उपयुक्त के चनने के कार्य को निर्णय लेना कहते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि किसी भी कार्य को करने के लिए अनेक विकल्प या मार्ग या रास्ते या विधियाँ हो सकती हैं। अत: इस बात की आवश्यकता है कि हम ज्ञात करें कि किसी भी कार्य को करने के लिए भने सम्भव विकल्प हो सकते हैं और फिर उन विकल्पों में से अपने संगठन के लिए एक लोत्तम विकल्प को चुनें । कौन-सा विकल्प सर्वोत्तम होगा, इसका निर्णय करना संगठन की परिस्थिति, क्षमता तथा आवश्यकता पर निर्भर है।

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Organization Structure and Contingency Factors

संगठन 

जब कभी दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी उपक्रम में साथ-साथ कार्य करते हैं तो इन व्यक्तियों के मध्य कार्य का विभाजन कर उनमें समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता होती है । इसा का नाम संगठन है और यहीं से संगठन की क्रिया का शभारम्भ होता है। शरीर में अनेक छोटे-छोटे भाग होते हैं तथा प्रत्येक भाग का एक नियत कार्य होता है और का कार्य-कार्य करना; मुख का खाना; पेट का पचाना; टांगों का चलनाः आँखों का कान एवं नाक का सुनना तथा सूचना इत्यादि, किन्तु इन विभिन्न भागों के अतिरिक शरीर के मस्तिष्क में एक केन्दीय विभाग भी होता है, जो समस्त क्रियाओं का नियोजन है-

विभिन्न भागों का निर्देशन एवं संचालन करता है तथा उस पर पर्याप्त नियन्त्रण रखता मानव शरीर की भांति ही व्यावसायिक संस्था भी विभिन्न विभागों में विभक्त होती है और विभाग. वित्त विभाग. कर्मचारी विभाग, विक्रय विभाग इत्यादि । अतः विभिन्न विभागों में प्रभावपूर्ण समन्वय स्थापित करने की कला को ही संगठन कहते हैं।

संगठन के कार्य को कई विद्वानों ने अपने-अपने हिसाब से परिभाषित किया जिनमें निम्न प्रमुख हैं –

प्रो० आर० सी० डेविस के अनुसार, “संगठन व्यक्तियों का एक ऐसा समह है जो सामान्य उद्देश्य की पूर्ति हेतु नेतृत्व के निर्देशन के अन्तर्गत सहयोग करते हैं।” 

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Authority & Resposibility and Centrialization

अधिकार का अर्थ 

अधिकार प्रबन्ध कार्य की कुन्जी है। बिना अधिकार प्राप्त हुए कोई भी प्रकार सफलतापूर्वक अपना उत्तरदायित्व नहीं निभा सकता है। अधिकार प्राप्त प्रबन्धक कार्य को सम्पन्न करने के लिये कर्मचारियों को आदेश देता है, जिससे संस्था के उद्देश्यों की पति की जा सके । अधिकार का तात्पर्य किसी व्यक्ति को प्राप्त उस वैधानिक शक्ति से है जिसके आधार पर वह दूसरों को आदेश दे सकता है। अन्य शब्दों में, संगठन के उद्देश्यों और लक्ष्यों को प्राप्ति के लिये संगठन के अन्तर्गत कार्य करने वालों की गति विधियों का मार्गदर्शन करने तथा उनसे कार्य लेने के लिये आदेश देने के लिये प्राप्त शक्ति को अधिकार कहा जा सकता है। 

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Motivaton Concept & Theories (Moslow, Herzberg, Megregor and Ouchi)

अभिप्रेरणा 

एक प्रबन्धक बिना यह जाने कि व्यक्तियों को क्या अभिप्रेरित करता है, अपने दायित्वों का सफलतापूर्वक निष्पादन नहीं कर सकता है। अतः व्यवसाय में अभिप्रेरण होना बहुत जरूरी है! 

अभिप्रेरण शब्द ‘प्रेरण’ (Motive) से निकला है। प्रेरणाएँ मानवीय आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति को कहते हैं, जिसका आशय है-“साभिप्रायिक आवश्यकतायें। 

सरल शब्दों में इसका अर्थ है कि जब कोई मनुष्य कोई भी कार्य करता है, तो उसके पीछे उसकी कोई आवश्यकता अवश्य होती है, जो उसे कार्य को करने के लिए प्रेरित करती है ।

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Leadership-Concept, styles and Theories

नेतृत्व 

नेतृत्व प्रबन्ध की आत्मा है । प्रबन्ध के लिये नेतृत्व गुणों को इतना अधिक महत्व दिया गया है कि अनेक बार लोगों को यह प्रतीत होने लगता है कि प्रबन्धक एवं नेता एक समान हैं। कूण्ट्ज एवं ओ’डोनेल ने प्रबन्ध में नेतृत्व की भूमिका दर्शाते हुए कहा है कि “प्रबन्धकों को नेता अवश्य होना चाहिए, चाहे नेतागण प्रबन्धक हों अथवा नहीं।” अतः कोई प्रबन्धक अपने नेतृत्व गुणों से अधीनस्थों से वांछित कार्य को पूर्ण नहीं करा लें, तब तक संगठन के उद्देश्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता है। 

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Communication- Nature, process, Network

संचार या सम्प्रेषण 

आधुनिक युग में प्रभावी सम्प्रेषण ही किसी भी व्यवसाय की सफलता का मूलमन्त्र है। सम्प्रेषण के द्वारा ही एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जाता है। दूसरे शब्दों में, “यह कहा जा सकता है कि आधुनिक युग की सफलता सम्प्रेषण पर ही निर्भर करती है।

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Concept, Process and Techniques of Managerial control

नियन्त्रण का अर्थ एवं परिभाषाएँ 

किसी उपक्रम अथवा उसके विभागों के लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अपनायी गयी योजनाएं यथाविधि कार्यान्वित की जा रही हैं अथवा नहीं, यह जानने के लिए अधीनस्थों के कार्यों की जांच पड़ताल करके उनमें आवश्यकतानुसार सुधार करना प्रबन्धकीय नियन्त्रण’ कहलाता है । नियन्त्रण पथ-प्रदर्शन एवं नियमन का कार्य करता है। पूर्वानुमान एवं नियोजन तो भविष्य के लिए निर्णय लेने से सम्बन्धित है, परन्तु नियन्त्रण वह प्रबन्धकीय कार्य होता है, जो निर्धारित नीतियों व योजनाओं के उचित क्रियान्वयन के सतत् अनुगमन से सम्बन्ध रखता है। ‘प्रबन्धकीय नियन्त्रण’ के अर्थ को भली प्रकार समझने के लिए निम्नलिखित परिभाषाओं का उल्लेख आवश्यक है-

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mangement and resistance of Change

परिवर्तन के प्रबन्ध 

परिवर्तन प्रकृति नियम है । जो कल था, वह आज नहीं है जो आज है वह कल की होगा। क्षेत्र चाहे धार्मिक हो, राजनीतिक, सामाजिक हो, आर्थिक हो या व्यावसायिक सभी में निरन्तर हो रहे हैं और यह क्रम आगे भी जारी रहेगा। व्यवसाय के क्षेत्र में एक समय था जब प्रबन्धक कर्मचारी को उत्पादन करने वाली मशीन मानते थे उसमें परिवर्तन हुआ और कर्मचारी को उत्पादन का प्रमुख अंग माना गया और अब उसे उपक्रम का सहभागी माना जाता है। इसी प्रकार पुरानी व्यवस्था की कमियों को दूर करते हुए नई व्यवस्था को अपनाना ही परिवर्तन है। विभिन्न विद्वानों ने परिवर्तन को इस प्रकार परिभाषित किया है

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